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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 380, कुल 558 में से

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पृष्ठ 380

२६८ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।१८ § ६९६-
युज्यते । तन्मूलाः सर्वे दोषाः । ममेदमिति हि सति संकल्पे संरक्षणादयः संजायन्ते । तत्र च हिंसा-
वश्यंभाविनी । तदर्थमनृतं जल्पति । चौर्यं वा१ आचरति । मैथुने च कर्मणि प्रयतते । तत्प्रभवा
नरकादिषु दुःखप्रकाराः ।
§ ६९६. एवमुक्तेन२ प्रकारेण हिंसादिदोषदर्शिनोऽहिंसादिगुणाहितचेतसः परमप्रयत्नस्या-
५ हिंसादीनि व्रतानि यस्य सन्ति सः—
निःशल्यो व्रती ॥१८॥
§ ६९७. शृणाति हिनस्तीति शल्यम् । शरीरानुप्रवेशि काण्डादिप्रहरणं३ शल्यमिव शल्यं
यथा तत् प्राणिनो बाधाकरं तथा४ शरीरमानसबाधाहेतुत्वात्कर्मोदयविकारः शल्यमित्युपचर्यते ।
तत् त्रिविधम्—मायाशल्यं निदानशल्यं मिथ्यादर्शनशल्यमिति । माया निकृतिर्वञ्चना । निदानं
१० विषयभोगाकाङ्क्षा । मिथ्यादर्शनमतत्त्वश्रद्धानम् । एतस्मात्त्रिविधाच्छल्यान्निष्क्रान्तो निःशल्यो
व्रती इत्युच्यते । अत्र चोद्यते—शल्याभावान्निःशल्यो व्रताभिसंबन्धाद् व्रती, न निःशल्यत्वाद् व्रती
भवितुमर्हति । न हि देवदत्तो दण्डसंबन्धाच्छत्री भवतीति । अत्रोच्यते—उभयविशेषणविशिष्ट५-
स्येष्टत्वात् । न हिंसाद्युपरतिमात्रवृता६भिसंबन्धाद् व्रती भवत्यन्तरेण शल्याभावम् । सति शल्या-
पगमे व्रतसंबन्धाद् व्रती विवक्षितो यथा बहुक्षीरघृतो गोमानिति व्यपदिश्यते । बहुक्षीरघृताभा-
१५ इसलिए उनमें होनेवाला संकल्प परिग्रह है यह बात बन जाती है। सब दोष परिग्रहमूलक ही
होते हैं। 'यह मेरा है' इस प्रकारके संकल्पके होनेपर संरक्षण आदि रूप भाव होते हैं। और
इसमें हिंसा अवश्यंभाविनी है। इसके लिए असत्य बोलता है, चोरी करता है, मैथुन कर्ममें प्रवृत्त
होता है। नरकादिकमें जितने दुःख हैं वे सब इससे उत्पन्न होते हैं।
§ ६९६. इस प्रकार उक्त विधिसे जो हिंसादिमें दोषोंका दर्शन करता है, जिसका चित्त
२० अहिंसादि गुणोंमें लगा रहता है और जो प्रयत्नशील है वह यदि अहिंसादि व्रतोंको पाले तो किस
संज्ञाको प्राप्त होता है इसी बातका खुलासा करनेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
जो शल्यरहित है वह व्रती है ॥१८॥
६९७. 'शृणाति हिनस्ति इति शल्यम्' यह शल्य शब्दकी व्युत्पत्ति है। शल्यका अर्थ है
पीड़ा देनेवाली वस्तु। जब शरीरमें कांटा आदि चुभ जाता है तो वह शल्य कहलाता है। यहाँ
२५ उसके समान जो पीड़ाकर भाव है वह शल्य शब्दसे लिया गया है। जिस प्रकार काँटा आदि
शल्य प्राणियोंको बाधाकर होती है उसी प्रकार शरीर और मन सम्बन्धी बाधाका कारण होनेसे
कर्मोदयजनित विकारमें भी शल्यका उपचार कर लेते हैं अर्थात् उसे भी शल्य कहते हैं। वह
शल्य तीन प्रकारकी है—माया शल्य, निदान शल्य और मिथ्यादर्शन शल्य। माया, निकृति और
वंचना अर्थात् ठगनेकी वृत्ति यह माया शल्य है। भोगोंकी लालसा निदान शल्य है और अतत्त्वों-
३० का श्रद्धान मिथ्यादर्शन शल्य है। इन तीन शल्योंसे जो रहित है वही निःशल्य व्रती कहा जाता
है। शंका—शल्यके न होनेसे निःशल्य होता है और व्रतोंके धारण करनेसे व्रती होता है। शल्य-
रहित होनेसे व्रती नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ देवदत्तके हाथमें लाठी होनेपर वह छत्री नहीं हो
सकता ? समाधान—व्रती होनेके लिए दोनों विशेषणोंसे युक्त होना आवश्यक है, यदि किसीने
शल्योंका त्याग नहीं किया और केवल हिंसादि दोषोंको छोड़ दिया तो वह व्रती नहीं हो सकता ।
३५ यहाँ ऐसा व्रती इष्ट है जिसने शल्योंका त्याग करके व्रतोंको स्वीकार किया है। जैसे जिसके यहाँ
१. चौर्यं चाचरति ता. । २. एवमुक्तक्रमेण हिंसा-ता० । ३. -प्रहरणं । तच्छल्य मु. । ४. तथा शरीर-
मु० । ५. -विशिष्टत्वात् मु० । ६. -मात्रसम्ब-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri