सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 389, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें- ७।२९ § ७१४ ] सप्तमोऽध्यायः २७७
तत्र ह्यल्पमूल्यलभ्यानि महार्घ्याणि द्रव्याणीति प्रयत्नः । प्रस्थादि मानम्, तुलाद्युन्मानम् । एतेन
न्यूनेनान्यस्मै देयमधिकानेनात्मनो ग्राह्यमित्येवमादिकूटप्रयोगो हीनाधिकमानोन्मानम् । कृत्रिमैर्हिरण्या-
दिभिर्वञ्चनापूर्वको व्यवहारः प्रतिरूपकव्यवहारः । त एते पञ्चादत्तादानाणुव्रतस्यातिचाराः ।
परविवाहकरणेत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमनानङ्गक्रीडाकाम-
तीव्राभिनिवेशाः ॥ २८ ॥ ५
§ ७१४. कन्यादानं विवाहः । परस्य विवाहः परविवाहः । परविवाहस्य करणं परविवाह-
करणम् । परपुरुषानिति गच्छतीत्येवं शीला¹ इत्वरी । कुत्सिता इत्वरी कुत्सायां क इत्वरिका । या
एकपुरुषभर्तृका सा परिगृहीता । या गणिकात्वेन पुंश्चलीत्वेन वा परपुरुषगमनशीला अस्वामिका
सा अपरिगृहीता । परिगृहीता चापरिगृहीता च परिगृहीतापरिगृहीते । इत्वरिके च ते परिगृहीता-
परिगृहीते च इत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीते, तयोर्गमने इत्वरिकापरिगृहीतापरिगृहीतागमने । अङ्गं १०
प्रजननं योनिश्च ततोऽन्यत्र क्रीडा अनङ्गक्रीडा । कामस्य प्रवृद्धः परिणामः कामतीव्राभिनिवेशः ।
त एते पञ्च स्वदारसंतोषव्रतस्यातिचाराः ।
क्षेत्रवास्तुहिरण्यसुवर्णधनधान्यदासीदासकुप्यप्रमाणातिक्रमाः ॥ २९ ॥
गयी है इसलिए अतिचार है । विरुद्ध जो राज्य वह विरुद्धराज्य है । राज्यमें किसी प्रकारका विरोध
होने पर मर्यादाका न पालना विरुद्धराज्यातिक्रम है । यदि वहाँ अल्प मूल्यमें वस्तुएँ मिल गयीं तो १५
उन्हें महँगा बेचनेका प्रयत्न करना विरुद्धराज्यातिक्रम है । मानपदसे प्रस्थ आदि मापनेके बाट लिये
जाते हैं और उन्मानपदसे तराजू आदि तौलनेके बाट लिये जाते हैं । कमती माप-तौलसे दूसरेको
देना और बढ़ती माप-तौलसे स्वयं लेना इत्यादि कुटिलतासे लेन-देन करना हीनाधिकमानोन्मान
है । बनावटी चाँदी आदिसे कपटपूर्वक व्यवहार करना प्रतिरूपक व्यवहार है । इस प्रकार ये
अदत्तादान अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं । २०
परविवाहकरण, इत्वरिकापरिगृहीतागमन, इत्वारिका-अपरिगृहीतागमन, अनङ्गक्रीड़ा और
कामतीव्राभिनिवेश ये स्वदारसन्तोष अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२८॥
§ ७१४. कन्याका ग्रहण करना विवाह है । किसी अन्यका विवाह परविवाह है और इसका
करना परविवाह-करण है । जिसका स्वभाव अन्य पुरुषोंके पास जाना-आना है वह इत्वरी कह-
लाती है । इत्वरी अर्थात् अभिसारिका । इसमें भी जो अत्यन्त आचरट होती है वह इत्वरिका २५
कहलाती है । यहाँ कुत्सित अर्थमें 'क' प्रत्यय होकर इत्वरिका शब्द बना है । जिसका कोई एक
पुरुष भर्ता है वह परिगृहीता कहलाती है । तथा जो वेश्या या व्यभिचारिणी होनेसे दूसरे पुरुषोंके
पास जाती-आती रहती है और जिसका कोई पुरुष स्वामी नहीं है वह अपरिगृहीता कहलाती है ।
परिगृहीता इत्वरिकाका गमन करना इत्वरिकापरिगृहीतागमन है और अपरिगृहीता इत्वरिकाका
गमन करना इत्वरिकाअपरिगृहीतागमन है । यहाँ अंग शब्दका अर्थ प्रजनन और योनि है । ३०
तथा इनके सिवा अन्यत्र क्रीडा करना अनंगक्रीडा है । कामविषयक बढ़ा हुआ परिणाम काम-
तीव्राभिनिवेश है । ये स्वदारसन्तोष अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ।
क्षेत्र और वास्तुके प्रमाणका अतिक्रम, हिरण्य और सुवर्णके प्रमाणका अतिक्रम, धन और
धान्यके प्रमाणका अतिक्रम, दासी और दासके प्रमाणका अतिक्रम तथा कुप्यके प्रमाणका अतिक्रम
ये परिग्रहपरिमाण अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२९॥ ३५
१. शीला इत्वरी कुत्सा-मु०, ता० ।