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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 397, कुल 558 में से

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पृष्ठ 397
  • ८।२ § ७३४ ] अष्टमोऽध्यायः २८५
    चतुर्णां योगकषायौ। उपशान्तकषायक्षीणकषायसयोगकेवलिनामेक एव योगः। अयोगकेवलिनो
    न बन्धहेतुः।
    § ७३३. उक्ता बन्धहेतवः। इदानीं बन्धो वक्तव्य इत्यत आह—
    सकषायत्वाज्जीवः कर्मणो योग्यान्पुद्गलानादत्ते स बन्धः ॥ २ ॥
    § ७३४. सह कषायेण वर्तत इति सकषायः। सकषायस्य भावः सकषायत्त्वम्। तस्मात्स- ५
    कषायत्वादिति। पुनर्हेतुनिर्देशः¹ जठराग्न्याशयानुरूपाहारग्रहणवत्तीव्रमन्दमध्यमकषायाशयानुरूप-
    स्थित्यनुभवविशेषप्रतिपत्त्यर्थम्²। अमूर्तिरहस्त आत्मा कथं कर्मादत्त इति चोदितः सन् ‘जीवः’
    इत्याह। जीवनाज्जीवः प्राणधारणादायूःसंबन्धान्नायुर्विरहादिति। ‘कर्मयोग्यान्’ इति लघुनिर्देशा-
    त्सिद्धे ‘कर्मणो योग्यान्’ इति पृथग्विभक्त्युच्चारणं वाक्यान्तरज्ञापनार्थम्। किं पुनस्तद्वा-
    क्यान्तरम्। कर्मणो जीवः सकषायो भवतीत्येकं वाक्यम्। एतदुक्तं भवति—‘कर्मणः’ इति १०
    हेतुनिर्देशः कर्मणो हेतोर्जीवः सकषायो भवति नाकर्मकस्य कषायलेपोऽस्ति। ततो जीवकर्मणोरना-
    दिसंबन्ध इत्युक्तं भवति। तेनामूर्तो जीवो मूर्तेन कर्मणा कथं बध्यते इति चोद्यमपाकृतं भवति।
    इतरथा हि बन्धस्यादिमत्त्वे आत्यन्तिकीं शुद्धिं दधतः सिद्धस्येव बन्धाभावः प्रसज्येत। द्वितीयं
    वाक्यं ‘कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते’ इति। अर्थवशाद्विभक्तिपरिणाम इति³ पूर्वहेतुसंबन्धं
    कषाय ये दो बन्धके हेतु हैं। उपशान्तकषाय, क्षीणकषाय और सयोगकेवली इनके एक योग ही १५
    बन्धका हेतु है। अयोगकेवलीके बन्धका हेतु नहीं है।
    § ७३३. बन्धके हेतु कहे। अब बन्धका कथन करना चाहिए इसलिए आगेका सूत्र
    कहते हैं—
    कषाय सहित होनेसे जीव कर्मके योग्य पुद्गलोंको ग्रहण करता है वह बन्ध है ॥२॥
    § ७३४. कषायके साथ रहता है इसलिए सकषाय कहलाता है और सकषायका भाव २०
    सकषायत्व है। इससे अर्थात् सकषाय होनेसे। यह हेतुनिर्देश है। जिस प्रकार जठराग्निके अनु-
    रूप आहारका ग्रहण होता है उसी प्रकार तीव्र, मन्द और मध्यम कषायाशयके अनुरूप ही स्थिति
    और अनुभाग होता है। इस प्रकार इस विशेषताका ज्ञान करानेके लिए सूत्रमें ‘सकषायत्वात्’ इस
    पदद्वारा पुनः हेतुका निर्देश किया है। अमूर्ति और बिना हाथवाला आत्मा कर्मोंको कैसे ग्रहण
    करता है इस प्रश्नका उत्तर देनेके अभिप्रायसे सूत्रमें ‘जीव’ पद कहा है। जीव शब्दका व्युत्पत्ति- २५
    लभ्य अर्थ है—जीवनाज्जीवः—जो जीता है अर्थात् जो प्राणोंको धारण करता है, जिसके आयुका
    सद्भाव है, आयुका अभाव नहीं है वह जीव है। सूत्रमें ‘कर्मयोग्यान्’ इस प्रकार लघु निर्देश
    करनेसे काम चल जाता फिर भी ‘कर्मणो योग्यान्’ इस प्रकार पृथक् विभक्तिका उच्चारण वाक्या-
    न्तरका ज्ञान करानेके लिए किया है। वह वाक्यान्तर क्या है? ‘कर्मणो जीवः सकषायो भवति’
    यह एक वाक्य है। इसका यह अभिप्राय है कि ‘कर्मणः’ यह हेतुपरक निर्देश है। जिसका अर्थ है ३०
    कि कर्मके कारण जीव कषायसहित होता है। कर्मरहित जीवके कषायका लेप नहीं होता। इससे
    जीव और कर्मका अनादि सम्बन्ध है यह कथन निष्पन्न होता है। और इससे अमूर्त जीव मूर्त
    कर्मके साथ कैसे बँधता है इस प्रश्नका निराकरण हो जाता है। अन्यथा बन्धको सादि मानने
    पर आत्यन्तिक शुद्धिको धारण करनेवाले सिद्ध जीवके समान संसारी जीवके बन्धका अभाव
    प्राप्त होता है। ‘कर्मणो योग्यान् पुद्गलानादत्ते’ यह दूसरा वाक्य है, क्योंकि, अर्थके अनुसार ३५
    विभक्ति बदल जाती है इसलिए पहले जो हेत्वर्थमें विभक्ति थी वह अब ‘कर्मणो योग्यान्’ इस
    प्रकार षष्ठी अर्थको प्राप्त होती है। सूत्रमें ‘पुद्गल’ पद कर्मके साथ तादात्म्य दिखलानेके लिए
    १. -निर्देशः किमर्थम् ? जठ-मु०, दि० १ । २. -त्यर्थः । अहस्त आत्मा ता०, ना० । ३. पूर्वं हेतु-मु० ।