सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६६ | सर्वार्थसिद्धौ | [ ७।१६ § ६९२ –
प्राप्नोति । नैष दोषः; सामान्येन मुक्तत्वात् । तथाहि—अयं भिक्षुः पिहितद्वारादिषु न प्रविशति
अमुक्तत्वात् । अथवा 'प्रमत्तयोगात्' इत्यनुवर्तते । प्रमत्तयोगाददत्तादानं यत् तत्स्तेयमित्युच्यते ।
न च रथ्यादि प्रविशतः प्रमत्तयोगोऽस्ति । तेनैतदुक्तं भवति, यत्र संक्लेशपरिणामेन प्रवृत्तिस्तत्र
स्तेयं भवति बाह्यवस्तुनो¹ ग्रहणे चाग्रहणे च ।
५ § ६९२. अथ चतुर्थमब्रह्म किंलक्षणमित्यत्रोच्यते—
मैथुनमब्रह्म ॥१६॥
§ ६९३. स्त्रीपुंसयोश्चारित्रमोहोदये सति रागपरिणामाविद्धयोः परस्परस्पर्शनं प्रति इच्छा
मिथुनम् । मिथुनस्य कर्म मैथुनमित्युच्यते । न सर्वं कर्म । कुतः । लोके शास्त्रे च तथा प्रसिद्धेः ।
लोके तावद्गोपालादिप्रसिद्धं स्त्रीपुंसयोः रागपरिणामनिमित्तं चेष्टितं मैथुनमिति । शास्त्रेऽपि
१० "अश्ववृषभयोर्मैथुनेच्छायाम्" इत्येवमादिषु तदेव गृह्यते । अपि च 'प्रमत्तयोगात्' इत्यनुवर्तते तेन
स्त्रीपुंसमिथुनविषयं रतिसुखार्थं चेष्टितं मैथुनमिति गृह्यते, न सर्वम् । अहिंसादयो⁴ गुणा यस्मिन्
परिपाल्यमाने बृंहन्ति वृद्धिमुपयान्ति तद् ब्रह्म । न ब्रह्म अब्रह्म इति । किं तत् । मैथुनम् । तत्र
हिंसादयो दोषाः पुष्यन्ति । यस्मान्मैथुनसेवनप्रवणः स्थास्नूँश्चरिष्णून् प्राणिनो हिनस्ति मृषावाद-
माचष्टे अदत्तमादत्ते अचेतनमितरं⁶ च परिग्रहं गृह्णाति ।
१५ अर्थ करने पर भी भिक्षुके ग्राम नगरादिकमें भ्रमण करते समय गली, कूचा, दरवाजा आदिमें
प्रवेश करने पर बिना दी हुई वस्तुका ग्रहण प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है;
क्योंकि वे गली, कूचा और दरवाजा आदि सबके लिए खुले हैं । यह भिक्षु जिनमें किवाड़ आदि
लगे हैं उन दरवाजा आदिमें प्रवेश नहीं करता, क्योंकि वे सबके लिए खुले नहीं हैं । अथवा,
'प्रमत्तयोगात्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है जिससे यह अर्थ होता है कि प्रमत्तके योगसे बिना दी
२० हुई वस्तुका ग्रहण करना स्तेय है । गली कूचा आदिमें प्रवेश करनेवाले भिक्षुके प्रमत्तयोग तो है
नहीं इसलिए वैसा करते हुए स्तेयका दोष नहीं लगता । इस सब कथनका यह अभिप्राय है कि
बाह्य वस्तु ली जाय या न ली जाय किन्तु जहाँ संक्लेशरूप परिणामके साथ प्रवृत्ति होती है वहाँ
स्तेय है ।
§ ६९२. अब चौथा जो अब्रह्म है उसका क्या लक्षण है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
२५ कहते हैं—
मैथुन अब्रह्म है ॥१६॥
§ ६९३. चारित्र मोहनीयका उदय होनेपर राग परिणामसे युक्त स्त्री और पुरुषके जो एक
दूसरेको स्पर्श करने की इच्छा होती है वह मिथुन कहलाता है और इसका कार्य मैथुन कहा
जाता है । सब कार्य मैथुन नहीं कहलाता क्योंकि लोकमें और शास्त्रमें इसी अर्थमें मैथुन शब्दकी
३० प्रसिद्धि है । लोकमें बाल गोपाल आदि तक यह प्रसिद्ध है कि स्त्री-पुरुषकी रागपरिणामके निमित्त-
से होनेवाली चेष्टा मैथुन है । शास्त्रमें भी 'घोड़ा और बैलकी मैथुनेच्छा होनेपर' इत्यादि वाक्योंमें
यही अर्थ लिया जाता है । दूसरे 'प्रमत्तयोगात्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है इसलिए रतिजन्य
सुखके लिए स्त्री-पुरुषकी मिथुनविषयक जो चेष्टा होती है वही मैथुन रूपसे ग्रहण किया जाता है
सब नहीं । अहिंसादिक गुण जिसके पालन करनेपर बढ़ते हैं वह ब्रह्म कहलाता है और जो इससे
३५ रहित है वह अब्रह्म है । शंका—अब्रह्म क्या है ? समाधान—मैथुन । मैथुनमें हिंसादिक दोष पुष्ट
होते हैं, क्योंकि जो मैथुनके सेवनमें दक्ष है वह चर और अचर सब प्रकार के प्राणियोंकी हिंसा
१. -वस्तुनो ग्रहणे च आ० । २. -पुंसराग-मु० । ३. पा० सू० ७।१।५१ इत्यत्र वार्तिकम् । ४. -दयो
धर्मा य-मु० । ५. अब्रह्म । किं मु० । ६. सचेतनमितरच्च मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri