सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८० सर्वार्थसिद्धौ [ ७।३५ § ७२२ -
प्रमार्जितोत्सर्ग इत्येवमादि । तत्र अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितायां १ भूमौ मूत्रपुरीषोत्सर्गः अप्रत्यवेक्षिताप्र-
मार्जितोत्सर्गः । अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितस्यार्हदाचार्यपूजोपकरणस्य गन्धमाल्यधूपायदेरात्मपरिधाना-
र्थस्य च वस्त्रादेरादानमप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितादानम् । अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितस्य प्रावरणादेः
संस्तरस्योपक्रमणं अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितसंस्तरोपक्रमणम् । क्षुद्भ्यर्दितत्वादावश्यकेष्वनादरोऽनु-
त्साहः । स्मृत्यनुपस्थानं व्याख्यातम् । त एते पञ्च प्रोषधोपवासस्यातिचाराः ।
सचित्तसंबन्धसंमिश्राभिषवदुष्पक्वाहाराः ॥३५॥
§ ७२२. सह चित्तेन वर्तते इति सचित्तं चेतनावद् द्रव्यम् । तदुपश्लिष्टः संबन्धः ।
तद्व्यतिकीर्णः संमिश्रः । कथं पुनरस्य सचित्तादिषु प्रवृत्तिः २ । प्रमादसंमोहाभ्याम् । द्रवो वृष्यो
वाभिषवः । असम्यक्पक्वो दुष्पक्वः । एतैराहारो विशेष्यते—सचित्ताहारः संबन्धाहारः संमिश्रा-
हारोऽभिषवाहारो दुष्पक्वाहार इति । त एते पञ्च भोगोपभोगपरिसंख्यानस्यातिचाराः ।
सचित्तनिक्षेपापिधानपरव्यपदेशमात्सर्यकालातिक्रमाः ॥३६॥
§ ७२३. सचित्ते पद्मपत्रादौ निक्षेपः सचित्तनिक्षेपः । अपिधानमावरणम् । सचित्तेनैव
संबध्यते सचित्तापिधानमिति । अन्यदातृदेयार्पणं परव्यपदेशः । प्रयच्छतोऽप्यादराभावोऽन्यदातृ-
उत्सर्ग आदि अगले तीन पदोंसे सम्बन्ध होता है । यथा—अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्ग आदि ।
बिना देखी और बिना प्रमार्जित भूमिमें मल मूत्रका त्याग करना अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्ग है ।
अरहंत और आचार्यकी पूजाके उपकरण, गन्ध, माला और धूप आदिको तथा अपने ओढ़ने आदि-
के वस्त्रादि पदार्थोंको बिना देखे और बिना परिमार्जन किये हुए ले लेना अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जिता-
दान है । बिना देखे और बिना परिमार्जन किये हुए प्रावरण आदि संस्तरका बिछाना अप्रत्य-
वेक्षिताप्रमार्जितसंस्तरोपक्रमण है । भूखसे पीड़ित होनेके कारण आवश्यक कार्योंमें अनुत्साहित
होना अनादर है । स्मृत्यनुपस्थानका व्याख्यान पहले किया ही है । इस प्रकार ये प्रोषधोपवास
व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
सचित्ताहार, सम्बन्धाहार, सम्मिश्राहार, अभिषवाहार और दुःपक्वाहार ये उपभोगपरि-
परिमाण व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३५॥
§ ७२२. जो चित्त सहित है वह सचित्त कहलाता है । सचित्तसे चेतना सहित द्रव्य लिया
जाता है । इससे सम्बन्धको प्राप्त हुआ द्रव्य सम्बन्धाहार है । और इससे मिश्रित द्रव्य सम्मिश्र
है । शंका—यह गृहस्थ सचित्तादिकमें प्रवृत्ति किस कारणसे करता है ? समाधान—प्रमाद और
सम्मोहके कारण । द्रव, वृष्य और अभिषव इनका एक अर्थ है । जो ठीक तरहसे नहीं पका है
वह दुःपक्व है । ये पाँचों शब्द आहारके विशेषण हैं या इनसे आहार पांच प्रकारका हो जाता
है । यथा—सचित्ताहार, सम्बन्धाहार, सम्मिश्राहार, अभिषवाहार और दुःपक्वाहार ये सब भोगोप-
भोग परिसंख्यान व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
सचित्तनिक्षेप, सचित्तापिधान, परव्यपदेश, मात्सर्य और कालातिक्रम ये अतिथिसंविभाग
व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३६॥
§ ७२३. सचित्त कमलपत्र आदिमें रखना सचित्तनिक्षेप है । अपिधानका अर्थ ढांकना है ।
इस शब्दको भी सचित्त शब्दसे जोड़ लेना चाहिए जिससे सचित्त कमलपत्र आदिसे ढांकना यह
अर्थ फलित होता है । इस दानकी वस्तुका दाता अन्य है यह कहकर देना परव्यपदेश है । दान
१. -मार्जितभूमौ आ०, दि०, १, दि० २ । २. -त्तिः स्यात् । प्रमा-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri