सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- ७३७ § ७२७ ] सप्तमोऽध्यायः २८१
गुणासहनं वा मात्सर्यम् । अकाले भोजनं कालातिक्रमः । त एते पञ्चातिथिसंविभागशीला-
तिचाराः ।
जीवितमरणाशंसामित्रानुरागसुखानुबन्धनिदानानि ॥३७॥
§ ७२४. आशंसनमाशंसा आकाङ्क्षणमित्यर्थः । जीवितं च मरणं च जीवितमरणम्,
जीवितमरणस्याशंसे जीवितमरणाशंसे । पूर्वसुहृत्सहपांसुक्रीडनाद्यनुस्मरणं मित्रानुरागः । अनुभूत- ५
प्रीतिविशेषस्मृतिसमन्वाहारः सुखानुबन्धः । भोगाकाङ्क्षया नियतं दीयते चित्तं तस्मिंस्तेनेति वा
निदानम् । त एते पञ्च सल्लेखनाया अतिचाराः ।
§ ७२५. अत्राह, उक्तं भवता¹ तीर्थंकरत्वकारणकर्मसूत्रनिर्देशे 'शक्तिस्तस्त्यागतपसी' इति,
पुनश्चोक्तं शीलविधाने 'अतिथिसंविभाग' इति । तस्य दानस्य लक्षणमनिर्ज्ञातं तदुच्यतामित्यत
आह— १०
अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् ॥३८॥
§ ७२६. स्वपरोपकारोऽनुग्रहः । स्वोपकारः पुण्यसंचयः, परोपकारः सम्यग्ज्ञानादिवृद्धिः ।
'स्व'शब्दो धनपर्यायवचनः । अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गस्त्यागो दानं वेदितव्यम् ।
§ ७२७. अत्राह—उक्तं दानं तत्किमविशिष्टफलमाहोस्विदस्ति कश्चित्प्रतिविशेष इत्यत
आह— १५
विधिद्रव्यदातृपात्रविशेषात्तद्विशेषः ॥३६॥
करते हुए भी आदरका न होना या दूसरे दाताके गुणोंको न सह सकना मात्सर्य है । भिक्षाकालके
सिवा दूसरा काल अकाल है और उसमें भोजन कराना कालातिक्रम है । ये सब अतिथिसंविभागके
शीलव्रतके पाँच अतिचार हैं ।
जीविताशंसा, मरणाशंसा, मित्रानुराग, सुखानुबन्ध और निदान ये सल्लेखनाके पाँच अति- २०
चार हैं ॥३७॥
§ ७२४. आशंसाका अर्थ चाहना है । जीनेकी चाह करना जीविताशंसा है और मरनेकी
चाह करना मरणाशंसा है । पहले मित्रोंके साथ पांसुक्रीड़न आदि नाना प्रकारकी क्रीड़ाएँ की रहीं
उनका स्मरण करना मित्रानुराग है । अनुभवमें आये हुए विविध सुखोंका पुनः-पुनः स्मरण
करना सुखानुबन्ध है । भोगाकांक्षासे जिसमें या जिसके कारण चित्त नियमसे दिया जाता है २५
वह निदान है । ये सब सल्लेखनाके पाँच अतिचार हैं ।
§ ७२५. तीर्थंकर पदके कारणभूत आस्रवके कारणोंका कथन करते समय शक्तिपूर्वक त्याग
और तप कहा; पुनः शीलोंका कथन करते समय अतिथिसंविभागव्रत कहा परन्तु दानका लक्षण
अभीतक ज्ञात नहीं हुआ इसलिए दानका स्वरूप बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अनुग्रहके लिए अपनी वस्तुका त्याग करना दान है ॥३८॥ ३०
§ ७२६. स्वयं अपना और दूसरेका उपकार करना अनुग्रह है । दान देनेसे पुण्यका संचय
होता है यह अपना उपकार है तथा जिन्हें दान दिया जाता है उनके सम्यग्ज्ञान आदिकी वृद्धि
होती है यह परका उपकार है । सूत्रमें आये हुए स्वशब्दका अर्थ धन है । तात्पर्य यह है कि अनु-
ग्रहके लिए जो धनका अतिसर्ग अर्थात् त्याग किया जाता है वह दान है ।
§ ७२७. दानका स्वरूप कहा तब भी उसका फल एक-सा होता है या उसमें कुछ विशेषता ३५
है, यह बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
विधि, देय, वस्तु, दाता और पात्रकी विशेषतासे उसकी विशेषता है ॥३९॥
१. भगवता मु०, ता० ।
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