सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअथाष्टमोऽध्यायः
§ ७२९. व्याख्यात आस्रवपदार्थः । तदनन्तरोद्देशभागबन्धपदार्थ इदानीं व्याख्येयः । तस्मि-
न्न्याख्येये सति पूर्वं बन्धहेतूपन्यासः क्रियते; तत्पूर्वकत्वाद् बन्धस्येति—
मिथ्यादर्शनाविरतिप्रमादकषाययोगा बन्धहेतवः ॥१॥
§ ७३०. मिथ्यादर्शनादय उक्ताः । क्व । मिथ्यादर्शनं तावदुक्तम्, 'तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्-
दर्शनम्' इत्यत्र तत्प्रतिपक्षभूतम्, आस्रवविधाने च क्रियासु व्याख्यातं मिथ्यादर्शनक्रियेति । विर-
तिरुक्ता । तत्प्रतिपक्षभूता अविरतिर्ग्राह्या । आज्ञाव्यापादनक्रिया अनाकाङ्क्षाक्रियेत्यनयोः प्रमाद-
स्यान्तर्भावः । स च प्रमादः कुशलेष्वनादरः । कषायाः क्रोधादयः अनन्तानुबन्ध्यप्रत्याख्यानप्रत्या-
ख्यानसंज्वलनविकल्पाः प्रोक्ताः । क्व । 'इन्द्रियकषाया' इत्यत्रैव । योगाः कायादिविकल्पाः
प्रोक्ताः । क्व । 'कायवाङ्मनःकर्म योगः' इत्यत्र ।
§ ७३१. मिथ्यादर्शनं द्विविधम्; नैसर्गिकं परोपदेशपूर्वकं च । तत्र परोपदेशमन्तरेण
मिथ्यात्वकर्मोदयवशाद् यदाविर्भवति तत्त्वार्थाश्रद्धानलक्षणं तन्नैसर्गिकम् । परोपदेशनिमित्तं चतु-
र्विधम्; क्रियाक्रियावाद्यज्ञानिकवैनयिकविकल्पात् । अथवा पञ्चविधं मिथ्यादर्शनम्—एकान्त-
मिथ्यादर्शनं विपरीतमिथ्यादर्शनं संशयमिथ्यादर्शनं वैनयिकमिथ्यादर्शनम् अज्ञानिकमिथ्यादर्शनं
§ ७२९. आस्रव पदार्थका व्याख्यान किया अब उसके बाद कहे गये बन्ध पदार्थका व्याख्यान
करना चाहिए । उसका व्याख्यान करते हुए पहले बन्धके कारणोंका निर्देश करते हैं, क्योंकि बन्ध
तत्पूर्वक होता है—
मिथ्यादर्शन, अविरति, प्रमाद, कषाय और योग ये बन्धके हेतु हैं ॥१॥
§ ७३०. मिथ्यादर्शन आदिका व्याख्यान पहले किया जा चुका है । शंका—इनका व्याख्यान
पहले कहाँ किया है ? 'तत्त्वार्थश्रद्धानं सम्यग्दर्शनम्' इस सूत्रमें सम्यग्दर्शनका व्याख्यान किया है ।
मिथ्यादर्शन उसका उलटा है, अतः इससे उसका भी व्याख्यान हो जाता है । या आस्रवका कथन
करते समय पच्चीस क्रियाओंमें मिथ्यादर्शनका व्याख्यान किया है । विरतिका व्याख्यान पहले
कर आये हैं । उसकी उलटी अविरति लेनी चाहिए । प्रमादका अन्तर्भाव आज्ञाव्यापादनक्रिया
और अनाकांक्षाक्रिया इन दोनोंमें हो जाता है । अच्छे कार्योंके करनेमें आदरभावका न होना यह
प्रमाद है । कषाय क्रोधादिक हैं जो अनन्तानुबन्धी, अप्रत्याख्यान, प्रत्याख्यान और संज्वलनके
भेदसे अनेक प्रकारके हैं । इनका भी पहले कथन कर आये हैं । शंका—कहाँ पर ? समाधान—
'इन्द्रियकषाया' इत्यादि सूत्रका व्याख्यान करते समय । तथा कायादिके भेदसे तीन प्रकारके योग-
का व्याख्यान भी पहले कर आये हैं । शंका—कहाँ पर ? समाधान—'कायवाङ्मनःकर्म योगः'
इस सूत्रमें ।
§ ७३१. मिथ्यादर्शन दो प्रकारका है—नैसर्गिक और परोपदेशपूर्वक । इनमेंसे जो परोप-
देशके बिना मिथ्यादर्शन कर्मके उदयसे जीवादि पदार्थोंका अश्रद्धानरूप भाव होता है वह नैसर्गिक
मिथ्या दर्शन है । तथा परोपदेशके निमित्तसे होनेवाला मिथ्यादर्शन चार प्रकारका है—क्रियावादी,
अक्रियावादी, अज्ञानी और वैनयिक । अथवा मिथ्यादर्शन पाँच प्रकारका है—एकान्त मिथ्यादर्शन,
१. श्रद्धानं इत्यत्र आ०, दि० १, दि० २ । २. -ज्ञानिवै-मु० । ३. अज्ञानमिथ्या-मु० ।