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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 388, कुल 558 में से

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पृष्ठ 388

२७६ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२६ § ७११ -
§ ७११. अभिमतदेशगतिनिरोधहेतुर्बन्धः । दण्डकशावेत्रादिभिरभिघातः प्राणिनां वधः,
न प्राणव्यपरोपणम्; ततः प्रागेवास्य विनिवृत्तत्वात् । कर्णनासिकादीनामवयवानामपनयनं छेदः ।
न्याय्यभारादतिरिक्तवाहनमतिभारारोपणम् । गवादीनां क्षुत्पिपासाबाधाकरणमन्नपाननिरोधः ।
एते पञ्चाहिंसाणुव्रतस्यातिचाराः ।
मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकारमन्त्रभेदाः ॥ २६ ॥
§ ७१२. अभ्युदयनिःश्रेयसार्थेषु क्रियाविशेषेषु अन्यस्यान्यथा प्रवर्तनमतिसंधानं वा
मिथ्योपदेशः। यत्स्त्रीपुंसाभ्यामेकान्तेऽनुष्ठितस्य क्रियाविशेषस्य प्रकाशनं तद्रहोभ्याख्यानं वेदितव्यम् ।
अन्येनानुक्तं मननुष्ठितं यत्किंचित्परप्रयोगवशादेव तेनोक्तमनुष्ठितमिति वञ्चनानिमित्तं लेखनं
कूटलेखक्रिया । हिरण्यादेर्द्रव्यस्य निक्षेप्तुर्विस्मृतसंख्यस्याल्पसंख्येयमाददानस्यैवमित्यनुज्ञावचनं
न्यासापहारः । अर्थप्रकरणाङ्गविकारभ्रूविक्षेपादिभिः पराकूतमुपलभ्य तदाविष्करणमसूयादि-
निमित्तं यत्तत्साकारमन्त्रभेद इति कथ्यते । त एते सत्याणुव्रतस्य पञ्चातिचारा बोद्धव्याः ।
स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपक-
व्यवहाराः ॥ २७ ॥
§ ७१३. मुष्णन्तं स्वयमेव वा प्रयुङ्क्तेऽन्येन वा प्रयोजयति प्रयुक्तमनुमन्यते वा यतः स
स्तेनप्रयोगः । अप्रयुक्तेनाननुमतेन च चौरेणानीतस्य ग्रहणं तदाहृतादानम् । उचितन्यायादन्येन
प्रकारेण दानग्रहणमतिक्रमः विरुद्धं राज्यं विरुद्धराज्यं विरुद्धराज्येऽतिक्रमः विरुद्धराज्यातिक्रमः ।
§ ७११. किसीको अपने इष्ट स्थानमें जानेसे रोकनेके कारणको बन्ध कहते हैं। डंडा, चाबुक
और बेंत आदिसे प्राणियोंको मारना वध है। यहाँ वधका अर्थ प्राणोंका वियोग करना नहीं लिया
है क्योंकि अतिचारके पहले ही हिंसाका त्याग कर दिया जाता है। कान और नाक आदि अवयवों
का छेदना छेद है। उचित भारसे अतिरिक्त भारका लादना अतिभारारोपण है। गौ आदिको भूख-
प्यासके लगने पर अन्नपानका रोकना अन्नपाननिरोध है। ये पाँच अहिंसाणु व्रतके अतिचार हैं।
मिथ्योपदेश, रहोभ्याख्यान, कूटलेखक्रिया, न्यासापहार और साकारमंत्रभेद ये सत्याणुव्रतके
पाँच अतिचार हैं ॥२६॥
§ ७१२. अभ्युदय और मोक्षकी कारणभूत क्रियाओंमें किसी दूसरेको विपरीत मार्गसे लगा
देना या मिथ्या वचनों द्वारा दूसरोंको ठगना मिथ्योपदेश है। स्त्री और पुरुष द्वारा एकान्तमें
किये गये आचरण विशेषका प्रकट कर देना रहोभ्याख्यान है। दूसरेने न तो कुछ कहा और न
कुछ किया तो भी अन्य किसीकी प्रेरणासे उसने ऐसा कहा है और ऐसा किया है इस प्रकार छलसे
लिखना कूटलेखक्रिया है। धरोहरमें चाँदी आदिको रखनेवाला कोई उसकी संख्या भूलकर यदि
उसे कमती लेने लगा तो 'ठीक है' इस प्रकार स्वीकार करना न्यासापहार है। अर्थवश, प्रकरण-
वश, शरीरके विकारवश या भ्रूक्षेप आदिके कारण दूसरेके अभिप्रायको जान कर डाहसे उसका
प्रकट कर देना साकारमंत्रभेद है। इस प्रकार ये सत्याणुव्रतके पाँच अतिचार जानने चाहिए।
स्तेनप्रयोग, स्तेन आहृतादान, विरुद्धराज्यातिक्रम, हीनाधिक मानोन्मान और प्रतिरूपक-
व्यवहार ये अचौर्य अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२७॥
§ ७१३. किसीको चोरीके लिए स्वयं प्रेरित करना, या दूसरेके द्वारा प्रेरणा दिलाना या
प्रयुक्त हुए की अनुमोदना करना स्तेनप्रयोग है। अपने द्वारा अप्रयुक्त और असम्मत चोरके द्वारा
लायी हुई वस्तुका ले लेना तदाहृतादान है। यहाँ न्यायमार्गको छोड़ कर अन्य प्रकारसे वस्तु ली
१. -नुक्तं यत्किं मु० । २. -भ्रूनिक्षेपणादि -मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri