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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 558 में से

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पृष्ठ 387

– ७।२५ § ७१० ] सप्तमोऽध्यायः २७५
शङ्काकाङ्क्षाविचिकित्सान्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतिचाराः ॥ २३ ॥
§ ७०७. निःशङ्कितत्वादयो व्याख्याताः 'दर्शनविशुद्धिः' इत्यत्र । तत्प्रतिपक्षभूताः शङ्कादयो
वेदितव्याः । अथ प्रशंसासंस्तवयोः को विशेषः । मनसा मिथ्यादृष्टेर्ज्ञानचारित्रगुणोद्भावनं प्रशंसा,
भूताभूतगुणोद्भाववचनं संस्तव इत्ययमनयोर्भेदः । ननु च सम्यग्दर्शनमष्टाङ्गमुक्तं तस्यातिचारै-
रप्यष्टाभिर्भवितव्यम् । नैष दोषः; व्रतशीलेषु पञ्च पञ्चातिचारा इत्युत्तरत्र विवक्षुणाचार्येण ५
प्रशंसासंस्तवयोरितरानतिचारानन्तर्भाव्य पञ्चैवातिचारा उक्ताः ।
§ ७०८. आह, सम्यग्दृष्टेरतिचारा उक्ताः । किमेवं व्रतशीलेष्वपि भवन्तीति । ओमित्युक्त्वा
तदतिचारसंख्यानिर्देशार्थमाह—
व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥ २४ ॥
§ ७०९. व्रतानि च शीलानि च व्रतशीलानि तेषु व्रतशीलेषु । शीलग्रहणमनर्थकम्; १०
व्रतग्रहणेनैव सिद्धेः । नानर्थकम्; विशेषज्ञापनार्थं व्रतपरिरक्षणार्थं शीलमिति दिग्विरत्यादीनीह
'शील'ग्रहणेन गृह्यन्ते ।
§ ७१०. अगार्यधिकारादगारिणो व्रतशीलेषु पञ्च पञ्चातिचारा वक्ष्यमाणा यथाक्रमं
वेदितव्याः । तद्यथा—आद्यस्य तावदहिंसाव्रतस्य—
बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ॥ २५ ॥ १५
शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तव ये सम्यग्दृष्टि के पांच
अतिचार हैं ॥२३॥
§ ७०७. 'दर्शनविशुद्धिः' इत्यादि सूत्रका व्याख्यान करते समय निःशंकितत्व आदिका
व्याख्यान किया । ये शंकादिक उनके प्रतिपक्षभूत जानना चाहिए । शंका—प्रशंसा और संस्तवमें
क्या अन्तर है ? समाधान—मिथ्यादृष्टिके ज्ञान और चारित्र गुणोंका मनसे उद्भावन करना प्रशंसा २०
है और मिथ्यादृष्टिमें जो गुण हैं या जो गुण नहीं हैं इन दोनोंका सद्भाव बतलाते हुए कथन करना
संस्तव है, इस प्रकार यह दोनोंमें अन्तर है । शंका—सम्यग्दर्शनके आठ अंग कहे हैं, इसलिए
उसके अतिचार भी आठ ही होने चाहिए । समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि आगे आचार्य
व्रतों और शीलोंके पाँच-पाँच अतिचार कहनेवाले हैं इसलिए अन्यदृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तव
इन दो अतिचारोंमें शेष अतिचारोंका अन्तर्भाव करके सम्यग्दृष्टिके पांच ही अतिचार कहे हैं । २५
§ ७०८. सम्यग्दृष्टिके अतिचार कहे, क्या इसी प्रकार व्रत और शीलोंके भी अतिचार होते
हैं ? हां, यह कह कर अब उन अतिचारोंकी संख्याका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
व्रतों और शीलोंमें पांच पांच अतिचार हैं जो क्रमसे इस प्रकार हैं ॥२४॥
§ ७०९. शील और व्रत इन शब्दोंका कर्मधारय समास होकर व्रतशील पद बना है । उनमें
अर्थात् व्रत-शीलोंमें । शंका—सूत्रमें शील पदका ग्रहण करना निष्फल है, क्योंकि व्रत पदके ग्रहण ३०
करनेसे ही उसकी सिद्धि हो जाती है ? समाधान—सूत्रमें शील पदका ग्रहण करना निष्फल नहीं
है, क्योंकि विशेषका ज्ञान करानेके लिए और व्रतोंकी रक्षा करनेके लिए शील है इसलिए यहाँ
शील पदके ग्रहण करनेसे दिग्विरति आदि लिये जाते हैं ।
§ ७१०. यहाँ गृहस्थका प्रकरण है, इसलिए गृहस्थके व्रतों और शीलोंके आगे कहे जाने-
वाले क्रमसे पाँच पाँच अतिचार जानने चाहिए जो निम्न प्रकार हैं । उसमें भी पहले प्रथम अहिंसा ३५
व्रतके अतिचार बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बन्ध, वध, छेद, अतिभारका आरोपण और अन्नपानका निरोध ये अहिंसा अणुव्रतके पांच
अतिचार हैं ॥२५॥