सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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- ७।३४ § ७२१ ] सप्तमोऽध्यायः २७९
एवं कुर्विति नियोगः प्रेष्यप्रयोगः । व्यापारकरान्पुरुषान्प्रत्युत्कासिकादिकरणं शब्दानुपातः ।
स्वविग्रहदर्शनं रूपानुपातः । लोष्टादिनिपातः पुद्गलक्षेपः । त एते देशविरमणस्य पञ्चातिचाराः ।
कन्दर्पकौत्कुच्यमौखर्यासमीक्ष्याधिकरणोपभोगपरिभोगानर्थक्यानि ॥३२॥
§ ७१९. रागोद्रेकात्प्रहासमिश्रोऽशिष्टवाक्प्रयोगः कन्दर्पः । तदेवोभयं परत्र दुष्टकायकर्म- ५
प्रयुक्तं कौत्कुच्यम् । धाष्टर्यप्रायं१ यत्किंचनानर्थकं बहुप्रलापित्वं२ मौखर्यम् । असमीक्ष्य प्रयोजन-
माधिक्येन करणमसमीक्ष्याधिकरणम् । यावताऽर्थेनोपभोगपरिभोगौ सोऽर्थस्ततोऽन्यस्याधिक्य-
मानर्थक्यम् । त एते पञ्चानर्थदण्डविरतेरतिचाराः ।
योगदुष्प्रणिधानानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३३ ॥
§ ७२०. योगो व्याख्यातस्त्रिविधः । तस्य दुष्टं३ प्रणिधानं योगदुष्प्रणिधानम्—कायदुष्प्रणि-
धानं वाग्दुष्प्रणिधानं मनोदुष्प्रणिधानमिति । अनादरोऽनुत्साहः । अनैकाग्र्यं स्मृत्यनुपस्थानम् । त १०
एते पञ्च सामायिकस्यातिक्रमाः ।
अप्रत्यवेक्षिताप्रमार्जितोत्सर्गादानसंस्तरोपक्रमणानादरस्मृत्यनुपस्थानानि ॥ ३४ ॥
§ ७२१. जन्तवः सन्ति न सन्ति वेति प्रत्यवेक्षणं चक्षुर्व्यापारः । मृदुनोपकरणेन यत्क्रियते
प्रयोजनं तत्प्रमार्जितम् । तदुभयं प्रतिषेधविशिष्टमुत्सर्गादिभिस्त्रिभिरभिसंबध्यते४—अप्रत्यवेक्षिता-
की आज्ञा करना आनयन है । ऐसा करो इस प्रकार काममें लगाना प्रेष्यप्रयोग है। जो पुरुष १५
किसी उद्योगमें जुटे हैं उन्हें उद्देश्य कर खाँसना आदि शब्दानुपात है। उन्हीं पुरुषोंको अपने
शरीरको दिखलाना रूपानुरूपात है । ढेला आदिका फेंकना पुद्गलक्षेप है । इस प्रकार देशविरमण
व्रतके पाँच अतिचार हैं।
कन्दर्प, कौत्कुच्य, मौखर्य, असमीक्ष्याधिकरण और उपभोगपरिभोगानर्थक्य ये अनर्थदण्ड-
विरति व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३२॥ २०
§ ७१९. रागभावकी तीव्रतावश हास्यमिश्रित असभ्य वचन बोलना कन्दर्प है। परिहास
और असभ्यवचन इन दोनोंके साथ दूसरेके लिए शारीरिक कुचेष्टाएँ करना कौत्कुच्य है। धीठता-
को लिये हुए निःसार कुछ भी बहुत बकवास करना मौखर्य है । प्रयोजनका विचार किये बिना
मर्यादाके बाहर अधिक काम करना असमीक्ष्याधिकरण है। उपभोग परिभोगके लिए जितनी वस्तु-
की आवश्यकता है वह अर्थ है उससे अतिरिक्त अधिक वस्तु रखना उपभोगपरिभोगानर्थक्य है। २५
इस प्रकार ये अनर्थदण्डविरति व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
काययोगदुष्प्रणिधान, वचनयोगदुष्प्रणिधान, मनोयोगदुष्प्रणिधान, अनादर और स्मृतिका
अनुपस्थान ये सामायिक व्रतके पाँच अतिचार हैं ॥३३॥
§ ७२०. तीन प्रकारके योगका व्याख्यान किया जा चुका है। उसका बुरी तरहसे चलते
रहना योगदुष्प्रणिधान है जो तीन प्रकारका है - कायदुष्प्रणिधान, वचनदुष्प्रणिधान और मनो- ३०
दुष्प्रणिधान । उत्साहका न होना अनुत्साह है और वही अनादर है। तथा एकाग्रताका न होना
स्मृत्यनुपस्थान है । इस प्रकार ये सामायिक व्रतके पाँच अतिचार हैं ।
अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित भूमिमें उत्सर्ग, अप्रत्यवेक्षित अप्रमार्जित वस्तुका आदान, अप्रत्य-
वेक्षित अप्रमार्जित संस्तरका उपक्रमण, अनादर और स्मृतिका अनुपस्थान ये प्रोषधोपवास व्रतके
पाँच अतिचार हैं ॥३४॥ ३५
§ ७२१. जीव हैं या नहीं हैं इस प्रकार आँखसे देखना प्रत्यवेक्षण कहलाता है और कोमल
उपकरणसे जो प्रयोजन साधा जाता है वह प्रमार्जित कहलाता है । निषेधयुक्त इन दोनों पदोंका
१. -प्रायं बहु-आ., दि. १, दि. २ । २. -प्रलपितं मौ-मु. । ३. दुःप्रणि-मु. । ४. -दिभिरभि-मु. ।