सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ७।२१ § ७०३ ] सप्तमोऽध्यायः २७१
रभिज्ञानैरवधिं कृत्वा नियमनं दिग्विरतिव्रतम् । ततो बहिस्त्रसस्थावरव्यपरोपणनिवृत्तेर्महा-
व्रतत्वमवसेयम् । तत्र लाभे सत्यपि परिणामस्य निवृत्तेर्लोभनिरासश्च कृतो भवति । ग्रामा-
दीनामवधृतपरिमाणः² प्रदेशो देशः । ततो बहिर्निवृत्तिर्देशविरतिव्रतम् । पूर्ववद्बहिर्महाव्रतत्वं
व्यवस्थाप्यम् । असत्युपकारे पापादानहेतुरनर्थदण्डः ।³ ततो विरतिरनर्थदण्डविरतिः ।
अनर्थदण्डः पञ्चविधः—अपध्यानं पापोपदेशः प्रमादाचरितं हिंसाप्रदानं अशुभश्रुतिरिति । तत्र ५
परेषां जयपराजयवधबन्धनाङ्गच्छेदपरस्वहरणादि कथं स्यादिति मनसा⁴ चिन्तनमपध्यानम् ।⁵
तिर्यक्क्लेशवाणिज्यप्राणिवधकारम्भादिषु पापसंयुक्तं वचनं पापोपदेशः ।⁷ प्रयोजनमन्तरेण वृक्षा-
दिच्छेदनभूमिकुट्टनसलिलसेचनावद्यकर्म प्रमादाचरितम् ।⁸ विषकण्टकशस्त्राग्निरज्जुकशादण्डा-
दिहिंसोपकरणप्रदानं हिंसाप्रदानम् । हिंसारागादिप्रवर्धनदुष्टकथाश्रवणशिक्षणव्यापृतिरशुभश्रुतिः ।
समेकीभावे९ वर्तते । तद्यथा संगतं घृतं संगतं तैलमित्युच्यते एकीभूतमिति गम्यते । एकत्वेन १०
अयनं गमनं समयः, समय एव सामायिकं, समयः प्रयोजनमस्येति वा विगृह्य सामायिकम् । इयति
जो पूर्वादि दिशाएँ हैं उनमें प्रसिद्ध चिह्नोंके द्वारा मर्यादा करके नियम करना दिग्विरतिव्रत है ।
उस मर्यादाके बाहर त्रस और स्थावर हिंसाका त्याग हो जानेसे उतने अंशमें महाव्रत होता है ।
मर्यादाके बाहर लाभ होते हुए भी उसमें परिणाम न रहनेके कारण लोभका त्याग हो जाता है ।
ग्रामादिककी निश्चित मर्यादारूप प्रदेश देश कहलाता है। उससे बाहर जानेका त्याग कर देना १५
देशविरतिव्रत है। यहाँ भी पहलेके समान मर्यादाके बाहर महाव्रत होता है। उपकार न होकर
जो प्रवृत्ति केवल पापका कारण है वह अनर्थदण्ड है। इससे विरत होना अनर्थदण्डविरति है।
अनर्थदण्ड पाँच प्रकारका है—अपध्यान, पापोपदेश, प्रमादाचरित, हिंसाप्रदान और अशुभश्रुति ।
दूसरोंका जय, पराजय, मारना, बाँधना, अंगोंका छेदना और धनका अपहरण आदि कैसे किया
जाय इस प्रकार मनसे विचार करना अपध्यान नामका अनर्थदण्ड है। तिर्यंचोंको क्लेश पहुँचाने- २०
वाले, वणिजका प्रसार करनेवाले और प्राणियोंकी हिंसाके कारणभूत आरम्भ आदिके विषयमें
पापबहुल वचन बोलना पापोपदेश नामका अनर्थदण्ड है। बिना प्रयोजनके वृक्षादिका छेदना,
भूमिका कूटना, पानीका सींचना आदि पाप कार्य प्रमादाचरित नामका अनर्थदण्ड है। विष, काँटा,
शस्त्र, अग्नि, रस्सी, चाबुक और लकड़ी आदि हिंसाके उपकरणोंका प्रदान करना हिंसाप्रदान
नामका अनर्थदण्ड है। हिंसा और राग आदिको बढ़ानेवाली दुष्ट कथाओंका सुनना और उनकी २५
शिक्षा देना अशुभश्रुति नामका अनर्थदण्ड है। 'सम्' उपसर्गका अर्थ एक रूप है। जैसे 'घी संगत
है, तेल संगत है' जब यह कहा जाता है तब संगतका अर्थ एकीभूत होता है। सामायिकमें मूल
शब्द समय है। इसके दो अवयव हैं सम् और अय। सम्का अर्थ कहा ही है और अयका अर्थ
गमन है। समुदायार्थ एकरूप हो जाना समय है और समय ही सामायिक है। अथवा समय
१. सीमन्तानां परतः स्थूलेतरपञ्चपापसं त्यागात् । देशावकाशिकेन च महाव्रतानि प्रसाध्यन्ते ॥' -रत्न० ३०
३, ५ । २. -माणप्रदेशो मु. । ३. 'पापोपदेशहिंसादानापध्यानदुःश्रुतीः पञ्च । प्राहुः प्रमादचर्यामनर्थदण्डान-
दण्डधराः ॥'-रत्न० ३, ५ । ४. -च्छेदस्वहर-आ० । छेदसर्वस्वहर-दि० १, दि० २ । ५. 'वधबन्ध-
च्छेदादेर्देपाद्रागाच्च परकलत्रादेः । आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने विशदाः ॥' -रत्न० ३,३२ ।
६. -ध्यानम् । प्राणिवधक-आ०, दि० १, दि० २ । ७. 'तिर्यक्क्लेशवणिज्याहिंसारम्भप्रलम्भनादीनाम् ।
कथाप्रसङ्गप्रसवः स्मर्तव्यः पाप उपदेशः ॥' -रत्न० ३, ३० । ८. 'क्षितिसलिलदहनपवनवारम्भं विफलं ३५
वनस्पतिच्छेदम् । सरणं सारणमपि च प्रमादचर्या प्रभाषन्ते ॥' -रत्न० ३,३४ । ६. “तद्यथा तावदेकार्थीभावः
सामर्थ्यन्तदैवं विग्रहः करिष्यते-सङ्गतार्थः समर्थः सृष्टार्थः समर्थ इति । तद्यथा सङ्गतं घृतं सङ्गतं तैलमित्युच्यते
एकीभूतमिति गम्यते ।' -पा० म० भा० २,१,१,१ ।