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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 558 में से

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पृष्ठ 385
  • ७।२२ ६ ७०५ ] सप्तमोऽध्यायः २७३
    वा यथाशक्ति । संयममविनाशयन्नतीतत्यतिथिः । अथवा नास्य तिथिरस्तीत्यतिथिः अनियतकाला-
    गमन इत्यर्थः । अतिथये संविभागोऽतिथिसंविभागः । स चतुर्विधः; भिक्षोपकरणौषधप्रतिश्रय-
    भेदात् । मोक्षार्थमभ्युद्यतायातिथये संयमपरायणाय शुद्धाय शुद्धचेतसा निरवद्या भिक्षा देया ।
    धर्मोपकरणानि च सम्यग्दर्शनाद्युपबृंहणानि दातव्यानि । औषधमपि योग्यमुपयोजनीयम् । प्रति-
    श्रयश्च परमधर्मश्रद्धया प्रतिपादियितव्य इति । 'च'शब्दो वक्ष्यमाणगृहस्थधर्मसमुच्चयार्थः । ५
    § ७०४. कः पुनरसौ-
    मारणान्तिक सल्येखना जोषिता ॥ २२ ॥
    § ७०५. स्वपरिणामोपात्तस्यायुष इन्द्रियाणां बलानां च कारणवशात्संक्षयो मरणम् । 'अन्त'-
    ग्रहणं तद्भवमरणप्रतिपत्त्यर्थम् । मरणमन्तो मरणान्तः । स प्रयोजनमस्येति मारणान्तिकी ।
    सम्यक्कायकषायलेखना सल्लेखना । कायस्य बाह्यस्याभ्यन्तराणां च कषायाणां तत्कारणहापन- १०
    क्रमेण सम्यग्लेखना सल्लेखना । तां मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता सेविता गृहीत्यभि-
    संबध्यते । ननु च विस्पष्टार्थं सेवितेत्येवं वक्तव्यम् । न; अर्थविशेषोपपत्तेः । न केवलमिह सेवनं
    परिगृह्यते । किं तर्हि । प्रीत्यर्थोऽपि । यस्मादसत्यां प्रीतौ बलान्न सल्लेखना कार्यते । सत्यां हि
    संयमका विनाश न हो इस विधिसे जो आता है वह अतिथि है या जिसके आनेकी कोई
    तिथि नहीं उसे अतिथि कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जिसके आनेका कोई काल निश्चित नहीं है १५
    उसे अतिथि कहते हैं। इस अतिथिके लिए विभाग करना अतिथिसंविभाग है। वह चार प्रकारका
    है-भिक्षा, उपकरण, औषध और प्रतिश्रय अर्थात् रहनेका स्थान । जो मोक्षके लिए बद्धकक्ष
    है, संयमके पालन करनेमें तत्पर है और शुद्ध है उस अतिथिके लिए शुद्ध मनसे निर्दोष भिक्षा
    देनी चाहिए । सम्यग्दर्शन आदिके बढ़ानेवाले धर्मोपकरण देने चाहिए । योग्य औषधकी योजना
    करनी चाहिए तथा परम धर्ममें श्रद्धापूर्वक निवास-स्थान भी देना चाहिए । सूत्रमें जो 'च' शब्द है २०
    वह आगे कहे जानेवाले गृहस्थधर्मके संग्रह करनेके लिए दिया है ।
    § ७०४. वह और कौन-सा गृहस्थ धर्म है-
    तथा वह मारणान्तिक संलेखनाका प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाला होता है ॥२२॥
    § ७०५. अपने परिणामोंसे प्राप्त हुई आयुका, इन्द्रियोंका और मन, वचन, काय इन तीन
    बलोंका कारण विशेषके मिलने पर नाश होना मरण है। उसी भवके मरणका ज्ञान करानेके लिए २५
    सूत्रमें मरण शब्दके साथ अन्त पदको ग्रहण किया है। मरण यही अन्त मरणान्त है और जिसका
    यह मरणान्त ही प्रयोजन है वह मारणान्तिकी कहलाती है। अच्छे प्रकारसे काय और कषायका
    लेखन करना अर्थात् कृष करना सल्लेखना है। अर्थात् बाहरी शरीरका और भीतरी कषायोंका,
    उत्तरोत्तर काय और कषायको पुष्ट करनेवाले कारणोंको घटाते हुए, भले प्रकारसे लेखन करना
    अर्थात् कृष करना सल्लेखना है। मरणके अन्तमें होने वाली इस सल्लेखनाको प्रीतिपूर्वक सेवन ३०
    करनेवाला गृहस्थ होता है यह इस सूत्रका तात्पर्य है। शंका- सहज तरीकेसे अर्थका स्पष्टीकरण
    हो इसके लिए सूत्रमें 'जोषिता' इसके स्थानमें 'सेविता' कहना ठीक है ? समाधान - नहीं क्योंकि
    'जोषिता' क्रियाके रखनेसे उससे अर्थ-विशेष ध्वनित हो जाता है। यहाँ केवल 'सेवन करना' अर्थ
    नहीं लिया गया है किन्तु प्रीति रूप अर्थ भी लिया गया है, क्योंकि प्रीतिके न रहने पर बलपूर्वक
    सल्लेखना नहीं करायी जाती । किन्तु प्रीतिके रहने पर जीव स्वयं ही सल्लेखना करता है। तात्पर्य ३५
    यह है कि 'प्रीतिपूर्वक सेवन करना' यह अर्थ 'जोषिता' क्रियासे निकल आता है 'सेविता' से नहीं,
    अतः सूत्रमें 'जोषिता' क्रिया रखी है। शंका- चूंकि सल्लेखनामें अपने अभिप्रायसे आयु आदिका
    १. -हापनया क्रमे-आ०, दि० १, ता० ।
    ३५