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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 386, कुल 558 में से

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पृष्ठ 386

[Header] २७४ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२२ § ७०६ –

प्रीतौ स्वयमेव करोति । स्यान्मतमात्मवधः प्राप्नोति; स्वाभिसन्धिपूर्वकायुरादिनिवृत्तेः । नैष
दोषः; अप्रमत्तत्वात् । 'प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्युक्तम् । न चास्य प्रमादयोगोऽस्ति ।
कुतः ? रागाद्यभावात् । रागद्वेषमोहाविष्टस्य हि विषशस्त्राद्युपकरणप्रयोगवशादात्मानं घ्नतः
स्वघातो भवति । न सल्लेखनां प्रतिपन्नस्य रागादयः सन्ति ततो नात्मवधदोषः । उक्तं च—
“रागादीणमणुप्पा अहिंसगत्तं ति¹ देसिदं समये ।
तेसिं चे उप्पत्ती हिंसेति जिणेहि णिद्दिट्ठा ॥”
किं च मरणस्यानिष्टत्वात्तथा वणिजो विविधपण्यदानादानसंचयपरस्य स्वगृहविनाशोऽनिष्टः ।
तद्विनाशकारणे च कुतश्चिदुपस्थिते यथाशक्ति² परिहरति । दुष्परिहारे च पण्यविनाशो यथा न
भवति तथा यतते । एवं गृहस्थोऽपि व्रतशीलपण्यसंचये प्रवर्तमानः तदाश्रयस्य न पातमभिवाञ्छति ।
तदुपप्लवकारणे चोपस्थिते स्वगुणाविरोधेन परिहरति । दुष्परिहारे च यथा स्वगुणविनाशो
न भवति तथा प्रयतत इति कथमात्मवधो भवेत् ।
§ ७०६. अत्राह, 'निःशल्यो व्रती' इत्युक्तं तत्र च तृतीयं शल्यं मिथ्यादर्शनम् । ततः
सम्यग्दृष्टिना व्रतिनां³ निःशल्येन भवितव्यमित्युक्तम् । तत्सम्यग्दर्शनं किं सापवादं निरपवादमिति ।
उच्यते—कस्यचिन्मोहनीयावस्थाविशेषात्कदाचिदिमे भवन्त्यपवादाः—

त्याग किया जाता है इसलिए यह आत्मघात हुआ ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि
सल्लेखनामें प्रमादका अभाव है । 'प्रमत्तयोगसे प्राणोंका वध करना हिंसा है' यह पहले कहा जा
चुका है । परन्तु इसके प्रमाद नहीं है, क्योंकि इसके रागादिक नहीं पाये जाते । राग, द्वेष और
मोहसे युक्त होकर जो विष और शस्त्र आदि उपकरणोंका प्रयोग करके उनसे अपना घात करता
है उसे आत्मघातका दोष प्राप्त होता है । परन्तु सल्लेखनाको प्राप्त हुए जीवके रागादिक तो हैं
नहीं इसलिए इसे आत्मघातका दोष नहीं प्राप्त होता । कहा भी है—
“शास्त्रमें यह उपदेश है कि रागादिका नहीं उत्पन्न होना अहिंसा है । तथा जिनदेवने
उनकी उत्पत्तिको हिंसा कहा है ॥”
दूसरे मरण किसी को भी इष्ट नहीं है । जैसे नाना प्रकारकी विक्रेय वस्तुओंके देन, लेन और
संचयमें लगे हुए किसी व्यापारीको अपने घरका नाश होना इष्ट नहीं है । फिर भी परिस्थिति-
वश उसके विनाशके कारण आ उपस्थित हों तो यथाशक्ति वह उनको दूर करता है । इतने पर
भी यदि वे दूर न हो सकें तो जिससे विक्रेय वस्तुओंका नाश न हो ऐसा प्रयत्न करता है उसी
प्रकार पण्यस्थानीय व्रत और शीलके संचयमें जुटा हुआ गृहस्थ भी उनके आधारभूत आयु आदि-
का पतन नहीं चाहता । यदा कदाचित् उनके विनाशके कारण उत्पन्न हो जाँय तो जिससे अपने
गुणोंमें बाधा नहीं पड़े इस प्रकार उनको दूर करनेका प्रयत्न करता है । इतने पर भी यदि वे दूर
न हों तो जिससे अपने गुणोंका नाश न हो इस प्रकार प्रयत्न करता है इसलिए इसके आत्मघात
नामका दोष कैसे हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता है ।
§ ७०६. यहाँ पर शंकाकार कहता है कि व्रती निःशल्य होता है ऐसा कहा है और वहाँ
तीसरी शल्य मिथ्यादर्शन है । इसलिए सम्यग्दृष्टि व्रतीको निःशल्य होना चाहिए यह उसका
अभिप्राय है, तो अब यह बतलाइए कि वह सम्यग्दर्शन सापवाद होता है या निरपवाद होता है ?
अब इसका समाधान करते हैं—किसी जीवके मोहनीयकी अवस्था विशेषके कारण ये अपवाद
होते हैं—

१. त्ति भासिदं स-मु० । २. -शक्ति च परि -मु० । ३. व्रतिना भवि-आ०, दि०, १, दि० २ ।