सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२७० सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२० § ७०१ –
अणुव्रतोऽगारी ॥२०॥
§ ७०१. 'अणु'शब्दोऽल्पवचनः। अणूनि व्रतान्यस्य अणुव्रतोऽगारीत्युच्यते । कथमस्य
व्रतानामणुत्वम् । सर्वसावद्यनिवृत्त्यसंभवात् । कुतस्तर्ह्यसौ निवृत्तः। त्रसप्राणिव्यपरोपणान्निवृत्तः
अगारीत्याद्यमणुव्रतम् । स्नेहमोहादिवशाद् गृहविनाशे ग्रामविनाशे वा कारणमित्यभिमतादसत्य-
वचनान्निवृत्तो गृहीति द्वितीयमणुव्रतम् । अन्यपीडाकरं पार्थिवभयादिवशादवश्यं परित्यक्तमपि
यददत्तं ततः प्रतिनिवृत्त्यादरः श्रावक इति तृतीयमणुव्रतम् । उपात्ताया अनुपात्तायाश्च पराङ्गनायाः
सङ्गान्निवृत्तरतिर्गृहीति चतुर्थमणुव्रतम् । धनधान्यक्षेत्रादीनामिच्छावशात् कृतपरिच्छेदो गृहीति
पञ्चममणुव्रतम् ।
§ ७०२. आह अपरित्यक्तागारस्य किमेतावानेव विशेष आहोस्विदस्ति कश्चिदन्योऽपीत्यत
आह—
दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकप्रोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसं-
विभागव्रतसंपन्नश्च ॥२१॥
§ ७०३. 'विरति'शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । दिग्विरतिः देशविरतिः अनर्थदण्डविरति-
रिति एतानि त्रीणि गुणव्रतानि; १'व्रत'शब्दस्य प्रत्येकभभिसंबन्धात् । तथा सामायिकव्रतं
प्रोषधोपवासव्रतं उपभोगपरिभोगपरिमाणव्रतं अतिथिसंविभागव्रतं २ एतानि चत्वारि शिक्षा-
व्रतानि । एतैर्वृतैः संपन्नो गृही विरताविरत इत्युच्यते । तद्यथा—दिक्प्राच्यादिः तत्र प्रसिद्धे-
अणुव्रतोंका धारी अगारी है ॥२०॥
§ ७०१. अणु शब्द अल्पवाची है। जिसके व्रत अणु अर्थात् अल्प हैं वह अणुव्रतवाला
अगारी कहा जाता है । शंका—अगारीके व्रत अल्प कैसे होते हैं ? समाधान—अगारीके पूरे हिंसादि
दोषोंका त्याग सम्भव नहीं है इसलिए उसके व्रत अल्प होते हैं। शंका—तो यह किसका त्यागी
है ? समाधान—यह त्रस जीवोंकी हिंसाका त्यागी है; इसलिए उसके पहला अहिंसा अणुव्रत होता
है। गृहस्थ स्नेह और मोहादिकके वशसे गृहविनाश और ग्रामविनाशके कारण असत्य वचनसे
निवृत्त है इसलिए उसके दूसरा सत्याणुव्रत होता है। श्रावक राजाके भय आदिके कारण दूसरेको
पीड़ाकारी जानकर बिना दी हुई वस्तुको लेना यद्यपि अवश्य छोड़ देता है तो भी बिना दी हुई
वस्तुके लेनेसे उसकी प्रीति घट जाती है इसलिए उसके तीसरा अचौर्याणुव्रत होता है। गृहस्थके
स्वीकार की हुई या बिना स्वीकार की हुई परस्त्रीका संग करनेसे रति हट जाती है इसलिए
उसके परस्त्रीत्याग नामका चौथा अणुव्रत होता है। तथा गृहस्थ धन, धान्य और क्षेत्र आदिका
स्वेच्छासे परिमाण कर लेता है इसलिए उसके पाँचवाँ परिग्रहपरिमाण अणुव्रत होता है।
§ ७०२. गृहस्थकी क्या इतनी ही विशेषता है कि और भी विशेषता है, अब यह बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं —
वह दिग्विरति, देशविरति, अनर्थदण्डविरति, सामायिकव्रत, प्रोषधोपवासव्रत, उपभोग-
परिभोगपरिमाणव्रत और अतिथिसंविभागव्रत इन व्रतोंसे भी सम्पन्न होता है ॥२१॥
§ ७०३. विरति शब्द प्रत्येक शब्दपर लागू होता है । यथा—दिग्विरति, देशविरति और
अनर्थदण्डविरति । ये तीन गुणव्रत हैं, क्योंकि व्रत शब्दका हर एकके साथ सम्बन्ध है। तथा
सामायिकव्रत, प्रोषधोपवासव्रत, उपभोगपरिमाणव्रत और अतिथिसंविभागव्रत ये चार हैं। इस
प्रकार इन व्रतोंसे जो सम्पन्न है वह गृही विरताविरत कहा जाता है । खुलासा इस प्रकार है—
१. –करपार्थिव–मु० । २. व्रतम् । इत्येतै–मु० ।