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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

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पृष्ठ 394

२८२ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।३९ § ७२८ –
§ ७२८. प्रतिग्रहादिक्रमो विधिः । विशेषो गुणकृतः । तस्य प्रत्येकमभिसंबन्धः क्रियते—
विधिविशेषो द्रव्यविशेषो दातृविशेषः पात्रविशेष इति । तत्र विधिविशेषः प्रतिग्रहादिष्वादरानादर-
कृतो भेदः तपःस्वाध्यायपरिवृद्धिहेतुत्वादिर्र्द्रव्यविशेषः । अनसूयाविषादादिर्दातृविशेषः । मोक्षकारण-
गुणसंयोगः पात्रविशेषः । ततश्च पुण्यफलविशेषः क्षित्यादिविशेषाद्¹ बीजफलविशेषवत् ।
५ इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञिकायां सप्तमोऽध्यायः समाप्तः ॥७॥
§ ७२८. प्रतिग्रह आदि करनेका जो क्रम है वह विधि है । विशेषता गुणसे आती है ।
इस विशेष शब्दको विधि आदि प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा—विधिविशेष, द्रव्य-
विशेष, दाताविशेष और पात्रविशेष । प्रतिग्रह आदिकमें आदर और अनादर होनेसे जो भेद होता
है वह विधिविशेष है । जिससे तप और स्वाध्याय आदिकी वृद्धि होती है वह द्रव्यविशेष है । अन-
१० सूया और विषाद आदिका न होना दाताकी विशेषता है । तथा मोक्षके कारणभूत गुणोंसे युक्त
रहना पात्रकी विशेषता है । जैसे पृथिवी आदिमें विशेषता होनेसे उससे उत्पन्न हुए बीजमें विशे-
षता आ जाती है वैसे ही विधि आदिककी विशेषतासे दानसे प्राप्त होनेवाले पुण्य फलमें विशेषता
आ जाती है ।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामक तत्त्वार्थवृत्तिमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥७॥
१५ १. क्षेत्रादि-मु. ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri