सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 381, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें- ७।१९ § ७०० ] सप्तमोऽध्यायः २६९
वात्सतीष्वपि गोषु न गोमांस्तथा सशल्यत्वात्सत्स्वपि व्रतेषु न व्रती । यस्तु निःशल्यः स व्रती ।
§ ६९८. तस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
अगार्यनगारश्च ॥१९॥
§ ६९९. प्रतिश्रयार्थिभिः अङ्ग्यते इति अगारं वेश्म, तद्वानगारी । न विद्यते अगारमस्येत्य-
नगारः । द्विविधो व्रती अगारो अनगारश्च । ननु चात्र विपर्ययोऽपि प्राप्नोति शून्यागारदेवकुलाद्या-
वासस्य मुनेरगारित्वम् अनिवृत्तविषयतृष्णस्य कुतश्चित्कारणाद् गृहं विमुच्य वने वसतोऽनगा-
रत्वं च प्राप्नोतीति¹ । नैष दोषः; भावागारस्य विवक्षितत्वात् । चारित्रमोहोदये सत्यगारसम्बन्धं
प्रत्यनिवृत्तः² परिणामो भावागारमित्युच्यते । स यस्यास्त्यसावगारी वने वसन्नपि । गृहे वसन्नपि
तदभावादनगार इति च भवति । ननु चागारिणो व्रतित्वं न प्राप्नोति; असकलव्रतत्वात् । नैष
दोषः; नैगमादिनयापेक्षया अगारिणोऽपि व्रतित्वमुपपद्यते नगरावासवत् । यथा गृहे अपवरके वा
वसन्नपि नगरावास इत्युच्येत तथा असकलव्रतोऽपि नैगमसंग्रहव्यवहारनयापेक्षया व्रतीति
व्यपदिश्यते ।
§ ७००. अत्राह किं हिंसादीनामन्यतमस्माद्यः प्रतिनिवृत्तः स खल्वगारी व्रती । नैवम् । किं
तर्हि । पञ्चतय्या अपि विरतेर्वैकल्येन विवक्षित इत्युच्यते—
बहुत घी दूध होता है वह गायवाला कहा जाता है । यदि उसके घी दूध नहीं होता और गायें
हैं तो वह गायवाला नहीं कहलाता, उसी प्रकार जो शल्य है व्रतोंके होनेपर भी वह व्रती नहीं
हो सकता । किन्तु जो निःशल्य है वह व्रती है ।
§ ६९८. अब उसके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उसके अगारी और अनागार ये दो भेद हैं ॥१९॥
§ ६९९. आश्रय चाहनेवाले जिसे अंगीकार करते हैं वह अगार है । अगारका अर्थ वेश्म
अर्थात् घर है । जिसके घर है वह अगारी है । और जिसके घर नहीं है वह अनगार है । इस
तरह व्रती दो प्रकारका है—अगारी और अनगार । शंका—अभी अगारी और अनगारका जो
लक्षण कहा है उससे विपरीत अर्थ भी प्राप्त होता है, क्योंकि उपर्युक्त लक्षणके अनुसार जो मुनि
शून्य घर और देवकुलमें निवास करते हैं वे अगारी हो जायेंगे और विषयतृष्णाका त्याग किये
बिना जो किसी कारणसे घरको छोड़कर वनमें रहने लगे हैं वे अनगार हो जायेंगे ? समाधान—
यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यहाँपर भावागार विवक्षित है । चारित्र मोहनीयका उदय होने
पर जो परिणाम घरसे निवृत्त नहीं है वह भावागार कहा जाता है। वह जिसके है वह वनमें
निवास करते हुए भी अगारी है और जिसके इस प्रकारका परिणाम नहीं है वह घरमें रहते हुए भी
अनगार है । शंका—अगारी व्रती नहीं हो सकता, क्योंकि उसके पूर्ण व्रत नहीं है ? समाधान—
यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि नैगम आदि नयकी अपेक्षा नगरावासके समान अगारीके भी व्रती-
पना बन जाता है । जैसे कोई घरमें या झोपड़ीमें रहता है तो भी 'मैं नगरमें रहता हूँ' यह कहा
जाता है उसी प्रकार जिसके पूरे व्रत नहीं है वह नैगम, संग्रह और व्यवहारनयकी अपेक्षा व्रती
कहा जाता है ।
§ ७००. शंका—जो हिंसादिकमें-से किसी एकसे निवृत्त है वह क्या अगारी व्रती है ?
समाधान—ऐसा नहीं है। शंका—तो क्या है ? समाधान—जिसके एक देशसे पाँचों प्रकारकी
विरति है वह अगारी है यह अर्थ यहाँ विवक्षित है । अब इसी बातको बतलानेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
१. -प्नोति नैष आ०, दि० १, दि० २ । २. -वृत्तिपरि-आ०, दि०, १, दि० २ ।