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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 379, कुल 558 में से

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पृष्ठ 379
  • ७।१७ ६ ६९५ ] सप्तमोऽध्यायः २६७
    § ६९४. अथ पञ्चमस्य परिग्रहस्य किं लक्षणमित्यत आह-
    मूर्च्छा परिग्रहः ॥१७॥
    § ६९५. मूर्च्छत्युच्यते ।$^१$ का मूर्च्छा । बाह्यानां गोमहिषमणिमुक्ताफलादीनां$^२$ चेतनाचेत-
    $^३$नानामाभ्यन्तराणां च रागादीनामुपधीनां संरक्षणार्जनसंस्कारादिलक्षणाव्यावृत्तिर्मूर्च्छा । ननु ५
    च लोके वातादिप्रकोपविशेषस्य मूर्च्छति प्रसिद्धिरस्ति तद्ग्रहणं कस्मान्न भवति । सत्यमेवैतत् ।
    मूर्च्छिरयं मोहसामान्ये वर्तते । “सामान्यचोदनाश्च विशेषेष्ववतिष्ठन्ते” इत्युक्ते विशेषे व्यवस्थितः
    परिगृह्यते; परिग्रहप्रकरणात् । एवमपि बाह्यस्य परिग्रहत्वं न प्राप्नोति; आध्यात्मिकस्य संग्रहात् ।
    सत्यमेवैतत्; प्रधानत्वादभ्यन्तर एव संगृहीतः ।$^४$ असत्यपि बाह्ये ममेदमिति संकल्पवान् सपरि-
    ग्रह$^५$ एव भवति । अथ बाह्यः परिग्रहो न भवत्येव, भवति च मूर्च्छाकारणत्वात् यदि ममेदमिति
    संकल्पः परिग्रहः; संज्ञानाद्यपि परिग्रहः प्राप्नोति तदपि हि ममेदमिति संकल्प्यते रागादिपरिणाम- १०
    वत् । नैष दोषः; 'प्रमत्तयोगात्' इत्यनुवर्तते $^६$ । ततो ज्ञानदर्शनचारित्रवतोऽप्रमत्तस्य मोहाभावान्न
    मूर्च्छास्तीति निष्परिग्रहत्वं सिद्धम् । किंच तेषां ज्ञानादीनामहेयत्वादात्मस्वभावत्वादपरिग्रहत्वम् ।
    रागादयः पुनः कर्मोदयतन्त्रा इति अनात्मस्वभावत्वाद्धेयाः । ततस्तेषु संकल्पः परिग्रह इति
    करता है, झूठ बोलता है, बिना दी हुई वस्तु लेता है तथा चेतन और अचेतन दोनों प्रकारके
    परिग्रहको स्वीकार करता है। १५
    § ६९४. अब पाँचवां जो परिग्रह है उसका क्या लक्षण है यह बतलानेके लिए आगेका
    सूत्र कहते हैं-
    मूर्च्छा परिग्रह है ॥१७॥
    § ६९५. अब मूर्च्छाका स्वरूप कहते हैं । शंका-मूर्च्छा क्या है ? समाधान-गाय, भैंस,
    मणि और मोती आदि चेतन अचेतन बाह्य उपधिका तथा रागादिरूप अभ्यन्तर उपधिका संरक्षण २०
    अर्जन और संस्कार आदि रूप व्यापार ही मूर्च्छा है। शंका-लोकमें वातादि प्रकोप विशेषका
    नाम मूर्च्छा है ऐसी प्रसिद्धि है, इसलिए यहाँ इस मूर्च्छाका ग्रहण क्यों नहीं किया जाता ? समा-
    धान-यह कहना सत्य है तथापि मूच्छ धातुका सामान्य अर्थ मोह है और सामान्य शब्द तद्गत
    विशेषोंमें ही रहते हैं ऐसा मान लेने पर यहाँ मूर्च्छाका विशेष अर्थ ही लिया गया है, क्योंकि
    यहाँ परिग्रहका प्रकरण है । शंका-मूर्च्छाका यह अर्थ लेने पर भी बाह्य वस्तुको परिग्रहपना नहीं २५
    प्राप्त होता, क्योंकि मूर्च्छा इस शब्दसे आभ्यन्तर परिग्रहका संग्रह होता है। समाधान -यह
    कहना सही है; क्योंकि प्रधान होनेसे आभ्यन्तरका ही संग्रह किया है। यह स्पष्ट ही है कि बाह्य
    परिग्रहके न रहनेपर भी 'यह मेरा है' ऐसा संकल्पवाला पुरुष परिग्रहसहित ही होता है। शंका-
    यदि बाह्य पदार्थ परिग्रह नहीं है और मूर्च्छाका कारण होनेसे 'यह मेरा है' इस प्रकारका संकल्प
    ही परिग्रह है तो ज्ञानादिक भी परिग्रह ठहरते हैं, क्योंकि रागादि परिणामोंके समान ज्ञानादिक ३०
    में भी 'यह मेरा है' इस प्रकारका संकल्प होता है ? समाधान -यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि
    'प्रमत्तयोगात्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है, इसलिए जो ज्ञान, दर्शन और चारित्रवाला होकर
    प्रमादरहित है उसके मोहका अभाव होनेसे मूर्च्छा नहीं है, अतएव परिग्रहरहितपना सिद्ध होता
    है। दूसरे वे ज्ञानादिक अहेय हैं और आत्माके स्वभाव हैं इसलिए उनमें परिग्रहपना नहीं प्राप्त
    होता । परन्तु रागादिक तो कर्मोंके उदयसे होते हैं, अतः वे आत्माका स्वभाव न होनेसे हेय हैं ३५
    १. -च्यते । केयं मूर्च्छा मु० आ०, दि० १, दि० २ । २. -मुक्तादी - मु०, ता० । ३. -तनानां च
    रागा-मु० । ४. -गृह्यते । एवमपि ता०, ना० । ५. संगृह्यते । असत्यपि मु. । ६. -ग्रहो भवति मु० ।
    ७. -र्तते । ज्ञान - आ०, दि० १, दि० २ ।