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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 396, कुल 558 में से

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पृष्ठ 396

चेति । तत्र इदमेव इत्थमेवेति धर्मिधर्मयोरभिनिवेश एकान्तः । “पुरुष एवेदं सर्वम्१” इति वा
नित्य एव वा अनित्य एवेति । सग्रन्थो निर्ग्रन्थः, केवली कवलाहारी, स्त्री सिध्यतीत्येवमादिः
विपर्ययः । सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्राणि किं मोक्षमार्गः स्याद्वा न वेत्यन्तरपक्षापरिग्रहः संशयः । सर्व-
देवतानां सर्वसमयानां च समदर्शनं वैनयिकम् । हिताहितपरीक्षाविरहोऽज्ञानिकत्वम् । उक्तं च—
५ “असिदिसदं २ किरियाणं अक्किरियाणं३ तह य होइ चुलसीदी ।
४सत्तट्ठमण्णाणीणं वेणइयाणं तु बत्तीसं ॥”
§ ७३२. अविरतिर्द्वादशविधा; षट्कायषट्करणविषयभेदात् । षोडश कषाया नव नोकषायो-
स्तेषामीषद्वेदो न भेद इति पञ्चविंशतिः कषायाः । चत्वारो मनोयोगाश्चत्वारो वाग्योगाः पञ्च
काययोगा इति त्रयोदशविकल्पो योगः । आहारककाययोगाहारकमिश्रकाययोगयोः प्रमत्तसंयते
१० संभवात्पञ्चदशापि५ भवन्ति । प्रमादोऽनेकविधैः; शुद्धयष्टकोत्तमक्षमादिविषयभेदात्६ । त एते पञ्च
बन्धहेतवः समस्ता व्यस्ताश्च भवन्ति । तद्यथा—मिथ्यादृष्टेः पञ्चापि समुदािता बन्धहेतवो भवन्ति ।
स सादनसम्यग्दृष्टिसम्यङ्मिथ्यादृष्ट्यसंयतसम्यग्दृष्टीनामविरत्यादयश्चत्वारः । संयतासंयतस्या-
विरतिविरतिमिश्रा प्रमादकषाययोगाश्च । प्रमत्तसंयतस्य प्रमादकषाययोगाः । अप्रमत्तादीनां
विपरीतमिथ्यादर्शन, संशयमिथ्यादर्शन, वैनयिकमिथ्यादर्शन और अज्ञानिक मिथ्यादर्शन ।
१५ यही है, इसी प्रकारका है इस प्रकार धर्म और धर्मीमें एकान्तरूप अभिप्राय रखना एकान्त
मिथ्यादर्शन है । जैसे यह सब जग परब्रह्म रूप ही है, या सब पदार्थ अनित्य ही हैं या नित्य ही
हैं । सग्रन्थको निर्ग्रन्थ मानना, केवलीको कवलाहारी मानना और स्त्री सिद्ध होती है इत्यादि
मानना विपर्यय मिथ्यादर्शन है। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर
क्या मोक्षमार्ग है या नहीं इस प्रकार किसी एक पक्षको स्वीकार नहीं करना संशय मिथ्यादर्शन
२० है। सब देवता और सब मतोंको एक समान मानना वैनयिक मिथ्यादर्शन है। हिताहितकी
परीक्षासे रहित होना अज्ञानिक मिथ्यादर्शन है। कहा भी है—“क्रियावादियोंके एकसौ अस्सी,
अक्रियावादियोंके चौरासी, अज्ञानियोंके सरसठ और वैनयिकोंके बत्तीस भेद हैं।
§ ७३२. छहकायके जीवोंकी दया न करनेसे और छह इन्द्रियोंके विषयभेदसे अविरति
बारह प्रकारकी होती है। सोलह कषाय और नौ नोकषाय ये पच्चीस कषाय हैं। यद्यपि कषायोंसे
२५ नोकषायोंमें थोड़ा भेद है पर वह यहाँ विवक्षित नहीं है, इसलिए सबको कषाय कहा है। चार
मनोयोग, चार वचनयोग और पाँच काययोग ये योगके तेरह भेद हैं। प्रमत्तसंयत गुणस्थानमें
आहारक ऋद्धिधारी मुनिके आहारककाययोग और आहारक मिश्रकाययोग भी सम्भव हैं इस
प्रकार योग पन्द्रह भी होते हैं। शुद्धयष्टक और उत्तम क्षमा आदि विषयक भेदसे प्रमाद अनेक
प्रकारका है। इस प्रकार ये मिथ्यादर्शन आदि पाँचों मिलकर या पृथक्-पृथक् बन्धके हेतु हैं।
३० स्पष्ट इस प्रकार है—मिथ्यादृष्टि जीवके पाँचों ही मिलकर बन्धके हेतु हैं। सासादनसम्यग्दृष्टि,
सम्यग्मिथ्यादृष्टि और अविरतसम्यग्दृष्टिके अविरति आदि चार बन्धके हेतु हैं। संयतासंयतके
विरति और अविरति ये दोनों मिश्ररूप तथा प्रमाद, कषाय और योग ये बन्धके हेतु हैं। प्रमत्त-
संयतके प्रमाद, कषाय और योग ये तीन बन्धके हेतु हैं। अप्रमत्तसंयत आदि चारके योग और
१. इति वा नित्यमेवेति मु०, दि० १, दि० २, आ० । २. गो० कर्म०, गा० ८७६ । ३. -याणं च
३५ होइ मु० । ४. सत्तच्छण्णा-मु० । ५. -पायाः ईषद्भे-दि० १, दि० २, आ० । ६. -दश भवन्ति आ०,
दि० १, दि० २ । ७. -नेकविधः पञ्चसमितित्रिगुप्तिशुद्धय-मु०, आ०, दि० १, दि० २ । ८. -भेदात् ।
शुद्धयष्टकस्यार्थः भावकायविनयेर्यापथभिक्षाप्रतिष्ठापनशयनासनवाक्यशुद्धयोऽष्टौ दशलक्षणो धर्मश्च । त एते
मु०, आ०, दि० १, दि० २ ।