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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

अथ सप्तमोऽध्यायः
§ ६६३. आस्रवपदार्थो व्याख्यातः । तत्प्रारम्भकाल एवोक्तं 'शुभः पुण्यस्य' इति तत्सामान्ये-
नोक्तम् । तद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थं कः पुनः शुभ इत्युक्ते इदमुच्यते—
हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् ॥ १ ॥
§ ६६४. 'प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्येवमादिभिः सूत्रैर्हिंसादयो निर्देक्ष्यन्ते । तेभ्यो ५
विरमणं विरतिर्व्रतमित्युच्यते । २व्रतमभिसन्धिकृतो नियमः, इदं कर्तव्यमिदं न कर्तव्यमिति
वा । ननु च हिंसादयः परिणामविशेषा अध्रुवाः, कथं तेषाम³पादानत्वमुच्यते । बुद्धयपाये
ध्रुवत्वविवक्षोपपत्तेः । यथा धर्माद्विरमतीत्यत्र य एष मनुष्यः संभिन्नबुद्धिः स पश्यति—दुष्करो धर्मः,
फलं चास्य श्रद्धामात्रगम्यमिति स⁵ बुद्ध्या संप्राप्य निवर्तते । एवमिहापि य⁶ एव मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी
स पश्यति—य एते हिंसादयः परिणामास्ते पापहेतवः । पापकर्माणं प्रवर्त्तमानान् जनानिहैव १०
राजानो दण्डयन्ति परत्र च दुःखमाप्नुवन्तीति स⁷ बुद्ध्या संप्राप्य निवर्तते । ततो बुद्ध्या
ध्रुवत्वविवक्षोपपत्तेरपादानत्वं युक्तम् । 'विरति'शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते हिंसाया विरतिः
§ ६६३. आस्रव पदार्थका व्याख्यान करते समय उसके आरम्भ में 'शुभः पुण्यस्य' यह कहा
है पर वह सामान्य रूपसे ही कहा है, अतः विशेष रूपसे उसका ज्ञान करानेके लिए शुभ क्या है
ऐसा पूछने पर आगेका सूत्र कहते हैं— १५
हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रहसे निवृत्त होना व्रत है ॥१॥
§ ६६४. 'प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्यादि सूत्रों द्वारा हिंसादिका जो स्वरूप
आगे कहेंगे उनसे विरत होना व्रत कहलाता है । प्रतिज्ञा करके जो नियम लिया जाता है वह
व्रत है । या 'यह करने योग्य है और यह नहीं करने योग्य है' इस प्रकार नियम करना व्रत है ।
शंका—हिंसा आदिक परिणाम विशेष ध्रुव अर्थात् सदा काल स्थिर नहीं रहते इसलिए उनका २०
अपादान कारकमें प्रयोग कैसे बन सकता है ? समाधान—बुद्धिपूर्वक त्यागमें ध्रुवपनेकी विवक्षा
बन जानेसे अपादान कारकका प्रयोग बन जाता है । जैसे 'धर्मसे विरत होता है' यहाँ जो यह
धर्मसे विमुख बुद्धिवाला मनुष्य है वह विचार करता है कि 'धर्म दुष्कर है और उसका फल
श्रद्धामात्रगम्य है' इस प्रकार वह बुद्धिसे समझ कर धर्मसे विरत हो जाता है । इसी प्रकार यहाँ
भी जो यह मनुष्य विचारपूर्वक काम करनेवाला है वह विचार करता है कि जो ये हिंसादिक २५
परिणाम हैं वे पापके कारण हैं और जो पाप कार्यमें प्रवृत्त होते हैं उन्हें इसी भवमें राजा लोग दण्ड
देते हैं और वे पापाचारी परलोकमें दुःख उठाते हैं, इस प्रकार वह बुद्धिसे समझ कर हिंसादिकसे
विरत हो जाता है । इसलिए बुद्धिसे ध्रुवत्वपनेकी विवक्षा बन जानेसे अपादान कारकका प्रयोग
करना उचित है । विरति शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा हिंसासे विरति,
१. 'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यपरिग्रहा यमाः ।'—पा० यो० सू० २, ३० । २. 'अभिसन्धिकृता विरतिर्वि- ३०
षयाद्योध्याद्व्रतं भवति ।'—रत्न० ३, ४० । ३. 'ध्रुवमपायेऽपादानम् ।'—पा० १, ४, २४ । ४. 'धर्माद्विरमति
× × य एष मनुष्यः संभिन्नबुद्धिर्भवति स पश्यति ।'—पा० म० भा० १, ४, ३, २४ । ५. स्वबुद्ध्या
मु० । 'स बुद्ध्या निवर्तते'—पा० म० भा० १, ४, ३, २४ । ६. 'य एष मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी भवति स
पश्यति ।'—पा० म० भा० १, ४, ३, २४ । ७. –वन्तीति स्वबुद्ध्या मु०, ता० ना० ।
३३

अनृताद्विरितिरित्येवमादि । तत्र अहिंसाव्रतमादौ क्रियते प्रधानत्वात् । सत्यादीनि हि तत्परिपाल-
नार्थानि सस्यस्य वृतिपरिक्षेपवत् । सर्वसावद्यनिवृत्तिलक्षणसामायिकापेक्षया एकं व्रतं, तदेव
छेदोपस्थापनापेक्षया पञ्चविधमिहोच्यते । ननु च अस्य व्रतस्यास्रवहेतुत्वमनुपपन्नं संवरहेतुष्वन्त-
र्भावात् । संवरहेतवो वक्ष्यन्ते गुप्तिसमित्यादयः । तत्र दशविधे धर्मे संयमे वा व्रतानामन्तर्भाव इति ।
नैष दोषः; तत्र संवरो निवृत्तिलक्षणो वक्ष्यते । प्रवृत्तिश्चात्र दृश्यते'; हिंसानृतादत्तादानादिपरित्यागे
अहिंसासत्यवचनदत्तादानादिक्रियाप्रतीतेः गुप्त्यादिसंवरपरिकर्मत्वाच्च । व्रतेषु हि कृतपरिकर्मा
साधुः सुखेन संवरं करोतीति ततः पृथक्त्वेनोपदेशः क्रियते । ननु च षष्ठमणुव्रतमस्ति रात्रिभोजन-
विरमणं तदिहोपसंख्यातव्यम् । न; भावनास्वन्तर्भावात् । अहिंसाव्रतभावना हि वक्ष्यन्ते² । तत्र
आलोकितपानभोजनभावना कार्येति ।
§ ६६५. तस्य पञ्चतयस्य व्रतस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह -
देशसर्वतोऽणुमहती³ ॥ २ ॥
§ ६६६. देश एकदेशः । सर्वः सकलः । देशश्च सर्वंश्च देशसर्वौ ताभ्यां देशसर्वतः । 'विरतिः'
इत्यनुवर्तते । अणु च महच्चाणुमहती । व्रताभिसंबन्धान्नपुंसकलिङ्गनिर्देशः । यथासंख्यमभि-
असत्यसे विरति आदि । इन पाँच व्रतोंमें अहिंसा व्रतको प्रारम्भमें रखा है क्योंकि वह सबमें मुख्य
है। धान्यके खेतके लिए जैसे उसके चारों ओर कांटोंका घेरा होता है उसी प्रकार सत्यादिक सभी
व्रत उसकी रक्षाके लिए हैं। सब पापोंसे निवृत्त होनेरूप सामायिककी अपेक्षा एक व्रत है। वही
व्रत छेदोपस्थापनाकी अपेक्षा पाँच प्रकारका है और उन्हींका यहाँ कथन किया है। शंका-यह
व्रत आस्रवका कारण है यह बात नहीं बनती, क्योंकि संवरके कारणोंमें इनका अन्तर्भाव होता है।
आगे गुप्ति, समिति इत्यादि संवरके कारण कहनेवाले हैं। वहाँ दस प्रकारके धर्मोंमें एक संयम
नामका धर्म बतलाया है उसमें व्रतोंका अन्तर्भाव होता है ? समाधान-यह कोई दोष नहीं है,
क्योंकि वहाँ निवृत्तिरूप संवरका कथन करेंगे और यहाँ प्रवृत्ति देखी जाती है, क्योंकि हिंसा,
असत्य और अदत्तादान आदिका त्याग करने पर अहिंसा, सत्यवचन और दी हुई वस्तुका ग्रहण
आदि रूप क्रिया देखी जाती है। दूसरे ये व्रत गुप्ति आदि रूप संवरके अंग हैं। जिस साधुने व्रतोंकी
मर्यादा कर ली है वह सुखपूर्वक संवर करता है इसलिए व्रतोंका अलगसे उपदेश दिया है।
शंका-रात्रिभोजनविरमण नाम छठा अणुव्रत है उसकी यहाँ परिगणना करनी थी ? समाधान -
नहीं, क्योंकि उसका भावनाओंमें अन्तर्भाव हो जाता है। आगे अहिंसा व्रतकी भावनाएँ कहेंगे ।
उनमें एक आलोकितपानभोजन नामकी भावना है उसमें रात्रिभोजनविरमण नामक व्रतका
अन्तर्भाव हो जाता है।
§ ६६५. उस पाँच प्रकारके व्रतके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
हिंसादिकसे एकदेश निवृत्त होना अणुव्रत है और सब प्रकारसे निवृत्त होना महाव्रत
है ॥२॥
§ ६६६. देश शब्दका अर्थ एकदेश है और सर्व शब्दका अर्थ सकल है। सूत्रमें देश और
सर्व शब्दका द्वन्द्व समास करके तसि प्रत्यय करके 'देशसर्वतः' पद बनाया है। इस सूत्रमें विरति
शब्दकी अनुवृत्ति पूर्व सूत्रसे होती है । यहाँ अणु और महत् शब्दका द्वन्द्व समास होकर अणुमहती
पद बना है। व्रत शब्द नपुंसक लिंग है इसलिए 'अणुमहती' यह नपुंसक लिंगपरक निर्देश किया
है। इनका सम्बन्ध क्रमसे होता है। यथा-एकदेश निवृत्त होना अणुव्रत है और सब प्रकारसे
१. दृश्यते हिंसानृतादत्तादानादिक्रिया-मु० । २. -क्ष्यन्ते । आलो- आ०, दि० १, दि०, २ । ३. 'एते
जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ।'-पा० यो० सू० २, ३१ ।

संबध्यते । देशतो विरतिरणुव्रतं सर्वतो विरतिर्महाव्रतमिति द्विधा भिद्यते प्रत्येकं व्रतम् । एतानि
व्रतानि भावितानि वरौषधवद्यत्नवते¹ दुःखनिवृत्तिनिमित्तानि भवन्ति ।
§ ६६७. किमर्थं कथं वा भावनं तेषामित्यत्रोच्यते—
तत्स्थैर्यार्थं भावनाः पञ्च पञ्च ॥ ३ ॥
§ ६६८. तेषां व्रतानां स्थिरीकरणायैकैकस्य व्रतस्य पञ्च पञ्च भावना वेदितव्याः । ५
यद्येवमाद्यस्याहिंसाव्रतस्य भावनाः का इत्यत्रोच्यते—
वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पञ्च ॥ ४ ॥
§ ६६९. वाग्गुप्तिः मनोगुप्तिः ईर्यासमितिः आदाननिक्षेपणसमितिः आलोकितपानभोजन-
मित्येताः पञ्चाहिंसाव्रतस्य भावनाः ।
§ ६७०. अथ द्वितीयस्य व्रतस्य का इत्यत्रोच्यते— १०
क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचीभाषणं च पञ्च ॥ ५ ॥
§ ६७१. क्रोधप्रत्याख्यानं लोभप्रत्याख्यानं भीरुत्वप्रत्याख्यानं हास्यप्रत्याख्यानम् अनुवीची-
भाषणं चेत्येताः पञ्च भावनाः सत्यव्रतस्य ज्ञेयाः । अनुवीचीभाषणं निरवद्यानुभाषणमित्यर्थः ।
§ ६७२. इदानीं तृतीयस्य व्रतस्य का भावना इत्यत्राह—
शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्षशुद्धिसधर्माविसंवादाः पञ्च ॥ ६ ॥ १५
निवृत्त होना महाव्रत है इस प्रकार अहिंसादि प्रत्येक व्रत दो प्रकारके हैं। प्रयत्नशील जो पुरुष
उत्तम ओषधिके समान इन व्रतोंका सेवन करता है उसके दुःखोंका नाश होता है।
§ ६६७. इन व्रतोंकी किसलिए और किस प्रकार भावना करनी चाहिए, अब इसी बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन व्रतोंको स्थिर करनेके लिए प्रत्येक व्रतकी पाँच पाँच भावनाएँ हैं ॥३॥ २०
§ ६६८. उन व्रतोंको स्थिर करनेके लिए एक एक व्रतकी पाँच पाँच भावनाएँ जाननी
चाहिए। यदि ऐसा है तो प्रथम अहिंसा व्रतकी भावनाएँ कौन-सी हैं? अब इस बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वचनगुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्यासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति और आलोकितपान-भोजन ये
अहिंसाव्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥४॥ २५
§ ६६९. वचनगुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्यासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति और आलोकितपान-
भोजन ये अहिंसा व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं।
§ ६७०. अब दूसरे व्रतकी भावनाएँ कौनसी हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
क्रोधप्रत्याख्यान, लोभप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान और अनुवीचीभाषण
ये सत्य व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥५॥ ३०
§ ६७१. क्रोधप्रत्याख्यान, लोभप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान और अनु-
वीचीभाषण ये सत्य व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं। अनुवीचीभाषणका अर्थ निर्दोष भाषण है।
§ ६७२. अब तीसरे व्रतकी कौनसी भावनाएँ हैं, यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
शून्यागारावास, विमोचितावास, परोपरोधाकरण, भैक्षशुद्धि और सधर्माविसंवाद ये अचौर्य ३५
व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥६॥
१. वरौषधवत् दुःख-भा० ।

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२६० सर्वार्थसिद्धौ [ ७।७ § ६७३ -
§ ६७३. शून्यागारेषु गिरिगुहातरुकोटरादिष्वावासः । परकीयेषु च विमोचितेष्वावासः ।
परेषामुपरोधाकरणम् । आचारशास्त्रमार्गेण भैक्षशुद्धिः । ममेदं तवेदमिति सधर्मभिरविसंवादः ।
इत्येताः पञ्चादत्तादानविरमणव्रतस्य भावनाः ।
§ ६७४. अथेदानीं ब्रह्मचर्यव्रतस्य भावना वक्तव्या इत्यत्राह—
५ स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कार-
त्यागाः पञ्च ॥ ७ ॥
§ ६७५. त्यागशब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । स्त्रीरागकथाश्रवणत्यागः तन्मनोहराङ्गनिरी-
क्षणत्यागः पूर्वरतानुस्मरणत्यागः वृष्येष्टरसत्यागः स्वशरीरसंस्कारत्यागश्चेति चतुर्थव्रतस्य भावनाः
पञ्च विज्ञेयाः ।
१० § ६७६. अथ पञ्चमव्रतस्य भावनाः का इत्यत्रोच्यते—
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च ॥ ८ ॥
§ ६७७. पञ्चानामिन्द्रियाणां स्पर्शनादीनामिष्टानिष्टेषु विषयेषूपैनिपत्तितेषु स्पर्शादिषु राग-
वर्जनानि पञ्च आकिंचन्यस्य व्रतस्य भावनाः प्रत्येप्तव्याः ।
§ ६७८. किंचान्यद्यथामीषां व्रतानां द्रढिमार्थं भावनाः प्रतीयन्ते तद्विपश्चिद्द्भिरिति
१५ भावनोपदेशः, तथा तदर्थं तद्विरोधिष्वपीत्याह—
§ ६७३. पर्वतकी गुफा और वृक्षका कोटर आदि शून्यागार हैं इनमें रहना शून्यागारावास
है । दूसरों द्वारा छोड़े हुए मकान आदिमें रहना विमोचितावास है । दूसरोंको ठहरनेसे नहीं रोकना
परोपरोधाकरण है । आचार शास्त्रमें बतलायी हुई विधिके अनुसार भिक्षा लेना भैक्षशुद्धि है । यह
मेरा है यह तेरा है इस प्रकार सधर्मियोंसे विसंवाद नहीं करना सधर्माविसंवाद है । ये अदत्तादान-
२० विरमण व्रतकी पांच भावनाएँ हैं ।
§ ६७४. अब इस समय ब्रह्मचर्य व्रतकी पांच भावनाओंका कथन करना चाहिए; इसलिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
स्त्रियोंमें रागको पैदा करनेवाली कथाके सुननेका त्याग, स्त्रियोंके मनोहर अंगोंको देखने-
का त्याग, पूर्व भोगोंके स्मरणका त्याग, गरिष्ठ और इष्ट रसका त्याग तथा अपने शरीरके
२५ संस्कारका त्याग ये ब्रह्मचर्य व्रतकी पांच भावनाएँ हैं ॥७॥
§ ६७५. त्याग शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा-स्त्रीरागकथाश्रवण-
त्याग, तन्मनोहरांगनिरीक्षणत्याग, पूर्वरतानुस्मरणत्याग, वृष्येष्टरसत्याग और स्वशरीरसंस्कारत्याग
ये ब्रह्मचर्य व्रतकी भावनाएँ हैं ।
§ ६:६. अब पाँचवें व्रतकी कौनसी भावनाएँ हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
३० मनोज्ञ और अमनोज्ञ इन्द्रियोंके विषयोंमें क्रमसे राग और द्वेषका त्याग करना ये अपरि-
ग्रहव्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥८॥
§ ६७७. स्पर्श न आदि पाँच इन्द्रियोंके इष्ट और अनिष्ट स्पर्श आदिक पाँच विषयोंके प्राप्त
होने पर राग और द्वेषका त्याग करना ये आकिंचन्य व्रतकी पाँच भावनाएँ जाननी चाहिए ।
§ ६७८. जिस प्रकार इन व्रतोंकी दृढ़ताके लिए भावनाएँ हैं इसलिए भावनाओंका उपदेश
३५ दिया है उसी प्रकार विद्वान् पुरुषोंको व्रतोंकी दृढ़ताके लिए विरोधी भावोंके विषयमें क्या करना
चाहिए ? यह बतलानेके लिए अब आगे का सूत्र कहते हैं—
१. -येषूपरिनिपतितेषु आ०, दि० १, दि० २ ।

  • ७।९ § ६७९ ] सप्तमोऽध्यायः २६१
    हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् ॥ ९ ॥
    § ६७९. अभ्युदयनिःश्रेयसार्थिनां क्रियाणां विनाशकः १ प्रयोगोऽपायः । अवद्यं गर्ह्यम् ।
    अपायश्चावद्यं चापायावद्ये तयोर्दर्शनमपायावद्यदर्शनं भावयितव्यम् । क्व । इहामुत्र च । केषु ।
    हिंसादिषु । कथमिति चेदुच्यते—हिंसायां तावत्, हिंस्रो हि नित्योद्वेजनीयः सततानुबद्धवैरश्च इह
    च वधबन्धपरिक्लेशादीन् प्रतिलभते प्रेत्य चाशुभां गतिं गर्हितश्च भवतीति हिंसाया व्युपरमः ५
    श्रेयान् । तथा अनृतवादी अश्रद्धेयो भवति इहैव च जिह्वाच्छेदादीन् प्रतिलभते मिथ्याख्यान-
    दुःखितेभ्यश्च बद्धवैरेभ्यो बहूनि व्यसनान्यवाप्नोति प्रेत्य चाशुभां गतिं गर्हितश्च भवतीति
    अनृतवचनादुपरमः श्रेयान् । तथा स्तेनः परद्रव्याहरणासक्तः सर्वस्योद्वेजनीयो भवति । इहैव
    चाभिघातवधबन्धहस्तपादकर्णनासोत्तरोष्ठच्छेदनभेदनसर्वस्वहरणादीन् प्रतिलभते प्रेत्य चाशुभां
    गतिं गर्हितश्च भवतीति स्तेयाद् व्युपरतिः श्रेयसी । तथा अब्रह्मचारी मदविभ्रमोद्भ्रान्तचित्तो १०
    वनगज इव वासितावञ्चितो विवशो वधबन्धनपरिक्लेशाननुभवति मोहाभिभूतत्वाच्च कार्याकार्या-
    नभिज्ञो न किंचित्कुशलमाचरति पराङ्गनालिङ्गनसङ्गकृतरतिश्चेहैव वैरानुबन्धो लिङ्गच्छेदन-
    वधबन्धसर्वस्वहरणादीनपायान् प्राप्नोति प्रेत्य चाशुभां गतिमश्नुते गर्हितश्च भवति अतो विरति-
    रात्महिता । तथा परिग्रहवान् शकुनिरिव गृहीतमांसखण्डोऽन्येषां तदर्थिनां पतत्त्रिणामिहैव
    हिंसादिक पाँच दोषोंमें ऐहिक और पारलौकिक अपाय और अवद्यका दर्शन भावने योग्य १५
    है ॥९॥
    § ६७९. स्वर्ग और मोक्षकी प्रयोजक क्रियाओंका विनाश करनेवाली प्रवृत्ति अपाय है ।
    अवद्यका अर्थ गर्हा है । अपाय और अवद्य इन दोनोंके दर्शनकी भावना करनी चाहिए । शंका—
    कहाँ ? समाधान—इस लोक और परलोकमें । शंका—किनमें ? समाधान—हिंसादि पाँच दोषों-
    में । शंका—कैसे ? समाधान—हिंसामें यथा—हिंसक निरन्तर उद्वेजनीय है, वह सदा वैरको २०
    बाँधे रहता है । इस लोकमें वध, बन्ध और क्लेश आदिको प्राप्त होता है तथा परलोकमें अशुभ
    गतिको प्राप्त होता है और गर्हित भी होता है इस लिए हिंसाका त्याग श्रेयस्कर है । असत्यवादी-
    का कोई श्रद्धान नहीं करता । वह इस लोकमें जिह्वाच्छेद आदि दुःखों को प्राप्त होता है तथा असत्य
    बोलनेसे दुःखी हुए अतएव जिन्होंने वैर बाँध लिया है उनसे बहुत प्रकारकी आपत्तियोंको और
    परलोकमें अशुभ गतिको प्राप्त होता है और गर्हित भी होता है इसलिए असत्य वचनका त्याग २५
    श्रेयस्कर है । तथा परद्रव्यका अपहरण करनेवाले चोरका सब तिरस्कार करते हैं । इस लोकमें
    वह ताड़ना, मारना, बाँधना तथा हाथ, पैर, कान, नाक, ऊपरके ओठका छेदना, भेदना और
    सर्वस्वहरण आदि दुःखोंको और परलोकमें अशुभ गतिको प्राप्त होता है और गर्हित भी होता है
    इसलिए चोरीका त्याग श्रेयस्कर है । तथा जो अब्रह्मचारी है उसका चित्त मदसे भ्रमता रहता
    है । जिस प्रकार वनका हाथी हथनीसे जुदा कर दिया जाता है और विवश होकर उसे वध, ३०
    बन्धन और क्लेश आदि दुःखोंको भोगना पड़ता है ठीक यही अवस्था अब्रह्मचारीकी होती है ।
    मोहसे अभिभूत होनेके कारण वह कार्य और अकार्यके विवेकसे रहित होकर कुछ भी उचित
    आचरण नहीं करता । परस्त्रीके आलिंगन और संसर्गमें ही इसको रति रहती है इसलिए यह
    वैरको बढ़ानेवाले लिंगका छेदा जाना, मारा जाना, बाँधा जाना और सर्वस्वका अपहरण किया
    जाना आदि दुःखोंको और परलोकमें अशुभ गतिको प्राप्त होता है तथा गर्हित भी होता है इसलिए ३५
    अब्रह्मका त्याग आत्महितकारी है । जिस प्रकार पक्षी मांसके टुकड़ेको प्राप्त करके उसको चाहने-
    वाले दूसरे पक्षियोंके द्वारा पराभूत होता है उसी प्रकार परिग्रहवाला भी इसी लोकमें उसको
    चाहनेवाले चोर आदिके द्वारा पराभूत होता है । तथा उसके अर्जन, रक्षण और नाशसे होनेवाले
    १. -शकप्रयो-मु. ।

२६२ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।१० § ६८० -

तस्करादीनामभिभवनीयो भवति तदर्जनरक्षणप्रक्षयकृतांश्च दोषान् बहूनवाप्नोति न चास्य
तृप्तिर्भवति इन्धनैरिवाग्नेः लोभाभिभूतत्वाच्च कार्याकार्यानपेक्षो भवति प्रेत्य चाशुभां गतिमास्क-
न्दते लुब्धोऽयमिति गर्हितश्च भवतीति तद्विरमणं श्रेयः । एवं हिंसादिष्वपायावद्यदर्शनं भावनीयम् ।
§ ६८०. हिंसादिषु भावनान्तरप्रतिपादनार्थमाह—
दुःखमेव वा ॥ १० ॥
§ ६८१. हिंसादयो दुःखमेवेति भावयितव्याः । कथं हिंसादयो दुःखम् । दुःखकारणत्वात् ।
यथा “अन्नं वै प्राणाः” इति । कारणस्य कारणत्वाद्वा । यथा “धनं प्राणाः” इति । धनकारण-
मन्नपानमन्नपानकारणाः प्राणा इति । तथा हिंसादयोऽसद्वेद्यकर्मकारणम् । असद्वेद्यकर्म च
दुःखकारणमिति दुःखकारणे दुःखकारणकारणे वा दुःखोपचारः । तदेते¹ दुःखमेवेति भावनं परात्म-
साक्षिकमवगन्तव्यम् । ननु² च तत्सर्वं न दुःखमेव; विषयरतिसुखसद्भावात् । न तत्सुखम्;
वेदनाप्रतीकारत्वात्कच्छूकण्डूयनवत् ।
§ ६८२. पुनरपि³ भावनान्तरमाह—
⁴मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि च सत्त्वगुणाधिकक्लिश्यमानाविनेयेषु ॥ ११ ॥
अनेक दोषोंको प्राप्त होता है। जैसे ईंधनसे अग्निकी तृप्ति नहीं होती वैसे ही इसकी कितने ही
परिग्रहसे कभी भी तृप्ति नहीं होती । यह लोभातिरेकके कारण कार्य और अकार्यका विवेक नहीं
करता, परलोकमें अशुभ गतिको प्राप्त होता है । तथा यह लोभी है इस प्रकारसे इसका तिरस्कार
भी होता है इसलिए परिग्रहका त्याग श्रेयस्कर है । इस प्रकार हिंसा आदि दोषोंमें अपाय और
अवद्यके दर्शनकी भावना करनी चाहिए।
§ ६८०. अब हिंसा आदि दोषोंमें दूसरी भावनाका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
अथवा हिंसादिक दुःख ही हैं ऐसी भावना करनी चाहिए ॥१०॥
§ ६८१. हिंसादिक दुःख ही हैं ऐसा चिन्तन करना चाहिए। शंका—हिंसादिक दुःख कैसे
हैं ? समाधान—दुःखके कारण होनेसे । यथा—'अन्न ही प्राण है।' अन्न प्राणधारणका कारण है
पर कारणमें कार्यका उपचार करके जिस प्रकार अन्नको ही प्राण कहते हैं । या कारणका कारण
होनेसे हिंसादिक दुःख हैं। यथा—'धन ही प्राण हैं।' यहाँ अन्नपानका कारण धन है और प्राणका
कारण अन्नपान है इसलिए जिस प्रकार धनको प्राण कहते हैं उसी प्रकार हिंसादिक असाता
वेदनीय कर्मके कारण हैं और असाता वेदनीय दुःखका कारण है, इसलिए दुःखके कारण या दुःखके
कारणके कारण हिंसादिकमें दुःखका उपचार है। ये हिंसादिक दुःख ही हैं इस प्रकार अपनी और
दूसरोंकी साक्षीपूर्वक भावना करनी चाहिए। शंका—ये हिंसादिक सबके सब केवल दुःख ही हैं यह
बात नहीं है, क्योंकि विषयोंके सेवनमें सुख उपलब्ध होता है ? समाधान—विषयोंके सेवनसे जो
सुखाभास होता है वह सुख नहीं है, किन्तु दादको खुजलानेके समान केवल वेदनाका प्रतिकार-
मात्र है।
§ ६८२. और भी अन्य भावना करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
प्राणीमात्रमें मैत्री, गुणाधिकोंमें प्रमोद, क्लिश्यमानोंमें करुणा वृत्ति और अविनेयोंमें
माध्यस्थ्य भावना करनी चाहिए ॥११॥

१. तदेते दुःखमेवेति भावनं परमात्मसा-आ० । तदेतत् दुःखमेवेति भावनं परात्मसा-मु० । तदेते दुःखमेवेति
भावनं परत्रात्मसा-ता० । २. ननु च सर्वं दुःखमेव ता० । ३. भावनार्थमाह आ०, दि० १, दि० २ ।
४. 'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनतश्चित्तप्रसादनम् ।' पा० यो० सू० १, ३३ ।

  • ७।१२ § ६८६ ] सप्तमोऽध्यायः २६३
    § ६८३. परेषां दुःखानुत्पत्त्यभिलाषो मैत्री । वदनप्रसादादिभिरभिव्यज्यमानान्तर्भक्तिरागः
    प्रमोदः । दीनानुग्रहभावः कारुण्यम् । रागद्वेषपूर्वकपक्षपाताभावो माध्यस्थ्यम् । दुष्कर्मविपाकवशा-
    न्नानायोनिषु सीदन्तीति सत्त्वा जीवाः । सम्यग्ज्ञानादिभिः प्रकृष्टा गुणाधिकाः । असद्वेद्योदयापादित-
    क्लेशाः क्लिश्यमानाः । तत्त्वार्थश्रवणग्रहणाभ्यामसंपादितगुणा अविनेयाः । एतेषु सत्त्वादिषु
    यथासंख्यं मैत्र्यादीनि भावयितव्यानि । सर्वसत्त्वेषु मैत्री, गुणाधिकेषु प्रमोदः, क्लिश्यमानेषु ५
    कारुण्यम्, अविनेयेषु माध्यस्थ्यमिति । एवं भावयतः पूर्णान्यहिंसादीनि व्रतानि भवन्ति ।
    § ६८४. पुनरपि भावनान्तरमाह—
    १जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् ॥ १२ ॥
    § ६८५. जगत्स्वभावस्तावदनादिरनिधनो वेत्रासनझल्लरीमृदङ्गनिभः । अत्र जीवा अनादि- १०
    संसारेऽनन्तकालं नानायोनिषु दुःखं भोजं भोजं पर्यटन्ति । न चात्र किंचिन्नियतमस्ति । जलबुद्-
    बुदोपमं जीवितम्, विद्युन्मेघादिविकारचपला भोगसंपद इति । एवमादिजगत्स्वभावचिन्तनात्संसा-
    रात्संवेगो भवति । कायस्वभावश्च अनित्यता दुःखहेतुत्वं निःसारता अशुचित्वमिति । एवमादि-
    कायस्वभावचिन्तनाद्विषयरागनिवृत्तेर्वैराग्यमुपजायते । इति जगत्कायस्वभावौ भावयितव्यौ ।
    § ६८६. अत्राह; उक्तं भवता२ हिंसादिनिवृत्तिव्रतमिति, तत्र न जानीमः के हिंसादयः
    § ६८३. दूसरोंको दुःख न हो ऐसी अभिलाषा रखना मैत्री है। मुखकी प्रसन्नता आदिके १५
    द्वारा भीतर भक्ति और अनुरागका व्यक्त होना प्रमोद है। दोनों पर दयाभाव रखना कारुण्य है।
    रागद्वेषपूर्वक पक्षपातका न करना माध्यस्थ्य है। बुरे कर्मोंके फलसे जो नाना योनियोंमें जन्मते और
    मरते हैं वे सत्त्व हैं। सत्त्व यह जीवका पर्यायवाची नाम है। जो सम्यग्ज्ञानादि गुणोंमें बढ़े चढ़े हैं
    वे गुणाधिक कहलाते हैं। असातावेदनीयके उदयसे जो दुःखी हैं वे क्लिश्यमान कहलाते हैं। २०
    जिनमें जीवादि पदार्थोंको सुनने और ग्रहण करनेका गुण नहीं है वे अविनेय कहलाते हैं। इन
    सत्त्व आदिकमें क्रमसे मैत्री आदिकी भावना करनी चाहिए। जो सब जीवोंमें मैत्री, गुणाधिकोंमें
    प्रमोद, क्लिश्यमानोंमें कारुण्य और अविनेयोंमें माध्यस्थ्य भावकी भावना करता है उसके अहिंसा
    आदि व्रत पूर्णताको प्राप्त होते हैं।
    ६८४. अब फिर भी और भावनाके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    संवेग और वैराग्यके लिए जगत्के स्वभाव और शरीरके स्वभावकी भावना करनी २५
    चाहिए ॥१२॥
    § ६८५. जगत्का स्वभाव तथा—यह जगत् अनादि है, अनिधन है, वेत्रासन, झल्लरी और
    मृदंगके समान है। इस अनादि संसारमें जीव अनन्त काल तक नाना योनियोंमें दुःखको पुनः पुनः
    भोगते हुए भ्रमण करते हैं। इसमें कोई भी वस्तु नियत नहीं है। जीवन जलके बुलबुलेके समान
    है। और भोग-सम्पदाएँ बिजुली और इन्द्रधनुषके समान चंचल हैं। इत्यादि रूपसे जगत्के ३०
    स्वभावका चिन्तन करनेसे संसारसे संवेग—भय होता है। कायका स्वभाव यथा—यह शरीर
    अनित्य है, दुःखका कारण है, निःसार है और अशुचि है इत्यादि । इस प्रकार कायके स्वभावका
    चिन्तन करनेसे विषयोंसे आसक्ति हटकर वैराग्य उत्पन्न होता है। अतः जगत् और कायके
    स्वभावकी भावना करनी चाहिए।
    § ६८६. यहाँ पर शंकाकार कहता है कि आपने यह तो बतलाया कि हिंसादिकसे निवृत्त ३५
    १. शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ।'—पा० यो० सू० २,४० । २. भगवता मु०, ता०, ना० ।
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क्रियाविशेषा इत्यत्रोच्यते। युगपद्वक्तुमशक्यत्वात्तल्लक्षणनिर्देशस्य क्रमप्रसङ्गे यासावादौ चोदिता
सैव तावदुच्यते—
प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा ॥ १३ ॥
§ ६८७. प्रमादः सकषायत्वं तद्भानात्मपरिणामः प्रमत्तः। प्रमत्तस्य योगः प्रमत्तयोगः।
तस्मात्प्रमत्तयोगात् इन्द्रियादयो दशप्राणास्तेषां यथासंभवं व्यपरोपणं वियोगकरणं हिंसेत्यभिधीयते।
सा प्राणिनो दुःखहेतुत्वादधर्महेतुः । 'प्रमत्तयोगात्' इति विशेषणं केवलं प्राणव्यपरोपणं नाधर्मयेति
ज्ञापनार्थम्। उक्तं च—
वियोजयति¹ चासुभिर्न च वधेन संयुज्यते ।।' इति ॥
उक्तं च—
“उच्चालिदमम्हि² पादे इरियासमिदस्स णिग्गमट्ठाणे ।
आवादे [धे] ज्ज कुंलिगो मरेज्ज तज्जोगमासेज्ज ॥
ण हि तस्स³ तण्णिमित्तो बंधो सुहुमो वि देसिदो समए ।
मुच्छापरिग्गहो त्ति य अज्झप्पपमाणदो भणिदो ॥”
ननु च प्राणव्यपरोपणाभावेऽपि प्रमत्तयोगमात्रादेव हिंसेष्यते । उक्तं च—
“मरदु व जियदु व जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा ।
पयदस्स णत्थि बंधो हिंसामित्तेण समिदस्स ।।”
होना व्रत है। परन्तु वहां यह न जान सके कि हिंसादिक क्रियाविशेष क्या हैं ? इसलिए यहां
कहते हैं। तथापि उन सबका एक साथ कथन करना अशक्य है किन्तु उनका लक्षण क्रमसे ही
कहा जा सकता है अतः प्रारम्भमें जिसका उल्लेख किया है उसीका स्वरूप बतलानेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
प्रमत्तयोगसे प्राणोंका वध करना हिंसा है ॥१३॥
§ ६८७. प्रमाद कषाय सहित अवस्थाको कहते हैं और इस प्रमादसे युक्त जो आत्माका
परिणाम होता है वह प्रमत्त कहलाता है। तथा प्रमत्तका योग प्रमत्तयोग है। इसके सम्बन्धसे
इन्द्रियादि दस प्राणोंका यथासम्भव व्यपरोपण अर्थात् वियोग करना हिंसा कही जाती है। इससे
प्राणियोंको दुःख होता है इसलिए वह अधर्मका कारण है। केवल प्राणोंका वियोग करनेसे अधर्म
नहीं होता है यह बतलानेके लिए सूत्रमें 'प्रमत्तयोगसे' यह पद दिया है। कहा भी है—
'यह प्राणी दूसरेको प्राणोंसे वियुक्त करता है तो भी उसे हिंसा नहीं लगती ।।' और भी
कहा है—
'ईर्यासमितिस युक्त साधुके अपने पैरके उठाने पर चलनेके स्थानमें यदि कोई क्षुद्र प्राणी
उनके पैरसे दब जाय और उसके सम्बन्धसे मर जाय तो भी उस निमित्तसे थोड़ा भी बन्ध आगम-
में नहीं कहा है, क्योंकि जैसे अध्यात्म दृष्टिसे मूर्च्छाको ही परिग्रह कहा है वैसे यहाँ भी रागादि
परिणामको हिंसा कहा है ।।'
शंका - प्राणोंका विनाश न होने पर भी केवल प्रमत्तयोगसे ही हिंसा कही जाती है। कहा
भी है-
'जीव मर जाय या जीता रहे तो भी यत्नाचारसे रहित पुरुषके नियमसे हिंसा होती है
और जो यत्नाचारपूर्वक प्रवृत्ति करता है। हिंसाके हो जाने पर भी उसे बन्ध नहीं होता ।।'
१. सिद्ध० द्वा० ३,१६। २. प्रवचन० क्षे० ३,१६। ३. प्रवचन० क्षे० ३,१७। ४. वचन० ३,१७ ।

  • ७।१५ ६ ६९१ ] सप्तमोऽध्यायः २६५
    नैष दोषः । अत्रापि प्राणव्यपरोपणमस्ति भावलक्षणम् । तथा चोक्तम्—
    "स्वयमेवात्मनात्मानं हिनस्त्यात्मा प्रमादवान् ।
    पूर्वं प्राणव्यन्तराणां तु पश्चात्स्याद्वा न वा वधः ॥"
    § ६८८. आह अभिहितलक्षणा हिंसा । तदनन्तरोद्दिष्टमनृतं किल्लक्षणमित्यत्रोच्यते—
    असदभिधानमनृतम् ॥ १४ ॥
    § ६८९. सच्छब्दः प्रशंसावाची । न सदसदप्रशस्तमिति यावत् । असतोऽर्थस्याभिधानमसद-
    भिधानमनृतम् । ऋतं सत्यं, न ऋतमनृतम् । किं पुनरप्रशस्तम् । प्राणिपीडाकरं यत्तदप्रशस्तं
    विद्यमानार्थविषयं वा अविद्यमानार्थविषयं वा। उक्तं च प्रागेवार्हिसाव्रतपरिपालनार्थमितरद्व्रतम्
    इति । तस्माद्धिंसाकरं वचोऽनृतमिति निश्चेयम् ।
    § ६९० अथानृतानन्तरमुद्दिष्टं यत्स्तेयं तस्य किं लक्षणमित्यत आह—
    अदत्तादानं स्तेयम् ॥ १५ ॥
    § ६९१. अदानं ग्रहणमदत्तस्यादानमदत्तादानं स्तेयमित्युच्यते । यद्येवं कर्मनोकर्मग्रहणमपि
    स्तेयं प्राप्नोति; अन्येनादत्तत्वात् । नैष दोषः दानादाने यत्र संभवतस्तत्रैव स्तेयव्यवहारः । कुतः ।
    'अदत्त'ग्रहणसामर्थ्यात् । एवमपि भिक्षोर्ग्रामनगरादिषु भ्रमणकाले रथ्याद्वारादिप्रवेशाददत्तादानं
    समाधान — यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहां भी भावरूप प्राणोंका नाश है ही। कहा
    भी है—
    'प्रमादसे युक्त आत्मा पहले स्वयं अपने द्वारा ही अपना घात करता है इसके बाद दूसरे
    प्राणियोंका वध होवे या मत होवे ॥'
    § ६८८. हिंसाका लक्षण कहा अब उसके बाद असत्यका लक्षण बतलानेके लिए आगेका
    सूत्र कहते हैं—
    असत् बोलना अनृत है ॥१५॥
    § ६८९. सत् शब्द प्रशंसावाची है । जो सत् नहीं वह असत् है। असत्का अर्थ अप्रशस्त
    है। तात्पर्य यह है कि जो पदार्थ नहीं है उसका कथन करना अनृत-असत्य कहलाता है। ऋतका
    अर्थ सत्य है और जो ऋत-सत्य नहीं है वह अनृत है । शंका-अप्रशस्त किसे कहते हैं?
    समाधान- जिससे प्राणियोंको पीड़ा होती है उसे अप्रशस्त कहते हैं। भले ही वह चाहे विद्यमान
    पदार्थको विषय करता हो या चाहे अविद्यमान पदार्थको विषय करता हो । यह पहले ही कहा है
    कि शेष व्रत अहिंसा व्रतकी रक्षाके लिए हैं। इसलिए जिससे हिंसा हो वह वचन अनृत है ऐसा
    निश्चय करना चाहिए ।
    § ६९०. असत्यके बाद जो स्तेय कहा है उसका क्या लक्षण है यह बतलानेके लिए आगेका
    सूत्र कहते हैं—
    बिना दी हुई वस्तुका लेना स्तेय है ॥१५॥
    § ६९१. आदान शब्दका अर्थ ग्रहण है। बिना दी हुई वस्तुका लेना अदत्तादान है और यही
    स्तेय-चोरी कहलाता है। शंका- यदि स्तेयका पूर्वोक्त अर्थ किया जाता है तो कर्म और नोकर्मका
    ग्रहण करना भी स्तेय ठहरता है, क्योंकि ये किसीके द्वारा दिये नहीं जाते ? समाधान — यह कोई
    दोष नहीं है, क्योंकि जहां देना और लेना सम्भव है वहीं स्तेयका व्यवहार होता है। शंका- यह
    अर्थ किस शब्दसे फलित होता है ? समाधान — सूत्रमें जो 'अदत्त' पदका ग्रहण किया है उससे
    ज्ञात होता है कि जहां देना लेना सम्भव है वहीं स्तेयका व्यवहार होता है। शंका-स्तेयका उक्त
    १. तत्रापि आ०, दि० १, दि० २ । २. -हिंसाप्रतिपाल-मु० । ३. कर्मवचो मु० ।
    ३४
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२६६ | सर्वार्थसिद्धौ | [ ७।१६ § ६९२ –
प्राप्नोति । नैष दोषः; सामान्येन मुक्तत्वात् । तथाहि—अयं भिक्षुः पिहितद्वारादिषु न प्रविशति
अमुक्तत्वात् । अथवा 'प्रमत्तयोगात्' इत्यनुवर्तते । प्रमत्तयोगाददत्तादानं यत् तत्स्तेयमित्युच्यते ।
न च रथ्यादि प्रविशतः प्रमत्तयोगोऽस्ति । तेनैतदुक्तं भवति, यत्र संक्लेशपरिणामेन प्रवृत्तिस्तत्र
स्तेयं भवति बाह्यवस्तुनो¹ ग्रहणे चाग्रहणे च ।
५ § ६९२. अथ चतुर्थमब्रह्म किंलक्षणमित्यत्रोच्यते—
मैथुनमब्रह्म ॥१६॥
§ ६९३. स्त्रीपुंसयोश्चारित्रमोहोदये सति रागपरिणामाविद्धयोः परस्परस्पर्शनं प्रति इच्छा
मिथुनम् । मिथुनस्य कर्म मैथुनमित्युच्यते । न सर्वं कर्म । कुतः । लोके शास्त्रे च तथा प्रसिद्धेः ।
लोके तावद्गोपालादिप्रसिद्धं स्त्रीपुंसयोः रागपरिणामनिमित्तं चेष्टितं मैथुनमिति । शास्त्रेऽपि
१० "अश्ववृषभयोर्मैथुनेच्छायाम्" इत्येवमादिषु तदेव गृह्यते । अपि च 'प्रमत्तयोगात्' इत्यनुवर्तते तेन
स्त्रीपुंसमिथुनविषयं रतिसुखार्थं चेष्टितं मैथुनमिति गृह्यते, न सर्वम् । अहिंसादयो⁴ गुणा यस्मिन्
परिपाल्यमाने बृंहन्ति वृद्धिमुपयान्ति तद् ब्रह्म । न ब्रह्म अब्रह्म इति । किं तत् । मैथुनम् । तत्र
हिंसादयो दोषाः पुष्यन्ति । यस्मान्मैथुनसेवनप्रवणः स्थास्नूँश्चरिष्णून् प्राणिनो हिनस्ति मृषावाद-
माचष्टे अदत्तमादत्ते अचेतनमितरं⁶ च परिग्रहं गृह्णाति ।
१५ अर्थ करने पर भी भिक्षुके ग्राम नगरादिकमें भ्रमण करते समय गली, कूचा, दरवाजा आदिमें
प्रवेश करने पर बिना दी हुई वस्तुका ग्रहण प्राप्त होता है ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है;
क्योंकि वे गली, कूचा और दरवाजा आदि सबके लिए खुले हैं । यह भिक्षु जिनमें किवाड़ आदि
लगे हैं उन दरवाजा आदिमें प्रवेश नहीं करता, क्योंकि वे सबके लिए खुले नहीं हैं । अथवा,
'प्रमत्तयोगात्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है जिससे यह अर्थ होता है कि प्रमत्तके योगसे बिना दी
२० हुई वस्तुका ग्रहण करना स्तेय है । गली कूचा आदिमें प्रवेश करनेवाले भिक्षुके प्रमत्तयोग तो है
नहीं इसलिए वैसा करते हुए स्तेयका दोष नहीं लगता । इस सब कथनका यह अभिप्राय है कि
बाह्य वस्तु ली जाय या न ली जाय किन्तु जहाँ संक्लेशरूप परिणामके साथ प्रवृत्ति होती है वहाँ
स्तेय है ।
§ ६९२. अब चौथा जो अब्रह्म है उसका क्या लक्षण है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
२५ कहते हैं—
मैथुन अब्रह्म है ॥१६॥
§ ६९३. चारित्र मोहनीयका उदय होनेपर राग परिणामसे युक्त स्त्री और पुरुषके जो एक
दूसरेको स्पर्श करने की इच्छा होती है वह मिथुन कहलाता है और इसका कार्य मैथुन कहा
जाता है । सब कार्य मैथुन नहीं कहलाता क्योंकि लोकमें और शास्त्रमें इसी अर्थमें मैथुन शब्दकी
३० प्रसिद्धि है । लोकमें बाल गोपाल आदि तक यह प्रसिद्ध है कि स्त्री-पुरुषकी रागपरिणामके निमित्त-
से होनेवाली चेष्टा मैथुन है । शास्त्रमें भी 'घोड़ा और बैलकी मैथुनेच्छा होनेपर' इत्यादि वाक्योंमें
यही अर्थ लिया जाता है । दूसरे 'प्रमत्तयोगात्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है इसलिए रतिजन्य
सुखके लिए स्त्री-पुरुषकी मिथुनविषयक जो चेष्टा होती है वही मैथुन रूपसे ग्रहण किया जाता है
सब नहीं । अहिंसादिक गुण जिसके पालन करनेपर बढ़ते हैं वह ब्रह्म कहलाता है और जो इससे
३५ रहित है वह अब्रह्म है । शंका—अब्रह्म क्या है ? समाधान—मैथुन । मैथुनमें हिंसादिक दोष पुष्ट
होते हैं, क्योंकि जो मैथुनके सेवनमें दक्ष है वह चर और अचर सब प्रकार के प्राणियोंकी हिंसा
१. -वस्तुनो ग्रहणे च आ० । २. -पुंसराग-मु० । ३. पा० सू० ७।१।५१ इत्यत्र वार्तिकम् । ४. -दयो
धर्मा य-मु० । ५. अब्रह्म । किं मु० । ६. सचेतनमितरच्च मु० ।
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  • ७।१७ ६ ६९५ ] सप्तमोऽध्यायः २६७
    § ६९४. अथ पञ्चमस्य परिग्रहस्य किं लक्षणमित्यत आह-
    मूर्च्छा परिग्रहः ॥१७॥
    § ६९५. मूर्च्छत्युच्यते ।$^१$ का मूर्च्छा । बाह्यानां गोमहिषमणिमुक्ताफलादीनां$^२$ चेतनाचेत-
    $^३$नानामाभ्यन्तराणां च रागादीनामुपधीनां संरक्षणार्जनसंस्कारादिलक्षणाव्यावृत्तिर्मूर्च्छा । ननु ५
    च लोके वातादिप्रकोपविशेषस्य मूर्च्छति प्रसिद्धिरस्ति तद्ग्रहणं कस्मान्न भवति । सत्यमेवैतत् ।
    मूर्च्छिरयं मोहसामान्ये वर्तते । “सामान्यचोदनाश्च विशेषेष्ववतिष्ठन्ते” इत्युक्ते विशेषे व्यवस्थितः
    परिगृह्यते; परिग्रहप्रकरणात् । एवमपि बाह्यस्य परिग्रहत्वं न प्राप्नोति; आध्यात्मिकस्य संग्रहात् ।
    सत्यमेवैतत्; प्रधानत्वादभ्यन्तर एव संगृहीतः ।$^४$ असत्यपि बाह्ये ममेदमिति संकल्पवान् सपरि-
    ग्रह$^५$ एव भवति । अथ बाह्यः परिग्रहो न भवत्येव, भवति च मूर्च्छाकारणत्वात् यदि ममेदमिति
    संकल्पः परिग्रहः; संज्ञानाद्यपि परिग्रहः प्राप्नोति तदपि हि ममेदमिति संकल्प्यते रागादिपरिणाम- १०
    वत् । नैष दोषः; 'प्रमत्तयोगात्' इत्यनुवर्तते $^६$ । ततो ज्ञानदर्शनचारित्रवतोऽप्रमत्तस्य मोहाभावान्न
    मूर्च्छास्तीति निष्परिग्रहत्वं सिद्धम् । किंच तेषां ज्ञानादीनामहेयत्वादात्मस्वभावत्वादपरिग्रहत्वम् ।
    रागादयः पुनः कर्मोदयतन्त्रा इति अनात्मस्वभावत्वाद्धेयाः । ततस्तेषु संकल्पः परिग्रह इति
    करता है, झूठ बोलता है, बिना दी हुई वस्तु लेता है तथा चेतन और अचेतन दोनों प्रकारके
    परिग्रहको स्वीकार करता है। १५
    § ६९४. अब पाँचवां जो परिग्रह है उसका क्या लक्षण है यह बतलानेके लिए आगेका
    सूत्र कहते हैं-
    मूर्च्छा परिग्रह है ॥१७॥
    § ६९५. अब मूर्च्छाका स्वरूप कहते हैं । शंका-मूर्च्छा क्या है ? समाधान-गाय, भैंस,
    मणि और मोती आदि चेतन अचेतन बाह्य उपधिका तथा रागादिरूप अभ्यन्तर उपधिका संरक्षण २०
    अर्जन और संस्कार आदि रूप व्यापार ही मूर्च्छा है। शंका-लोकमें वातादि प्रकोप विशेषका
    नाम मूर्च्छा है ऐसी प्रसिद्धि है, इसलिए यहाँ इस मूर्च्छाका ग्रहण क्यों नहीं किया जाता ? समा-
    धान-यह कहना सत्य है तथापि मूच्छ धातुका सामान्य अर्थ मोह है और सामान्य शब्द तद्गत
    विशेषोंमें ही रहते हैं ऐसा मान लेने पर यहाँ मूर्च्छाका विशेष अर्थ ही लिया गया है, क्योंकि
    यहाँ परिग्रहका प्रकरण है । शंका-मूर्च्छाका यह अर्थ लेने पर भी बाह्य वस्तुको परिग्रहपना नहीं २५
    प्राप्त होता, क्योंकि मूर्च्छा इस शब्दसे आभ्यन्तर परिग्रहका संग्रह होता है। समाधान -यह
    कहना सही है; क्योंकि प्रधान होनेसे आभ्यन्तरका ही संग्रह किया है। यह स्पष्ट ही है कि बाह्य
    परिग्रहके न रहनेपर भी 'यह मेरा है' ऐसा संकल्पवाला पुरुष परिग्रहसहित ही होता है। शंका-
    यदि बाह्य पदार्थ परिग्रह नहीं है और मूर्च्छाका कारण होनेसे 'यह मेरा है' इस प्रकारका संकल्प
    ही परिग्रह है तो ज्ञानादिक भी परिग्रह ठहरते हैं, क्योंकि रागादि परिणामोंके समान ज्ञानादिक ३०
    में भी 'यह मेरा है' इस प्रकारका संकल्प होता है ? समाधान -यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि
    'प्रमत्तयोगात्' इस पदकी अनुवृत्ति होती है, इसलिए जो ज्ञान, दर्शन और चारित्रवाला होकर
    प्रमादरहित है उसके मोहका अभाव होनेसे मूर्च्छा नहीं है, अतएव परिग्रहरहितपना सिद्ध होता
    है। दूसरे वे ज्ञानादिक अहेय हैं और आत्माके स्वभाव हैं इसलिए उनमें परिग्रहपना नहीं प्राप्त
    होता । परन्तु रागादिक तो कर्मोंके उदयसे होते हैं, अतः वे आत्माका स्वभाव न होनेसे हेय हैं ३५
    १. -च्यते । केयं मूर्च्छा मु० आ०, दि० १, दि० २ । २. -मुक्तादी - मु०, ता० । ३. -तनानां च
    रागा-मु० । ४. -गृह्यते । एवमपि ता०, ना० । ५. संगृह्यते । असत्यपि मु. । ६. -ग्रहो भवति मु० ।
    ७. -र्तते । ज्ञान - आ०, दि० १, दि० २ ।

२६८ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।१८ § ६९६-
युज्यते । तन्मूलाः सर्वे दोषाः । ममेदमिति हि सति संकल्पे संरक्षणादयः संजायन्ते । तत्र च हिंसा-
वश्यंभाविनी । तदर्थमनृतं जल्पति । चौर्यं वा१ आचरति । मैथुने च कर्मणि प्रयतते । तत्प्रभवा
नरकादिषु दुःखप्रकाराः ।
§ ६९६. एवमुक्तेन२ प्रकारेण हिंसादिदोषदर्शिनोऽहिंसादिगुणाहितचेतसः परमप्रयत्नस्या-
५ हिंसादीनि व्रतानि यस्य सन्ति सः—
निःशल्यो व्रती ॥१८॥
§ ६९७. शृणाति हिनस्तीति शल्यम् । शरीरानुप्रवेशि काण्डादिप्रहरणं३ शल्यमिव शल्यं
यथा तत् प्राणिनो बाधाकरं तथा४ शरीरमानसबाधाहेतुत्वात्कर्मोदयविकारः शल्यमित्युपचर्यते ।
तत् त्रिविधम्—मायाशल्यं निदानशल्यं मिथ्यादर्शनशल्यमिति । माया निकृतिर्वञ्चना । निदानं
१० विषयभोगाकाङ्क्षा । मिथ्यादर्शनमतत्त्वश्रद्धानम् । एतस्मात्त्रिविधाच्छल्यान्निष्क्रान्तो निःशल्यो
व्रती इत्युच्यते । अत्र चोद्यते—शल्याभावान्निःशल्यो व्रताभिसंबन्धाद् व्रती, न निःशल्यत्वाद् व्रती
भवितुमर्हति । न हि देवदत्तो दण्डसंबन्धाच्छत्री भवतीति । अत्रोच्यते—उभयविशेषणविशिष्ट५-
स्येष्टत्वात् । न हिंसाद्युपरतिमात्रवृता६भिसंबन्धाद् व्रती भवत्यन्तरेण शल्याभावम् । सति शल्या-
पगमे व्रतसंबन्धाद् व्रती विवक्षितो यथा बहुक्षीरघृतो गोमानिति व्यपदिश्यते । बहुक्षीरघृताभा-
१५ इसलिए उनमें होनेवाला संकल्प परिग्रह है यह बात बन जाती है। सब दोष परिग्रहमूलक ही
होते हैं। 'यह मेरा है' इस प्रकारके संकल्पके होनेपर संरक्षण आदि रूप भाव होते हैं। और
इसमें हिंसा अवश्यंभाविनी है। इसके लिए असत्य बोलता है, चोरी करता है, मैथुन कर्ममें प्रवृत्त
होता है। नरकादिकमें जितने दुःख हैं वे सब इससे उत्पन्न होते हैं।
§ ६९६. इस प्रकार उक्त विधिसे जो हिंसादिमें दोषोंका दर्शन करता है, जिसका चित्त
२० अहिंसादि गुणोंमें लगा रहता है और जो प्रयत्नशील है वह यदि अहिंसादि व्रतोंको पाले तो किस
संज्ञाको प्राप्त होता है इसी बातका खुलासा करनेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
जो शल्यरहित है वह व्रती है ॥१८॥
६९७. 'शृणाति हिनस्ति इति शल्यम्' यह शल्य शब्दकी व्युत्पत्ति है। शल्यका अर्थ है
पीड़ा देनेवाली वस्तु। जब शरीरमें कांटा आदि चुभ जाता है तो वह शल्य कहलाता है। यहाँ
२५ उसके समान जो पीड़ाकर भाव है वह शल्य शब्दसे लिया गया है। जिस प्रकार काँटा आदि
शल्य प्राणियोंको बाधाकर होती है उसी प्रकार शरीर और मन सम्बन्धी बाधाका कारण होनेसे
कर्मोदयजनित विकारमें भी शल्यका उपचार कर लेते हैं अर्थात् उसे भी शल्य कहते हैं। वह
शल्य तीन प्रकारकी है—माया शल्य, निदान शल्य और मिथ्यादर्शन शल्य। माया, निकृति और
वंचना अर्थात् ठगनेकी वृत्ति यह माया शल्य है। भोगोंकी लालसा निदान शल्य है और अतत्त्वों-
३० का श्रद्धान मिथ्यादर्शन शल्य है। इन तीन शल्योंसे जो रहित है वही निःशल्य व्रती कहा जाता
है। शंका—शल्यके न होनेसे निःशल्य होता है और व्रतोंके धारण करनेसे व्रती होता है। शल्य-
रहित होनेसे व्रती नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ देवदत्तके हाथमें लाठी होनेपर वह छत्री नहीं हो
सकता ? समाधान—व्रती होनेके लिए दोनों विशेषणोंसे युक्त होना आवश्यक है, यदि किसीने
शल्योंका त्याग नहीं किया और केवल हिंसादि दोषोंको छोड़ दिया तो वह व्रती नहीं हो सकता ।
३५ यहाँ ऐसा व्रती इष्ट है जिसने शल्योंका त्याग करके व्रतोंको स्वीकार किया है। जैसे जिसके यहाँ
१. चौर्यं चाचरति ता. । २. एवमुक्तक्रमेण हिंसा-ता० । ३. -प्रहरणं । तच्छल्य मु. । ४. तथा शरीर-
मु० । ५. -विशिष्टत्वात् मु० । ६. -मात्रसम्ब-मु० ।
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  • ७।१९ § ७०० ] सप्तमोऽध्यायः २६९

वात्सतीष्वपि गोषु न गोमांस्तथा सशल्यत्वात्सत्स्वपि व्रतेषु न व्रती । यस्तु निःशल्यः स व्रती ।
§ ६९८. तस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह—
अगार्यनगारश्च ॥१९॥
§ ६९९. प्रतिश्रयार्थिभिः अङ्ग्यते इति अगारं वेश्म, तद्वानगारी । न विद्यते अगारमस्येत्य-
नगारः । द्विविधो व्रती अगारो अनगारश्च । ननु चात्र विपर्ययोऽपि प्राप्नोति शून्यागारदेवकुलाद्या-
वासस्य मुनेरगारित्वम् अनिवृत्तविषयतृष्णस्य कुतश्चित्कारणाद् गृहं विमुच्य वने वसतोऽनगा-
रत्वं च प्राप्नोतीति¹ । नैष दोषः; भावागारस्य विवक्षितत्वात् । चारित्रमोहोदये सत्यगारसम्बन्धं
प्रत्यनिवृत्तः² परिणामो भावागारमित्युच्यते । स यस्यास्त्यसावगारी वने वसन्नपि । गृहे वसन्नपि
तदभावादनगार इति च भवति । ननु चागारिणो व्रतित्वं न प्राप्नोति; असकलव्रतत्वात् । नैष
दोषः; नैगमादिनयापेक्षया अगारिणोऽपि व्रतित्वमुपपद्यते नगरावासवत् । यथा गृहे अपवरके वा
वसन्नपि नगरावास इत्युच्येत तथा असकलव्रतोऽपि नैगमसंग्रहव्यवहारनयापेक्षया व्रतीति
व्यपदिश्यते ।
§ ७००. अत्राह किं हिंसादीनामन्यतमस्माद्यः प्रतिनिवृत्तः स खल्वगारी व्रती । नैवम् । किं
तर्हि । पञ्चतय्या अपि विरतेर्वैकल्येन विवक्षित इत्युच्यते—

बहुत घी दूध होता है वह गायवाला कहा जाता है । यदि उसके घी दूध नहीं होता और गायें
हैं तो वह गायवाला नहीं कहलाता, उसी प्रकार जो शल्य है व्रतोंके होनेपर भी वह व्रती नहीं
हो सकता । किन्तु जो निःशल्य है वह व्रती है ।
§ ६९८. अब उसके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उसके अगारी और अनागार ये दो भेद हैं ॥१९॥
§ ६९९. आश्रय चाहनेवाले जिसे अंगीकार करते हैं वह अगार है । अगारका अर्थ वेश्म
अर्थात् घर है । जिसके घर है वह अगारी है । और जिसके घर नहीं है वह अनगार है । इस
तरह व्रती दो प्रकारका है—अगारी और अनगार । शंका—अभी अगारी और अनगारका जो
लक्षण कहा है उससे विपरीत अर्थ भी प्राप्त होता है, क्योंकि उपर्युक्त लक्षणके अनुसार जो मुनि
शून्य घर और देवकुलमें निवास करते हैं वे अगारी हो जायेंगे और विषयतृष्णाका त्याग किये
बिना जो किसी कारणसे घरको छोड़कर वनमें रहने लगे हैं वे अनगार हो जायेंगे ? समाधान—
यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यहाँपर भावागार विवक्षित है । चारित्र मोहनीयका उदय होने
पर जो परिणाम घरसे निवृत्त नहीं है वह भावागार कहा जाता है। वह जिसके है वह वनमें
निवास करते हुए भी अगारी है और जिसके इस प्रकारका परिणाम नहीं है वह घरमें रहते हुए भी
अनगार है । शंका—अगारी व्रती नहीं हो सकता, क्योंकि उसके पूर्ण व्रत नहीं है ? समाधान—
यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि नैगम आदि नयकी अपेक्षा नगरावासके समान अगारीके भी व्रती-
पना बन जाता है । जैसे कोई घरमें या झोपड़ीमें रहता है तो भी 'मैं नगरमें रहता हूँ' यह कहा
जाता है उसी प्रकार जिसके पूरे व्रत नहीं है वह नैगम, संग्रह और व्यवहारनयकी अपेक्षा व्रती
कहा जाता है ।
§ ७००. शंका—जो हिंसादिकमें-से किसी एकसे निवृत्त है वह क्या अगारी व्रती है ?
समाधान—ऐसा नहीं है। शंका—तो क्या है ? समाधान—जिसके एक देशसे पाँचों प्रकारकी
विरति है वह अगारी है यह अर्थ यहाँ विवक्षित है । अब इसी बातको बतलानेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—


१. -प्नोति नैष आ०, दि० १, दि० २ । २. -वृत्तिपरि-आ०, दि०, १, दि० २ ।

२७० सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२० § ७०१ –
अणुव्रतोऽगारी ॥२०॥
§ ७०१. 'अणु'शब्दोऽल्पवचनः। अणूनि व्रतान्यस्य अणुव्रतोऽगारीत्युच्यते । कथमस्य
व्रतानामणुत्वम् । सर्वसावद्यनिवृत्त्यसंभवात् । कुतस्तर्ह्यसौ निवृत्तः। त्रसप्राणिव्यपरोपणान्निवृत्तः
अगारीत्याद्यमणुव्रतम् । स्नेहमोहादिवशाद् गृहविनाशे ग्रामविनाशे वा कारणमित्यभिमतादसत्य-
वचनान्निवृत्तो गृहीति द्वितीयमणुव्रतम् । अन्यपीडाकरं पार्थिवभयादिवशादवश्यं परित्यक्तमपि
यददत्तं ततः प्रतिनिवृत्त्यादरः श्रावक इति तृतीयमणुव्रतम् । उपात्ताया अनुपात्तायाश्च पराङ्गनायाः
सङ्गान्निवृत्तरतिर्गृहीति चतुर्थमणुव्रतम् । धनधान्यक्षेत्रादीनामिच्छावशात् कृतपरिच्छेदो गृहीति
पञ्चममणुव्रतम् ।
§ ७०२. आह अपरित्यक्तागारस्य किमेतावानेव विशेष आहोस्विदस्ति कश्चिदन्योऽपीत्यत
आह—
दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकप्रोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसं-
विभागव्रतसंपन्नश्च ॥२१॥
§ ७०३. 'विरति'शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । दिग्विरतिः देशविरतिः अनर्थदण्डविरति-
रिति एतानि त्रीणि गुणव्रतानि; १'व्रत'शब्दस्य प्रत्येकभभिसंबन्धात् । तथा सामायिकव्रतं
प्रोषधोपवासव्रतं उपभोगपरिभोगपरिमाणव्रतं अतिथिसंविभागव्रतं २ एतानि चत्वारि शिक्षा-
व्रतानि । एतैर्वृतैः संपन्नो गृही विरताविरत इत्युच्यते । तद्यथा—दिक्प्राच्यादिः तत्र प्रसिद्धे-
अणुव्रतोंका धारी अगारी है ॥२०॥
§ ७०१. अणु शब्द अल्पवाची है। जिसके व्रत अणु अर्थात् अल्प हैं वह अणुव्रतवाला
अगारी कहा जाता है । शंका—अगारीके व्रत अल्प कैसे होते हैं ? समाधान—अगारीके पूरे हिंसादि
दोषोंका त्याग सम्भव नहीं है इसलिए उसके व्रत अल्प होते हैं। शंका—तो यह किसका त्यागी
है ? समाधान—यह त्रस जीवोंकी हिंसाका त्यागी है; इसलिए उसके पहला अहिंसा अणुव्रत होता
है। गृहस्थ स्नेह और मोहादिकके वशसे गृहविनाश और ग्रामविनाशके कारण असत्य वचनसे
निवृत्त है इसलिए उसके दूसरा सत्याणुव्रत होता है। श्रावक राजाके भय आदिके कारण दूसरेको
पीड़ाकारी जानकर बिना दी हुई वस्तुको लेना यद्यपि अवश्य छोड़ देता है तो भी बिना दी हुई
वस्तुके लेनेसे उसकी प्रीति घट जाती है इसलिए उसके तीसरा अचौर्याणुव्रत होता है। गृहस्थके
स्वीकार की हुई या बिना स्वीकार की हुई परस्त्रीका संग करनेसे रति हट जाती है इसलिए
उसके परस्त्रीत्याग नामका चौथा अणुव्रत होता है। तथा गृहस्थ धन, धान्य और क्षेत्र आदिका
स्वेच्छासे परिमाण कर लेता है इसलिए उसके पाँचवाँ परिग्रहपरिमाण अणुव्रत होता है।
§ ७०२. गृहस्थकी क्या इतनी ही विशेषता है कि और भी विशेषता है, अब यह बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं —
वह दिग्विरति, देशविरति, अनर्थदण्डविरति, सामायिकव्रत, प्रोषधोपवासव्रत, उपभोग-
परिभोगपरिमाणव्रत और अतिथिसंविभागव्रत इन व्रतोंसे भी सम्पन्न होता है ॥२१॥
§ ७०३. विरति शब्द प्रत्येक शब्दपर लागू होता है । यथा—दिग्विरति, देशविरति और
अनर्थदण्डविरति । ये तीन गुणव्रत हैं, क्योंकि व्रत शब्दका हर एकके साथ सम्बन्ध है। तथा
सामायिकव्रत, प्रोषधोपवासव्रत, उपभोगपरिमाणव्रत और अतिथिसंविभागव्रत ये चार हैं। इस
प्रकार इन व्रतोंसे जो सम्पन्न है वह गृही विरताविरत कहा जाता है । खुलासा इस प्रकार है—
१. –करपार्थिव–मु० । २. व्रतम् । इत्येतै–मु० ।

  • ७।२१ § ७०३ ] सप्तमोऽध्यायः २७१

रभिज्ञानैरवधिं कृत्वा नियमनं दिग्विरतिव्रतम् । ततो बहिस्त्रसस्थावरव्यपरोपणनिवृत्तेर्महा-
व्रतत्वमवसेयम् । तत्र लाभे सत्यपि परिणामस्य निवृत्तेर्लोभनिरासश्च कृतो भवति । ग्रामा-
दीनामवधृतपरिमाणः² प्रदेशो देशः । ततो बहिर्निवृत्तिर्देशविरतिव्रतम् । पूर्ववद्बहिर्महाव्रतत्वं
व्यवस्थाप्यम् । असत्युपकारे पापादानहेतुरनर्थदण्डः ।³ ततो विरतिरनर्थदण्डविरतिः ।
अनर्थदण्डः पञ्चविधः—अपध्यानं पापोपदेशः प्रमादाचरितं हिंसाप्रदानं अशुभश्रुतिरिति । तत्र ५
परेषां जयपराजयवधबन्धनाङ्गच्छेदपरस्वहरणादि कथं स्यादिति मनसा⁴ चिन्तनमपध्यानम् ।⁵
तिर्यक्क्लेशवाणिज्यप्राणिवधकारम्भादिषु पापसंयुक्तं वचनं पापोपदेशः ।⁷ प्रयोजनमन्तरेण वृक्षा-
दिच्छेदनभूमिकुट्टनसलिलसेचनावद्यकर्म प्रमादाचरितम् ।⁸ विषकण्टकशस्त्राग्निरज्जुकशादण्डा-
दिहिंसोपकरणप्रदानं हिंसाप्रदानम् । हिंसारागादिप्रवर्धनदुष्टकथाश्रवणशिक्षणव्यापृतिरशुभश्रुतिः ।
समेकीभावे९ वर्तते । तद्यथा संगतं घृतं संगतं तैलमित्युच्यते एकीभूतमिति गम्यते । एकत्वेन १०
अयनं गमनं समयः, समय एव सामायिकं, समयः प्रयोजनमस्येति वा विगृह्य सामायिकम् । इयति

जो पूर्वादि दिशाएँ हैं उनमें प्रसिद्ध चिह्नोंके द्वारा मर्यादा करके नियम करना दिग्विरतिव्रत है ।
उस मर्यादाके बाहर त्रस और स्थावर हिंसाका त्याग हो जानेसे उतने अंशमें महाव्रत होता है ।
मर्यादाके बाहर लाभ होते हुए भी उसमें परिणाम न रहनेके कारण लोभका त्याग हो जाता है ।
ग्रामादिककी निश्चित मर्यादारूप प्रदेश देश कहलाता है। उससे बाहर जानेका त्याग कर देना १५
देशविरतिव्रत है। यहाँ भी पहलेके समान मर्यादाके बाहर महाव्रत होता है। उपकार न होकर
जो प्रवृत्ति केवल पापका कारण है वह अनर्थदण्ड है। इससे विरत होना अनर्थदण्डविरति है।
अनर्थदण्ड पाँच प्रकारका है—अपध्यान, पापोपदेश, प्रमादाचरित, हिंसाप्रदान और अशुभश्रुति ।
दूसरोंका जय, पराजय, मारना, बाँधना, अंगोंका छेदना और धनका अपहरण आदि कैसे किया
जाय इस प्रकार मनसे विचार करना अपध्यान नामका अनर्थदण्ड है। तिर्यंचोंको क्लेश पहुँचाने- २०
वाले, वणिजका प्रसार करनेवाले और प्राणियोंकी हिंसाके कारणभूत आरम्भ आदिके विषयमें
पापबहुल वचन बोलना पापोपदेश नामका अनर्थदण्ड है। बिना प्रयोजनके वृक्षादिका छेदना,
भूमिका कूटना, पानीका सींचना आदि पाप कार्य प्रमादाचरित नामका अनर्थदण्ड है। विष, काँटा,
शस्त्र, अग्नि, रस्सी, चाबुक और लकड़ी आदि हिंसाके उपकरणोंका प्रदान करना हिंसाप्रदान
नामका अनर्थदण्ड है। हिंसा और राग आदिको बढ़ानेवाली दुष्ट कथाओंका सुनना और उनकी २५
शिक्षा देना अशुभश्रुति नामका अनर्थदण्ड है। 'सम्' उपसर्गका अर्थ एक रूप है। जैसे 'घी संगत
है, तेल संगत है' जब यह कहा जाता है तब संगतका अर्थ एकीभूत होता है। सामायिकमें मूल
शब्द समय है। इसके दो अवयव हैं सम् और अय। सम्का अर्थ कहा ही है और अयका अर्थ
गमन है। समुदायार्थ एकरूप हो जाना समय है और समय ही सामायिक है। अथवा समय

१. सीमन्तानां परतः स्थूलेतरपञ्चपापसं त्यागात् । देशावकाशिकेन च महाव्रतानि प्रसाध्यन्ते ॥' -रत्न० ३०
३, ५ । २. -माणप्रदेशो मु. । ३. 'पापोपदेशहिंसादानापध्यानदुःश्रुतीः पञ्च । प्राहुः प्रमादचर्यामनर्थदण्डान-
दण्डधराः ॥'-रत्न० ३, ५ । ४. -च्छेदस्वहर-आ० । छेदसर्वस्वहर-दि० १, दि० २ । ५. 'वधबन्ध-
च्छेदादेर्देपाद्रागाच्च परकलत्रादेः । आध्यानमपध्यानं शासति जिनशासने विशदाः ॥' -रत्न० ३,३२ ।
६. -ध्यानम् । प्राणिवधक-आ०, दि० १, दि० २ । ७. 'तिर्यक्क्लेशवणिज्याहिंसारम्भप्रलम्भनादीनाम् ।
कथाप्रसङ्गप्रसवः स्मर्तव्यः पाप उपदेशः ॥' -रत्न० ३, ३० । ८. 'क्षितिसलिलदहनपवनवारम्भं विफलं ३५
वनस्पतिच्छेदम् । सरणं सारणमपि च प्रमादचर्या प्रभाषन्ते ॥' -रत्न० ३,३४ । ६. “तद्यथा तावदेकार्थीभावः
सामर्थ्यन्तदैवं विग्रहः करिष्यते-सङ्गतार्थः समर्थः सृष्टार्थः समर्थ इति । तद्यथा सङ्गतं घृतं सङ्गतं तैलमित्युच्यते
एकीभूतमिति गम्यते ।' -पा० म० भा० २,१,१,१ ।

स्थानान्यनन्तकायव्यपदेशार्हाणि परिहर्तव्यानि बहुघाताल्पफलत्वात् ।Wait,बहुजन्तुयोनिस्थानान्यनन्तकायव्यपदेशार्हाणि- checkयोनिस्थानान्य: बहुजन्तुयोनिस्थानान्यनन्तकायव्यपदेशार्हाणि` - yes!

L11:
यानवाहनाभरणादिष्वेतावदेवेष्टमतोऽन्यदनिष्टमित्यनिष्टान्निवर्तनं कर्तव्यं कालनियमेन यावज्जीवं
Correct.

L12:
अर्थात् एक रूप हो जाना ही जिसका प्रयोजन है वह सामायिक है। इतने देशमें और इतने काल
Correct.

L13:
तक इस प्रकार निश्चित की गयी सामायिकमें स्थित पुरुषके पहलेके समान महाव्रत जानना
Correct.

L14:
चाहिए, क्योंकि इसके सूक्ष्म और स्थूल दोनों प्रकारके हिंसा आदि पापोंका त्याग हो जाता है।
Correct.

L15:
शंका—यदि ऐसा है तो सामायिकमें स्थित हुए पुरुषके सकलसंयमका प्रसंग प्राप्त होता है ? समा-
Correct.

L16:
धान—नहीं, क्योंकि इसके संयमका घात करनेवाले कर्मोंका उदय पाया जाता है। शंका—तो फिर
Correct.

L17:
`इसके महाव्रतका अभाव प्राप्त होता है ? समाधान—

  • ७।२२ ६ ७०५ ] सप्तमोऽध्यायः २७३
    वा यथाशक्ति । संयममविनाशयन्नतीतत्यतिथिः । अथवा नास्य तिथिरस्तीत्यतिथिः अनियतकाला-
    गमन इत्यर्थः । अतिथये संविभागोऽतिथिसंविभागः । स चतुर्विधः; भिक्षोपकरणौषधप्रतिश्रय-
    भेदात् । मोक्षार्थमभ्युद्यतायातिथये संयमपरायणाय शुद्धाय शुद्धचेतसा निरवद्या भिक्षा देया ।
    धर्मोपकरणानि च सम्यग्दर्शनाद्युपबृंहणानि दातव्यानि । औषधमपि योग्यमुपयोजनीयम् । प्रति-
    श्रयश्च परमधर्मश्रद्धया प्रतिपादियितव्य इति । 'च'शब्दो वक्ष्यमाणगृहस्थधर्मसमुच्चयार्थः । ५
    § ७०४. कः पुनरसौ-
    मारणान्तिक सल्येखना जोषिता ॥ २२ ॥
    § ७०५. स्वपरिणामोपात्तस्यायुष इन्द्रियाणां बलानां च कारणवशात्संक्षयो मरणम् । 'अन्त'-
    ग्रहणं तद्भवमरणप्रतिपत्त्यर्थम् । मरणमन्तो मरणान्तः । स प्रयोजनमस्येति मारणान्तिकी ।
    सम्यक्कायकषायलेखना सल्लेखना । कायस्य बाह्यस्याभ्यन्तराणां च कषायाणां तत्कारणहापन- १०
    क्रमेण सम्यग्लेखना सल्लेखना । तां मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता सेविता गृहीत्यभि-
    संबध्यते । ननु च विस्पष्टार्थं सेवितेत्येवं वक्तव्यम् । न; अर्थविशेषोपपत्तेः । न केवलमिह सेवनं
    परिगृह्यते । किं तर्हि । प्रीत्यर्थोऽपि । यस्मादसत्यां प्रीतौ बलान्न सल्लेखना कार्यते । सत्यां हि
    संयमका विनाश न हो इस विधिसे जो आता है वह अतिथि है या जिसके आनेकी कोई
    तिथि नहीं उसे अतिथि कहते हैं। तात्पर्य यह है कि जिसके आनेका कोई काल निश्चित नहीं है १५
    उसे अतिथि कहते हैं। इस अतिथिके लिए विभाग करना अतिथिसंविभाग है। वह चार प्रकारका
    है-भिक्षा, उपकरण, औषध और प्रतिश्रय अर्थात् रहनेका स्थान । जो मोक्षके लिए बद्धकक्ष
    है, संयमके पालन करनेमें तत्पर है और शुद्ध है उस अतिथिके लिए शुद्ध मनसे निर्दोष भिक्षा
    देनी चाहिए । सम्यग्दर्शन आदिके बढ़ानेवाले धर्मोपकरण देने चाहिए । योग्य औषधकी योजना
    करनी चाहिए तथा परम धर्ममें श्रद्धापूर्वक निवास-स्थान भी देना चाहिए । सूत्रमें जो 'च' शब्द है २०
    वह आगे कहे जानेवाले गृहस्थधर्मके संग्रह करनेके लिए दिया है ।
    § ७०४. वह और कौन-सा गृहस्थ धर्म है-
    तथा वह मारणान्तिक संलेखनाका प्रीतिपूर्वक सेवन करनेवाला होता है ॥२२॥
    § ७०५. अपने परिणामोंसे प्राप्त हुई आयुका, इन्द्रियोंका और मन, वचन, काय इन तीन
    बलोंका कारण विशेषके मिलने पर नाश होना मरण है। उसी भवके मरणका ज्ञान करानेके लिए २५
    सूत्रमें मरण शब्दके साथ अन्त पदको ग्रहण किया है। मरण यही अन्त मरणान्त है और जिसका
    यह मरणान्त ही प्रयोजन है वह मारणान्तिकी कहलाती है। अच्छे प्रकारसे काय और कषायका
    लेखन करना अर्थात् कृष करना सल्लेखना है। अर्थात् बाहरी शरीरका और भीतरी कषायोंका,
    उत्तरोत्तर काय और कषायको पुष्ट करनेवाले कारणोंको घटाते हुए, भले प्रकारसे लेखन करना
    अर्थात् कृष करना सल्लेखना है। मरणके अन्तमें होने वाली इस सल्लेखनाको प्रीतिपूर्वक सेवन ३०
    करनेवाला गृहस्थ होता है यह इस सूत्रका तात्पर्य है। शंका- सहज तरीकेसे अर्थका स्पष्टीकरण
    हो इसके लिए सूत्रमें 'जोषिता' इसके स्थानमें 'सेविता' कहना ठीक है ? समाधान - नहीं क्योंकि
    'जोषिता' क्रियाके रखनेसे उससे अर्थ-विशेष ध्वनित हो जाता है। यहाँ केवल 'सेवन करना' अर्थ
    नहीं लिया गया है किन्तु प्रीति रूप अर्थ भी लिया गया है, क्योंकि प्रीतिके न रहने पर बलपूर्वक
    सल्लेखना नहीं करायी जाती । किन्तु प्रीतिके रहने पर जीव स्वयं ही सल्लेखना करता है। तात्पर्य ३५
    यह है कि 'प्रीतिपूर्वक सेवन करना' यह अर्थ 'जोषिता' क्रियासे निकल आता है 'सेविता' से नहीं,
    अतः सूत्रमें 'जोषिता' क्रिया रखी है। शंका- चूंकि सल्लेखनामें अपने अभिप्रायसे आयु आदिका
    १. -हापनया क्रमे-आ०, दि० १, ता० ।
    ३५

[Header] २७४ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२२ § ७०६ –

प्रीतौ स्वयमेव करोति । स्यान्मतमात्मवधः प्राप्नोति; स्वाभिसन्धिपूर्वकायुरादिनिवृत्तेः । नैष
दोषः; अप्रमत्तत्वात् । 'प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्युक्तम् । न चास्य प्रमादयोगोऽस्ति ।
कुतः ? रागाद्यभावात् । रागद्वेषमोहाविष्टस्य हि विषशस्त्राद्युपकरणप्रयोगवशादात्मानं घ्नतः
स्वघातो भवति । न सल्लेखनां प्रतिपन्नस्य रागादयः सन्ति ततो नात्मवधदोषः । उक्तं च—
“रागादीणमणुप्पा अहिंसगत्तं ति¹ देसिदं समये ।
तेसिं चे उप्पत्ती हिंसेति जिणेहि णिद्दिट्ठा ॥”
किं च मरणस्यानिष्टत्वात्तथा वणिजो विविधपण्यदानादानसंचयपरस्य स्वगृहविनाशोऽनिष्टः ।
तद्विनाशकारणे च कुतश्चिदुपस्थिते यथाशक्ति² परिहरति । दुष्परिहारे च पण्यविनाशो यथा न
भवति तथा यतते । एवं गृहस्थोऽपि व्रतशीलपण्यसंचये प्रवर्तमानः तदाश्रयस्य न पातमभिवाञ्छति ।
तदुपप्लवकारणे चोपस्थिते स्वगुणाविरोधेन परिहरति । दुष्परिहारे च यथा स्वगुणविनाशो
न भवति तथा प्रयतत इति कथमात्मवधो भवेत् ।
§ ७०६. अत्राह, 'निःशल्यो व्रती' इत्युक्तं तत्र च तृतीयं शल्यं मिथ्यादर्शनम् । ततः
सम्यग्दृष्टिना व्रतिनां³ निःशल्येन भवितव्यमित्युक्तम् । तत्सम्यग्दर्शनं किं सापवादं निरपवादमिति ।
उच्यते—कस्यचिन्मोहनीयावस्थाविशेषात्कदाचिदिमे भवन्त्यपवादाः—

त्याग किया जाता है इसलिए यह आत्मघात हुआ ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है क्योंकि
सल्लेखनामें प्रमादका अभाव है । 'प्रमत्तयोगसे प्राणोंका वध करना हिंसा है' यह पहले कहा जा
चुका है । परन्तु इसके प्रमाद नहीं है, क्योंकि इसके रागादिक नहीं पाये जाते । राग, द्वेष और
मोहसे युक्त होकर जो विष और शस्त्र आदि उपकरणोंका प्रयोग करके उनसे अपना घात करता
है उसे आत्मघातका दोष प्राप्त होता है । परन्तु सल्लेखनाको प्राप्त हुए जीवके रागादिक तो हैं
नहीं इसलिए इसे आत्मघातका दोष नहीं प्राप्त होता । कहा भी है—
“शास्त्रमें यह उपदेश है कि रागादिका नहीं उत्पन्न होना अहिंसा है । तथा जिनदेवने
उनकी उत्पत्तिको हिंसा कहा है ॥”
दूसरे मरण किसी को भी इष्ट नहीं है । जैसे नाना प्रकारकी विक्रेय वस्तुओंके देन, लेन और
संचयमें लगे हुए किसी व्यापारीको अपने घरका नाश होना इष्ट नहीं है । फिर भी परिस्थिति-
वश उसके विनाशके कारण आ उपस्थित हों तो यथाशक्ति वह उनको दूर करता है । इतने पर
भी यदि वे दूर न हो सकें तो जिससे विक्रेय वस्तुओंका नाश न हो ऐसा प्रयत्न करता है उसी
प्रकार पण्यस्थानीय व्रत और शीलके संचयमें जुटा हुआ गृहस्थ भी उनके आधारभूत आयु आदि-
का पतन नहीं चाहता । यदा कदाचित् उनके विनाशके कारण उत्पन्न हो जाँय तो जिससे अपने
गुणोंमें बाधा नहीं पड़े इस प्रकार उनको दूर करनेका प्रयत्न करता है । इतने पर भी यदि वे दूर
न हों तो जिससे अपने गुणोंका नाश न हो इस प्रकार प्रयत्न करता है इसलिए इसके आत्मघात
नामका दोष कैसे हो सकता है अर्थात् नहीं हो सकता है ।
§ ७०६. यहाँ पर शंकाकार कहता है कि व्रती निःशल्य होता है ऐसा कहा है और वहाँ
तीसरी शल्य मिथ्यादर्शन है । इसलिए सम्यग्दृष्टि व्रतीको निःशल्य होना चाहिए यह उसका
अभिप्राय है, तो अब यह बतलाइए कि वह सम्यग्दर्शन सापवाद होता है या निरपवाद होता है ?
अब इसका समाधान करते हैं—किसी जीवके मोहनीयकी अवस्था विशेषके कारण ये अपवाद
होते हैं—

१. त्ति भासिदं स-मु० । २. -शक्ति च परि -मु० । ३. व्रतिना भवि-आ०, दि०, १, दि० २ ।

– ७।२५ § ७१० ] सप्तमोऽध्यायः २७५
शङ्काकाङ्क्षाविचिकित्सान्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः सम्यग्दृष्टेरतिचाराः ॥ २३ ॥
§ ७०७. निःशङ्कितत्वादयो व्याख्याताः 'दर्शनविशुद्धिः' इत्यत्र । तत्प्रतिपक्षभूताः शङ्कादयो
वेदितव्याः । अथ प्रशंसासंस्तवयोः को विशेषः । मनसा मिथ्यादृष्टेर्ज्ञानचारित्रगुणोद्भावनं प्रशंसा,
भूताभूतगुणोद्भाववचनं संस्तव इत्ययमनयोर्भेदः । ननु च सम्यग्दर्शनमष्टाङ्गमुक्तं तस्यातिचारै-
रप्यष्टाभिर्भवितव्यम् । नैष दोषः; व्रतशीलेषु पञ्च पञ्चातिचारा इत्युत्तरत्र विवक्षुणाचार्येण ५
प्रशंसासंस्तवयोरितरानतिचारानन्तर्भाव्य पञ्चैवातिचारा उक्ताः ।
§ ७०८. आह, सम्यग्दृष्टेरतिचारा उक्ताः । किमेवं व्रतशीलेष्वपि भवन्तीति । ओमित्युक्त्वा
तदतिचारसंख्यानिर्देशार्थमाह—
व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥ २४ ॥
§ ७०९. व्रतानि च शीलानि च व्रतशीलानि तेषु व्रतशीलेषु । शीलग्रहणमनर्थकम्; १०
व्रतग्रहणेनैव सिद्धेः । नानर्थकम्; विशेषज्ञापनार्थं व्रतपरिरक्षणार्थं शीलमिति दिग्विरत्यादीनीह
'शील'ग्रहणेन गृह्यन्ते ।
§ ७१०. अगार्यधिकारादगारिणो व्रतशीलेषु पञ्च पञ्चातिचारा वक्ष्यमाणा यथाक्रमं
वेदितव्याः । तद्यथा—आद्यस्य तावदहिंसाव्रतस्य—
बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ॥ २५ ॥ १५
शंका, कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तव ये सम्यग्दृष्टि के पांच
अतिचार हैं ॥२३॥
§ ७०७. 'दर्शनविशुद्धिः' इत्यादि सूत्रका व्याख्यान करते समय निःशंकितत्व आदिका
व्याख्यान किया । ये शंकादिक उनके प्रतिपक्षभूत जानना चाहिए । शंका—प्रशंसा और संस्तवमें
क्या अन्तर है ? समाधान—मिथ्यादृष्टिके ज्ञान और चारित्र गुणोंका मनसे उद्भावन करना प्रशंसा २०
है और मिथ्यादृष्टिमें जो गुण हैं या जो गुण नहीं हैं इन दोनोंका सद्भाव बतलाते हुए कथन करना
संस्तव है, इस प्रकार यह दोनोंमें अन्तर है । शंका—सम्यग्दर्शनके आठ अंग कहे हैं, इसलिए
उसके अतिचार भी आठ ही होने चाहिए । समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि आगे आचार्य
व्रतों और शीलोंके पाँच-पाँच अतिचार कहनेवाले हैं इसलिए अन्यदृष्टिप्रशंसा और अन्यदृष्टिसंस्तव
इन दो अतिचारोंमें शेष अतिचारोंका अन्तर्भाव करके सम्यग्दृष्टिके पांच ही अतिचार कहे हैं । २५
§ ७०८. सम्यग्दृष्टिके अतिचार कहे, क्या इसी प्रकार व्रत और शीलोंके भी अतिचार होते
हैं ? हां, यह कह कर अब उन अतिचारोंकी संख्याका निर्देश करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
व्रतों और शीलोंमें पांच पांच अतिचार हैं जो क्रमसे इस प्रकार हैं ॥२४॥
§ ७०९. शील और व्रत इन शब्दोंका कर्मधारय समास होकर व्रतशील पद बना है । उनमें
अर्थात् व्रत-शीलोंमें । शंका—सूत्रमें शील पदका ग्रहण करना निष्फल है, क्योंकि व्रत पदके ग्रहण ३०
करनेसे ही उसकी सिद्धि हो जाती है ? समाधान—सूत्रमें शील पदका ग्रहण करना निष्फल नहीं
है, क्योंकि विशेषका ज्ञान करानेके लिए और व्रतोंकी रक्षा करनेके लिए शील है इसलिए यहाँ
शील पदके ग्रहण करनेसे दिग्विरति आदि लिये जाते हैं ।
§ ७१०. यहाँ गृहस्थका प्रकरण है, इसलिए गृहस्थके व्रतों और शीलोंके आगे कहे जाने-
वाले क्रमसे पाँच पाँच अतिचार जानने चाहिए जो निम्न प्रकार हैं । उसमें भी पहले प्रथम अहिंसा ३५
व्रतके अतिचार बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बन्ध, वध, छेद, अतिभारका आरोपण और अन्नपानका निरोध ये अहिंसा अणुव्रतके पांच
अतिचार हैं ॥२५॥

२७६ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।२६ § ७११ -
§ ७११. अभिमतदेशगतिनिरोधहेतुर्बन्धः । दण्डकशावेत्रादिभिरभिघातः प्राणिनां वधः,
न प्राणव्यपरोपणम्; ततः प्रागेवास्य विनिवृत्तत्वात् । कर्णनासिकादीनामवयवानामपनयनं छेदः ।
न्याय्यभारादतिरिक्तवाहनमतिभारारोपणम् । गवादीनां क्षुत्पिपासाबाधाकरणमन्नपाननिरोधः ।
एते पञ्चाहिंसाणुव्रतस्यातिचाराः ।
मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहारसाकारमन्त्रभेदाः ॥ २६ ॥
§ ७१२. अभ्युदयनिःश्रेयसार्थेषु क्रियाविशेषेषु अन्यस्यान्यथा प्रवर्तनमतिसंधानं वा
मिथ्योपदेशः। यत्स्त्रीपुंसाभ्यामेकान्तेऽनुष्ठितस्य क्रियाविशेषस्य प्रकाशनं तद्रहोभ्याख्यानं वेदितव्यम् ।
अन्येनानुक्तं मननुष्ठितं यत्किंचित्परप्रयोगवशादेव तेनोक्तमनुष्ठितमिति वञ्चनानिमित्तं लेखनं
कूटलेखक्रिया । हिरण्यादेर्द्रव्यस्य निक्षेप्तुर्विस्मृतसंख्यस्याल्पसंख्येयमाददानस्यैवमित्यनुज्ञावचनं
न्यासापहारः । अर्थप्रकरणाङ्गविकारभ्रूविक्षेपादिभिः पराकूतमुपलभ्य तदाविष्करणमसूयादि-
निमित्तं यत्तत्साकारमन्त्रभेद इति कथ्यते । त एते सत्याणुव्रतस्य पञ्चातिचारा बोद्धव्याः ।
स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिकमानोन्मानप्रतिरूपक-
व्यवहाराः ॥ २७ ॥
§ ७१३. मुष्णन्तं स्वयमेव वा प्रयुङ्क्तेऽन्येन वा प्रयोजयति प्रयुक्तमनुमन्यते वा यतः स
स्तेनप्रयोगः । अप्रयुक्तेनाननुमतेन च चौरेणानीतस्य ग्रहणं तदाहृतादानम् । उचितन्यायादन्येन
प्रकारेण दानग्रहणमतिक्रमः विरुद्धं राज्यं विरुद्धराज्यं विरुद्धराज्येऽतिक्रमः विरुद्धराज्यातिक्रमः ।
§ ७११. किसीको अपने इष्ट स्थानमें जानेसे रोकनेके कारणको बन्ध कहते हैं। डंडा, चाबुक
और बेंत आदिसे प्राणियोंको मारना वध है। यहाँ वधका अर्थ प्राणोंका वियोग करना नहीं लिया
है क्योंकि अतिचारके पहले ही हिंसाका त्याग कर दिया जाता है। कान और नाक आदि अवयवों
का छेदना छेद है। उचित भारसे अतिरिक्त भारका लादना अतिभारारोपण है। गौ आदिको भूख-
प्यासके लगने पर अन्नपानका रोकना अन्नपाननिरोध है। ये पाँच अहिंसाणु व्रतके अतिचार हैं।
मिथ्योपदेश, रहोभ्याख्यान, कूटलेखक्रिया, न्यासापहार और साकारमंत्रभेद ये सत्याणुव्रतके
पाँच अतिचार हैं ॥२६॥
§ ७१२. अभ्युदय और मोक्षकी कारणभूत क्रियाओंमें किसी दूसरेको विपरीत मार्गसे लगा
देना या मिथ्या वचनों द्वारा दूसरोंको ठगना मिथ्योपदेश है। स्त्री और पुरुष द्वारा एकान्तमें
किये गये आचरण विशेषका प्रकट कर देना रहोभ्याख्यान है। दूसरेने न तो कुछ कहा और न
कुछ किया तो भी अन्य किसीकी प्रेरणासे उसने ऐसा कहा है और ऐसा किया है इस प्रकार छलसे
लिखना कूटलेखक्रिया है। धरोहरमें चाँदी आदिको रखनेवाला कोई उसकी संख्या भूलकर यदि
उसे कमती लेने लगा तो 'ठीक है' इस प्रकार स्वीकार करना न्यासापहार है। अर्थवश, प्रकरण-
वश, शरीरके विकारवश या भ्रूक्षेप आदिके कारण दूसरेके अभिप्रायको जान कर डाहसे उसका
प्रकट कर देना साकारमंत्रभेद है। इस प्रकार ये सत्याणुव्रतके पाँच अतिचार जानने चाहिए।
स्तेनप्रयोग, स्तेन आहृतादान, विरुद्धराज्यातिक्रम, हीनाधिक मानोन्मान और प्रतिरूपक-
व्यवहार ये अचौर्य अणुव्रतके पाँच अतिचार हैं ॥२७॥
§ ७१३. किसीको चोरीके लिए स्वयं प्रेरित करना, या दूसरेके द्वारा प्रेरणा दिलाना या
प्रयुक्त हुए की अनुमोदना करना स्तेनप्रयोग है। अपने द्वारा अप्रयुक्त और असम्मत चोरके द्वारा
लायी हुई वस्तुका ले लेना तदाहृतादान है। यहाँ न्यायमार्गको छोड़ कर अन्य प्रकारसे वस्तु ली
१. -नुक्तं यत्किं मु० । २. -भ्रूनिक्षेपणादि -मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri