सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 372, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंHere is the line-by-line transcription of the text from the image into clean Devanagari text, preserving original formatting, numbering, and marginal line counters.
२६० सर्वार्थसिद्धौ [ ७।७ § ६७३ -
§ ६७३. शून्यागारेषु गिरिगुहातरुकोटरादिष्वावासः । परकीयेषु च विमोचितेष्वावासः ।
परेषामुपरोधाकरणम् । आचारशास्त्रमार्गेण भैक्षशुद्धिः । ममेदं तवेदमिति सधर्मभिरविसंवादः ।
इत्येताः पञ्चादत्तादानविरमणव्रतस्य भावनाः ।
§ ६७४. अथेदानीं ब्रह्मचर्यव्रतस्य भावना वक्तव्या इत्यत्राह—
५ स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहराङ्गनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरणवृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कार-
त्यागाः पञ्च ॥ ७ ॥
§ ६७५. त्यागशब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते । स्त्रीरागकथाश्रवणत्यागः तन्मनोहराङ्गनिरी-
क्षणत्यागः पूर्वरतानुस्मरणत्यागः वृष्येष्टरसत्यागः स्वशरीरसंस्कारत्यागश्चेति चतुर्थव्रतस्य भावनाः
पञ्च विज्ञेयाः ।
१० § ६७६. अथ पञ्चमव्रतस्य भावनाः का इत्यत्रोच्यते—
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च ॥ ८ ॥
§ ६७७. पञ्चानामिन्द्रियाणां स्पर्शनादीनामिष्टानिष्टेषु विषयेषूपैनिपत्तितेषु स्पर्शादिषु राग-
वर्जनानि पञ्च आकिंचन्यस्य व्रतस्य भावनाः प्रत्येप्तव्याः ।
§ ६७८. किंचान्यद्यथामीषां व्रतानां द्रढिमार्थं भावनाः प्रतीयन्ते तद्विपश्चिद्द्भिरिति
१५ भावनोपदेशः, तथा तदर्थं तद्विरोधिष्वपीत्याह—
§ ६७३. पर्वतकी गुफा और वृक्षका कोटर आदि शून्यागार हैं इनमें रहना शून्यागारावास
है । दूसरों द्वारा छोड़े हुए मकान आदिमें रहना विमोचितावास है । दूसरोंको ठहरनेसे नहीं रोकना
परोपरोधाकरण है । आचार शास्त्रमें बतलायी हुई विधिके अनुसार भिक्षा लेना भैक्षशुद्धि है । यह
मेरा है यह तेरा है इस प्रकार सधर्मियोंसे विसंवाद नहीं करना सधर्माविसंवाद है । ये अदत्तादान-
२० विरमण व्रतकी पांच भावनाएँ हैं ।
§ ६७४. अब इस समय ब्रह्मचर्य व्रतकी पांच भावनाओंका कथन करना चाहिए; इसलिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
स्त्रियोंमें रागको पैदा करनेवाली कथाके सुननेका त्याग, स्त्रियोंके मनोहर अंगोंको देखने-
का त्याग, पूर्व भोगोंके स्मरणका त्याग, गरिष्ठ और इष्ट रसका त्याग तथा अपने शरीरके
२५ संस्कारका त्याग ये ब्रह्मचर्य व्रतकी पांच भावनाएँ हैं ॥७॥
§ ६७५. त्याग शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा-स्त्रीरागकथाश्रवण-
त्याग, तन्मनोहरांगनिरीक्षणत्याग, पूर्वरतानुस्मरणत्याग, वृष्येष्टरसत्याग और स्वशरीरसंस्कारत्याग
ये ब्रह्मचर्य व्रतकी भावनाएँ हैं ।
§ ६:६. अब पाँचवें व्रतकी कौनसी भावनाएँ हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
३० मनोज्ञ और अमनोज्ञ इन्द्रियोंके विषयोंमें क्रमसे राग और द्वेषका त्याग करना ये अपरि-
ग्रहव्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥८॥
§ ६७७. स्पर्श न आदि पाँच इन्द्रियोंके इष्ट और अनिष्ट स्पर्श आदिक पाँच विषयोंके प्राप्त
होने पर राग और द्वेषका त्याग करना ये आकिंचन्य व्रतकी पाँच भावनाएँ जाननी चाहिए ।
§ ६७८. जिस प्रकार इन व्रतोंकी दृढ़ताके लिए भावनाएँ हैं इसलिए भावनाओंका उपदेश
३५ दिया है उसी प्रकार विद्वान् पुरुषोंको व्रतोंकी दृढ़ताके लिए विरोधी भावोंके विषयमें क्या करना
चाहिए ? यह बतलानेके लिए अब आगे का सूत्र कहते हैं—
१. -येषूपरिनिपतितेषु आ०, दि० १, दि० २ ।