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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 371, कुल 558 में से

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पृष्ठ 371

संबध्यते । देशतो विरतिरणुव्रतं सर्वतो विरतिर्महाव्रतमिति द्विधा भिद्यते प्रत्येकं व्रतम् । एतानि
व्रतानि भावितानि वरौषधवद्यत्नवते¹ दुःखनिवृत्तिनिमित्तानि भवन्ति ।
§ ६६७. किमर्थं कथं वा भावनं तेषामित्यत्रोच्यते—
तत्स्थैर्यार्थं भावनाः पञ्च पञ्च ॥ ३ ॥
§ ६६८. तेषां व्रतानां स्थिरीकरणायैकैकस्य व्रतस्य पञ्च पञ्च भावना वेदितव्याः । ५
यद्येवमाद्यस्याहिंसाव्रतस्य भावनाः का इत्यत्रोच्यते—
वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि पञ्च ॥ ४ ॥
§ ६६९. वाग्गुप्तिः मनोगुप्तिः ईर्यासमितिः आदाननिक्षेपणसमितिः आलोकितपानभोजन-
मित्येताः पञ्चाहिंसाव्रतस्य भावनाः ।
§ ६७०. अथ द्वितीयस्य व्रतस्य का इत्यत्रोच्यते— १०
क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचीभाषणं च पञ्च ॥ ५ ॥
§ ६७१. क्रोधप्रत्याख्यानं लोभप्रत्याख्यानं भीरुत्वप्रत्याख्यानं हास्यप्रत्याख्यानम् अनुवीची-
भाषणं चेत्येताः पञ्च भावनाः सत्यव्रतस्य ज्ञेयाः । अनुवीचीभाषणं निरवद्यानुभाषणमित्यर्थः ।
§ ६७२. इदानीं तृतीयस्य व्रतस्य का भावना इत्यत्राह—
शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्षशुद्धिसधर्माविसंवादाः पञ्च ॥ ६ ॥ १५
निवृत्त होना महाव्रत है इस प्रकार अहिंसादि प्रत्येक व्रत दो प्रकारके हैं। प्रयत्नशील जो पुरुष
उत्तम ओषधिके समान इन व्रतोंका सेवन करता है उसके दुःखोंका नाश होता है।
§ ६६७. इन व्रतोंकी किसलिए और किस प्रकार भावना करनी चाहिए, अब इसी बातको
बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन व्रतोंको स्थिर करनेके लिए प्रत्येक व्रतकी पाँच पाँच भावनाएँ हैं ॥३॥ २०
§ ६६८. उन व्रतोंको स्थिर करनेके लिए एक एक व्रतकी पाँच पाँच भावनाएँ जाननी
चाहिए। यदि ऐसा है तो प्रथम अहिंसा व्रतकी भावनाएँ कौन-सी हैं? अब इस बातको बतलानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
वचनगुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्यासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति और आलोकितपान-भोजन ये
अहिंसाव्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥४॥ २५
§ ६६९. वचनगुप्ति, मनोगुप्ति, ईर्यासमिति, आदाननिक्षेपणसमिति और आलोकितपान-
भोजन ये अहिंसा व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं।
§ ६७०. अब दूसरे व्रतकी भावनाएँ कौनसी हैं यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
क्रोधप्रत्याख्यान, लोभप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान और अनुवीचीभाषण
ये सत्य व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥५॥ ३०
§ ६७१. क्रोधप्रत्याख्यान, लोभप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान और अनु-
वीचीभाषण ये सत्य व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं। अनुवीचीभाषणका अर्थ निर्दोष भाषण है।
§ ६७२. अब तीसरे व्रतकी कौनसी भावनाएँ हैं, यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
शून्यागारावास, विमोचितावास, परोपरोधाकरण, भैक्षशुद्धि और सधर्माविसंवाद ये अचौर्य ३५
व्रतकी पाँच भावनाएँ हैं ॥६॥
१. वरौषधवत् दुःख-भा० ।