सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२६२ सर्वार्थसिद्धौ [ ७।१० § ६८० -
तस्करादीनामभिभवनीयो भवति तदर्जनरक्षणप्रक्षयकृतांश्च दोषान् बहूनवाप्नोति न चास्य
तृप्तिर्भवति इन्धनैरिवाग्नेः लोभाभिभूतत्वाच्च कार्याकार्यानपेक्षो भवति प्रेत्य चाशुभां गतिमास्क-
न्दते लुब्धोऽयमिति गर्हितश्च भवतीति तद्विरमणं श्रेयः । एवं हिंसादिष्वपायावद्यदर्शनं भावनीयम् ।
§ ६८०. हिंसादिषु भावनान्तरप्रतिपादनार्थमाह—
दुःखमेव वा ॥ १० ॥
§ ६८१. हिंसादयो दुःखमेवेति भावयितव्याः । कथं हिंसादयो दुःखम् । दुःखकारणत्वात् ।
यथा “अन्नं वै प्राणाः” इति । कारणस्य कारणत्वाद्वा । यथा “धनं प्राणाः” इति । धनकारण-
मन्नपानमन्नपानकारणाः प्राणा इति । तथा हिंसादयोऽसद्वेद्यकर्मकारणम् । असद्वेद्यकर्म च
दुःखकारणमिति दुःखकारणे दुःखकारणकारणे वा दुःखोपचारः । तदेते¹ दुःखमेवेति भावनं परात्म-
साक्षिकमवगन्तव्यम् । ननु² च तत्सर्वं न दुःखमेव; विषयरतिसुखसद्भावात् । न तत्सुखम्;
वेदनाप्रतीकारत्वात्कच्छूकण्डूयनवत् ।
§ ६८२. पुनरपि³ भावनान्तरमाह—
⁴मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थ्यानि च सत्त्वगुणाधिकक्लिश्यमानाविनेयेषु ॥ ११ ॥
अनेक दोषोंको प्राप्त होता है। जैसे ईंधनसे अग्निकी तृप्ति नहीं होती वैसे ही इसकी कितने ही
परिग्रहसे कभी भी तृप्ति नहीं होती । यह लोभातिरेकके कारण कार्य और अकार्यका विवेक नहीं
करता, परलोकमें अशुभ गतिको प्राप्त होता है । तथा यह लोभी है इस प्रकारसे इसका तिरस्कार
भी होता है इसलिए परिग्रहका त्याग श्रेयस्कर है । इस प्रकार हिंसा आदि दोषोंमें अपाय और
अवद्यके दर्शनकी भावना करनी चाहिए।
§ ६८०. अब हिंसा आदि दोषोंमें दूसरी भावनाका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
अथवा हिंसादिक दुःख ही हैं ऐसी भावना करनी चाहिए ॥१०॥
§ ६८१. हिंसादिक दुःख ही हैं ऐसा चिन्तन करना चाहिए। शंका—हिंसादिक दुःख कैसे
हैं ? समाधान—दुःखके कारण होनेसे । यथा—'अन्न ही प्राण है।' अन्न प्राणधारणका कारण है
पर कारणमें कार्यका उपचार करके जिस प्रकार अन्नको ही प्राण कहते हैं । या कारणका कारण
होनेसे हिंसादिक दुःख हैं। यथा—'धन ही प्राण हैं।' यहाँ अन्नपानका कारण धन है और प्राणका
कारण अन्नपान है इसलिए जिस प्रकार धनको प्राण कहते हैं उसी प्रकार हिंसादिक असाता
वेदनीय कर्मके कारण हैं और असाता वेदनीय दुःखका कारण है, इसलिए दुःखके कारण या दुःखके
कारणके कारण हिंसादिकमें दुःखका उपचार है। ये हिंसादिक दुःख ही हैं इस प्रकार अपनी और
दूसरोंकी साक्षीपूर्वक भावना करनी चाहिए। शंका—ये हिंसादिक सबके सब केवल दुःख ही हैं यह
बात नहीं है, क्योंकि विषयोंके सेवनमें सुख उपलब्ध होता है ? समाधान—विषयोंके सेवनसे जो
सुखाभास होता है वह सुख नहीं है, किन्तु दादको खुजलानेके समान केवल वेदनाका प्रतिकार-
मात्र है।
§ ६८२. और भी अन्य भावना करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
प्राणीमात्रमें मैत्री, गुणाधिकोंमें प्रमोद, क्लिश्यमानोंमें करुणा वृत्ति और अविनेयोंमें
माध्यस्थ्य भावना करनी चाहिए ॥११॥
१. तदेते दुःखमेवेति भावनं परमात्मसा-आ० । तदेतत् दुःखमेवेति भावनं परात्मसा-मु० । तदेते दुःखमेवेति
भावनं परत्रात्मसा-ता० । २. ननु च सर्वं दुःखमेव ता० । ३. भावनार्थमाह आ०, दि० १, दि० २ ।
४. 'मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षाणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनतश्चित्तप्रसादनम् ।' पा० यो० सू० १, ३३ ।