सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 377, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 377
  • ७।१५ ६ ६९१ ] सप्तमोऽध्यायः २६५
    नैष दोषः । अत्रापि प्राणव्यपरोपणमस्ति भावलक्षणम् । तथा चोक्तम्—
    "स्वयमेवात्मनात्मानं हिनस्त्यात्मा प्रमादवान् ।
    पूर्वं प्राणव्यन्तराणां तु पश्चात्स्याद्वा न वा वधः ॥"
    § ६८८. आह अभिहितलक्षणा हिंसा । तदनन्तरोद्दिष्टमनृतं किल्लक्षणमित्यत्रोच्यते—
    असदभिधानमनृतम् ॥ १४ ॥
    § ६८९. सच्छब्दः प्रशंसावाची । न सदसदप्रशस्तमिति यावत् । असतोऽर्थस्याभिधानमसद-
    भिधानमनृतम् । ऋतं सत्यं, न ऋतमनृतम् । किं पुनरप्रशस्तम् । प्राणिपीडाकरं यत्तदप्रशस्तं
    विद्यमानार्थविषयं वा अविद्यमानार्थविषयं वा। उक्तं च प्रागेवार्हिसाव्रतपरिपालनार्थमितरद्व्रतम्
    इति । तस्माद्धिंसाकरं वचोऽनृतमिति निश्चेयम् ।
    § ६९० अथानृतानन्तरमुद्दिष्टं यत्स्तेयं तस्य किं लक्षणमित्यत आह—
    अदत्तादानं स्तेयम् ॥ १५ ॥
    § ६९१. अदानं ग्रहणमदत्तस्यादानमदत्तादानं स्तेयमित्युच्यते । यद्येवं कर्मनोकर्मग्रहणमपि
    स्तेयं प्राप्नोति; अन्येनादत्तत्वात् । नैष दोषः दानादाने यत्र संभवतस्तत्रैव स्तेयव्यवहारः । कुतः ।
    'अदत्त'ग्रहणसामर्थ्यात् । एवमपि भिक्षोर्ग्रामनगरादिषु भ्रमणकाले रथ्याद्वारादिप्रवेशाददत्तादानं
    समाधान — यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि यहां भी भावरूप प्राणोंका नाश है ही। कहा
    भी है—
    'प्रमादसे युक्त आत्मा पहले स्वयं अपने द्वारा ही अपना घात करता है इसके बाद दूसरे
    प्राणियोंका वध होवे या मत होवे ॥'
    § ६८८. हिंसाका लक्षण कहा अब उसके बाद असत्यका लक्षण बतलानेके लिए आगेका
    सूत्र कहते हैं—
    असत् बोलना अनृत है ॥१५॥
    § ६८९. सत् शब्द प्रशंसावाची है । जो सत् नहीं वह असत् है। असत्का अर्थ अप्रशस्त
    है। तात्पर्य यह है कि जो पदार्थ नहीं है उसका कथन करना अनृत-असत्य कहलाता है। ऋतका
    अर्थ सत्य है और जो ऋत-सत्य नहीं है वह अनृत है । शंका-अप्रशस्त किसे कहते हैं?
    समाधान- जिससे प्राणियोंको पीड़ा होती है उसे अप्रशस्त कहते हैं। भले ही वह चाहे विद्यमान
    पदार्थको विषय करता हो या चाहे अविद्यमान पदार्थको विषय करता हो । यह पहले ही कहा है
    कि शेष व्रत अहिंसा व्रतकी रक्षाके लिए हैं। इसलिए जिससे हिंसा हो वह वचन अनृत है ऐसा
    निश्चय करना चाहिए ।
    § ६९०. असत्यके बाद जो स्तेय कहा है उसका क्या लक्षण है यह बतलानेके लिए आगेका
    सूत्र कहते हैं—
    बिना दी हुई वस्तुका लेना स्तेय है ॥१५॥
    § ६९१. आदान शब्दका अर्थ ग्रहण है। बिना दी हुई वस्तुका लेना अदत्तादान है और यही
    स्तेय-चोरी कहलाता है। शंका- यदि स्तेयका पूर्वोक्त अर्थ किया जाता है तो कर्म और नोकर्मका
    ग्रहण करना भी स्तेय ठहरता है, क्योंकि ये किसीके द्वारा दिये नहीं जाते ? समाधान — यह कोई
    दोष नहीं है, क्योंकि जहां देना और लेना सम्भव है वहीं स्तेयका व्यवहार होता है। शंका- यह
    अर्थ किस शब्दसे फलित होता है ? समाधान — सूत्रमें जो 'अदत्त' पदका ग्रहण किया है उससे
    ज्ञात होता है कि जहां देना लेना सम्भव है वहीं स्तेयका व्यवहार होता है। शंका-स्तेयका उक्त
    १. तत्रापि आ०, दि० १, दि० २ । २. -हिंसाप्रतिपाल-मु० । ३. कर्मवचो मु० ।
    ३४
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri