सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 369, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ सप्तमोऽध्यायः
§ ६६३. आस्रवपदार्थो व्याख्यातः । तत्प्रारम्भकाल एवोक्तं 'शुभः पुण्यस्य' इति तत्सामान्ये-
नोक्तम् । तद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थं कः पुनः शुभ इत्युक्ते इदमुच्यते—
हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् ॥ १ ॥
§ ६६४. 'प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्येवमादिभिः सूत्रैर्हिंसादयो निर्देक्ष्यन्ते । तेभ्यो ५
विरमणं विरतिर्व्रतमित्युच्यते । २व्रतमभिसन्धिकृतो नियमः, इदं कर्तव्यमिदं न कर्तव्यमिति
वा । ननु च हिंसादयः परिणामविशेषा अध्रुवाः, कथं तेषाम³पादानत्वमुच्यते । बुद्धयपाये
ध्रुवत्वविवक्षोपपत्तेः । यथा धर्माद्विरमतीत्यत्र य एष मनुष्यः संभिन्नबुद्धिः स पश्यति—दुष्करो धर्मः,
फलं चास्य श्रद्धामात्रगम्यमिति स⁵ बुद्ध्या संप्राप्य निवर्तते । एवमिहापि य⁶ एव मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी
स पश्यति—य एते हिंसादयः परिणामास्ते पापहेतवः । पापकर्माणं प्रवर्त्तमानान् जनानिहैव १०
राजानो दण्डयन्ति परत्र च दुःखमाप्नुवन्तीति स⁷ बुद्ध्या संप्राप्य निवर्तते । ततो बुद्ध्या
ध्रुवत्वविवक्षोपपत्तेरपादानत्वं युक्तम् । 'विरति'शब्दः प्रत्येकं परिसमाप्यते हिंसाया विरतिः
§ ६६३. आस्रव पदार्थका व्याख्यान करते समय उसके आरम्भ में 'शुभः पुण्यस्य' यह कहा
है पर वह सामान्य रूपसे ही कहा है, अतः विशेष रूपसे उसका ज्ञान करानेके लिए शुभ क्या है
ऐसा पूछने पर आगेका सूत्र कहते हैं— १५
हिंसा, असत्य, चोरी, अब्रह्म और परिग्रहसे निवृत्त होना व्रत है ॥१॥
§ ६६४. 'प्रमत्तयोगात् प्राणव्यपरोपणं हिंसा' इत्यादि सूत्रों द्वारा हिंसादिका जो स्वरूप
आगे कहेंगे उनसे विरत होना व्रत कहलाता है । प्रतिज्ञा करके जो नियम लिया जाता है वह
व्रत है । या 'यह करने योग्य है और यह नहीं करने योग्य है' इस प्रकार नियम करना व्रत है ।
शंका—हिंसा आदिक परिणाम विशेष ध्रुव अर्थात् सदा काल स्थिर नहीं रहते इसलिए उनका २०
अपादान कारकमें प्रयोग कैसे बन सकता है ? समाधान—बुद्धिपूर्वक त्यागमें ध्रुवपनेकी विवक्षा
बन जानेसे अपादान कारकका प्रयोग बन जाता है । जैसे 'धर्मसे विरत होता है' यहाँ जो यह
धर्मसे विमुख बुद्धिवाला मनुष्य है वह विचार करता है कि 'धर्म दुष्कर है और उसका फल
श्रद्धामात्रगम्य है' इस प्रकार वह बुद्धिसे समझ कर धर्मसे विरत हो जाता है । इसी प्रकार यहाँ
भी जो यह मनुष्य विचारपूर्वक काम करनेवाला है वह विचार करता है कि जो ये हिंसादिक २५
परिणाम हैं वे पापके कारण हैं और जो पाप कार्यमें प्रवृत्त होते हैं उन्हें इसी भवमें राजा लोग दण्ड
देते हैं और वे पापाचारी परलोकमें दुःख उठाते हैं, इस प्रकार वह बुद्धिसे समझ कर हिंसादिकसे
विरत हो जाता है । इसलिए बुद्धिसे ध्रुवत्वपनेकी विवक्षा बन जानेसे अपादान कारकका प्रयोग
करना उचित है । विरति शब्दको प्रत्येक शब्दके साथ जोड़ लेना चाहिए । यथा हिंसासे विरति,
१. 'अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यपरिग्रहा यमाः ।'—पा० यो० सू० २, ३० । २. 'अभिसन्धिकृता विरतिर्वि- ३०
षयाद्योध्याद्व्रतं भवति ।'—रत्न० ३, ४० । ३. 'ध्रुवमपायेऽपादानम् ।'—पा० १, ४, २४ । ४. 'धर्माद्विरमति
× × य एष मनुष्यः संभिन्नबुद्धिर्भवति स पश्यति ।'—पा० म० भा० १, ४, ३, २४ । ५. स्वबुद्ध्या
मु० । 'स बुद्ध्या निवर्तते'—पा० म० भा० १, ४, ३, २४ । ६. 'य एष मनुष्यः प्रेक्षापूर्वकारी भवति स
पश्यति ।'—पा० म० भा० १, ४, ३, २४ । ७. –वन्तीति स्वबुद्ध्या मु०, ता० ना० ।
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