सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 376, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्रियाविशेषा इत्यत्रोच्यते। युगपद्वक्तुमशक्यत्वात्तल्लक्षणनिर्देशस्य क्रमप्रसङ्गे यासावादौ चोदिता
सैव तावदुच्यते—
प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा ॥ १३ ॥
§ ६८७. प्रमादः सकषायत्वं तद्भानात्मपरिणामः प्रमत्तः। प्रमत्तस्य योगः प्रमत्तयोगः।
तस्मात्प्रमत्तयोगात् इन्द्रियादयो दशप्राणास्तेषां यथासंभवं व्यपरोपणं वियोगकरणं हिंसेत्यभिधीयते।
सा प्राणिनो दुःखहेतुत्वादधर्महेतुः । 'प्रमत्तयोगात्' इति विशेषणं केवलं प्राणव्यपरोपणं नाधर्मयेति
ज्ञापनार्थम्। उक्तं च—
वियोजयति¹ चासुभिर्न च वधेन संयुज्यते ।।' इति ॥
उक्तं च—
“उच्चालिदमम्हि² पादे इरियासमिदस्स णिग्गमट्ठाणे ।
आवादे [धे] ज्ज कुंलिगो मरेज्ज तज्जोगमासेज्ज ॥
ण हि तस्स³ तण्णिमित्तो बंधो सुहुमो वि देसिदो समए ।
मुच्छापरिग्गहो त्ति य अज्झप्पपमाणदो भणिदो ॥”
ननु च प्राणव्यपरोपणाभावेऽपि प्रमत्तयोगमात्रादेव हिंसेष्यते । उक्तं च—
“मरदु व जियदु व जीवो अयदाचारस्स णिच्छिदा हिंसा ।
पयदस्स णत्थि बंधो हिंसामित्तेण समिदस्स ।।”
होना व्रत है। परन्तु वहां यह न जान सके कि हिंसादिक क्रियाविशेष क्या हैं ? इसलिए यहां
कहते हैं। तथापि उन सबका एक साथ कथन करना अशक्य है किन्तु उनका लक्षण क्रमसे ही
कहा जा सकता है अतः प्रारम्भमें जिसका उल्लेख किया है उसीका स्वरूप बतलानेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
प्रमत्तयोगसे प्राणोंका वध करना हिंसा है ॥१३॥
§ ६८७. प्रमाद कषाय सहित अवस्थाको कहते हैं और इस प्रमादसे युक्त जो आत्माका
परिणाम होता है वह प्रमत्त कहलाता है। तथा प्रमत्तका योग प्रमत्तयोग है। इसके सम्बन्धसे
इन्द्रियादि दस प्राणोंका यथासम्भव व्यपरोपण अर्थात् वियोग करना हिंसा कही जाती है। इससे
प्राणियोंको दुःख होता है इसलिए वह अधर्मका कारण है। केवल प्राणोंका वियोग करनेसे अधर्म
नहीं होता है यह बतलानेके लिए सूत्रमें 'प्रमत्तयोगसे' यह पद दिया है। कहा भी है—
'यह प्राणी दूसरेको प्राणोंसे वियुक्त करता है तो भी उसे हिंसा नहीं लगती ।।' और भी
कहा है—
'ईर्यासमितिस युक्त साधुके अपने पैरके उठाने पर चलनेके स्थानमें यदि कोई क्षुद्र प्राणी
उनके पैरसे दब जाय और उसके सम्बन्धसे मर जाय तो भी उस निमित्तसे थोड़ा भी बन्ध आगम-
में नहीं कहा है, क्योंकि जैसे अध्यात्म दृष्टिसे मूर्च्छाको ही परिग्रह कहा है वैसे यहाँ भी रागादि
परिणामको हिंसा कहा है ।।'
शंका - प्राणोंका विनाश न होने पर भी केवल प्रमत्तयोगसे ही हिंसा कही जाती है। कहा
भी है-
'जीव मर जाय या जीता रहे तो भी यत्नाचारसे रहित पुरुषके नियमसे हिंसा होती है
और जो यत्नाचारपूर्वक प्रवृत्ति करता है। हिंसाके हो जाने पर भी उसे बन्ध नहीं होता ।।'
१. सिद्ध० द्वा० ३,१६। २. प्रवचन० क्षे० ३,१६। ३. प्रवचन० क्षे० ३,१७। ४. वचन० ३,१७ ।