सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
पृष्ठ 373, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 373
- ७।९ § ६७९ ] सप्तमोऽध्यायः २६१
हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् ॥ ९ ॥
§ ६७९. अभ्युदयनिःश्रेयसार्थिनां क्रियाणां विनाशकः १ प्रयोगोऽपायः । अवद्यं गर्ह्यम् ।
अपायश्चावद्यं चापायावद्ये तयोर्दर्शनमपायावद्यदर्शनं भावयितव्यम् । क्व । इहामुत्र च । केषु ।
हिंसादिषु । कथमिति चेदुच्यते—हिंसायां तावत्, हिंस्रो हि नित्योद्वेजनीयः सततानुबद्धवैरश्च इह
च वधबन्धपरिक्लेशादीन् प्रतिलभते प्रेत्य चाशुभां गतिं गर्हितश्च भवतीति हिंसाया व्युपरमः ५
श्रेयान् । तथा अनृतवादी अश्रद्धेयो भवति इहैव च जिह्वाच्छेदादीन् प्रतिलभते मिथ्याख्यान-
दुःखितेभ्यश्च बद्धवैरेभ्यो बहूनि व्यसनान्यवाप्नोति प्रेत्य चाशुभां गतिं गर्हितश्च भवतीति
अनृतवचनादुपरमः श्रेयान् । तथा स्तेनः परद्रव्याहरणासक्तः सर्वस्योद्वेजनीयो भवति । इहैव
चाभिघातवधबन्धहस्तपादकर्णनासोत्तरोष्ठच्छेदनभेदनसर्वस्वहरणादीन् प्रतिलभते प्रेत्य चाशुभां
गतिं गर्हितश्च भवतीति स्तेयाद् व्युपरतिः श्रेयसी । तथा अब्रह्मचारी मदविभ्रमोद्भ्रान्तचित्तो १०
वनगज इव वासितावञ्चितो विवशो वधबन्धनपरिक्लेशाननुभवति मोहाभिभूतत्वाच्च कार्याकार्या-
नभिज्ञो न किंचित्कुशलमाचरति पराङ्गनालिङ्गनसङ्गकृतरतिश्चेहैव वैरानुबन्धो लिङ्गच्छेदन-
वधबन्धसर्वस्वहरणादीनपायान् प्राप्नोति प्रेत्य चाशुभां गतिमश्नुते गर्हितश्च भवति अतो विरति-
रात्महिता । तथा परिग्रहवान् शकुनिरिव गृहीतमांसखण्डोऽन्येषां तदर्थिनां पतत्त्रिणामिहैव
हिंसादिक पाँच दोषोंमें ऐहिक और पारलौकिक अपाय और अवद्यका दर्शन भावने योग्य १५
है ॥९॥
§ ६७९. स्वर्ग और मोक्षकी प्रयोजक क्रियाओंका विनाश करनेवाली प्रवृत्ति अपाय है ।
अवद्यका अर्थ गर्हा है । अपाय और अवद्य इन दोनोंके दर्शनकी भावना करनी चाहिए । शंका—
कहाँ ? समाधान—इस लोक और परलोकमें । शंका—किनमें ? समाधान—हिंसादि पाँच दोषों-
में । शंका—कैसे ? समाधान—हिंसामें यथा—हिंसक निरन्तर उद्वेजनीय है, वह सदा वैरको २०
बाँधे रहता है । इस लोकमें वध, बन्ध और क्लेश आदिको प्राप्त होता है तथा परलोकमें अशुभ
गतिको प्राप्त होता है और गर्हित भी होता है इस लिए हिंसाका त्याग श्रेयस्कर है । असत्यवादी-
का कोई श्रद्धान नहीं करता । वह इस लोकमें जिह्वाच्छेद आदि दुःखों को प्राप्त होता है तथा असत्य
बोलनेसे दुःखी हुए अतएव जिन्होंने वैर बाँध लिया है उनसे बहुत प्रकारकी आपत्तियोंको और
परलोकमें अशुभ गतिको प्राप्त होता है और गर्हित भी होता है इसलिए असत्य वचनका त्याग २५
श्रेयस्कर है । तथा परद्रव्यका अपहरण करनेवाले चोरका सब तिरस्कार करते हैं । इस लोकमें
वह ताड़ना, मारना, बाँधना तथा हाथ, पैर, कान, नाक, ऊपरके ओठका छेदना, भेदना और
सर्वस्वहरण आदि दुःखोंको और परलोकमें अशुभ गतिको प्राप्त होता है और गर्हित भी होता है
इसलिए चोरीका त्याग श्रेयस्कर है । तथा जो अब्रह्मचारी है उसका चित्त मदसे भ्रमता रहता
है । जिस प्रकार वनका हाथी हथनीसे जुदा कर दिया जाता है और विवश होकर उसे वध, ३०
बन्धन और क्लेश आदि दुःखोंको भोगना पड़ता है ठीक यही अवस्था अब्रह्मचारीकी होती है ।
मोहसे अभिभूत होनेके कारण वह कार्य और अकार्यके विवेकसे रहित होकर कुछ भी उचित
आचरण नहीं करता । परस्त्रीके आलिंगन और संसर्गमें ही इसको रति रहती है इसलिए यह
वैरको बढ़ानेवाले लिंगका छेदा जाना, मारा जाना, बाँधा जाना और सर्वस्वका अपहरण किया
जाना आदि दुःखोंको और परलोकमें अशुभ गतिको प्राप्त होता है तथा गर्हित भी होता है इसलिए ३५
अब्रह्मका त्याग आत्महितकारी है । जिस प्रकार पक्षी मांसके टुकड़ेको प्राप्त करके उसको चाहने-
वाले दूसरे पक्षियोंके द्वारा पराभूत होता है उसी प्रकार परिग्रहवाला भी इसी लोकमें उसको
चाहनेवाले चोर आदिके द्वारा पराभूत होता है । तथा उसके अर्जन, रक्षण और नाशसे होनेवाले
१. -शकप्रयो-मु. ।