सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 375, कुल 558 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 375
  • ७।१२ § ६८६ ] सप्तमोऽध्यायः २६३
    § ६८३. परेषां दुःखानुत्पत्त्यभिलाषो मैत्री । वदनप्रसादादिभिरभिव्यज्यमानान्तर्भक्तिरागः
    प्रमोदः । दीनानुग्रहभावः कारुण्यम् । रागद्वेषपूर्वकपक्षपाताभावो माध्यस्थ्यम् । दुष्कर्मविपाकवशा-
    न्नानायोनिषु सीदन्तीति सत्त्वा जीवाः । सम्यग्ज्ञानादिभिः प्रकृष्टा गुणाधिकाः । असद्वेद्योदयापादित-
    क्लेशाः क्लिश्यमानाः । तत्त्वार्थश्रवणग्रहणाभ्यामसंपादितगुणा अविनेयाः । एतेषु सत्त्वादिषु
    यथासंख्यं मैत्र्यादीनि भावयितव्यानि । सर्वसत्त्वेषु मैत्री, गुणाधिकेषु प्रमोदः, क्लिश्यमानेषु ५
    कारुण्यम्, अविनेयेषु माध्यस्थ्यमिति । एवं भावयतः पूर्णान्यहिंसादीनि व्रतानि भवन्ति ।
    § ६८४. पुनरपि भावनान्तरमाह—
    १जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् ॥ १२ ॥
    § ६८५. जगत्स्वभावस्तावदनादिरनिधनो वेत्रासनझल्लरीमृदङ्गनिभः । अत्र जीवा अनादि- १०
    संसारेऽनन्तकालं नानायोनिषु दुःखं भोजं भोजं पर्यटन्ति । न चात्र किंचिन्नियतमस्ति । जलबुद्-
    बुदोपमं जीवितम्, विद्युन्मेघादिविकारचपला भोगसंपद इति । एवमादिजगत्स्वभावचिन्तनात्संसा-
    रात्संवेगो भवति । कायस्वभावश्च अनित्यता दुःखहेतुत्वं निःसारता अशुचित्वमिति । एवमादि-
    कायस्वभावचिन्तनाद्विषयरागनिवृत्तेर्वैराग्यमुपजायते । इति जगत्कायस्वभावौ भावयितव्यौ ।
    § ६८६. अत्राह; उक्तं भवता२ हिंसादिनिवृत्तिव्रतमिति, तत्र न जानीमः के हिंसादयः
    § ६८३. दूसरोंको दुःख न हो ऐसी अभिलाषा रखना मैत्री है। मुखकी प्रसन्नता आदिके १५
    द्वारा भीतर भक्ति और अनुरागका व्यक्त होना प्रमोद है। दोनों पर दयाभाव रखना कारुण्य है।
    रागद्वेषपूर्वक पक्षपातका न करना माध्यस्थ्य है। बुरे कर्मोंके फलसे जो नाना योनियोंमें जन्मते और
    मरते हैं वे सत्त्व हैं। सत्त्व यह जीवका पर्यायवाची नाम है। जो सम्यग्ज्ञानादि गुणोंमें बढ़े चढ़े हैं
    वे गुणाधिक कहलाते हैं। असातावेदनीयके उदयसे जो दुःखी हैं वे क्लिश्यमान कहलाते हैं। २०
    जिनमें जीवादि पदार्थोंको सुनने और ग्रहण करनेका गुण नहीं है वे अविनेय कहलाते हैं। इन
    सत्त्व आदिकमें क्रमसे मैत्री आदिकी भावना करनी चाहिए। जो सब जीवोंमें मैत्री, गुणाधिकोंमें
    प्रमोद, क्लिश्यमानोंमें कारुण्य और अविनेयोंमें माध्यस्थ्य भावकी भावना करता है उसके अहिंसा
    आदि व्रत पूर्णताको प्राप्त होते हैं।
    ६८४. अब फिर भी और भावनाके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    संवेग और वैराग्यके लिए जगत्के स्वभाव और शरीरके स्वभावकी भावना करनी २५
    चाहिए ॥१२॥
    § ६८५. जगत्का स्वभाव तथा—यह जगत् अनादि है, अनिधन है, वेत्रासन, झल्लरी और
    मृदंगके समान है। इस अनादि संसारमें जीव अनन्त काल तक नाना योनियोंमें दुःखको पुनः पुनः
    भोगते हुए भ्रमण करते हैं। इसमें कोई भी वस्तु नियत नहीं है। जीवन जलके बुलबुलेके समान
    है। और भोग-सम्पदाएँ बिजुली और इन्द्रधनुषके समान चंचल हैं। इत्यादि रूपसे जगत्के ३०
    स्वभावका चिन्तन करनेसे संसारसे संवेग—भय होता है। कायका स्वभाव यथा—यह शरीर
    अनित्य है, दुःखका कारण है, निःसार है और अशुचि है इत्यादि । इस प्रकार कायके स्वभावका
    चिन्तन करनेसे विषयोंसे आसक्ति हटकर वैराग्य उत्पन्न होता है। अतः जगत् और कायके
    स्वभावकी भावना करनी चाहिए।
    § ६८६. यहाँ पर शंकाकार कहता है कि आपने यह तो बतलाया कि हिंसादिकसे निवृत्त ३५
    १. शौचात्स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः ।'—पा० यो० सू० २,४० । २. भगवता मु०, ता०, ना० ।
    CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri