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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 370, कुल 558 में से

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पृष्ठ 370

अनृताद्विरितिरित्येवमादि । तत्र अहिंसाव्रतमादौ क्रियते प्रधानत्वात् । सत्यादीनि हि तत्परिपाल-
नार्थानि सस्यस्य वृतिपरिक्षेपवत् । सर्वसावद्यनिवृत्तिलक्षणसामायिकापेक्षया एकं व्रतं, तदेव
छेदोपस्थापनापेक्षया पञ्चविधमिहोच्यते । ननु च अस्य व्रतस्यास्रवहेतुत्वमनुपपन्नं संवरहेतुष्वन्त-
र्भावात् । संवरहेतवो वक्ष्यन्ते गुप्तिसमित्यादयः । तत्र दशविधे धर्मे संयमे वा व्रतानामन्तर्भाव इति ।
नैष दोषः; तत्र संवरो निवृत्तिलक्षणो वक्ष्यते । प्रवृत्तिश्चात्र दृश्यते'; हिंसानृतादत्तादानादिपरित्यागे
अहिंसासत्यवचनदत्तादानादिक्रियाप्रतीतेः गुप्त्यादिसंवरपरिकर्मत्वाच्च । व्रतेषु हि कृतपरिकर्मा
साधुः सुखेन संवरं करोतीति ततः पृथक्त्वेनोपदेशः क्रियते । ननु च षष्ठमणुव्रतमस्ति रात्रिभोजन-
विरमणं तदिहोपसंख्यातव्यम् । न; भावनास्वन्तर्भावात् । अहिंसाव्रतभावना हि वक्ष्यन्ते² । तत्र
आलोकितपानभोजनभावना कार्येति ।
§ ६६५. तस्य पञ्चतयस्य व्रतस्य भेदप्रतिपत्त्यर्थमाह -
देशसर्वतोऽणुमहती³ ॥ २ ॥
§ ६६६. देश एकदेशः । सर्वः सकलः । देशश्च सर्वंश्च देशसर्वौ ताभ्यां देशसर्वतः । 'विरतिः'
इत्यनुवर्तते । अणु च महच्चाणुमहती । व्रताभिसंबन्धान्नपुंसकलिङ्गनिर्देशः । यथासंख्यमभि-
असत्यसे विरति आदि । इन पाँच व्रतोंमें अहिंसा व्रतको प्रारम्भमें रखा है क्योंकि वह सबमें मुख्य
है। धान्यके खेतके लिए जैसे उसके चारों ओर कांटोंका घेरा होता है उसी प्रकार सत्यादिक सभी
व्रत उसकी रक्षाके लिए हैं। सब पापोंसे निवृत्त होनेरूप सामायिककी अपेक्षा एक व्रत है। वही
व्रत छेदोपस्थापनाकी अपेक्षा पाँच प्रकारका है और उन्हींका यहाँ कथन किया है। शंका-यह
व्रत आस्रवका कारण है यह बात नहीं बनती, क्योंकि संवरके कारणोंमें इनका अन्तर्भाव होता है।
आगे गुप्ति, समिति इत्यादि संवरके कारण कहनेवाले हैं। वहाँ दस प्रकारके धर्मोंमें एक संयम
नामका धर्म बतलाया है उसमें व्रतोंका अन्तर्भाव होता है ? समाधान-यह कोई दोष नहीं है,
क्योंकि वहाँ निवृत्तिरूप संवरका कथन करेंगे और यहाँ प्रवृत्ति देखी जाती है, क्योंकि हिंसा,
असत्य और अदत्तादान आदिका त्याग करने पर अहिंसा, सत्यवचन और दी हुई वस्तुका ग्रहण
आदि रूप क्रिया देखी जाती है। दूसरे ये व्रत गुप्ति आदि रूप संवरके अंग हैं। जिस साधुने व्रतोंकी
मर्यादा कर ली है वह सुखपूर्वक संवर करता है इसलिए व्रतोंका अलगसे उपदेश दिया है।
शंका-रात्रिभोजनविरमण नाम छठा अणुव्रत है उसकी यहाँ परिगणना करनी थी ? समाधान -
नहीं, क्योंकि उसका भावनाओंमें अन्तर्भाव हो जाता है। आगे अहिंसा व्रतकी भावनाएँ कहेंगे ।
उनमें एक आलोकितपानभोजन नामकी भावना है उसमें रात्रिभोजनविरमण नामक व्रतका
अन्तर्भाव हो जाता है।
§ ६६५. उस पाँच प्रकारके व्रतके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
हिंसादिकसे एकदेश निवृत्त होना अणुव्रत है और सब प्रकारसे निवृत्त होना महाव्रत
है ॥२॥
§ ६६६. देश शब्दका अर्थ एकदेश है और सर्व शब्दका अर्थ सकल है। सूत्रमें देश और
सर्व शब्दका द्वन्द्व समास करके तसि प्रत्यय करके 'देशसर्वतः' पद बनाया है। इस सूत्रमें विरति
शब्दकी अनुवृत्ति पूर्व सूत्रसे होती है । यहाँ अणु और महत् शब्दका द्वन्द्व समास होकर अणुमहती
पद बना है। व्रत शब्द नपुंसक लिंग है इसलिए 'अणुमहती' यह नपुंसक लिंगपरक निर्देश किया
है। इनका सम्बन्ध क्रमसे होता है। यथा-एकदेश निवृत्त होना अणुव्रत है और सब प्रकारसे
१. दृश्यते हिंसानृतादत्तादानादिक्रिया-मु० । २. -क्ष्यन्ते । आलो- आ०, दि० १, दि०, २ । ३. 'एते
जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम् ।'-पा० यो० सू० २, ३१ ।