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सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

२०४ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१० § ५४३ -
§ ५४३. अविद्यमानोऽन्तो येषां ते अनन्ताः । के । प्रदेशाः । कस्य । आकाशस्य । पूर्वव-
दस्यापि प्रदेशकल्पनावसेया ।
§ ५४४. उक्तममूर्तानां प्रदेशपरिमाणम् । इदानीं मूर्तानां पुद्गलानां प्रदेशपरिमाणं निर्ज्ञात-
व्यमित्यत आह—
संख्येयाऽसंख्येयाश्च पुद्गलानाम् ॥१०॥
§ ५४५. 'च'शब्दादनन्ताश्चेत्यनुकृष्यते । कस्यचित्पुद्गलद्रव्यस्य द्व्यणुकादेः संख्येयाः
प्रदेशाः कस्यचिदसंख्येया अनन्ताश्च । अनन्तानन्तोपसंख्यानमिति चेत् । न; अनन्तसामान्यात् ।
अनन्तप्रमाणं त्रिविधमुक्तं परीतानन्तं युक्तानन्तमन्तानन्तं चेति । तत्सर्वमनन्तसामान्येन गृह्यते ।
स्यादेतदसंख्यातप्रदेशो लोकः अनन्तप्रदेशस्यानन्तानन्तप्रदेशस्य च स्कन्धस्याधिकरणमिति विरोध-
स्ततो नानन्त्यमिति । नैष दोषः; सूक्ष्मपरिणामावगाहनशक्तियोगात् । परमाण्वादयो हि सूक्ष्मभावेन
परिणता एकैकस्मिन्नप्याकाशप्रदेशेऽनन्तानन्ता अवतिष्ठन्ते. अवगाहनशक्तिश्चैषामव्याहतास्ति ।
तस्मादेकस्मिन्नपि प्रदेशे अनन्तानन्तानामवस्थानं न विरुध्यते ।
§ ५४६. 'पुद्गलानाम्' इत्यविशेषवचनात्परमाणोरपि प्रदेशवत्त्वप्रसङ्गे तत्प्रतिषेधार्थमाह—
नाणोः ॥११॥
§ ५४३. जिनका अन्त नहीं है वे अनन्त कहलाते हैं ? शंका- अनन्त क्या हैं? समाधान-
प्रदेश । शंका- किसके ? समाधान - आकाशके । पहलेके समान इसके भी प्रदेशकी कल्पना जान
लेनी चाहिए । अर्थात् जितने क्षेत्रमें एक परमाणु रहता है उसे प्रदेश कहते हैं। प्रदेशका यह अर्थ
यहाँ भी जानना चाहिए ।
§ ५४४. अमूर्त द्रव्योंके प्रदेश कहे । अब मूर्त पुद्गलोंके प्रदेशोंकी संख्या ज्ञातव्य है, अतः
उसका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
पुद्गलोंके संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेश हैं ॥१०॥
§ ५४५. सूत्रमें जो 'च' शब्द दिया है उससे अनन्तकी अनुवृत्ति होती है। तात्पर्य यह है
कि किसी द्व्यणुक आदि पुद्गल द्रव्यके संख्यात प्रदेश होते हैं और किसीके असंख्यात तथा अनन्त
प्रदेश होते हैं। शंका-यहाँ अनन्तानन्तका उपसंख्यान करना चाहिए ? समाधान -नहीं; क्योंकि
यहाँ अनन्त सामान्यका ग्रहण किया है। अनन्त प्रमाण तीन प्रकारका कहा है- परीतानन्त,
युक्तानन्त और अनन्तानन्त । इसलिए इन सबका अनन्त सामान्यसे ग्रहण हो जाता है। शंका-
लोक असंख्यात प्रदेशवाला है इसलिए वह अनन्त प्रदेशवाले और अनन्तानन्त प्रदेशवाले स्कन्धका
आधार है, इस बातके माननेमें विरोध आता है अतः पुद्गलके अनन्त प्रदेश नहीं बनते ?
समाधान- यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि सूक्ष्म परिणमन होनेसे और अवगाहन शक्तिके निमित्तसे
अनन्त या अनन्तानन्त प्रदेशवाले पुद्गल स्कन्धोंका आकाश आधार हो जाता है । सूक्ष्मरूपसे
परिणत हुए परमाणु आकाशके एक-एक प्रदेशमें अनन्तानन्त ठहर जाते हैं। इनकी यह अवगाहन
शक्ति व्याघात रहित है, इसलिए आकाशके एक प्रदेशमें भी अनन्तानन्त परमाणुओंका अवस्थान
विरोधको प्राप्त नहीं होता ।
§ ५४६. पूर्व सूत्रमें 'पुद्गलानाम्' यह सामान्य वचन कहा है । इससे परमाणुके भी प्रदेशों
का प्रसंग प्राप्त होता है, अतः उसका निषेध करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
परमाणुके प्रदेश नहीं होते ॥११॥
१. च शब्देनानन्ता-मु०, ता०, ना० ।

– ५।१२ § ५४९ ] ° पञ्चमोऽध्यायः २०५
§ ५४७. अणोः 'प्रदेशा न सन्ति' इति वाक्यशेषः । कुतो न सन्तीति चेत् । प्रदेशमात्रत्वात् ।
यथा आकाशप्रदेशस्यैकस्य प्रदेशभेदाभावादप्रदेशत्वमेवमणोरपि प्रदेशमात्रत्वात्प्रदेशभेदाभावः । किं
च ततोऽल्पपरिमाणाभावात् । न ह्यणोरल्पीयानन्योऽस्ति, यतोऽस्य प्रदेशा भिद्येरन् ।
§ ५४८. एषामवधृतप्रदेशानां धर्मादीनामाधारप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
लोकाकाशेऽवगाहः ॥१२॥ ५
§ ५४९. उक्तानां धर्मादीनां द्रव्याणां लोकाकाशेऽवगाहो न बहिरित्यर्थः । यदि धर्मादीनां
लोकाकाशमाधारः, आकाशस्य क आधार इति । आकाशस्य नास्त्यन्य आधारः । स्वप्रतिष्ठमा-
काशम् । यद्याकाशं स्वप्रतिष्ठम्; धर्मादीन्यपि स्वप्रतिष्ठान्येव । अथ धर्मादीनामन्य आधारः कल्प्यते,
आकाशस्याप्यन्य आधारः कल्प्यः । तथा सत्यनवस्थाप्रसङ्ग इति चेत् । नैष दोषः; नाकाशादन्य-
दधिकपरिमाणं द्रव्यमस्ति यत्राकाशं स्थितमित्युच्येत । सर्वतोऽनन्तं हि तत्¹ । धर्मादीनां पुनरधि- १०
करणमाकाशमित्युच्यते व्यवहारनयवशात् । एवम्भूतनयापेक्षया तु सर्वाणि द्रव्याणि स्वप्रतिष्ठान्येव ।
तथा चोक्तम्, “क्व भवानास्ते । आत्मनि” इति । धर्मादीनि लोकाकाशान्न बहिः सन्तीत्येता-
वदत्राधाराधेयकल्पनासाध्यं फलम् । ननु च लोके पूर्वोत्तरकालभाविनामाधाराधेयभावो दृष्टो यथा
कुण्डे बदरादीनाम् । न तथाऽऽकाशं पूर्वं धर्मादीन्युत्तरकालभावीनि; अतो व्यवहारनयापेक्षयाऽपि
आधाराधेयकल्पनानुपपत्तिरिति ? नैष दोषः; युगपद्भाविनामपि आधाराधेयभावो दृश्यते । घटे १५
§ ५४७. परमाणुके प्रदेश नहीं हैं। यहाँ 'सन्ति' यह वाक्यका शेष है । शंका—परमाणुके
प्रदेश क्यों नहीं होते ? समाधान—क्योंकि वह स्वयं एक प्रदेश मात्र है। जिस प्रकार एक आकाश
प्रदेशमें प्रदेश-भेद नहीं होनेसे वह अप्रदेशी माना गया है उसी प्रकार अणु स्वयं एक प्रदेशरूप है
इसलिए उसमें प्रदेशभेद नहीं होता । दूसरे अणुसे अल्प परिमाण नहीं पाया जाता। ऐसी कोई
अन्य वस्तु नहीं जो परमाणुसे छोटी हो जिससे इसके प्रदेश भेदको प्राप्त होवें । २०
§ ५४८. इस प्रकार निश्चित प्रदेशवाले इन धर्मादिक द्रव्योंके आधारका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
इन धर्मादिक द्रव्योंका अवगाह लोकाकाशमें है ॥१२॥
§ ५४९. उक्त धर्मादिक द्रव्योंका लोकाकाशमें अवगाह है बाहर नहीं, यह इस सूत्रका तात्पर्य
है। शंका—यदि धर्मादिक द्रव्योंका लोकाकाश आधार है तो आकाशका क्या आधार है ? २५
समाधान—आकाशका अन्य आधार नहीं है; क्योंकि आकाश स्वप्रतिष्ठ है। शंका—यदि आकाश
स्वप्रतिष्ठ है तो धर्मादिक द्रव्य भी स्वप्रतिष्ठ ही होने चाहिए। यदि धर्मादिक द्रव्योंका अन्य
आधार माना जाता है तो आकाशका भी अन्य आधार मानना चाहिए। और ऐसा मानने पर
अनवस्था दोष प्राप्त होता है। समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि आकाशसे अधिक
परिमाणवाला अन्य द्रव्य नहीं है जहाँ आकाश स्थित है यह कहा जाय । वह सबसे अनन्त है । ३०
परन्तु धर्मादिक द्रव्योंका आकाश अधिकरण है यह व्यवहारनयकी अपेक्षा कहा जाता है। एवंभूत
नयकी अपेक्षा तो सब द्रव्य स्वप्रतिष्ठ ही हैं। कहा भी है—आप कहाँ रहते हैं ? अपनेमें । धर्मादिक
द्रव्य लोकाकाशके बाहर नहीं हैं। यहाँ आधार-आधेय कल्पनासे इतना ही फलितार्थ लिया गया
है । शंका—लोकमें जो पूर्वोत्तर कालभावी होते हैं उन्हींका आधार-आधेयभाव देखा गया है। जैसे
कि बेरोंका आधार कुण्ड होता है। उस प्रकार आकाश पूर्वकालभावी हो और धर्मादिक द्रव्य ३५
पीछेसे उत्पन्न हुए हों, ऐसा तो है नहीं, अतः व्यवहारनयकी अपेक्षा भी आधार-आधेयकल्पना नहीं
बनती ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि एक साथ होनेवाले पदार्थों में आधार-आधेय-
१. तत् । ततो धर्मा-ता०, ना० मु० ।

२०६ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१३ ६ ५५० -
रूपादयः शरीरे हस्तादय इति । लोक इत्युच्यते । को लोकः । धर्माधर्मादीनि द्रव्याणि यत्र
लोक्यन्ते स लोक इति । अधिकरणसाधनो घञ् । आकाशं द्विधा विभक्तं लोकाकाशमलोकाकाशं
चेति । लोक उक्तः । स यत्र तल्लोकाकाशम् । ततो बहिः सर्वतोऽनन्तमलोकाकाशम् । लोकालोक-
विभागश्च धर्माधर्मास्तिका य सद्भावासद्भावाद्द्ज्ञेयः । असति हि तस्मिन्धर्मास्तिकाये जीवपुद्-
गलांनां गतिनियमहेत्वभावाद्विभागो न स्यात् । असति चाधर्मास्तिकाये स्थितेराश्रयनिमित्ताभावात्
स्थितेरभावो लोकालोकविभागाभावो वा स्यात् । तस्मादुभयसद्भावाँसद्भावाल्लोकालोक-
विभागसिद्धिः ।
§ ५५०. तत्रावध्रियमाणानामवस्थानभेदसंभवाद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह -
धर्माधर्मयोः कृत्स्ने ॥१३॥
§ ५५१. कृत्स्नवचनमशेषव्याप्तिप्रदर्शनायँम् । अगारेऽवस्थितो घट इति यथा तथा धर्माधर्म-
योर्लोकाकाशेऽवगाहो न भवति । किं र्तार्ह । कृत्स्ने तिलेषु तैलवदिति । अन्योन्यप्रदेशप्रवेशव्याघाता-
भावः अवगाहनशक्तियोगाद्वेदितव्यः ।
§ ५५२. अतो विपरीतानां मूर्तिमतोमप्रदेशसंख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशानां पुद्गलानामवगाह-
विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह -
भाव देखा जाता है। यथा - घटमें रूपादिकका और शरीरमें हाथ आदिका । अब लोकका स्वरूप
कहते हैं- शंका- लोक किसे कहते हैं ? समाधान - जहाँ धर्मादिक द्रव्य विलोके जाते हैं उसे लोक
कहते हैं । 'लोक' धातुसे अधिकरण अर्थमें 'घञ्' प्रत्यय करके लोक शब्द बना है। आकाश दो
प्रकारका है- लोकाकाश और अलोकाकाश । लोकका स्वरूप पहले कह आये हैं। वह जितने
आकाशमें होता है वह लोकाकाश है और उससे बाहर सबसे अनन्त अलोकाकाश है। यह लोका-
लोकका विभाग धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकायके सद्भाव और असद्भावकी अपेक्षासे जानना
चाहिए । अर्थात् धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय जहां तक पाये जाते हैं वह लोकाकाश है और
इससे बाहर अलोकाकाश है । यदि धर्मास्तिकायका सद्भाव न माना जाय तो जीव और पुद्गलों-
की गतिके नियमका हेतु न रहनेसे लोकालोकका विभाग नहीं बनता । उसी प्रकार यदि अधर्मा-
स्तिकायका सद्भाव न माना जाय तो स्थितिका निमित्त न रहनेसे जीव और पुद्गलोंकी स्थितिका
अभाव होता है जिससे लोकालोकका विभाग नहीं बनता । इसलिए इन दोनोंके सद्भाव और
असद्भावकी अपेक्षा लोकालोकके विभागकी सिद्धि होती है।
§ ५५०. लोकाकाशमें जितने द्रव्य बतलाये हैं उनके अवस्थानमें भेद हो सकता है इसलिए
प्रत्येक द्रव्यके अवस्थान विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
धर्म और अधर्म द्रव्यका अवगाह समग्र लोकाकाशमें है ॥१३॥
§ ५५१. सब लोकाकाशके साथ व्याप्तिके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'कृत्स्न' पद रखा है।
घरमें जिस प्रकार घट अवस्थित रहता है उस प्रकार लोकाकाशमें धर्म और अधर्म द्रव्यका अवगाह
नहीं है। किन्तु जिस प्रकार तिलमें तैल रहता है उस प्रकार सब लोकाकाशमें धर्म और अधर्म
द्रव्यका अवगाह है । यद्यपि ये सब द्रव्य एक जगह रहते हैं तो भी अवगाहन शक्तिके निमित्तसे
इनके प्रदेश परस्पर प्रविष्ट होकर व्याघातको नहीं प्राप्त होते ।
§ ५५२. अब जो उक्त द्रव्योंसे विपरीत हैं और जो अप्रदेशी हैं या संख्यात असंख्यात और
अनन्तप्रदेशी हैं ऐसे मूर्तिमान् पुद्गलोंके अवगाह विशेषके ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते है-
१. 'हलः' जैनेन्द्र, २।३।११८। 'हलश्च' पाणिनि, ३।३।१२१ । २. -कायसद्भावाद्धि-मु० । ३. -रभावः ।
तस्या अभावे लोका-मु०, ता०, ना० । ४. - भयसद्भावाल्लोका-मु० । ५. -मतामेकप्रदे-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

  • ५।१५ § ५५५ ] पञ्चमोऽध्यायः २०७
    एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥१४॥
    § ५५३. एकः प्रदेश एकप्रदेशः । एकप्रदेश आदिर्येषां त इमे एकप्रदेशादयः । तेषु पुद्ग-
    लानामवगाहो भाज्यो विकल्प्यः । “अवयवेन विग्रहः समुदायः समासार्थः” $^२$ इति एकप्रदेशोऽपि
    गृह्यते । तद्यथा—एकस्मिन्नाकाशप्रदेशे परमाणोरवगाहः । द्वयोरेकत्रोभयत्र च बद्धयोरबद्धयोश्च ।
    त्रयाणामप्येकत्र द्वयोस्त्रिषु च बद्धानामबद्धानां च । एवं संख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशानां स्कन्धानामे-
    कसंख्येयासंख्येयप्रदेशेषु लोकाकाशेऽवस्थानं प्रत्येत्तव्यम् । ननु युक्तं तावदमूर्त्तयोर्धर्माधर्मयोरेकत्रा-
    विरोधेनावरोध इति । मूर्त्तिमतां पुद्गलानां कथम् । इत्यत्रोच्यते-अवगाहनस्वभावत्वात्सूक्ष्मपरि-
    णामाच्च मूर्तिमनामप्यवगाहो न विरुध्यते एकापवरके अनेकदीपप्रकाशावस्थानवत् । आगम-
    प्रामाण्याच्च तथाऽध्यवसेयम् । तदुक्तम्—
    “ओगाढगाढणिचिओ पुग्गलकाएहि संव्वदो लोगो ।
    सुहुमेहिं बादरेहिं अणंताणंतेहिं विवहेहिं ॥”
    § ५५४. अथ जीवानां कथमवगानमित्यत्रोच्यते—
    असंख्येयभागादिषु जीवानाम् ॥१५॥
    § ५५५. ‘लोकाकाशे’ इत्यनुवर्तते । तस्यासंख्येयभागीकृतस्यैको भागोऽसंख्येयभाग इत्यु-
    च्यते । स आदिर्येषां तेऽसंख्येयभागादयः । तेषु जीवानागवगाहो वेदितव्यः । तद्यथा—एकस्मिन्न-
    पुद्गलोंका अवगाह लोकाकाशके एक प्रदेश आदिमें विकल्पसे होता है ॥१४॥
    § ५५३. एक और प्रदेश इन दोनोंका द्वन्द्व समास है । जिनके आदिमें एक प्रदेश है वे एक
    प्रदेश आदि कहलाते हैं। उनमें पुद्गलोंका अवगाह विकल्पसे है। यहाँ पर विग्रह अवयवके साथ
    है किन्तु समासार्थ समुदायरूप लिया है इसलिए एक प्रदेशका भी ग्रहण होता है। खुलासा इस
    प्रकार है—आकाशके एक प्रदेशमें एक परमाणुका अवगाह है। बन्धको प्राप्त हुए या खुले हुए दो
    परमाणुओंका आकाशके एक प्रदेशमें या दो प्रदेशोंमें अवगाह है। बन्धको प्राप्त हुए या खुले हुए
    तीन परमाणुओंका आकाशके एक, दो या तीन प्रदेशोंमें अवगाह है। इसी प्रकार संख्यात, असंख्यात
    और अनन्त प्रदेशवाले स्कन्धोंका लोकाकाशके एक, संख्यात और असंख्यात प्रदेशोंमें अवगाह
    जानना चाहिए । शंका—यह तो युक्त है कि धर्म और अधर्म द्रव्य अमूर्त हैं इसलिए उनका एक
    जगह बिना विरोधके रहना बन जाता है किन्तु पुद्गल मूर्त हैं इसलिए उनका बिना विरोधके
    एक जगह रहना कैसे बन सकता है ? समाधान—इनका अवगाहन स्वभाव है और सूक्ष्म रूपसे
    परिणमन हो जाता है इसलिए एक झक्कनमें जिस प्रकार अनेक दीपकोंका प्रकाश रह जाता है
    उसी प्रकार मूर्त्तमान् पुद्गलोंका एक जगह अवगाह विरोधको प्राप्त नहीं होता । तथा आगम
    प्रमाणसे यह बात जानी जाती है। कहा भी है—
    § ५५४. अब जीवोंका अवगाह किस प्रकार है इस बातको अगले सूत्रमें कहते हैं—
    'लोक सूक्ष्म और स्थूल अनन्तानन्त नाना प्रकारके पुद्गलकायोंसे चारों ओरसे खचाखच
    भरा है।'
    जीवोंका अवगाह लोकाकाशके असंख्यातवें भाग आदिमें है ॥१५॥
    § ५५५. इस सूत्रमें ‘लोकाकाशे' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। उसके असंख्यात भाग
    करके जो एक भाग प्राप्त हो वह असंख्यातवाँ भाग कहलाता है। वह जिनके आदिमें है वे सब
    असंख्यातवें भाग आदि हैं । उनमें जीवोंका अवगाह जानना चाहिए। स्पष्ट इस प्रकार है—
    १. एक एव प्रदेशः मु० । २. पा० म० मा० २, २, २४ । ३. -याणामेकत्र मु०, ता० । ४. पंचत्थि०
    गा० ६४ ।

संख्येयभागे एको जीवोऽवतिष्ठते । एवं द्वित्रिचतुरादिष्वपि असंख्येयभागेषु आ सर्वलोकादवगाहः
प्रत्येतव्यः । नानाजीवानां तु सर्वलोक एव । यद्येकस्मिन्नसंख्येयभागे एको जीवोऽवतिष्ठते, कथं
द्रव्यप्रमाणेनानन्तानन्तो जीवराशिः सशरीरोऽवतिष्ठते लोकाकाशे । सूक्ष्मबादरभेदादवस्थानं
प्रत्येतव्यम् । बादरास्तावत्सप्रतिघातशरीराः । सूक्ष्मास्तु सशरीरा अपि सूक्ष्मभावादेवैकनिगोद-
जीवावगाह्येऽपि प्रदेशे साधारणशरीरा अनन्तानन्ता वसन्ति । न ते परस्परेण बादरैश्च व्याहन्यन्त
इति नास्त्यवगाहविरोधः² ।
§ ५५६. अत्राह लोकाकाशतुल्यप्रदेश एकजीव इत्युक्तम्, तस्य कथं लोकस्यासंख्येयभागा-
दिषु वृत्तिः । ननु सर्वलोकव्याप्त्यैव भवितव्यमित्यत्रोच्यते—
प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥
§ ५५७. अमूर्तस्वभावस्यात्मनोऽनादिबन्धं प्रत्येकत्वात् कथंचिन्मूर्ततां बिभ्रतः कार्मणशरी-
रवशान्महदणु च शरीरमधितिष्ठतस्तत्तद्गात्रप्रदेशसंहरणविसर्पणस्वभावस्य तावत्प्रमाणतायां सत्याम-
संख्येयभागादिषु वृत्तिरुपपद्यते, प्रदीपवत् । यथा निरावरणव्योमप्रदेशेऽनव³धृतप्रकाशपरिमाणस्य
प्रदीपस्य शरावमणिकापवरकाद्यावरणवशात्तत्परिमाणतेति । अत्राह धर्मादीनामन्योन्यप्रदेशानु-
प्रवेशात्संकरे⁴ सति, एकत्वं प्राप्नोतीति । तन्न; परस्परमत्यन्तसंश्लेषे सत्यपि स्वभावं न जहति ।
उक्तं च—
एक असंख्यातवे भागमें एक जीव रहता है। इस प्रकार दो, तीन और चार आदि असंख्यात भागों
से लेकर सब लोकपर्यन्त एक जीवका अवगाह जानना चाहिए। किन्तु नाना जीवोंका अवगाह
सब लोकमें ही होता है। शंका—यदि लोकके एक असंख्यातवें भागमें एक जीव रहता है तो
संख्याकी अपेक्षा अनन्तानन्त सशरीर जीवराशि लोकाकाशमें कैसे रह सकती है ? समाधान—जीव
दो प्रकारके हैं सूक्ष्म और बादर, अतः उनका लोकाकाशमें अवस्थान बन जाता है। जो बादर
जीव हैं उनका शरीर तो प्रतिघात सहित होता है। किन्तु जो सूक्ष्म हैं वे यद्यपि सशरीर हैं तो
भी सूक्ष्म होनेके कारण एक निगोद जीव आकाशके जितने प्रदेशोंको अवगाहन करता है उतनेमें
साधारण शरीरवाले अनन्तानन्त जीव रह जाते हैं। वे परस्परमें और बादरोंके साथ व्याघातको
नहीं प्राप्त होते इसलिए लोकाकाशमें अनन्तानन्त जीवोंके अवगाहमें कोई विरोध नहीं आता।
§ ५५६. यहाँ पर शंकाकारका कहना है कि जब एक जीवके प्रदेश लोकाकाशके बराबर
बतलाये हैं तो लोकके असंख्यातवें भाग आदिमें एक जीव कैसे रह सकता है, उसे तो सब लोक
व्याप्त कर ही रहना चाहिए ? अब इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
क्योंकि प्रदीपके समान जीवके प्रदेशोंका संकोच और विस्तार होता है ॥१६॥
§ ५५७. चूंकि आत्मा अमूर्त स्वभाव है तो भी अनादिकालीन बन्धके कारण एकपनेको
प्राप्त होनेसे वह मूर्त हो रहा है और कार्मण शरीरके कारण वह छोटे-बड़े शरीरमें रहता है,
इसलिए वह प्रदेशोंके संकोच और विस्तार स्वभाववाला है और इसलिए शरीरके अनुसार दीपक-
के समान उसका लोकके असंख्यातवें भाग आदिमें रहना बन जाता है। जिस प्रकार निरावरण
आकाश-प्रदेशमें यद्यपि दीपकके प्रकाशके परिमाणका निश्चय नहीं होता तथापि वह सकोरा,
मानिक तथा आवरण करनेवाले दूसरे पदार्थोंके आवरणके वशसे तत्परिमाण होता है उसी प्रकार
प्रकृतमें जानना चाहिए। शंका—धर्मादिक द्रव्योंके प्रदेशोंका परस्पर प्रवेश होनेके कारण संकर
होनेसे अभेद प्राप्त होता है ? समाधान—नहीं; क्योंकि परस्पर अत्यन्त सम्बन्ध हो जाने पर भी वे
अपने-अपने स्वभावको नहीं छोड़ते; इसलिए उनमें अभेद नहीं प्राप्त होता। कहा भी है—
१. सशरीरत्वेऽपि आ०, दि० १, दि० २ । २. -वगाहेऽपि मु० । ३. -देशेऽववृ-ता० ना० । ४. पंचत्थि०
गा० ७ ।

  • ५।१७ § ५५९ ] पञ्चमोऽध्यायः २०९
    “अण्णोण्णं पविसंता दिंता ओगासमण्णमण्णस्स ।
    मेलंता वि य णिच्चं सगसब्भावं ण जहंति ।”
    § ५५८. यद्येवं धर्मादीनां स्वभावभेद उच्यतामित्यत आह—
    गतिस्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ॥१७॥
    § ५५९. देशान्तरप्राप्तिहेतुर्गतिः। तद्विपरीता स्थितिः। उपगृह्यत इत्युपग्रहः। गतिश्च ५
    स्थितिश्च गतिस्थिती। गतिस्थिती एव उपग्रहौ गतिस्थित्युपग्रहौ। धर्माधर्मयोरिति कर्तृनिर्देशः।
    उपक्रियत इत्युपकारः। कः पुनरसौ। गत्युपग्रहः स्थित्युपग्रहश्च। यद्येवं द्वित्वनिर्देशः प्राप्नोति।
    नैष दोषः; सामान्येन व्युत्पादितः१ शब्द उपात्तसंख्यः शब्दान्तरसंबन्धे सत्यपि न पूर्वोपात्तां संख्यां
    जहाति। यथा—“साधोः कार्यं तपःश्रुते” इति। एतदुक्तं भवति-गतिपरिणामिनां जीवपुद्गलानां
    गत्युपग्रहे कर्तव्ये धर्मास्तिकायः साधारणश्रयो जलवन्मत्स्यगमने। तथा स्थितिपरिणामिनां १०
    जीवपुद्गलानां स्थित्युपग्रहे कर्तव्ये अधर्मास्तिकायः साधारणश्रयः पृथिवीधातुरिवाश्वादिस्थित्या-
    विति। ननु च 'उपग्रह' वचनमनर्थकम् 'उपकारः' इत्येवं२ सिद्धत्वात्। 'गतिस्थिती धर्माधर्म-
    योरुपकारः' इति। नैष दोषः; याथासंख्यनिवृत्त्यर्थम् 'उपग्रह'वचनम्। धर्माधर्मयोर्गतिस्थित्योश्च
    यथासंख्यं भवति, एवं जीवपुद्गलानां यथासंख्यं प्राप्नोति धर्मस्योपकारो जीवानां गतिः अधर्म-
    'सब द्रव्य परस्पर प्रविष्ट हैं, एक दूसरेको अवकाश देते हैं, और सदा मिलकर रह १५
    रहे हैं तो भी अपने स्वभावको नहीं छोड़ते।'
    § ५५८. यदि ऐसा है तो धर्मादिक द्रव्योंका स्वभावभेद कहना चाहिए इसलिए आगेका
    सूत्र-कहते हैं—
    गति और स्थितिमें निमित्त होना यह क्रमसे धर्म और अधर्म द्रव्यका उपकार है ॥१७॥
    § ५५९. एक स्थानसे दूसरे स्थानके प्राप्त करानेमें जो कारण है उसे गति कहते हैं। स्थिति- २०
    का स्वरूप इससे उलटा है। उपग्रह शब्द उपकारका पर्यायवाची है जिसकी व्युत्पत्ति 'उपगृह्यते'
    है। गति और स्थिति इन दोनोंमें द्वन्द्व समास है। गति और स्थिति ही उपग्रह हैं, इसलिए
    'गतिस्थित्युपग्रहौ' यह सूत्रवचन कहा है। 'धर्माधर्मयोः' यह कर्ता अर्थमें षष्ठी निर्देश है। उपकार-
    की व्युत्पत्ति 'उपक्रियते' है। शंका—यह उपकार क्या है ? समाधान—गति उपग्रह और स्थिति
    उपग्रह यही उपकार है। शंका—यदि ऐसा है तो द्विवचनका निर्देश प्राप्त होता है ? समाधान— २५
    यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सामान्यसे ग्रहण किया गया शब्द जिस संख्याको प्राप्त कर लेता है
    दूसरे शब्दके सम्बन्ध होनेपर भी वह उस संख्याको नहीं छोड़ता। जैसे 'साधोः कार्यं तपःश्रुते'
    इस वाक्य में 'कार्यम्' एकवचन और 'तपःश्रुते' द्विवचन है। यही बात प्रकृतमें जानना चाहिए।
    इस सूत्रका यह अभिप्राय है कि जिस प्रकार मछलीके गमनमें जल साधारण निमित्त है उसी
    प्रकार गमन करते हुए जीव और पुद्गलोंके गमनमें धर्मास्तिकाय साधारण निमित्त है। तथा जिस ३०
    प्रकार घोड़ा आदिके ठहरनेमें पृथिवी साधारण निमित्त है उसी प्रकार ठहरनेवाले जीव और
    पुद्गलोंके ठहरनेमें अधर्मास्तिकाय साधारण निमित्त है। शंका—सूत्रमें 'उपग्रह' वचन निरर्थक है
    क्योंकि 'उपकार' इसीसे काम चल जाता है। यथा—'गतिस्थिती धर्माधर्मयोरुपकारः' ?
    समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यथाक्रमके निराकरण करनेके लिए 'उपग्रह' पद रखा
    है। जिस प्रकार धर्म और अधर्मके साथ गति और स्थितिका क्रमसे सम्बन्ध होता है उसी प्रकार ३५
    जीव और पुद्गलोंका क्रमसे सम्बन्ध प्राप्त होता है। यथा-धर्म द्रव्यका उपकार जीवोंकी गति
    १. -दितः उपात्त-ता०, ना०, मु०। २. इत्येव सिद्ध-ता० ।
    २७

२१० सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१८ § ५६० –
स्योपकारः पुद्गलानां स्थितिरिति । तन्निवृत्त्यर्थमुपग्रहवचनं क्रियते । आह धर्माधर्मयोर्य उपकारः
स आकाशस्य युक्तः; सर्वगतत्वादिति चेत् । तदयुक्तम्; तस्यान्योपकारसद्भावात् । सर्वेषां धर्मादीनां
द्रव्याणामवगाहनं तत्प्रयोजनम् । एकस्यानेकप्रयोजनकल्पनायां लोकालोकविभागाभावः । भूमि-
जलादीन्येव तत्प्रयोजनसमर्थानि नार्थो धर्माधर्माभ्यामिति चेत् । न; साधारणाश्रय इति विशि-
ष्योक्तत्वात् । अनेककारणसाध्यत्वाच्चैकस्य कार्यस्य । तुल्यबलत्वात्तयोर्गतिस्थितिप्रतिबन्ध इति
चेत् । न; अप्रेरकत्वात् । अनुपलब्धेर्न तौ स्तः खरविषाणवदिति चेत् । न; सर्व१प्रवाद्यविप्रतिपत्तेः ।
सर्वे हि २प्रवादिनाः प्रत्यक्षाप्रत्यक्षानर्थानभिवाञ्छन्ति । अस्मान्प्रति हेतोरसिद्धेश्च । सर्वज्ञेन
निरतिशयप्रत्यक्षज्ञानचक्षुषा धर्मादयः सर्वे उपलभ्यन्ते । तदुपदेशाच्च श्रुतज्ञानिभिरपि ।
§ ५६०. अत्राह, यद्यतीन्द्रिययोर्धर्माधर्मयोरुपकारसंबन्धेनास्तित्वमवध्रियते, तदनन्तरमु-
द्दिष्टस्य नभसोऽतीन्द्रियस्याधिगमे क उपकार इत्युच्यते—
आकाशस्यावगाहः ॥१८॥
§ ५६१. ३'उपकारः' इत्यनुवर्तते । जीवपुद्गलादीनामवगाहिनामवकाशदानमवगाह-आकाश-
स्योपकारो वेदितव्यः । आह, जीवपुद्गलानां क्रियावतामवगाहिनामवकाशदानं युक्तम् । धर्मास्ति-
है और अधर्म द्रव्यका उपकार पुद्गलोंकी स्थिति है अतः इसका निराकरण करनेके लिए
सूत्रमें 'उपग्रह' पद रखा है। शंका—धर्म और अधर्म द्रव्यका जो उपकार है उसे आकाशका
मान लेना युक्त है, क्योंकि आकाश सर्वगत है ? समाधान—यह कहना युक्त नहीं है; क्योंकि
आकाशका अन्य उपकार है। सब धर्मादिक द्रव्योंको अवगाहन देना आकाशका प्रयोजन है । यदि
एक द्रव्यके अनेक प्रयोजन माने जाते हैं तो लोकालोकके विभागका अभाव होता है, अतः धर्म
और अधर्म द्रव्यका जो उपकार है वह आकाशका मानना युक्त नहीं । शंका—धर्म और अधर्म
द्रव्यके जो प्रयोजन हैं पृथिवी और जल आदिक ही उनके करनेमें समर्थ हैं, अतः धर्म और अधर्म
द्रव्यका मानना ठीक नहीं ? समाधान—नहीं, क्योंकि धर्म और अधर्म द्रव्य गति और स्थितिके
साधारण कारण हैं यह विशेष रूपसे कहा है । तथा एक कार्य अनेक कारणोंसे होता है, इसलिए
धर्म और अधर्म द्रव्यका मानना ठीक है। शंका—धर्म और अधर्म ये दोनों द्रव्य तुल्य बलवाले हैं,
अतः गतिसे स्थितिका और स्थितिसे गतिका प्रतिबन्ध होना चाहिए ? समाधान—नहीं, क्योंकि
ये अप्रेरक हैं । शंका—धर्म और अधर्म द्रव्य नहीं हैं, क्योंकि उनकी उपलब्धि नहीं होती, जैसे
गधेके सींग ? समाधान—नहीं; क्योंकि इसमें सब वादियोंको विवाद नहीं है । तात्पर्य यह है कि
जितने वादी हैं वे प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकारके पदार्थोंको स्वीकार करते हैं । इसलिए इनका
अभाव नहीं किया जा सकता । दूसरे हम जैनोंके प्रति 'अनुपलब्धि' हेतु असिद्ध है, क्योंकि जिनके
सातिशय प्रत्यक्ष ज्ञानरूपी नेत्र विद्यमान हैं ऐसे सर्वज्ञ देव सब धर्मादिक द्रव्योंको प्रत्यक्ष जानते हैं
और उनके उपदेशसे श्रुतज्ञानी भी जानते हैं ।
§ ५६०. यदि अतीन्द्रिय धर्म और अधर्म द्रव्यका उपकारके सम्बन्धसे अस्तित्व स्वीकार
किया जाता है तो इनके अनन्तर जो अतीन्द्रिय आकाश द्रव्य कहा है, ऐसा कौन-सा उपकार है
जिससे उसका ज्ञान होता है ? अब इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अवकाश देना आकाशका उपकार है ॥१८॥
§ ५६१. इस सूत्रमें 'उपकार' इस पदकी अनुवृत्ति होती है । अवगाहन करनेवाले जीव
और पुद्गलोंको अवकाश देना आकाशका उपकार जानना चाहिए । शंका—अवगाहन स्वभाव
वाले जीव और पुद्गल क्रियावान् हैं इसलिए इनको अवकाश देना युक्त है परन्तु धर्मादिक द्रव्य
१. –प्रतिवाद्य ता०, ना० । २. प्रतिवादिनः ता०, ना० । ३. उपकार इति वर्तते आ०, ता०, ना० ।
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  • ५।१९ § ५६३ ] पञ्चमोऽध्यायः २११
    कायादयः पुन्र्निष्क्रिया नित्यसंबन्धास्तेषां कथमवगाह इति चेत् । न; उपचारांतस्तत्सिद्धेः । यथा
    गमनाभावेऽपि 'सर्वगतमाकाशम्' इत्युच्यते; सर्वत्र सद्भावात्, एवं धर्माधर्मवपि अवगाहक्रिया-
    भावेऽपि सर्वत्र व्याप्तिदर्शनादवगाहिनावित्युपचर्येते । आह यद्यवकाशदानमस्य स्वभावो वज्रादि-
    भिर्लोष्टादीनां भित्त्यादिभिर्गवादीनां च व्याघातो न प्राप्नोति । दृश्यते च व्याघातः । तस्मादस्याव-
    काशदानं हीयते इति । नैष दोषः; वज्रलोष्टादीनां स्थूलानां परस्परव्याघात इति नास्यावकाश- ५
    दानसामर्थ्यं हीयते; तत्रावगाहिनामेव व्याघातात् । वज्रादयः पुनः स्थूलत्वात्परस्परं प्रत्यवकाश-
    दानं न कुर्वन्तीति नासावाकाशदोषः । ये खलु पुद्गलाः सूक्ष्मास्ते¹ परस्परं प्रत्यवकाशदानं
    कुर्वन्ति । यद्येवं नेदमाकाशस्यासाधारणं लक्षणम्; इतरेषामपि तत्सद्भावादिति । तन्न; सर्वपदा-
    र्थानां साधारणावगाहनहेतुत्वमस्यासाधारणं लक्षणमिति नास्ति दोषः । अलोकाकाशे तदभावाद-
    भाव इति चेत्; न; स्वभावापरित्यागात् । १०
    § ५६२. उक्त आकाशस्योपकारः । अथ तदनन्तरोद्दिष्टानां पुद्गलानां क उपकार इत्य-
    त्रोच्यते—
    शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् ।।१९।।
    § ५६३. इदमयुक्तं वर्तते । किमत्रायुक्तम् । पुद्गलानां क उपकार इति परिप्रश्ने पुद्गलानां
    निष्क्रिय और सदा सम्बन्धवाले हैं इसलिए उनका अवगाह कैसे बन सकता है ? समाधान—नहीं; १५
    क्योंकि उपचारसे इसकी सिद्धि होती है । जैसे गमन नहीं करने पर भी आकाश सर्वगत कहा
    जाता है, क्योंकि वह सर्वत्र पाया जाता है इसी प्रकार यद्यपि धर्म और अधर्म द्रव्यमें अवगाह-
    रूप क्रिया नहीं पायी जाती तो भी लोकाकाशमें वे सर्वत्र व्याप्त हैं अतः वे अवगाही हैं ऐसा
    उपचार कर लिया जाता है । शंका—यदि अवकाश देना आकाशका स्वभाव है तो वज्रादिकसे
    लोढ़ा आदिकका और भीत आदिकसे गाय आदिकका व्याघात नहीं प्राप्त होता है, किन्तु व्याघात २०
    तो देखा जाता है इससे मालूम होता है कि अवकाश देना आकाशका स्वभाव नहीं ठहरता ?
    समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वज्र और लोढ़ा आदिक स्थूल पदार्थ हैं इसलिए उनका
    आपसमें व्याघात होता है, अतः आकाशकी अवकाश देने रूप सामर्थ्य नहीं नष्ट होती । यहाँ जो
    व्याघात दिखाई देता है वह अवगाहन करनेवाले पदार्थोंका ही है । तात्पर्य यह है कि वज्रादिक
    स्थूल पदार्थ हैं इसलिए वे परस्पर अवकाश नहीं देते, यह कुछ आकाशका दोष नहीं है । हाँ, जो २५
    पुद्गल सूक्ष्म होते हैं वे परस्पर अवकाश देते हैं । शंका—यदि ऐसा है तो यह आकाशका असा-
    धारण लक्षण नहीं रहता, क्योंकि दूसरे पदार्थोंमें भी इसका सद्भाव पाया जाता है ? समाधान—
    नहीं, क्योंकि आकाश द्रव्य सब पदार्थोंको अवकाश देनेमें साधारण कारण है यही इसका असाधारण
    लक्षण है, इसलिए कोई दोष नहीं है । शंका—अलोकाकाशमें अवकाशदान रूप स्वभाव नहीं पाया
    जाता, इससे ज्ञात होता है कि यह आकाशका स्वभाव नहीं है ? समाधान—नहीं, क्योंकि कोई ३०
    भी द्रव्य अपने स्वभावका त्याग नहीं करता ।
    § ५६२. आकाश द्रव्यका उपकार कहा । अब उसके अनन्तर कहे गये पुद्गलोंका क्या
    उपकार है, यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
    शरीर, वचन, मन और प्राणापान यह पुद्गलोंका उपकार है ॥१९॥
    § ५६३. शंका—यह अयुक्त है ? प्रतिशंका—क्या अयुक्त है ? शंका—पुद्गलोंका क्या ३५
    १. -स्तेऽपि परस्प- आ०, दि० १, दि० २ । २. -क्षणमिति परे-आ०, दि० १, दि० २ ।

२१२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१९ § ५६३ -
लक्षणमुच्यते¹; शरीरादीनि पुद्गलमयानीति । नैतद्युक्तम्; पुद्गलानां लक्षणमुत्तरत्र² वक्ष्यते । इदं
तु जीवान् प्रति पुद्गलानामुपकारप्रतिपादनार्थमेवेति उपकारप्रकरणे उच्यते । शरीराण्युक्तानि ।
औदारिकादीनि सौक्ष्म्यादप्रत्यक्षाणि । तदुदयापादित³वृत्तीन्युपचयशरीराणि कानिचित्प्रत्यक्षाणि
कानिचिदप्रत्यक्षाणि । एतेषां कारणभूतानि कर्माण्यपि शरीरग्रहणेन गृह्यन्ते । एतानि पौद्गलिका-
५ नीति कृत्वा जीवानामुपकारे पुद्गलाः प्रवर्तन्ते । स्यान्मतं कार्मणमपौद्गलिकम्; अनाकारत्वाद्⁴ ।
आकारवतां हि औदारिकादीनां पौद्गलिकत्वं युक्तमिति । तन्न; तदपि पौद्गलिकमेव; तद्विपाकस्य
मूर्तिमत्संबन्धनिमित्तत्वात् । दृश्यते हि व्रीह्यादीनामुदकादिद्रव्यसंबन्धप्रापितपरिपाकानां
पौद्गलिकत्वम् । तथा कार्मणमपि गुडकण्टकादिमूर्तिमद्द्रव्योपनिपाते सति विपच्यमानत्वात्पौद्-
गलिकमित्यवसेयम् । वाग् द्विविधा-द्रव्यवाग् भाववागिति । तत्र भाववाक् तावद्वीर्यान्तरायमति-
१० श्रुतज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलब्धिनिमित्तत्वात् पौद्गलिकी । तदभावे तद्वृत्त्यभावात् ।
तत्सामर्थ्योपेतेन क्रियावतात्मना प्रेर्यमाणाः पुद्गला वाक्त्वेन विपरिणमन्त इति द्रव्यवागपि
पौद्गलिकी; श्रोत्रेन्द्रियविषयत्वात् । इतरेन्द्रियविषया कस्मान्न भवति । तद्ग्रहणायोग्यत्वात् ।
घ्राणग्राह्ये गन्धद्रव्ये रसाद्यनुपलब्धिवत् । अमूर्ता वागिति चेत् । न; मूर्तिमद्ग्रहणावरोधव्याघाता-
उपकार है यह प्रश्न था पर उसके उत्तरमें 'शरीरादिक पुद्गलमय हैं' इस प्रकार पुद्गलोंका लक्षण
१५ कहा जाता है ? समाधान—यह अयुक्त नहीं है, क्योंकि पुद्गलोंका लक्षण आगे कहा जायगा, यह सूत्र
तो जीवोंके प्रति पुद्गलोंके उपकारका कथन करनेके लिए ही आया है अतः उपकार प्रकरणमें ही
यह सूत्र कहा है। औदारिक आदिक पाँचों शरीरोंका कथन पहले कर आये हैं। वे सूक्ष्म होनेसे
इन्द्रियगोचर नहीं हैं। किन्तु उनके उदयसे जो उपचय शरीर प्राप्त होते हैं उनमें-से कुछ शरीर
इन्द्रियगोचर हैं और कुछ इन्द्रियातीत हैं। इन पाँचों शरीरोंके कारणभूत जो कर्म हैं उनका भी शरीर
२० पदके ग्रहण करनेसे ग्रहण हो जाता है। ये सब शरीर पौद्गलिक हैं ऐसा मानकर जीवोंका उपकार
पुद्गल करते हैं यह कहा है। शंका—आकाशके समान कार्मण शरीरका कोई आकार नहीं पाया
जाता इसलिए उसे पौद्गलिक मानना युक्त नहीं। हाँ, जो औदारिक आदिक शरीर आकारवाले हैं
उनको पौद्गलिक मानना युक्त है ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि कार्मण शरीर भी
पौद्गलिक ही है, क्योंकि उसका फल मूर्तिमान् पदार्थोंके सम्बन्धसे होता है। यह तो स्पष्ट दिखाई
२५ देता है कि जलादिकके सम्बन्धसे पकनेवाले धान आदि पौद्गलिक हैं। उसी प्रकार कार्मण शरीर
भी गुड़ और काँटे आदि मूर्तिमान् पदार्थोंके मिलने पर फल देते हैं इससे ज्ञात होता है कि कार्मण
शरीर भी पौद्गलिक है। वचन दो प्रकारका है--द्रव्यवचन और भाववचन । इनमें-से भाववचन
वीर्यान्तराय और मतिज्ञानावरण तथा श्रुतज्ञानावरण कर्मोंके क्षयोपशम और अंगोपांग नामकर्मके
निमित्तसे होता है इसलिए वह पौद्गलिक है; क्योंकि पुद्गलोंके अभावमें भाववचनका सद्भाव
३० नहीं पाया जाता। चूँकि इस प्रकारकी सामर्थ्यसे युक्त क्रियावाले आत्माके द्वारा प्रेरित हो कर
पुद्गल वचनरूपसे परिणमन करते हैं इसलिए द्रव्य वचन भी पौद्गलिक हैं। दूसरे द्रव्य वचन
श्रोत्र इन्द्रियके विषय हैं इससे भी ज्ञात होता है कि वे पौद्गलिक हैं। शंका—वचन इतर इन्द्रियों-
के विषय क्यों नहीं होते ? समाधान—घ्राण इन्द्रिय गन्धको ग्रहण करती है उससे जिस प्रकार
रसादिककी उपलब्धि नहीं होती उसी प्रकार इतर इन्द्रियोंमें वचनके ग्रहण करनेकी योग्यता नहीं
३५ है। शंका—वचन अमूर्त हैं ? समाधान—नहीं; क्योंकि वचनोंका मूर्त इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण होता
है, वे मूर्त भीत आदिके द्वारा रुक जाते हैं, प्रतिकूल वायु आदिके द्वारा उनका व्याघात देखा
१. -च्यते भवता शरी-मु० । २. -रत्र स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः इत्यत्र वक्ष्यते मु० । ३. -पादित-
( तदुदयोपपादित )वृत्ती-मु० । ४. -कारत्वादाकाशवत् । आकार-मु० ।
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  • ५।१९ § ५६३ ] पञ्चमोऽध्यायः २१३

भिभवादिदर्शनान्मूर्त्तिमत्त्वसिद्धेः । मनो द्विविधं द्रव्यमनो भावमनश्चेति । भावमनस्तावल्लब्ध्युप-
योगलक्षणं पुद्गलावलम्बनत्वात् पौद्गलिकम् । द्रव्यमनश्च, ज्ञानावरणवीर्यान्तरायक्षयोपशमाङ्गो-
पाङ्गनामलाभप्रत्यया गुणदोषविचारस्मरणादिप्रणिधानाभिमुख्यस्यात्मनोऽनुग्राहकाः पुद्गला
मनस्त्वेन परिणता इति पौद्गलिकम् । कश्चिदाह मनो द्रव्यान्तरं रूपादिपरिणामरहित-
मणुमात्रं तस्य पौद्गलिकत्वमयुक्तमिति । तदयुक्तम् । कथम् । उच्यते—तदिन्द्रियेणात्मना च
संबद्धं वा स्यादसंबद्धं वा । यद्यसंबद्धम्, तन्नात्मन उपकारकं भवितुमर्हति इन्द्रियस्य च साचिव्यं
न करोति । अथ संबद्धम्, एकस्मिन् प्रदेशे संबद्धं सत्तदणु इतरेषु प्रदेशेषु उपकारं न कुर्यात् ।
अदृष्टवशादस्य अलातचक्रवत्परिभ्रमणमिति चेत् । न; तत्सामर्थ्याभावात् । अमूर्त्तस्यात्मनो
निष्क्रियस्यादृष्टो गुणः, स निष्क्रियः संन्नन्यत्र क्रियारम्भे न समर्थः । दृष्टो हि वायुद्रव्यविशेषः
क्रियावान्स्पर्शवान्प्र१भवन्वनस्पतौ परिस्पन्दहेतुस्तद्विपरीतलक्षणश्चायमिति क्रियाहेतुत्वाभावः ।
वीर्यान्तरायज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामोदयापेक्षे२णात्मना उदस्यमानः कोष्ठ्यो वायु-
रुच्छ्वासलक्षणः प्राण इत्युच्यते । तेनैवात्मना बाह्यो वायुरभ्यन्तरीक्रियमाणो निःश्वासलक्षणोऽपान
इत्याख्यायते । एवं तावप्यात्मानुग्राहिणौ; जीवितहेतुत्वात् । तेषां मनःप्राणापानानां मूर्त्तिमत्त्वमव-
सेयम् । कुतः ३ । मूर्त्तिमद्भिः प्रतिघातादिदर्शनात् । प्रतिभयहेतुभिरशनिपातादिभिर्मनसः प्रतिघातो
दृश्यते । सुरादिभिश्चाभिभवः । ४ हस्ततलपटादिभिरास्यसंवरणात्प्राणापानयोः प्रतिघात उपलभ्यते ।
जाता है यथा अन्य कारणोंसे उनका अभिभव आदि देखा जाता है इससे शब्द मूर्त्त सिद्ध होते हैं ।
मन दो प्रकारका है—द्रव्यमन और भावमन । लब्धि और उपयोग-लक्षण भावमन पुद्गलोंके
आलम्बनसे होता है इसलिए पौद्गलिक है । तथा ज्ञानावरण और वीर्यान्तरायके क्षयोपशमसे
तथा अंगोपांग नामकर्मके निमित्तसे जो पुद्गल गुण दोषका विचार और स्मरण आदि उप-
योगके सम्मुख हुए आत्माके उपकारक हैं वे ही मन रूपसे परिणत होते हैं अतः द्रव्यमन भी
पौद्गलिक है । शंका—मन एक स्वतन्त्र द्रव्य है । वह रूपादि रूप परिणमनसे रहित है और
अणुमात्र है इसलिए उसे पौद्गलिक मानना अयुक्त है ? समाधान—शंकाकारका इस प्रकार कहना
अयुक्त है । खुलासा इस प्रकार है—वह मन आत्मा और इन्द्रियसे सम्बद्ध है या असम्बद्ध । यदि
असम्बद्ध है तो वह आत्माका उपकारक नहीं हो सकता और इन्द्रियोंकी सहायता भी नहीं कर
सकता । यदि सम्बद्ध है तो जिस प्रदेशमें वह अणु मन सम्बद्ध है उस प्रदेशको छोड़ कर इतर
प्रदेशोंका उपकार नहीं कर सकता । शंका—अदृष्ट नामका एक गुण है उसके वशसे यह मन
अलातचक्रके समान सब प्रदेशोंमें घूमता रहता है ? समाधान—नहीं; क्योंकि अदृष्ट नामके गुणमें
इस प्रकारकी सामर्थ्य नहीं पायी जाती । यतः अमूर्त्त और निष्क्रिय आत्माका अदृष्ट गुण है। अतः
यह गुण भी निष्क्रिय है इसलिए अन्यत्र क्रियाका आरम्भ करनेमें असमर्थ है । देखा जाता है कि
वायु नामक द्रव्य विशेष स्वयं क्रियावाला और स्पर्शवाला होकर ही वनस्पतिमें परिस्पन्दका
कारण होता है परन्तु यह अदृष्ट उससे विपरीत लक्षणवाला है इसलिए यह क्रियाका हेतु नहीं हो
सकता । वीर्यान्तराय और ज्ञानावरणके क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्मके उदयकी अपेक्षा
रखनेवाला आत्मा कोष्ठगत जिस वायुको बाहर निकालता है उच्छ्वासलक्षण उस वायुको प्राण
कहते हैं । तथा वही आत्मा बाहरी जिस वायुको भीतर करता है निःश्वासलक्षण उस वायुको
अपान कहते हैं । इस प्रकार ये प्राण और अपान भी आत्माका उपकार करते हैं, क्योंकि इनसे
आत्मा जीवित रहता है । ये मन, प्राण और अपान मूर्त्त हैं, क्योंकि दूसरे मूर्त्तपदार्थोंके द्वारा
इनका प्रतिघात आदि देखा जाता है । जैसे-प्रतिभय पैदा करनेवाले बिजली पात आदिके द्वारा
१. प्रासः वन-आ०, दि० १, दि० २, ता०, ना० । २. -पेक्षेणा-आ०, दि० १, दि० २ । ३. कुतः ।
प्रतिघा- -ता० । ४. हस्ततलपुटादि- ता०, ना० मु० ।

२१४ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।२० § ५६४ –
श्लेष्मणा चाभिभवः । न चामूत्तंस्य मूर्तिमद्भिूरभिघातादयः स्युः । अत एवात्मास्तित्वसिद्धिः ।
यथा यन्त्रप्रतिमाचेष्टितं प्रयोक्तुरस्तित्वं गमयति तथा प्राणापानादिकमपि क्रियावन्तमात्मानं
साधयति ।
§ ५६४. किमेतावानेव पुद्गलकृत उपकार आहोस्विदन्योऽप्यस्तीत्यत आह—
सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥२०॥
§ ५६५. १सदसद्वेद्योदयेऽन्तरङ्गहेतौ सति बाह्यद्रव्यादिपरिपाकनिमित्तवशादुत्पद्यमानः
प्रीतिपरितापरूपः परिणामः सुखदुःखमित्याख्यायते। भवधारणकारणायुराख्यकर्मोदयाद् भव-
स्थितिमादधानस्य जीवस्य पूर्वोक्तप्राणापानक्रियाविशेषाव्युच्छेदो जीवितमित्युच्यते। तदुच्छेदो
मरणम्। एतानि सुखादीनि जीवस्य पुद्गलकृत उपकारः२; मूर्तिमद्धेतुसंनिधाने सति तदुत्पत्तेः।
उपकाराधिकारात् 'उपग्रह'वचनमनर्थकम्। नानर्थकम्। स्वोपग्रहप्रदर्शनार्थमिदम्। पुद्गलानां
पुद्गलकृत उपकार इति। तद्यथा— कांस्यादीनां भस्मादिभिर्जलादीनां कतकादिभिरयःप्रभृती-
नामुदकादिभिरुपकारः क्रियते। 'च'शब्दः किमर्थः। समुच्चयर्थः। अन्योऽपि पुद्गलकृत उपकारो-
ऽस्तीति समुच्चीयते। यथा शरीराणि एवं चक्षुरादीनीन्द्रियाण्यपीति।
§ ५६६. एवमाद्यमजीवकृतमुपकारं प्रदर्श्य जीवकृतोपकारप्रदर्शना र्थमाह—
मनका प्रतिघात होता है और सुरा आदिके द्वारा अभिभव । तथा हस्ततल और वस्त्र आदिके
द्वारा मुखके ढँक लेने से प्राण और अपानका प्रतिघात होता है और कफके द्वारा अभिभव । परन्तु
अमूर्तका मूर्त पदार्थोंके द्वारा अभिघात आदि नहीं हो सकता इससे प्रतीत होता है कि ये सब
मूर्त हैं। तथा इसीसे आत्माके अस्तित्वकी सिद्धि होती है। जैसे यन्त्रप्रतिमाकी चेष्टाएँ अपने
प्रयोक्ताके अस्तित्वका ज्ञान कराती हैं उसी प्रकार प्राण और अपान आदि रूप कार्य भी क्रिया
वाले आत्माके अस्तित्वके साधक हैं।
§ ५६४. क्या पुद्गलोंका इतना ही उपकार है या और भी उपकार है, इस बातके बतलाने
'के लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
सुख, दुःख, जीवन और मरण ये भी पुद्गलोंके उपकार हैं ॥२०॥
§ ५६५. साता और असातारूप अन्तरंग हेतुके रहते हुए बाह्य द्रव्यादिके परिपाकके
निमित्तसे जो प्रीति और परितापरूप परिणाम उत्पन्न होते हैं वे सुख और दुःख कहे जाते हैं।
पर्यायके धारण करनेमें कारणभूत आयुकर्मके उदयसे भवस्थितिको धारण करनेवाले जीवके
पूर्वोक्त प्राण और अपानरूप क्रिया विशेषका विच्छेद नहीं होना जीवित है। तथा उसका उच्छेद
मरण है। ये सुखादिक जीवके पुद्गलकृत उपकार हैं; क्योंकि मूर्त कारणोंके रहने पर ही इनकी
उत्पत्ति होती है। शंका—उपकारका प्रकरण होनेसे सूत्रमें उपग्रह शब्दका प्रयोग करना निष्फल
है ? समाधान—निष्फल नहीं है, क्योंकि स्वतःके उपकारके दिखलानेके लिए सूत्रमें उपग्रह शब्द-
का प्रयोग किया है। पुद्गलोंका भी पुद्गलकृत उपकार होता है। यथा—काँसे आदिका राख
आदिके द्वारा, जल आदिका कतक आदिके द्वारा और लोहे आदिका जल आदिके द्वारा उपकार
किया जाता है। शंका—सूत्रमें 'च' शब्द किस लिए दिया है ? समाधान—समुच्चयके लिए ।
पुद्गलकृत और भी उपकार हैं इसके समुच्चयके लिए सूत्र में 'च' शब्द दिया है। जिस प्रकार
शरीर आदिक पुद्गलकृत उपकार हैं उसी प्रकार चक्षु आदि इन्द्रियाँ भी पुद्गलकृत उपकार हैं।
§ ५६६. इस प्रकार अजीवकृत उपकारको दिखलाकर अब जीवकृत उपकारके दिखलानेके
लिए आगेका सूत्र

  • ५।२१ § ५६७ ] पञ्चमोऽध्यायः २१५
    परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥२१॥
    § ५६७. 'परस्पर'शब्दः कर्मव्यतिहारे वर्तते । कर्मव्यतिहारश्च क्रियाव्यतिहारः । परस्पर-
    स्योपग्रहः परस्परोपग्रहः । जीवानामुपकारः । कः पुनरसौ । स्वामी भृत्यः, आचार्यः शिष्यः,
    इत्येवमादिभावेन वृत्तिः परस्परोपग्रहः । स्वामी तावद्वित्तत्यागादिना भृत्यानामुपकारे वर्तते ।
    भृत्याश्च हितप्रतिपादनेनाहितप्रतिषेधेन च । आचार्य उभयलोकफलप्रदोपदेशदर्शनेन तदुपदेश- ५
    विहितक्रियानुष्ठापनेन च शिष्याणामनुग्रहे वर्तते । शिष्या अपि तदानुकूल्यवृत्त्या आचार्याणाम्¹ ।
    उपकाराधिकारे पुनः 'उपग्रह'वचनं किमर्थम् । पूर्वोक्तसुखादिचतुष्टयप्रदर्शनार्थं पुनः 'उपग्रह'वचनं
    क्रियते² । सुखादीन्यपि जीवानां जीवकृत उपकार इति ।
    परस्पर निमित्त होना यह जीवोंका उपकार है ॥२१॥
    § ५६७. परस्पर यह शब्द कर्म व्यतिहार अर्थमें रहता है । और कर्मव्यतिहारका अर्थ १०
    क्रियाव्यतिहार है । परस्परका उपग्रह परस्परोपग्रह है । यह जीवोंका उपकार है । शंका—
    वह क्या है ? समाधान—स्वामी और सेवक तथा आचार्य और शिष्य इत्यादि रूपसे वर्तन करना
    परस्परोपग्रह है । स्वामी तो धन आदि देकर सेवकका उपकार करता है और सेवक हितका कथन
    करके तथा अहितका निषेध करके स्वामीका उपकार करता है। आचार्य दोनों लोकमें सुखदायी
    उपदेश-द्वारा तथा उस उपदेशके अनुसार क्रियामें लगाकर शिष्योंका उपकार करता है और शिष्य १५
    भी आचार्यके अनुकूल प्रवृत्ति करके आचार्यका उपकार करते हैं। शंका—उपकारका अधिकार
    है, इसलिए सूत्र में फिर से 'उपग्रह' शब्द किसलिए दिया है ? समाधान—पिछले सूत्रमें जो
    सुखादिक चार कह आये हैं उनके दिखलानेके लिए फिरसे 'उपग्रह' शब्द दिया है । तात्पर्य यह
    है कि सुखादिक भी जीवोंके जीवकृत उपकार हैं।
    विशेषार्थ—यहाँ उपकार के प्रकरणमें कौन द्रव्य अन्यका क्या उपकार करता है इस २०
    बातका निर्देश किया गया है, इसलिए विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या अन्य द्रव्य अपनेसे भिन्न
    दूसरे द्रव्यका भला-बुरा कुछ कर सकता है ? यदि कर सकता है यह मान लिया जाय तो जैन-
    दर्शनमें ईश्वरवादका निषेध क्यों किया गया है ? यह तो मानी हुई बात है कि एक द्रव्यके जो
    गुण और पर्याय होते हैं वे उसे छोड़कर अन्य द्रव्यमें प्रविष्ट नहीं होते । इसलिए एक द्रव्य अपनेसे
    भिन्न दूसरेका उपकार करता है यह विचारणीय हो जाता है। जिन दर्शनोंने ईश्वरवादको स्वीकार २५
    किया है वे प्रत्येक कार्यके होनेमें प्रेरक रूपसे ईश्वरको निमित्त कारण मानते हैं। उनका कहना
    है कि यह प्राणी अज्ञ है, अपने सुख-दुःखका स्वामी नहीं है । ईश्वरकी प्रेरणावश स्वर्ग जाता है
    या नरक । इसमें स्वर्ग और नरक आदि गतियोंकी प्राप्ति जीवको होती है यह बात स्वीकार की
    गयी है, तथापि उनकी प्राप्तिमें ईश्वरका पूरा हाथ रहता है । अगर ईश्वर चाहे तो जीवको इन
    गतियोंमें जानेसे बचा भी सकता है। यदि इसी अभिप्रायसे एक द्रव्यको अन्य द्रव्यका उपकारक ३०
    माना जाता है तब तो ईश्वरवादका निषेध करना न करनेके बराबर होता है और यदि इस
    उपकार प्रकरणका कोई भिन्न अभिप्राय है तो उसका दार्शनिक विश्लेषण होना अत्यावश्यक है ।
    आगे संक्षेपमें इसी बातपर प्रकाश डाला जाता है—
    लोकमें जितने द्रव्य हैं वे सब अपने-अपने गुण और पर्यायोंको लिये हुए हैं । द्रव्यदृष्टिसे
    वे अनन्त काल पहले जैसे थे आज भी वैसे ही हैं और आगे भी वैसे ही बने रहेंगे । किन्तु ३५
    पर्यायदृष्टिसे वे सदा परिवर्तनशील हैं । उनका यह परिवर्तन द्रव्यकी मर्यादाके भीतर ही होता
    है । प्रत्येक द्रव्यका यह स्वभाव है । इसलिए प्रत्येक द्रव्यमें जो भी परिणाम होता है वह अपनी-
    १. -याणां कृतोप-आ० । २. क्रियते । आह यद्यवश्यं ता०, ना० ।

२१६ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।२२ § ५६८ –
§ ५६८. आह, यद्यवश्यं सतोपकारिणा भवितव्यम्; संश्च कालोऽभिमतस्तस्य क उपकार
इत्यत्रोच्यते—
वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य ॥२२॥
§ ५६९. वृत्तेर्णिजन्तात्कर्मणि भावे वा युटि स्त्रीलिङ्गे वर्तनेति भवति । वर्त्यते¹ वर्तनमात्रं
५ वा वर्तना इति । धर्मादीनां द्रव्याणां स्वपर्यायनिर्वृत्ति प्रति स्वात्मनैव वर्तमानानां बाह्योपग्रहाद्विना
तद्वृत्त्यभावात्तत्प्रवर्तनोपलक्षितः काल इति कृत्वा वर्तना कालस्योपकारः । को णिजर्थः । वर्तते
द्रव्यपर्यायस्तस्य वर्तयिता कालः । यद्येवं कालस्य क्रियावत्त्वं प्राप्नोति । यथा शिष्योऽधीते, उपा-
ध्यायोऽध्यापयतीति । नैष दोषः; निमित्तमात्रेऽपि हेतुकर्तृव्यपदेशो दृष्टः । यथा "कारीषो²ऽग्निर-
ध्यापयति³ ।" एवं कालस्य हेतुकर्तृता । स कथं काल इत्यवसीयते । समयादीनां क्रियाविशेषाणां
१० अपनी योग्यतानुसार ही होता है । संसारी जीव पुद्गल द्रव्यसे बँधा हुआ है यह भी अपनी
योग्यताके कारण ही और कालान्तरमें मुक्त होता है यह भी अपनी योग्यतानुसार ही । तथापि
प्रत्येक द्रव्यके इस योग्यतानुसार कार्यके होनेमें बाह्य पदार्थ निमित्त माना जाता है । जैसे बालक-
में पढ़नेकी योग्यता है इसलिए उसे अध्यापक व पुस्तक आदिका निमित्त मिलने पर वह पढ़कर
विद्वान् बनता है, इसलिए ये अध्यापक आदि उसके निमित्त हैं। पर तत्त्वतः विचार करने पर
१५ ज्ञात होता है कि यहाँ कुछ अध्यापक या पुस्तक आदिने बालककी आत्मामें बुद्धि नहीं उत्पन्न
कर दी । यदि इन बाह्य पदार्थोंमें बुद्धि उत्पन्न करनेकी योग्यता होती तो जितने बालक उस
अध्यापकके पास पढ़ते हैं उन सबमें वह बुद्धि उत्पन्न कर सकता था । पर देखा यह जाता है कि
कोई मूर्ख रहता है, कोई अल्पज्ञानी हो पाता है और कोई महाज्ञानी हो जाता है । एक ओर तो
अध्यापकके बिना बालक पढ़ नहीं पाता और दूसरी ओर यदि बालकमें बुद्धिके प्रादुर्भाव होनेकी
२० योग्यता नहीं है तो अध्यापकके लाख चेष्टा करने पर भी वह मूर्ख बना रहता है । इससे ज्ञात
होता है कि कार्यकी उत्पत्तिमें अध्यापक निमित्त तो है पर वह प्रेरक नहीं । ईश्वरको मान्यतामें
प्रेरकतापर बल दिया गया है और यहाँ उपकार प्रकरणमें निमित्तको तो स्वीकार किया गया है
पर उसे प्रेरक नहीं माना है । यहाँ उपकार प्रकरणके ग्रथित करनेका यही अभिप्राय है ।
§ ५६८. यदि ऐसा है कि जो है उसे अवश्य उपकारी होना चाहिए तो काल भी सद्रूप माना
२५ गया है इसलिए उसका क्या उपकार है, इसी बातके बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं ।
वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व ये कालके उपकार हैं ॥२२॥
§ ५६९. णिजन्त 'वर्त' धातुसे कर्म या भावमें 'ल्युट्' प्रत्ययके करनेपर स्त्रीलिंगमें वर्तना
शब्द बनता है । जिसकी व्युत्पत्ति 'वर्त्यते' या 'वर्तनमात्रम्' होती है । यद्यपि धर्मादिक द्रव्य अपनी
नवीन पर्यायके उत्पन्न करनेमें स्वयं प्रवृत्त होते हैं तो भी वह बाह्य सहकारी कारणके बिना नहीं
३० हो सकती इसलिए उसे प्रवर्तानेवाला काल है ऐसा मान कर वर्तना कालका उपकार कहा है ।
शंका-णिजर्थ क्या है ? समाधान -द्रव्यकी पर्याय बदलती है और उसे बदलानेवाला काल है ।
शंका-यदि ऐसा है तो काल क्रियावान् द्रव्य प्राप्त होता है ? जैसे शिष्य पढ़ता है और उपाध्याय
पढ़ाता है । यहाँ उपाध्याय क्रियावान् द्रव्य है ? समाधान- यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि निमित्त-
मात्रमें भी हेतुकर्ता रूप व्यपदेश देखा जाता है । जैसे कंडेकी अग्नि पढ़ाती है । यहाँ कंडेकी अग्नि
३५ निमित्तमात्र है उसी प्रकार काल भी हेतुकर्ता है । शंका- वह काल है यह कैसे जाना जाता है ?
१. -र्त्यते वर्तते वर्तन- मु० । २. कारीषाग्नि-आ० । ३. 'हेतुनिर्देशश्च निमित्तमात्रे भिक्षादिषु दर्शनात् ।
हेतुनिर्देशश्च निमित्तमात्रे द्रष्टव्यः । यावद् ब्रूयान्निमित्तं कारणमिति तावद्धेतुरिति । किं प्रयोजनम् ? भिक्षादिषु
दर्शनात् । भिक्षादिष्वपि णिजृदृश्यते भिक्षा वासयन्ति कारीषोऽग्निरध्यापयति इति ।' -पा० म० भा० ३, १,
२, २६ ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri

– ५।२२ ६ ५६९ ] पञ्चमोऽध्यायः २१७
समयादिभिर्निर्वर्त्यमानानां च पाकादीनां समयः पाक इत्येवमादित्वसंज्ञारूढिसद्भावेऽपि समयः
कालः ओदनपाकः काल इति अध्यारोप्यमाणः कालब्यपदेशस्तद्व्यपदेशनिमित्तस्य कालस्यास्तित्वं
गमयति । कुतः । गौणस्य मुख्यापेक्षत्वात् । द्रव्यस्य पर्यायो धर्मान्तरनिवृत्तिधर्मान्तरोत्पादनरूपः
अपरिस्पन्दात्मकः परिणामः । जीवस्य क्रोधादिः, पुद्गलस्य वर्णादिः । धर्माधर्माकाशानामगुरुलघु-
गुणवृद्धिहानिकृतः । क्रिया परिस्पन्दात्मिका³ । सा द्विविधा; प्रायोगिकवैस्रसिकभेदात् । तत्र प्रायो-
गिकी शकटादीनाम्, वैस्रसिकी मेघादीनाम् । परत्वापरत्वे क्षेत्रकृते कालकृते च स्तः । तत्र कालो-
पैकारप्रकरणात्कालकृते गृह्येते । त एते वर्तनादय उपकाराः कालस्यास्तित्वं गमयन्ति । ननु
'वर्तना'ग्रहणमेवास्तु, तद्भेदाः परिणामादयस्तेषां पृथग्ग्रहणमनर्थकम् । नानर्थकम्; कालद्वयसूच-
नार्थत्वात्प्रपञ्चस्य । कालो हि द्विविधः परमार्थकालो व्यवहारकालश्च । परमार्थकालो वर्तना-
लक्षणः । परिणामादिलक्षणो व्यवहारकालः । अन्येन परिच्छिन्नः अन्यस्य परिच्छेदहेतुः क्रिया- १०
विशेषः काल इति व्यवह्रियते । स त्रिधा व्यवतिष्ठते भूतो वर्तमानो भविष्यन्निति । तत्र परमार्थ-
काले कालव्यपदेशो मुख्यः । भूतादिव्यपदेशो गौणः । व्यवहारकाले भूतादिव्यपदेशो मुख्यः ।
कालव्यपदेशो गौणः; क्रियावद्द्रव्यापेक्षत्वात्कालकृतत्वाच्च । अत्राह, धर्माधर्माकाशपुद्गलजी-
वकालानामपकारा उक्ताः । लक्षणं चोक्तम् 'उपयोगो लक्षणम्' इत्येवमादि । पुद्गलानां तु
समाधान - समयादिक क्रियाविशेषोंकी और समयादिकके द्वारा होनेवाले पाक आदिककी समय, १५
पाक इत्यादिक रूपसे अपनी अपनी रूढ़िक संज्ञाके रहते हुए भी उसमें जो समय काल, ओदनपाक-
काल इत्यादि रूपसे काल संज्ञाका अध्यारोप होता है वह उस संज्ञाके निमित्तभूत मुख्यकालके
अस्तित्वका ज्ञान कराता है क्योंकि गौण व्यवहार मुख्यकी अपेक्षा रखता है। एक धर्मकी निवृत्ति
करके दूसरे धर्मके पैदा करने रूप और परिस्पन्दसे रहित द्रव्यकी जो पर्याय है उसे परिणाम कहते
हैं। यथा जीवके क्रोधादि और पुद्गलके वर्णादि । इसी प्रकार धर्म, अधर्म, आकाश और काल २०
द्रव्यमें परिणाम होता है जो अगुरुलघु गुणकी वृद्धि और हानिसे उत्पन्न होता है। द्रव्यमें जो
परिस्पन्दरूप परिणमन होता है उसे क्रिया कहते हैं। प्रायोगिक और वैस्रसिकके भेदसे वह दो
प्रकारकी है। उनमें-से गाड़ी आदिकी प्रायोगिकी क्रिया है और मेघादिककी वैस्रसिकी । परत्व
और अपरत्व दो प्रकारका है- क्षेत्रकृत और कालकृत । प्रकृतमें कालकृत उपकारका
प्रकरण है इसलिए कालकृत परत्व और अपरत्व लिये गये हैं। ये सब वर्तनादिक उपकार २५
कालके अस्तित्वका ज्ञान कराते हैं। शंका - सूत्रमें केवल वर्तना पदका ग्रहण करना पर्याप्त है।
परिणाम आदिक उसके भेद हैं अतः उनका अलगसे ग्रहण करना निष्फल है । समाधान - परिणाम
आदिकका अलगसे ग्रहण करना निष्फल नहीं है, क्योंकि दो प्रकारके कालके सूचन करनेके लिए
इतना विस्तारसे कथन किया है। काल दो प्रकारका है-- परमार्थ काल और व्यवहारकाल ।
इनमें-से परमार्थ काल वर्तना लक्षणवाला है और परिणाम आदि लक्षणवाला व्यवहार काल है। ३०
तात्पर्य यह है कि जो क्रिया विशेष अन्यसे परिच्छिन्न होकर अन्यके परिच्छेदका हेतु है उसमें
काल इस प्रकारका व्यवहार किया गया है। वह काल तीन प्रकारका है- भूत, वर्तमान और
भविष्यत् । उनमें-से परमार्थ कालमें काल यह संज्ञा मुख्य है और भूतादिक व्यपदेश गौण है।
तथा व्यवहार कालमें भूतादिक रूप संज्ञा मुख्य है और काल संज्ञा गौण है; क्योंकि इस प्रकारका
व्यवहार क्रियावाले द्रव्यकी अपेक्षासे होता है तथा कालका कार्य है। यहाँ पर शंकाकार कहता ३५
है कि धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल, जीव और काल द्रव्यका उपकार कहा तथा 'उपयोगो
१. -द्विष्वसंज्ञा-मु० । २. पाककालः मु० । ३. -त्मिका । परत्वापरत्वे ता० । ४. कालोपकरणा-मु० ।
२८

सामान्यलक्षणमुक्तम्¹ 'अजीवकायाः' इति । विशेषलक्षणं नोक्तम् । तत्किमित्यत्रोच्यते—
स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः ॥२३॥
§ ५७०. स्पृश्यते स्पर्शनमात्रं वा स्पर्शः । सोऽष्टविधः; मृदुकठिनगुरुलघुशीतोष्णस्निग्धरूक्ष-
भेदात् । रस्यते रसनमात्रं वा रसः । स पञ्चविधः; तिक्ताम्लकठुकमधुरकषायभेदात् । गन्ध्यते
गन्धनमात्रं वा गन्धः । स द्वेधा; सुरभिरसुरभिरिति । वर्ण्यते वर्णनमात्रं वा वर्णः । स पञ्चविधः;
कृष्णनीलपीतशुक्लोहितभेदात् । त एते मूलभेदाः प्रत्येकं संख्येयासंख्येयानन्तभेदाश्च भवन्ति ।
स्पर्शाश्च रसाश्च गन्धश्च वर्णाश्च स्पर्शरसगन्धवर्णास्त एतेषां सन्तीति स्पर्शरसगन्धवर्णवन्त इति ।
नित्ययोगे ³मतुन्निर्देशः । यथा क्षीरिणो न्यग्रोधा इति । ननु च रूपिणः पुद्गला इत्यत्र पुद्गलानां
रूपवत्त्वमुक्तं तदविनाभाविनश्च रसादयस्तत्रैव परिगृहीता इति व्याख्यातं तस्मात्तेनैव पुद्गलानां
रूपादिमत्त्वसिद्धेः सूत्रमिदमनर्थकमिति । नैष दोषः; 'नित्यावस्थितान्यरूपणि' इत्यत्र धर्मादीनां
[L11

  • ५।२४ § ५७२ ] पञ्चमोऽध्यायः २१९

§ ५७१. अवशिष्टपुद्गलविकारप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतवन्तश्च ॥२४॥
§ ५७२. शब्दो द्विविधो भाषालक्षणो विपरीतश्चेति । भाषालक्षणो द्विविधः साक्षरोऽनक्षर-
श्चेति । अक्षरीकृतः शास्त्राभिव्यञ्जकः संस्कृतविपरीतभेदार्यम्लेच्छव्यवहारहेतुः । अनक्षरात्मको
द्वीन्द्रियादीनामतिशयज्ञानस्वरूपप्रतिपादनहेतुः । स एष सर्वः प्रायोगिकः । अभाषात्मको द्विविधः ५
प्रायोगिको वैस्रसिकश्चेति । वैस्रसिको वलाहकादिप्रभवः । प्रायोगिकश्चतुर्धा, ततविततघनशौषिर-
भेदात् । तत्र चर्मतानननिमित्तः पुष्करभेरीदर्दुरादिप्रभवस्ततः । तन्त्रीकृतवीणासुघोषादिसमुद्भवो
विततः । तालघण्टालालनाभिघातो घनः । वंशशङ्खादिनिमित्तः सौषिरः। बन्धो द्विविधो
वैस्रसिकः प्रायोगिकश्च । पुरुषप्रयोगानपेक्षो वैस्रसिकः । तद्यथा—स्निग्धरूक्षत्वगुणनिमित्तो
विद्युदुल्काजलधाराग्नीन्द्रधनुरादिविषयः । पुरुषप्रयोगनिमित्तः प्रायोगिकः अजीवविषयो जीवाजीव- १०
विषयश्चेति द्विधा भिन्नः । तत्राजीवविषयो जतुकाष्ठादिलक्षणः । जीवाजीवविषयः कर्मनोकर्मबन्धः ।
सौक्ष्म्यं द्विविधं, अन्त्यमापेक्षिकं च । तत्रान्त्यं परमाणूनाम् । आपेक्षिकं विल्वामलकबदरादीनाम् ।
स्थौल्यमपि द्विविधमन्त्यमापेक्षिकं चेति । तत्रान्त्यं जगद्व्यापिनि महास्कन्धे । आपेक्षिकं बदराम-
लकविल्वतालादिषु । संस्थानमाकृतिः । तद् द्विविधमित्थंलक्षणमनित्थंलक्षणं चेति । वृत्तत्र्यस्रचतु-
§ ५७१. अब पुद्गलोंकी शेष रहीं पर्यायोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— १५
तथा वे शब्द, बन्ध, सूक्ष्मत्व, स्थूलत्व, संस्थान, भेद, अन्धकार, छाया, आतप और
उद्योतवाले होते हैं ॥२४॥
§ ५७२. भाषारूप शब्द और अभाषारूप शब्द इस प्रकार शब्दोंके दो भेद हैं। भाषात्मक
शब्द दो प्रकारके हैं—साक्षर और अनक्षर । जिसमें शास्त्र रचे जाते हैं और जिससे आर्य और
म्लेच्छोंका व्यवहार चलता है ऐसे संस्कृत शब्द और इससे विपरीत शब्द ये सब साक्षर शब्द हैं । २०
जिससे उनके सातिशय ज्ञानके स्वरूपका पता लगता है ऐसे दो इन्द्रिय आदि जीवोंके शब्द
अनक्षरात्मक शब्द हैं। ये दोनों प्रकारके शब्द प्रायोगिक हैं। अभाषात्मक शब्द दो प्रकारके हैं—
प्रायोगिक और वैस्रसिक । मेघ आदि के निमित्तसे जो शब्द उत्पन्न होते हैं वे वैस्रसिक शब्द हैं।
तथा तत, वितत, घन और शौषिरके भेदसे प्रायोगिक शब्द चार प्रकारके हैं। चमड़ेसे मढ़े हुए
पुष्कर, भेरी और दर्दुरसे जो शब्द उत्पन्न होता है वह तत शब्द है। तांतवाले वीणा और २५
सुघोष आदिसे जो शब्द उत्पन्न होता है यह वितत शब्द है। ताल, घण्टा और लालन आदिके
ताड़नसे जो शब्द उत्पन्न होता है वह घन शब्द है। तथा बांसुरी और शंख आदिके फूँकनेसे जो
शब्द उत्पन्न होता है वह शौषिर शब्द है। बन्धके दो भेद हैं—वैस्रसिक और प्रायोगिक । जिसमें
पुरुषका प्रयोग अपेक्षित नहीं है वह वैस्रसिक बन्ध है । जैसे, स्निग्ध और रूक्ष गुणके निमित्तसे
होनेवाला बिजली, उल्का, मेघ, अग्नि और इन्द्रधनुष आदिका विषयभूत बन्ध वैस्रसिक बन्ध है। ३०
और जो बन्ध पुरुषके प्रयोगके निमित्तसे होता है वह प्रायोगिक बन्ध है। इसके दो भेद हैं—
अजीवसम्बन्धी और जीवाजीवसम्बन्धी । लाख और लकड़ी आदिका अजीव सम्बन्धी प्रायोगिक
बन्ध है। तथा कर्म और नोकर्मका जो जीवसे बन्ध होता है वह जीवाजीवसम्बन्धी प्रायोगिक बन्ध
है। सूक्ष्मताके दो भेद हैं—अन्त्य और आपेक्षिक । परमाणुओंमें अन्त्य सूक्ष्मत्व है। तथा बेल,
आंवला और बेर आदिमें आपेक्षिक सूक्ष्मत्व है । स्थौल्य भी दो प्रकारका है—अन्त्य और आपेक्षिक । ३५
जगद्व्यापी महास्कन्धमें अन्त्य स्थौल्य है । तथा बेर, आंवला और बेल आदिमें आपेक्षिक स्थौल्य
है। संस्थानका अर्थ आकृति है। इसके दो भेद हैं—इत्थंलक्षण और अनित्थंलक्षण । जिसके विषय-
में 'यह संस्थान इस प्रकारका है' यह निर्देश किया जा सके वह इत्थंलक्षण संस्थान है। वृत्त,

रत्रायतपरिमण्डलादीनामित्थंलक्षणम् । अतोऽन्यन्मेघादीनां संस्थानमनेकविधमित्यमिदमिति निरू-
पणभावादनित्थंलक्षणम् । भेदाः षोढा; उत्करचूर्णखण्डचूर्णिकाप्रतराणुचटनविकल्पात् । तत्रोत्करः
काष्ठादीनां करपत्रादिभिरुत्करणम् । चूर्णो यवगोधूमादीनां सक्तुकणिकादिः । खण्डो घटादीनां
कपालशर्करादिः । चूर्णिका माषमुद्गादीनाम् । प्रतरोऽभ्रपटलादीनाम् । अणुचटनं सन्तप्तायः-
पिण्डादिषु अयोगनादिभिरभिहन्यमानेषु स्फुलिङ्गनिर्गमः । तमो दृष्टिप्रतिबन्धकारणं प्रकाश-
विरोधि । छाया प्रकाशावरणनिमित्ता । सा द्वेधा, वर्णादिविकारपरिणता प्रतिबिम्बमात्रात्मिका
चेति । आतप आदित्यादिनिमित्त उष्णप्रकाशलक्षणः । उद्योतश्चन्द्रमणिखद्योतादिप्रभवः प्रकाशः ।
त एते शब्दादयः पुद्गलद्रव्यविकाराः । त एषां सन्तीति शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छा-
यातपोद्योतवन्तः पुद्गला इत्यभिसंबध्यते । 'च'शब्देन नोदनाभिघातादयः पुद्गलपरिणामा आगमे
प्रसिद्धाः समुच्चीयन्ते ।
§ ५७३. उक्तानां पुद्गलानां भेदप्रदर्शनार्थमाह—
अणवः स्कन्धाश्च ॥२५॥
§ ५७४. प्रदेशमात्रभाविस्पर्शादिपर्यायप्रसवसामर्थ्येनाण्यन्ते शब्द्यन्त इत्यणवः । सौक्ष्म्यादा-
त्मादय आत्ममध्या आत्मान्ताश्च ॥ उक्तं च—
त्रिकोण, चतुष्कोण, आयत और परिमण्डल आदि ये सब इत्थंलक्षण संस्थान हैं । तथा इससे
अतिरिक्त मेघ आदिके आकार जो कि अनेक प्रकारके हैं और जिनके विषयमें यह इस प्रकारका
है यह नहीं कहा जा सकता वह अनित्थंलक्षण संस्थान है। भेदके छह भेद हैं—उत्कर, चूर्ण, खण्ड,
चूर्णिका, प्रतर और अणुचटन । करौंत आदिसे जो लकड़ी आदिको चीरा जाता है वह उत्कर
नामका भेद है। जौ और गेहूँ आदिका जो सत्तू और कनक आदि बनता है वह चूर्ण नामका भेद
है । घट आदिके जो कपाल और शर्करा आदि टुकड़े होते हैं वह खण्ड नामका भेद है। उड़द और
मूंग आदिका जो खण्ड किया जाता है वह चूर्णिका नामका भेद है। मेघके जो अलग अलग पटल
आदि होते हैं वह प्रतर नामका भेद है । तपाये हुए लोहेके गोले आदिको घन आदिसे पीटने पर
जो फुलंगे निकलते हैं वह अणुचटन नामका भेद है। जिससे दृष्टिमें प्रतिबन्ध होता है और जो
प्रकाशका विरोधी है वह तम कहलाता है। प्रकाशको रोकनेवाले पदार्थोंके निमित्तसे जो पैदा होती
है वह छाया कहलाती है । उसके दो भेद हैं—एक तो वर्णादिके विकार रूपसे परिणत हुई और
दूसरी प्रतिबिम्बरूप । जो सूर्यके निमित्तसे उष्ण प्रकाश होता है उसे आतप कहते हैं। तथा चन्द्र
मणि और जुगनू आदिके निमित्तसे जो प्रकाश पैदा होता है उसे उद्योत कहते हैं। ये सब शब्दादिक
पुद्गल द्रव्यके विकार (पर्याय) हैं। इसीलिए सूत्रमें पुद्गलको इन शब्द, बन्ध, सौक्ष्म्य, स्थौल्य,
संस्थान, भेद, तम, छाया, आतप और उद्योतवाला कहा है । सूत्रमें दिये हुए 'च' शब्द से नोदन
अभिघात आदिक जो पुद्गलकी पर्यायें आगममें प्रसिद्ध हैं उनका संग्रह करना चाहिए।
§ ५७३. अब पूर्वोक्त पुद्गलोंके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पुद्गल के दो भेद हैं—अणु और स्कन्ध ॥ २५ ॥
§ ५७४. एक प्रदेशमें होनेवाले स्पर्शादि पर्यायको उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य रूपसे जो
'अण्यन्ते' अर्थात् कहे जाते हैं वे अणु कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि अणु एकप्रदेशी होनेसे सबसे
छोटा होता है इसलिए वह अणु कहलाता है। यह इतना सूक्ष्म होता है जिससे वही आदि है, वही
मध्य है और वही अन्त है। कहा भी है—

  • ५।२६ § ५७६ ] पञ्चमोऽध्यायः २२१
    "अत्तादि अत्तमज्झं अत्तंतं णेव इंदिये गेज्झं ।
    जं दव्वं अविभागी तं परमाणुं विआणाहि ।"
    स्थूलभावेन ग्रहणनिक्षेपणादिव्यापारस्कन्धनात्स्कन्धा इति संज्ञायन्ते । रूढौ क्रिया क्वचि-
    त्सती उपलक्षणत्वेनाश्रीयते इति ग्रहणादिव्यापारारोग्येष्वपि द्वयणुकादिषु स्कन्धाख्या प्रवर्तते ।
    अनन्तभेदा अपि पुद्गला अणुजात्या स्कन्धजात्या च द्वैविध्यमापद्यमानाः सर्वे गृह्यन्त इति ५
    तज्जात्याधारानन्तभेदसंसूचनार्थं बहुवचनं क्रियते । अणवः स्कन्धा इति भेदाभिधानं पूर्वोक्तसूत्रद्वय-
    भेदसंबन्धनार्थम् । स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तोऽणवः । स्कन्धाः पुनः शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेद-
    तमश्छायातपोद्योतवन्तश्च स्पर्शादिमन्तश्चेति ।
    § ५७५. आह, किमेषां पुद्गलानामणुस्कन्धलक्षणः परिणामोऽनादिरुत आदिमानित्युच्यते ।
    स खलूत्पत्तिमत्त्वादादिमान्प्रतिज्ञायते । यद्येवं तस्मादभिधीयतां कस्मान्निमित्तादुत्पद्यन्त इति । तत्र १०
    स्कन्धानां तावदुत्पत्तिहेतुप्रतिपादनार्थमुच्यते—
    भेदसंघातेभ्य उत्पद्यन्ते ॥२६॥
    § ५७६. संघातानां द्वितयनिमित्तवशाद्विदारणं भेदः । पृथग्भूतानामेकत्वापत्तिः संघातः ।
    ननु च द्वित्वाद् द्विवचनेन भवितव्यम् । बहुवचननिर्देशस्त्रितयसंग्रहार्थः । भेदात्संघाताद् भेदसंघा-
    ताभ्यां च उत्पद्यन्त इति । तद्यथा—द्वयोः परमाण्वोः संघाताद् द्विप्रदेशः स्कन्ध उत्पद्यते । १५
    'जिसका आदि, मध्य और अन्त एक है, और जिसे इन्द्रियां नहीं ग्रहण कर सकतीं ऐसा
    जो विभाग रहित द्रव्य है उसे परमाणु समझो ।'
    जिनमें स्थूल रूपसे पकड़ना, रखना आदि व्यापारका स्कन्धन अर्थात् संघटना होती है वे
    स्कन्ध कहे जाते हैं। रूढ़िमें क्रिया कहीं पर होती है, सर्वत्र नहीं। फिर भी उपलक्षणरूपसे वह ली
    जाती है, इसलिए ग्रहण आदि व्यापारके अयोग्य द्वयणुक आदिकमें भी स्कन्ध संज्ञा प्रवृत्त होती २०
    है। पुद्गलोंके अनन्त भेद हैं तो भी वे सब अणुजाति और स्कन्धजातिके भेदसे दो प्रकारके हैं।
    इस प्रकार पुद्गलोंकी इन दोनों जातियोंके आधारभूत अनन्त भेदोंके सूचन करनेके लिए सूत्रमें
    बहुवचनका निर्देश किया है। यद्यपि सूत्रमें अणु और स्कन्ध इन दोनों पदोंको समसित रखा जा
    सकता था तब भी ऐसा न करके 'अणवः स्कन्धाः' इस प्रकार भेद रूपसे जो कथन किया है वह
    इस सूत्रसे पहले कहे गये दो सूत्रोंके साथ अलग अलग सम्बन्ध बतलानेके लिए किया है। २५
    जिससे यह ज्ञात हो कि अणु स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णवाले हैं परन्तु स्कन्ध शब्द, बन्ध, सौक्ष्म्य,
    स्थौल्य, संस्थान, भेद, छाया, आतप और उद्योतवाले हैं तथा स्पर्शादिवाले भी हैं।
    § ५७५. इन पुद्गलोंका अणु और स्कन्धरूप परिणाम होना अनादि है या सादि ? वह
    उत्पन्न होता इसलिए सादि है। यदि ऐसा है तो उस निमित्तका कथन करो जिससे अणु और
    स्कन्ध ये भेद उत्पन्न होते हैं ? इसलिए पहले स्कन्धोंकी उत्पत्तिके हेतुका कथन करनेके लिए ३०
    आगेका सूत्र कहते हैं—
    भेदसे, संघातसे तथा भेद और संघात दोनोंसे स्कन्ध उत्पन्न होते हैं ।।२६।।
    § ५७६. अन्तरंग और बहिरंग इन दोनों प्रकारके निमित्तोंसे संघातोंके विदारण करनेको
    भेद कहते हैं। तथा पृथग्भूत हुए पदार्थोंके एकरूप हो जानेको संघात कहते हैं। शंका—भेद और
    संघात दो हैं इसलिए सूत्रमें द्विवचन होना चाहिए ? समाधान—तीनका संग्रह करनेके लिए सूत्रमें ३५
    बहुवचनका निर्देश किया है। जिससे यह अर्थ सम्पन्न होता है कि भेदसे, संघातसे तथा भेद और
    १. तृतीय-मु० ।

२२२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।२७ § ५७७ –

द्विप्रदेशस्याणोश्च त्रयाणां वा अणूनां संघातात्त्रिप्रदेशः । द्वयोर्द्विप्रदेशयोस्त्रिप्रदेशस्याणोश्च
चतुर्णां वा अणूनां संघाताचतुःप्रदेशः । एवं संख्येयासंख्येयानन्तानामनन्तानन्तानां च
संघातात्तावत्प्रदेशः। एषामेव भेदात्तावद्² द्विप्रदेशपर्यन्ताः स्कन्धा उत्पद्यन्ते । एवं भेदसंघाताभ्या-
मेकसमयिकाभ्यां द्विप्रदेशादयः स्कन्धा उत्पद्यन्ते । अन्यतो भेदेनान्यस्य संघातेनेति । एवं स्कन्धा-
नामुत्पत्तिहेतुरुक्तः।
§ ५७७. अणोरुत्पत्तिहेतुप्रदर्शनार्थमाह—
भेदादणुः ॥२७॥
§ ५७८. "सिद्धे ³ विधिरारभ्यमाणो नियमार्थो भवति ।” अणोरुत्पत्तिर्भेदादेव, न संघाता-
न्नापि भेदसंघाताभ्यामिति ।
§ ५७९. आह, संघातादेव स्कन्धानामात्मलाभे सिद्धे भेदसंघातग्रहणमनर्थकमिति तद्ग्रहण-
प्रयोजनप्रतिपादनार्थमिदमुच्यते—
भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः ॥२८॥
§ ५८०. अनन्तानन्तपरमाणुसमुदयनिष्पाद्योऽपि कश्चिच्चाक्षुषः कश्चिदचाक्षुषः । तत्र
योऽचाक्षुषः स कथं चाक्षुषो भवतीति चेदुच्यते—भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः । न भेदादिति । कात्रोप-
संघात इन दोनोंसे स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। खुलासा इस प्रकार है—दो परमाणुओंके संघातसे दो
प्रदेशवाला स्कन्ध उत्पन्न होता है। दो प्रदेशवाले स्कन्ध और अणुके संघातसे या तीन अणुओंके
संघातसे तीन प्रदेशवाला स्कन्ध उत्पन्न होता है। दो प्रदेशवाले दो स्कन्धोंके संघातसे, तीन
प्रदेशवाले स्कन्ध और अणुके संघातसे या चार अणुओंके संघातसे चार प्रदेशवाला स्कन्ध उत्पन्न
होता है। इस प्रकार संख्यात, असंख्यात, अनन्त और अनन्तानन्त अणुओंके संघातसे उतने उतने
प्रदेशोंवाले स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। तथा इन्हीं संख्यात आदि परमाणुवाले स्कन्धोंके भेदसे दो
प्रदेशवाले स्कन्ध तक स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार एक समयमें होनेवाले भेद और संघात
इन दोनोंसे दो प्रदेशवाले आदि स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य यह है कि जब अन्य स्कन्धसे
भेद होता है और अन्यका संघात, तब एक साथ भेद और संघात इन दोनोंसे भी स्कन्धकी उत्पत्ति
होती है। इस प्रकार स्कन्धोंकी उत्पत्तिका कारण कहा।
§ ५७७. अब अणुकी उत्पत्तिके हेतुको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भेदसे अणु उत्पन्न होता है ॥२७॥
§ ५७८. कोई विधि सिद्ध हो, फिर भी यदि उसका आरम्भ किया जाता है तो वह नियम
के लिए होती है। तात्पर्य यह है कि अणु भेदसे होता है यद्यपि यह सिद्ध है फिर भी 'भेदादणुः'
इस सूत्रके निर्माण करनेसे यह नियम फलित होता है कि अणुकी उत्पत्ति भेदसे ही होती है। न
संघातसे होती है और न भेद और संघात इन दोनोंसे ही होती है।
§ ५७९. जब संघातसे ही स्कन्धोंकी उत्पत्ति होती है तब सूत्रमें भेद और संघात इन दोनों
पदोंका ग्रहण करना निष्फल है ? अतः इन दोनों पदोंके ग्रहण करनेका क्या प्रयोजन है इसका
कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भेद और संघातसे चाक्षुष स्कन्ध बनता है ॥२८॥
§ ५८०. अनन्तानन्त परमाणुओंके समुदायसे निष्पन्न होकर भी कोई स्कन्ध चाक्षुष होता
है और कोई अचाक्षुष । उसमें जो अचाक्षुष स्कन्ध है वह चाक्षुष कैसे होता है इसी बातके बतलाने


१. –ख्येयानन्तानां च संघा–ता०, ना० । २. भेदाद्द्विप्रदे–ता०, आ०, दि० १, दि० २ । ३. ‘सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः’ न्यायसंग्रहः ।

– ५।३० § ५८४ ] पञ्चमोऽध्यायः २२३
पत्तिरिति चेत् । ब्रूमः; सूक्ष्मपरिणामस्य स्कन्धस्य भेदे सौक्ष्म्यापरित्यागादचाक्षुषत्वमेव । सौक्ष्म्य-
परिणतः पुनरपरः सत्यपि तद्भेदेऽन्यसंघातान्तरसंयोगात्सौक्ष्म्यपरिणामोपरमे स्थौल्योत्पत्तौ
चाक्षुषो भवति ।
§ ५८१. आह, धर्मादीनां द्रव्याणां विशेषलक्षणान्युक्तानि, सामान्यलक्षणं नोक्तम्, तद्वक्त-
व्यम् । उच्यते—
सद् द्रव्यलक्षणम् ॥२९॥
§ ५८२. यत्सत्तद् द्रव्यमित्यर्थः ।
§ ५८३. यद्येवं तदेव तावद्वक्तव्यं किं सत् । इत्यत आह—
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥३०॥
§ ५८४. चेतनस्याचेतनस्य वा द्रव्यस्य स्वां जातिमजहत उभयनिमित्तवशाद् भावान्तरा- १०
वाप्तिरूपादनमुत्पादः मृत्पिण्डस्य घटपर्यायवत् । तथा पूर्वभावविगमनं व्ययः । यथा घटोत्पत्तौ
पिण्डाकृतेः । अनादिपारिणामिकस्वभावेन व्ययोदयाभावाद् ध्रुवति स्थिरीभवतीति ध्रुवः । ध्रुवस्य
भावः कर्म वा ध्रौव्यम् । यथा मृत्पिण्डघटाद्यवस्थासु मृदाद्यन्वयः । तैरुत्पादव्ययध्रौव्यैर्युक्तं २
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सदिति । आह, भेदे सति युक्तशब्दो दृष्टः । यथा दण्डेन युक्तो देवदत्त इति ।
तथा सति तेषां त्रयाणां तैर्युक्तस्य द्रव्यस्य चाभावः प्राप्नोति । नैष दोषः; अभेदेऽपि कथंचिद् भेद- १५
लिए यह कहा है कि भेद और संघातसे चाक्षुष स्कन्ध होता है, केवल भेदसे नहीं, यह इस सूत्रका
अभिप्राय है । शंका—इसका क्या कारण है ? समाधान—आगे उसी कारणको बतलाते हैं—सूक्ष्म-
परिणामवाले स्कन्धका भेद होनेपर वह अपनी सूक्ष्मताको नहीं छोड़ता इसलिए उसमें अचाक्षुषपना
ही रहता है । एक दूसरा सूक्ष्मपरिणामवाला स्कन्ध है जिसका यद्यपि भेद हुआ तथापि उसका
दूसरे संघातसे संयोग हो गया अतः सूक्ष्मपना निकलकर उसमें स्थूलपनेकी उत्पत्ति हो जाती है २०
और इसलिए वह चाक्षुष हो जाता है ।
§ ५८१. धर्मादिक द्रव्यके विशेष लक्षण कहे, सामान्य लक्षण नहीं कहा, जो कहना चाहिए
इसलिए सूत्र द्वारा सामान्य लक्षण कहते हैं—
द्रव्यका लक्षण सत् है ॥२९॥
§ ५८२. जो सत् है वह द्रव्य है यह इस सूत्रका भाव है। २५
§ ५८३. यदि ऐसा है तो यही कहिए कि सत् क्या है ? इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य इन तीनोंसे युक्त अर्थात् इन तीनोंरूप है वह सत् है ॥३०॥
§ ५८४. द्रव्य दो हैं—चेतन और अचेतन । वे अपनी जातिको तो कभी नहीं छोड़ते फिर
भी उनमें अन्तरंग और बहिरंग निमित्तके वशसे प्रति समय जो नवीन अवस्थाकी प्राप्ति होती है
उसे उत्पाद कहते हैं। जैसे मिट्टीके पिण्डकी घट पर्याय । तथा पूर्व अवस्थाके त्यागको व्यय कहते ३०
हैं । जैसे घटकी उत्पत्ति होनेपर पिण्डरूप आकारका त्याग तथा जो अनादिकालीन पारिणामिक
स्वभाव है उसका व्यय और उदय नहीं होता किन्तु वह 'ध्रुवति' अर्थात् स्थिर रहता है इसलिए
उसे ध्रुव कहते हैं। तथा इस ध्रुवका भाव या कर्म ध्रौव्य कहलाता है। जैसे मिट्टीके पिण्ड
और घटादि अवस्थाओंमें मिट्टीका अन्वय बना रहता है। इस प्रकार इन उत्पाद, व्यय और
ध्रौव्यसे जो युक्त है वह सत् है । शंका—भेदके रहते हुए युक्त शब्द देखा जाता है। जैसे दण्डसे ३५
युक्त देवदत्त । यहाँ दण्ड और देवदत्तमें भेद है । प्रकृतमें भी यदि ऐसा मान लिया जाय तो उन
१. –जहत निमित्त-आ०, दि० १, दि० २ । २. -ध्रौव्यैर्युक्तं सदिति मु० ।