सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ५।१५ § ५५५ ] पञ्चमोऽध्यायः २०७
एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥१४॥
§ ५५३. एकः प्रदेश एकप्रदेशः । एकप्रदेश आदिर्येषां त इमे एकप्रदेशादयः । तेषु पुद्ग-
लानामवगाहो भाज्यो विकल्प्यः । “अवयवेन विग्रहः समुदायः समासार्थः” $^२$ इति एकप्रदेशोऽपि
गृह्यते । तद्यथा—एकस्मिन्नाकाशप्रदेशे परमाणोरवगाहः । द्वयोरेकत्रोभयत्र च बद्धयोरबद्धयोश्च ।
त्रयाणामप्येकत्र द्वयोस्त्रिषु च बद्धानामबद्धानां च । एवं संख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशानां स्कन्धानामे-
कसंख्येयासंख्येयप्रदेशेषु लोकाकाशेऽवस्थानं प्रत्येत्तव्यम् । ननु युक्तं तावदमूर्त्तयोर्धर्माधर्मयोरेकत्रा-
विरोधेनावरोध इति । मूर्त्तिमतां पुद्गलानां कथम् । इत्यत्रोच्यते-अवगाहनस्वभावत्वात्सूक्ष्मपरि-
णामाच्च मूर्तिमनामप्यवगाहो न विरुध्यते एकापवरके अनेकदीपप्रकाशावस्थानवत् । आगम-
प्रामाण्याच्च तथाऽध्यवसेयम् । तदुक्तम्—
“ओगाढगाढणिचिओ पुग्गलकाएहि संव्वदो लोगो ।
सुहुमेहिं बादरेहिं अणंताणंतेहिं विवहेहिं ॥”
§ ५५४. अथ जीवानां कथमवगानमित्यत्रोच्यते—
असंख्येयभागादिषु जीवानाम् ॥१५॥
§ ५५५. ‘लोकाकाशे’ इत्यनुवर्तते । तस्यासंख्येयभागीकृतस्यैको भागोऽसंख्येयभाग इत्यु-
च्यते । स आदिर्येषां तेऽसंख्येयभागादयः । तेषु जीवानागवगाहो वेदितव्यः । तद्यथा—एकस्मिन्न-
पुद्गलोंका अवगाह लोकाकाशके एक प्रदेश आदिमें विकल्पसे होता है ॥१४॥
§ ५५३. एक और प्रदेश इन दोनोंका द्वन्द्व समास है । जिनके आदिमें एक प्रदेश है वे एक
प्रदेश आदि कहलाते हैं। उनमें पुद्गलोंका अवगाह विकल्पसे है। यहाँ पर विग्रह अवयवके साथ
है किन्तु समासार्थ समुदायरूप लिया है इसलिए एक प्रदेशका भी ग्रहण होता है। खुलासा इस
प्रकार है—आकाशके एक प्रदेशमें एक परमाणुका अवगाह है। बन्धको प्राप्त हुए या खुले हुए दो
परमाणुओंका आकाशके एक प्रदेशमें या दो प्रदेशोंमें अवगाह है। बन्धको प्राप्त हुए या खुले हुए
तीन परमाणुओंका आकाशके एक, दो या तीन प्रदेशोंमें अवगाह है। इसी प्रकार संख्यात, असंख्यात
और अनन्त प्रदेशवाले स्कन्धोंका लोकाकाशके एक, संख्यात और असंख्यात प्रदेशोंमें अवगाह
जानना चाहिए । शंका—यह तो युक्त है कि धर्म और अधर्म द्रव्य अमूर्त हैं इसलिए उनका एक
जगह बिना विरोधके रहना बन जाता है किन्तु पुद्गल मूर्त हैं इसलिए उनका बिना विरोधके
एक जगह रहना कैसे बन सकता है ? समाधान—इनका अवगाहन स्वभाव है और सूक्ष्म रूपसे
परिणमन हो जाता है इसलिए एक झक्कनमें जिस प्रकार अनेक दीपकोंका प्रकाश रह जाता है
उसी प्रकार मूर्त्तमान् पुद्गलोंका एक जगह अवगाह विरोधको प्राप्त नहीं होता । तथा आगम
प्रमाणसे यह बात जानी जाती है। कहा भी है—
§ ५५४. अब जीवोंका अवगाह किस प्रकार है इस बातको अगले सूत्रमें कहते हैं—
'लोक सूक्ष्म और स्थूल अनन्तानन्त नाना प्रकारके पुद्गलकायोंसे चारों ओरसे खचाखच
भरा है।'
जीवोंका अवगाह लोकाकाशके असंख्यातवें भाग आदिमें है ॥१५॥
§ ५५५. इस सूत्रमें ‘लोकाकाशे' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। उसके असंख्यात भाग
करके जो एक भाग प्राप्त हो वह असंख्यातवाँ भाग कहलाता है। वह जिनके आदिमें है वे सब
असंख्यातवें भाग आदि हैं । उनमें जीवोंका अवगाह जानना चाहिए। स्पष्ट इस प्रकार है—
१. एक एव प्रदेशः मु० । २. पा० म० मा० २, २, २४ । ३. -याणामेकत्र मु०, ता० । ४. पंचत्थि०
गा० ६४ ।