सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- ५।२४ § ५७२ ] पञ्चमोऽध्यायः २१९
§ ५७१. अवशिष्टपुद्गलविकारप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायातपोद्योतवन्तश्च ॥२४॥
§ ५७२. शब्दो द्विविधो भाषालक्षणो विपरीतश्चेति । भाषालक्षणो द्विविधः साक्षरोऽनक्षर-
श्चेति । अक्षरीकृतः शास्त्राभिव्यञ्जकः संस्कृतविपरीतभेदार्यम्लेच्छव्यवहारहेतुः । अनक्षरात्मको
द्वीन्द्रियादीनामतिशयज्ञानस्वरूपप्रतिपादनहेतुः । स एष सर्वः प्रायोगिकः । अभाषात्मको द्विविधः ५
प्रायोगिको वैस्रसिकश्चेति । वैस्रसिको वलाहकादिप्रभवः । प्रायोगिकश्चतुर्धा, ततविततघनशौषिर-
भेदात् । तत्र चर्मतानननिमित्तः पुष्करभेरीदर्दुरादिप्रभवस्ततः । तन्त्रीकृतवीणासुघोषादिसमुद्भवो
विततः । तालघण्टालालनाभिघातो घनः । वंशशङ्खादिनिमित्तः सौषिरः। बन्धो द्विविधो
वैस्रसिकः प्रायोगिकश्च । पुरुषप्रयोगानपेक्षो वैस्रसिकः । तद्यथा—स्निग्धरूक्षत्वगुणनिमित्तो
विद्युदुल्काजलधाराग्नीन्द्रधनुरादिविषयः । पुरुषप्रयोगनिमित्तः प्रायोगिकः अजीवविषयो जीवाजीव- १०
विषयश्चेति द्विधा भिन्नः । तत्राजीवविषयो जतुकाष्ठादिलक्षणः । जीवाजीवविषयः कर्मनोकर्मबन्धः ।
सौक्ष्म्यं द्विविधं, अन्त्यमापेक्षिकं च । तत्रान्त्यं परमाणूनाम् । आपेक्षिकं विल्वामलकबदरादीनाम् ।
स्थौल्यमपि द्विविधमन्त्यमापेक्षिकं चेति । तत्रान्त्यं जगद्व्यापिनि महास्कन्धे । आपेक्षिकं बदराम-
लकविल्वतालादिषु । संस्थानमाकृतिः । तद् द्विविधमित्थंलक्षणमनित्थंलक्षणं चेति । वृत्तत्र्यस्रचतु-
§ ५७१. अब पुद्गलोंकी शेष रहीं पर्यायोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं— १५
तथा वे शब्द, बन्ध, सूक्ष्मत्व, स्थूलत्व, संस्थान, भेद, अन्धकार, छाया, आतप और
उद्योतवाले होते हैं ॥२४॥
§ ५७२. भाषारूप शब्द और अभाषारूप शब्द इस प्रकार शब्दोंके दो भेद हैं। भाषात्मक
शब्द दो प्रकारके हैं—साक्षर और अनक्षर । जिसमें शास्त्र रचे जाते हैं और जिससे आर्य और
म्लेच्छोंका व्यवहार चलता है ऐसे संस्कृत शब्द और इससे विपरीत शब्द ये सब साक्षर शब्द हैं । २०
जिससे उनके सातिशय ज्ञानके स्वरूपका पता लगता है ऐसे दो इन्द्रिय आदि जीवोंके शब्द
अनक्षरात्मक शब्द हैं। ये दोनों प्रकारके शब्द प्रायोगिक हैं। अभाषात्मक शब्द दो प्रकारके हैं—
प्रायोगिक और वैस्रसिक । मेघ आदि के निमित्तसे जो शब्द उत्पन्न होते हैं वे वैस्रसिक शब्द हैं।
तथा तत, वितत, घन और शौषिरके भेदसे प्रायोगिक शब्द चार प्रकारके हैं। चमड़ेसे मढ़े हुए
पुष्कर, भेरी और दर्दुरसे जो शब्द उत्पन्न होता है वह तत शब्द है। तांतवाले वीणा और २५
सुघोष आदिसे जो शब्द उत्पन्न होता है यह वितत शब्द है। ताल, घण्टा और लालन आदिके
ताड़नसे जो शब्द उत्पन्न होता है वह घन शब्द है। तथा बांसुरी और शंख आदिके फूँकनेसे जो
शब्द उत्पन्न होता है वह शौषिर शब्द है। बन्धके दो भेद हैं—वैस्रसिक और प्रायोगिक । जिसमें
पुरुषका प्रयोग अपेक्षित नहीं है वह वैस्रसिक बन्ध है । जैसे, स्निग्ध और रूक्ष गुणके निमित्तसे
होनेवाला बिजली, उल्का, मेघ, अग्नि और इन्द्रधनुष आदिका विषयभूत बन्ध वैस्रसिक बन्ध है। ३०
और जो बन्ध पुरुषके प्रयोगके निमित्तसे होता है वह प्रायोगिक बन्ध है। इसके दो भेद हैं—
अजीवसम्बन्धी और जीवाजीवसम्बन्धी । लाख और लकड़ी आदिका अजीव सम्बन्धी प्रायोगिक
बन्ध है। तथा कर्म और नोकर्मका जो जीवसे बन्ध होता है वह जीवाजीवसम्बन्धी प्रायोगिक बन्ध
है। सूक्ष्मताके दो भेद हैं—अन्त्य और आपेक्षिक । परमाणुओंमें अन्त्य सूक्ष्मत्व है। तथा बेल,
आंवला और बेर आदिमें आपेक्षिक सूक्ष्मत्व है । स्थौल्य भी दो प्रकारका है—अन्त्य और आपेक्षिक । ३५
जगद्व्यापी महास्कन्धमें अन्त्य स्थौल्य है । तथा बेर, आंवला और बेल आदिमें आपेक्षिक स्थौल्य
है। संस्थानका अर्थ आकृति है। इसके दो भेद हैं—इत्थंलक्षण और अनित्थंलक्षण । जिसके विषय-
में 'यह संस्थान इस प्रकारका है' यह निर्देश किया जा सके वह इत्थंलक्षण संस्थान है। वृत्त,