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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 317, कुल 558 में से

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पृष्ठ 317

– ५।१२ § ५४९ ] ° पञ्चमोऽध्यायः २०५
§ ५४७. अणोः 'प्रदेशा न सन्ति' इति वाक्यशेषः । कुतो न सन्तीति चेत् । प्रदेशमात्रत्वात् ।
यथा आकाशप्रदेशस्यैकस्य प्रदेशभेदाभावादप्रदेशत्वमेवमणोरपि प्रदेशमात्रत्वात्प्रदेशभेदाभावः । किं
च ततोऽल्पपरिमाणाभावात् । न ह्यणोरल्पीयानन्योऽस्ति, यतोऽस्य प्रदेशा भिद्येरन् ।
§ ५४८. एषामवधृतप्रदेशानां धर्मादीनामाधारप्रतिपत्त्यर्थमिदमुच्यते—
लोकाकाशेऽवगाहः ॥१२॥ ५
§ ५४९. उक्तानां धर्मादीनां द्रव्याणां लोकाकाशेऽवगाहो न बहिरित्यर्थः । यदि धर्मादीनां
लोकाकाशमाधारः, आकाशस्य क आधार इति । आकाशस्य नास्त्यन्य आधारः । स्वप्रतिष्ठमा-
काशम् । यद्याकाशं स्वप्रतिष्ठम्; धर्मादीन्यपि स्वप्रतिष्ठान्येव । अथ धर्मादीनामन्य आधारः कल्प्यते,
आकाशस्याप्यन्य आधारः कल्प्यः । तथा सत्यनवस्थाप्रसङ्ग इति चेत् । नैष दोषः; नाकाशादन्य-
दधिकपरिमाणं द्रव्यमस्ति यत्राकाशं स्थितमित्युच्येत । सर्वतोऽनन्तं हि तत्¹ । धर्मादीनां पुनरधि- १०
करणमाकाशमित्युच्यते व्यवहारनयवशात् । एवम्भूतनयापेक्षया तु सर्वाणि द्रव्याणि स्वप्रतिष्ठान्येव ।
तथा चोक्तम्, “क्व भवानास्ते । आत्मनि” इति । धर्मादीनि लोकाकाशान्न बहिः सन्तीत्येता-
वदत्राधाराधेयकल्पनासाध्यं फलम् । ननु च लोके पूर्वोत्तरकालभाविनामाधाराधेयभावो दृष्टो यथा
कुण्डे बदरादीनाम् । न तथाऽऽकाशं पूर्वं धर्मादीन्युत्तरकालभावीनि; अतो व्यवहारनयापेक्षयाऽपि
आधाराधेयकल्पनानुपपत्तिरिति ? नैष दोषः; युगपद्भाविनामपि आधाराधेयभावो दृश्यते । घटे १५
§ ५४७. परमाणुके प्रदेश नहीं हैं। यहाँ 'सन्ति' यह वाक्यका शेष है । शंका—परमाणुके
प्रदेश क्यों नहीं होते ? समाधान—क्योंकि वह स्वयं एक प्रदेश मात्र है। जिस प्रकार एक आकाश
प्रदेशमें प्रदेश-भेद नहीं होनेसे वह अप्रदेशी माना गया है उसी प्रकार अणु स्वयं एक प्रदेशरूप है
इसलिए उसमें प्रदेशभेद नहीं होता । दूसरे अणुसे अल्प परिमाण नहीं पाया जाता। ऐसी कोई
अन्य वस्तु नहीं जो परमाणुसे छोटी हो जिससे इसके प्रदेश भेदको प्राप्त होवें । २०
§ ५४८. इस प्रकार निश्चित प्रदेशवाले इन धर्मादिक द्रव्योंके आधारका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
इन धर्मादिक द्रव्योंका अवगाह लोकाकाशमें है ॥१२॥
§ ५४९. उक्त धर्मादिक द्रव्योंका लोकाकाशमें अवगाह है बाहर नहीं, यह इस सूत्रका तात्पर्य
है। शंका—यदि धर्मादिक द्रव्योंका लोकाकाश आधार है तो आकाशका क्या आधार है ? २५
समाधान—आकाशका अन्य आधार नहीं है; क्योंकि आकाश स्वप्रतिष्ठ है। शंका—यदि आकाश
स्वप्रतिष्ठ है तो धर्मादिक द्रव्य भी स्वप्रतिष्ठ ही होने चाहिए। यदि धर्मादिक द्रव्योंका अन्य
आधार माना जाता है तो आकाशका भी अन्य आधार मानना चाहिए। और ऐसा मानने पर
अनवस्था दोष प्राप्त होता है। समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि आकाशसे अधिक
परिमाणवाला अन्य द्रव्य नहीं है जहाँ आकाश स्थित है यह कहा जाय । वह सबसे अनन्त है । ३०
परन्तु धर्मादिक द्रव्योंका आकाश अधिकरण है यह व्यवहारनयकी अपेक्षा कहा जाता है। एवंभूत
नयकी अपेक्षा तो सब द्रव्य स्वप्रतिष्ठ ही हैं। कहा भी है—आप कहाँ रहते हैं ? अपनेमें । धर्मादिक
द्रव्य लोकाकाशके बाहर नहीं हैं। यहाँ आधार-आधेय कल्पनासे इतना ही फलितार्थ लिया गया
है । शंका—लोकमें जो पूर्वोत्तर कालभावी होते हैं उन्हींका आधार-आधेयभाव देखा गया है। जैसे
कि बेरोंका आधार कुण्ड होता है। उस प्रकार आकाश पूर्वकालभावी हो और धर्मादिक द्रव्य ३५
पीछेसे उत्पन्न हुए हों, ऐसा तो है नहीं, अतः व्यवहारनयकी अपेक्षा भी आधार-आधेयकल्पना नहीं
बनती ? समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि एक साथ होनेवाले पदार्थों में आधार-आधेय-
१. तत् । ततो धर्मा-ता०, ना० मु० ।