सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 320, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ेंसंख्येयभागे एको जीवोऽवतिष्ठते । एवं द्वित्रिचतुरादिष्वपि असंख्येयभागेषु आ सर्वलोकादवगाहः
प्रत्येतव्यः । नानाजीवानां तु सर्वलोक एव । यद्येकस्मिन्नसंख्येयभागे एको जीवोऽवतिष्ठते, कथं
द्रव्यप्रमाणेनानन्तानन्तो जीवराशिः सशरीरोऽवतिष्ठते लोकाकाशे । सूक्ष्मबादरभेदादवस्थानं
प्रत्येतव्यम् । बादरास्तावत्सप्रतिघातशरीराः । सूक्ष्मास्तु सशरीरा अपि सूक्ष्मभावादेवैकनिगोद-
जीवावगाह्येऽपि प्रदेशे साधारणशरीरा अनन्तानन्ता वसन्ति । न ते परस्परेण बादरैश्च व्याहन्यन्त
इति नास्त्यवगाहविरोधः² ।
§ ५५६. अत्राह लोकाकाशतुल्यप्रदेश एकजीव इत्युक्तम्, तस्य कथं लोकस्यासंख्येयभागा-
दिषु वृत्तिः । ननु सर्वलोकव्याप्त्यैव भवितव्यमित्यत्रोच्यते—
प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥
§ ५५७. अमूर्तस्वभावस्यात्मनोऽनादिबन्धं प्रत्येकत्वात् कथंचिन्मूर्ततां बिभ्रतः कार्मणशरी-
रवशान्महदणु च शरीरमधितिष्ठतस्तत्तद्गात्रप्रदेशसंहरणविसर्पणस्वभावस्य तावत्प्रमाणतायां सत्याम-
संख्येयभागादिषु वृत्तिरुपपद्यते, प्रदीपवत् । यथा निरावरणव्योमप्रदेशेऽनव³धृतप्रकाशपरिमाणस्य
प्रदीपस्य शरावमणिकापवरकाद्यावरणवशात्तत्परिमाणतेति । अत्राह धर्मादीनामन्योन्यप्रदेशानु-
प्रवेशात्संकरे⁴ सति, एकत्वं प्राप्नोतीति । तन्न; परस्परमत्यन्तसंश्लेषे सत्यपि स्वभावं न जहति ।
उक्तं च—
एक असंख्यातवे भागमें एक जीव रहता है। इस प्रकार दो, तीन और चार आदि असंख्यात भागों
से लेकर सब लोकपर्यन्त एक जीवका अवगाह जानना चाहिए। किन्तु नाना जीवोंका अवगाह
सब लोकमें ही होता है। शंका—यदि लोकके एक असंख्यातवें भागमें एक जीव रहता है तो
संख्याकी अपेक्षा अनन्तानन्त सशरीर जीवराशि लोकाकाशमें कैसे रह सकती है ? समाधान—जीव
दो प्रकारके हैं सूक्ष्म और बादर, अतः उनका लोकाकाशमें अवस्थान बन जाता है। जो बादर
जीव हैं उनका शरीर तो प्रतिघात सहित होता है। किन्तु जो सूक्ष्म हैं वे यद्यपि सशरीर हैं तो
भी सूक्ष्म होनेके कारण एक निगोद जीव आकाशके जितने प्रदेशोंको अवगाहन करता है उतनेमें
साधारण शरीरवाले अनन्तानन्त जीव रह जाते हैं। वे परस्परमें और बादरोंके साथ व्याघातको
नहीं प्राप्त होते इसलिए लोकाकाशमें अनन्तानन्त जीवोंके अवगाहमें कोई विरोध नहीं आता।
§ ५५६. यहाँ पर शंकाकारका कहना है कि जब एक जीवके प्रदेश लोकाकाशके बराबर
बतलाये हैं तो लोकके असंख्यातवें भाग आदिमें एक जीव कैसे रह सकता है, उसे तो सब लोक
व्याप्त कर ही रहना चाहिए ? अब इस शंकाका समाधान करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
क्योंकि प्रदीपके समान जीवके प्रदेशोंका संकोच और विस्तार होता है ॥१६॥
§ ५५७. चूंकि आत्मा अमूर्त स्वभाव है तो भी अनादिकालीन बन्धके कारण एकपनेको
प्राप्त होनेसे वह मूर्त हो रहा है और कार्मण शरीरके कारण वह छोटे-बड़े शरीरमें रहता है,
इसलिए वह प्रदेशोंके संकोच और विस्तार स्वभाववाला है और इसलिए शरीरके अनुसार दीपक-
के समान उसका लोकके असंख्यातवें भाग आदिमें रहना बन जाता है। जिस प्रकार निरावरण
आकाश-प्रदेशमें यद्यपि दीपकके प्रकाशके परिमाणका निश्चय नहीं होता तथापि वह सकोरा,
मानिक तथा आवरण करनेवाले दूसरे पदार्थोंके आवरणके वशसे तत्परिमाण होता है उसी प्रकार
प्रकृतमें जानना चाहिए। शंका—धर्मादिक द्रव्योंके प्रदेशोंका परस्पर प्रवेश होनेके कारण संकर
होनेसे अभेद प्राप्त होता है ? समाधान—नहीं; क्योंकि परस्पर अत्यन्त सम्बन्ध हो जाने पर भी वे
अपने-अपने स्वभावको नहीं छोड़ते; इसलिए उनमें अभेद नहीं प्राप्त होता। कहा भी है—
१. सशरीरत्वेऽपि आ०, दि० १, दि० २ । २. -वगाहेऽपि मु० । ३. -देशेऽववृ-ता० ना० । ४. पंचत्थि०
गा० ७ ।