सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 326, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें२१४ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।२० § ५६४ –
श्लेष्मणा चाभिभवः । न चामूत्तंस्य मूर्तिमद्भिूरभिघातादयः स्युः । अत एवात्मास्तित्वसिद्धिः ।
यथा यन्त्रप्रतिमाचेष्टितं प्रयोक्तुरस्तित्वं गमयति तथा प्राणापानादिकमपि क्रियावन्तमात्मानं
साधयति ।
§ ५६४. किमेतावानेव पुद्गलकृत उपकार आहोस्विदन्योऽप्यस्तीत्यत आह—
सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥२०॥
§ ५६५. १सदसद्वेद्योदयेऽन्तरङ्गहेतौ सति बाह्यद्रव्यादिपरिपाकनिमित्तवशादुत्पद्यमानः
प्रीतिपरितापरूपः परिणामः सुखदुःखमित्याख्यायते। भवधारणकारणायुराख्यकर्मोदयाद् भव-
स्थितिमादधानस्य जीवस्य पूर्वोक्तप्राणापानक्रियाविशेषाव्युच्छेदो जीवितमित्युच्यते। तदुच्छेदो
मरणम्। एतानि सुखादीनि जीवस्य पुद्गलकृत उपकारः२; मूर्तिमद्धेतुसंनिधाने सति तदुत्पत्तेः।
उपकाराधिकारात् 'उपग्रह'वचनमनर्थकम्। नानर्थकम्। स्वोपग्रहप्रदर्शनार्थमिदम्। पुद्गलानां
पुद्गलकृत उपकार इति। तद्यथा— कांस्यादीनां भस्मादिभिर्जलादीनां कतकादिभिरयःप्रभृती-
नामुदकादिभिरुपकारः क्रियते। 'च'शब्दः किमर्थः। समुच्चयर्थः। अन्योऽपि पुद्गलकृत उपकारो-
ऽस्तीति समुच्चीयते। यथा शरीराणि एवं चक्षुरादीनीन्द्रियाण्यपीति।
§ ५६६. एवमाद्यमजीवकृतमुपकारं प्रदर्श्य जीवकृतोपकारप्रदर्शना र्थमाह—
मनका प्रतिघात होता है और सुरा आदिके द्वारा अभिभव । तथा हस्ततल और वस्त्र आदिके
द्वारा मुखके ढँक लेने से प्राण और अपानका प्रतिघात होता है और कफके द्वारा अभिभव । परन्तु
अमूर्तका मूर्त पदार्थोंके द्वारा अभिघात आदि नहीं हो सकता इससे प्रतीत होता है कि ये सब
मूर्त हैं। तथा इसीसे आत्माके अस्तित्वकी सिद्धि होती है। जैसे यन्त्रप्रतिमाकी चेष्टाएँ अपने
प्रयोक्ताके अस्तित्वका ज्ञान कराती हैं उसी प्रकार प्राण और अपान आदि रूप कार्य भी क्रिया
वाले आत्माके अस्तित्वके साधक हैं।
§ ५६४. क्या पुद्गलोंका इतना ही उपकार है या और भी उपकार है, इस बातके बतलाने
'के लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं—
सुख, दुःख, जीवन और मरण ये भी पुद्गलोंके उपकार हैं ॥२०॥
§ ५६५. साता और असातारूप अन्तरंग हेतुके रहते हुए बाह्य द्रव्यादिके परिपाकके
निमित्तसे जो प्रीति और परितापरूप परिणाम उत्पन्न होते हैं वे सुख और दुःख कहे जाते हैं।
पर्यायके धारण करनेमें कारणभूत आयुकर्मके उदयसे भवस्थितिको धारण करनेवाले जीवके
पूर्वोक्त प्राण और अपानरूप क्रिया विशेषका विच्छेद नहीं होना जीवित है। तथा उसका उच्छेद
मरण है। ये सुखादिक जीवके पुद्गलकृत उपकार हैं; क्योंकि मूर्त कारणोंके रहने पर ही इनकी
उत्पत्ति होती है। शंका—उपकारका प्रकरण होनेसे सूत्रमें उपग्रह शब्दका प्रयोग करना निष्फल
है ? समाधान—निष्फल नहीं है, क्योंकि स्वतःके उपकारके दिखलानेके लिए सूत्रमें उपग्रह शब्द-
का प्रयोग किया है। पुद्गलोंका भी पुद्गलकृत उपकार होता है। यथा—काँसे आदिका राख
आदिके द्वारा, जल आदिका कतक आदिके द्वारा और लोहे आदिका जल आदिके द्वारा उपकार
किया जाता है। शंका—सूत्रमें 'च' शब्द किस लिए दिया है ? समाधान—समुच्चयके लिए ।
पुद्गलकृत और भी उपकार हैं इसके समुच्चयके लिए सूत्र में 'च' शब्द दिया है। जिस प्रकार
शरीर आदिक पुद्गलकृत उपकार हैं उसी प्रकार चक्षु आदि इन्द्रियाँ भी पुद्गलकृत उपकार हैं।
§ ५६६. इस प्रकार अजीवकृत उपकारको दिखलाकर अब जीवकृत उपकारके दिखलानेके
लिए आगेका सूत्र