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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 324, कुल 558 में से

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पृष्ठ 324

२१२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१९ § ५६३ -
लक्षणमुच्यते¹; शरीरादीनि पुद्गलमयानीति । नैतद्युक्तम्; पुद्गलानां लक्षणमुत्तरत्र² वक्ष्यते । इदं
तु जीवान् प्रति पुद्गलानामुपकारप्रतिपादनार्थमेवेति उपकारप्रकरणे उच्यते । शरीराण्युक्तानि ।
औदारिकादीनि सौक्ष्म्यादप्रत्यक्षाणि । तदुदयापादित³वृत्तीन्युपचयशरीराणि कानिचित्प्रत्यक्षाणि
कानिचिदप्रत्यक्षाणि । एतेषां कारणभूतानि कर्माण्यपि शरीरग्रहणेन गृह्यन्ते । एतानि पौद्गलिका-
५ नीति कृत्वा जीवानामुपकारे पुद्गलाः प्रवर्तन्ते । स्यान्मतं कार्मणमपौद्गलिकम्; अनाकारत्वाद्⁴ ।
आकारवतां हि औदारिकादीनां पौद्गलिकत्वं युक्तमिति । तन्न; तदपि पौद्गलिकमेव; तद्विपाकस्य
मूर्तिमत्संबन्धनिमित्तत्वात् । दृश्यते हि व्रीह्यादीनामुदकादिद्रव्यसंबन्धप्रापितपरिपाकानां
पौद्गलिकत्वम् । तथा कार्मणमपि गुडकण्टकादिमूर्तिमद्द्रव्योपनिपाते सति विपच्यमानत्वात्पौद्-
गलिकमित्यवसेयम् । वाग् द्विविधा-द्रव्यवाग् भाववागिति । तत्र भाववाक् तावद्वीर्यान्तरायमति-
१० श्रुतज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामलब्धिनिमित्तत्वात् पौद्गलिकी । तदभावे तद्वृत्त्यभावात् ।
तत्सामर्थ्योपेतेन क्रियावतात्मना प्रेर्यमाणाः पुद्गला वाक्त्वेन विपरिणमन्त इति द्रव्यवागपि
पौद्गलिकी; श्रोत्रेन्द्रियविषयत्वात् । इतरेन्द्रियविषया कस्मान्न भवति । तद्ग्रहणायोग्यत्वात् ।
घ्राणग्राह्ये गन्धद्रव्ये रसाद्यनुपलब्धिवत् । अमूर्ता वागिति चेत् । न; मूर्तिमद्ग्रहणावरोधव्याघाता-
उपकार है यह प्रश्न था पर उसके उत्तरमें 'शरीरादिक पुद्गलमय हैं' इस प्रकार पुद्गलोंका लक्षण
१५ कहा जाता है ? समाधान—यह अयुक्त नहीं है, क्योंकि पुद्गलोंका लक्षण आगे कहा जायगा, यह सूत्र
तो जीवोंके प्रति पुद्गलोंके उपकारका कथन करनेके लिए ही आया है अतः उपकार प्रकरणमें ही
यह सूत्र कहा है। औदारिक आदिक पाँचों शरीरोंका कथन पहले कर आये हैं। वे सूक्ष्म होनेसे
इन्द्रियगोचर नहीं हैं। किन्तु उनके उदयसे जो उपचय शरीर प्राप्त होते हैं उनमें-से कुछ शरीर
इन्द्रियगोचर हैं और कुछ इन्द्रियातीत हैं। इन पाँचों शरीरोंके कारणभूत जो कर्म हैं उनका भी शरीर
२० पदके ग्रहण करनेसे ग्रहण हो जाता है। ये सब शरीर पौद्गलिक हैं ऐसा मानकर जीवोंका उपकार
पुद्गल करते हैं यह कहा है। शंका—आकाशके समान कार्मण शरीरका कोई आकार नहीं पाया
जाता इसलिए उसे पौद्गलिक मानना युक्त नहीं। हाँ, जो औदारिक आदिक शरीर आकारवाले हैं
उनको पौद्गलिक मानना युक्त है ? समाधान—यह कहना ठीक नहीं है, क्योंकि कार्मण शरीर भी
पौद्गलिक ही है, क्योंकि उसका फल मूर्तिमान् पदार्थोंके सम्बन्धसे होता है। यह तो स्पष्ट दिखाई
२५ देता है कि जलादिकके सम्बन्धसे पकनेवाले धान आदि पौद्गलिक हैं। उसी प्रकार कार्मण शरीर
भी गुड़ और काँटे आदि मूर्तिमान् पदार्थोंके मिलने पर फल देते हैं इससे ज्ञात होता है कि कार्मण
शरीर भी पौद्गलिक है। वचन दो प्रकारका है--द्रव्यवचन और भाववचन । इनमें-से भाववचन
वीर्यान्तराय और मतिज्ञानावरण तथा श्रुतज्ञानावरण कर्मोंके क्षयोपशम और अंगोपांग नामकर्मके
निमित्तसे होता है इसलिए वह पौद्गलिक है; क्योंकि पुद्गलोंके अभावमें भाववचनका सद्भाव
३० नहीं पाया जाता। चूँकि इस प्रकारकी सामर्थ्यसे युक्त क्रियावाले आत्माके द्वारा प्रेरित हो कर
पुद्गल वचनरूपसे परिणमन करते हैं इसलिए द्रव्य वचन भी पौद्गलिक हैं। दूसरे द्रव्य वचन
श्रोत्र इन्द्रियके विषय हैं इससे भी ज्ञात होता है कि वे पौद्गलिक हैं। शंका—वचन इतर इन्द्रियों-
के विषय क्यों नहीं होते ? समाधान—घ्राण इन्द्रिय गन्धको ग्रहण करती है उससे जिस प्रकार
रसादिककी उपलब्धि नहीं होती उसी प्रकार इतर इन्द्रियोंमें वचनके ग्रहण करनेकी योग्यता नहीं
३५ है। शंका—वचन अमूर्त हैं ? समाधान—नहीं; क्योंकि वचनोंका मूर्त इन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण होता
है, वे मूर्त भीत आदिके द्वारा रुक जाते हैं, प्रतिकूल वायु आदिके द्वारा उनका व्याघात देखा
१. -च्यते भवता शरी-मु० । २. -रत्र स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः इत्यत्र वक्ष्यते मु० । ३. -पादित-
( तदुदयोपपादित )वृत्ती-मु० । ४. -कारत्वादाकाशवत् । आकार-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri