सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंरत्रायतपरिमण्डलादीनामित्थंलक्षणम् । अतोऽन्यन्मेघादीनां संस्थानमनेकविधमित्यमिदमिति निरू-
पणभावादनित्थंलक्षणम् । भेदाः षोढा; उत्करचूर्णखण्डचूर्णिकाप्रतराणुचटनविकल्पात् । तत्रोत्करः
काष्ठादीनां करपत्रादिभिरुत्करणम् । चूर्णो यवगोधूमादीनां सक्तुकणिकादिः । खण्डो घटादीनां
कपालशर्करादिः । चूर्णिका माषमुद्गादीनाम् । प्रतरोऽभ्रपटलादीनाम् । अणुचटनं सन्तप्तायः-
पिण्डादिषु अयोगनादिभिरभिहन्यमानेषु स्फुलिङ्गनिर्गमः । तमो दृष्टिप्रतिबन्धकारणं प्रकाश-
विरोधि । छाया प्रकाशावरणनिमित्ता । सा द्वेधा, वर्णादिविकारपरिणता प्रतिबिम्बमात्रात्मिका
चेति । आतप आदित्यादिनिमित्त उष्णप्रकाशलक्षणः । उद्योतश्चन्द्रमणिखद्योतादिप्रभवः प्रकाशः ।
त एते शब्दादयः पुद्गलद्रव्यविकाराः । त एषां सन्तीति शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छा-
यातपोद्योतवन्तः पुद्गला इत्यभिसंबध्यते । 'च'शब्देन नोदनाभिघातादयः पुद्गलपरिणामा आगमे
प्रसिद्धाः समुच्चीयन्ते ।
§ ५७३. उक्तानां पुद्गलानां भेदप्रदर्शनार्थमाह—
अणवः स्कन्धाश्च ॥२५॥
§ ५७४. प्रदेशमात्रभाविस्पर्शादिपर्यायप्रसवसामर्थ्येनाण्यन्ते शब्द्यन्त इत्यणवः । सौक्ष्म्यादा-
त्मादय आत्ममध्या आत्मान्ताश्च ॥ उक्तं च—
त्रिकोण, चतुष्कोण, आयत और परिमण्डल आदि ये सब इत्थंलक्षण संस्थान हैं । तथा इससे
अतिरिक्त मेघ आदिके आकार जो कि अनेक प्रकारके हैं और जिनके विषयमें यह इस प्रकारका
है यह नहीं कहा जा सकता वह अनित्थंलक्षण संस्थान है। भेदके छह भेद हैं—उत्कर, चूर्ण, खण्ड,
चूर्णिका, प्रतर और अणुचटन । करौंत आदिसे जो लकड़ी आदिको चीरा जाता है वह उत्कर
नामका भेद है। जौ और गेहूँ आदिका जो सत्तू और कनक आदि बनता है वह चूर्ण नामका भेद
है । घट आदिके जो कपाल और शर्करा आदि टुकड़े होते हैं वह खण्ड नामका भेद है। उड़द और
मूंग आदिका जो खण्ड किया जाता है वह चूर्णिका नामका भेद है। मेघके जो अलग अलग पटल
आदि होते हैं वह प्रतर नामका भेद है । तपाये हुए लोहेके गोले आदिको घन आदिसे पीटने पर
जो फुलंगे निकलते हैं वह अणुचटन नामका भेद है। जिससे दृष्टिमें प्रतिबन्ध होता है और जो
प्रकाशका विरोधी है वह तम कहलाता है। प्रकाशको रोकनेवाले पदार्थोंके निमित्तसे जो पैदा होती
है वह छाया कहलाती है । उसके दो भेद हैं—एक तो वर्णादिके विकार रूपसे परिणत हुई और
दूसरी प्रतिबिम्बरूप । जो सूर्यके निमित्तसे उष्ण प्रकाश होता है उसे आतप कहते हैं। तथा चन्द्र
मणि और जुगनू आदिके निमित्तसे जो प्रकाश पैदा होता है उसे उद्योत कहते हैं। ये सब शब्दादिक
पुद्गल द्रव्यके विकार (पर्याय) हैं। इसीलिए सूत्रमें पुद्गलको इन शब्द, बन्ध, सौक्ष्म्य, स्थौल्य,
संस्थान, भेद, तम, छाया, आतप और उद्योतवाला कहा है । सूत्रमें दिये हुए 'च' शब्द से नोदन
अभिघात आदिक जो पुद्गलकी पर्यायें आगममें प्रसिद्ध हैं उनका संग्रह करना चाहिए।
§ ५७३. अब पूर्वोक्त पुद्गलोंके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
पुद्गल के दो भेद हैं—अणु और स्कन्ध ॥ २५ ॥
§ ५७४. एक प्रदेशमें होनेवाले स्पर्शादि पर्यायको उत्पन्न करनेकी सामर्थ्य रूपसे जो
'अण्यन्ते' अर्थात् कहे जाते हैं वे अणु कहलाते हैं। तात्पर्य यह है कि अणु एकप्रदेशी होनेसे सबसे
छोटा होता है इसलिए वह अणु कहलाता है। यह इतना सूक्ष्म होता है जिससे वही आदि है, वही
मध्य है और वही अन्त है। कहा भी है—