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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 335, कुल 558 में से

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पृष्ठ 335

– ५।३० § ५८४ ] पञ्चमोऽध्यायः २२३
पत्तिरिति चेत् । ब्रूमः; सूक्ष्मपरिणामस्य स्कन्धस्य भेदे सौक्ष्म्यापरित्यागादचाक्षुषत्वमेव । सौक्ष्म्य-
परिणतः पुनरपरः सत्यपि तद्भेदेऽन्यसंघातान्तरसंयोगात्सौक्ष्म्यपरिणामोपरमे स्थौल्योत्पत्तौ
चाक्षुषो भवति ।
§ ५८१. आह, धर्मादीनां द्रव्याणां विशेषलक्षणान्युक्तानि, सामान्यलक्षणं नोक्तम्, तद्वक्त-
व्यम् । उच्यते—
सद् द्रव्यलक्षणम् ॥२९॥
§ ५८२. यत्सत्तद् द्रव्यमित्यर्थः ।
§ ५८३. यद्येवं तदेव तावद्वक्तव्यं किं सत् । इत्यत आह—
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥३०॥
§ ५८४. चेतनस्याचेतनस्य वा द्रव्यस्य स्वां जातिमजहत उभयनिमित्तवशाद् भावान्तरा- १०
वाप्तिरूपादनमुत्पादः मृत्पिण्डस्य घटपर्यायवत् । तथा पूर्वभावविगमनं व्ययः । यथा घटोत्पत्तौ
पिण्डाकृतेः । अनादिपारिणामिकस्वभावेन व्ययोदयाभावाद् ध्रुवति स्थिरीभवतीति ध्रुवः । ध्रुवस्य
भावः कर्म वा ध्रौव्यम् । यथा मृत्पिण्डघटाद्यवस्थासु मृदाद्यन्वयः । तैरुत्पादव्ययध्रौव्यैर्युक्तं २
उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सदिति । आह, भेदे सति युक्तशब्दो दृष्टः । यथा दण्डेन युक्तो देवदत्त इति ।
तथा सति तेषां त्रयाणां तैर्युक्तस्य द्रव्यस्य चाभावः प्राप्नोति । नैष दोषः; अभेदेऽपि कथंचिद् भेद- १५
लिए यह कहा है कि भेद और संघातसे चाक्षुष स्कन्ध होता है, केवल भेदसे नहीं, यह इस सूत्रका
अभिप्राय है । शंका—इसका क्या कारण है ? समाधान—आगे उसी कारणको बतलाते हैं—सूक्ष्म-
परिणामवाले स्कन्धका भेद होनेपर वह अपनी सूक्ष्मताको नहीं छोड़ता इसलिए उसमें अचाक्षुषपना
ही रहता है । एक दूसरा सूक्ष्मपरिणामवाला स्कन्ध है जिसका यद्यपि भेद हुआ तथापि उसका
दूसरे संघातसे संयोग हो गया अतः सूक्ष्मपना निकलकर उसमें स्थूलपनेकी उत्पत्ति हो जाती है २०
और इसलिए वह चाक्षुष हो जाता है ।
§ ५८१. धर्मादिक द्रव्यके विशेष लक्षण कहे, सामान्य लक्षण नहीं कहा, जो कहना चाहिए
इसलिए सूत्र द्वारा सामान्य लक्षण कहते हैं—
द्रव्यका लक्षण सत् है ॥२९॥
§ ५८२. जो सत् है वह द्रव्य है यह इस सूत्रका भाव है। २५
§ ५८३. यदि ऐसा है तो यही कहिए कि सत् क्या है ? इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं—
जो उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य इन तीनोंसे युक्त अर्थात् इन तीनोंरूप है वह सत् है ॥३०॥
§ ५८४. द्रव्य दो हैं—चेतन और अचेतन । वे अपनी जातिको तो कभी नहीं छोड़ते फिर
भी उनमें अन्तरंग और बहिरंग निमित्तके वशसे प्रति समय जो नवीन अवस्थाकी प्राप्ति होती है
उसे उत्पाद कहते हैं। जैसे मिट्टीके पिण्डकी घट पर्याय । तथा पूर्व अवस्थाके त्यागको व्यय कहते ३०
हैं । जैसे घटकी उत्पत्ति होनेपर पिण्डरूप आकारका त्याग तथा जो अनादिकालीन पारिणामिक
स्वभाव है उसका व्यय और उदय नहीं होता किन्तु वह 'ध्रुवति' अर्थात् स्थिर रहता है इसलिए
उसे ध्रुव कहते हैं। तथा इस ध्रुवका भाव या कर्म ध्रौव्य कहलाता है। जैसे मिट्टीके पिण्ड
और घटादि अवस्थाओंमें मिट्टीका अन्वय बना रहता है। इस प्रकार इन उत्पाद, व्यय और
ध्रौव्यसे जो युक्त है वह सत् है । शंका—भेदके रहते हुए युक्त शब्द देखा जाता है। जैसे दण्डसे ३५
युक्त देवदत्त । यहाँ दण्ड और देवदत्तमें भेद है । प्रकृतमें भी यदि ऐसा मान लिया जाय तो उन
१. –जहत निमित्त-आ०, दि० १, दि० २ । २. -ध्रौव्यैर्युक्तं सदिति मु० ।