सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२०४ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१० § ५४३ -
§ ५४३. अविद्यमानोऽन्तो येषां ते अनन्ताः । के । प्रदेशाः । कस्य । आकाशस्य । पूर्वव-
दस्यापि प्रदेशकल्पनावसेया ।
§ ५४४. उक्तममूर्तानां प्रदेशपरिमाणम् । इदानीं मूर्तानां पुद्गलानां प्रदेशपरिमाणं निर्ज्ञात-
व्यमित्यत आह—
संख्येयाऽसंख्येयाश्च पुद्गलानाम् ॥१०॥
§ ५४५. 'च'शब्दादनन्ताश्चेत्यनुकृष्यते । कस्यचित्पुद्गलद्रव्यस्य द्व्यणुकादेः संख्येयाः
प्रदेशाः कस्यचिदसंख्येया अनन्ताश्च । अनन्तानन्तोपसंख्यानमिति चेत् । न; अनन्तसामान्यात् ।
अनन्तप्रमाणं त्रिविधमुक्तं परीतानन्तं युक्तानन्तमन्तानन्तं चेति । तत्सर्वमनन्तसामान्येन गृह्यते ।
स्यादेतदसंख्यातप्रदेशो लोकः अनन्तप्रदेशस्यानन्तानन्तप्रदेशस्य च स्कन्धस्याधिकरणमिति विरोध-
स्ततो नानन्त्यमिति । नैष दोषः; सूक्ष्मपरिणामावगाहनशक्तियोगात् । परमाण्वादयो हि सूक्ष्मभावेन
परिणता एकैकस्मिन्नप्याकाशप्रदेशेऽनन्तानन्ता अवतिष्ठन्ते. अवगाहनशक्तिश्चैषामव्याहतास्ति ।
तस्मादेकस्मिन्नपि प्रदेशे अनन्तानन्तानामवस्थानं न विरुध्यते ।
§ ५४६. 'पुद्गलानाम्' इत्यविशेषवचनात्परमाणोरपि प्रदेशवत्त्वप्रसङ्गे तत्प्रतिषेधार्थमाह—
नाणोः ॥११॥
§ ५४३. जिनका अन्त नहीं है वे अनन्त कहलाते हैं ? शंका- अनन्त क्या हैं? समाधान-
प्रदेश । शंका- किसके ? समाधान - आकाशके । पहलेके समान इसके भी प्रदेशकी कल्पना जान
लेनी चाहिए । अर्थात् जितने क्षेत्रमें एक परमाणु रहता है उसे प्रदेश कहते हैं। प्रदेशका यह अर्थ
यहाँ भी जानना चाहिए ।
§ ५४४. अमूर्त द्रव्योंके प्रदेश कहे । अब मूर्त पुद्गलोंके प्रदेशोंकी संख्या ज्ञातव्य है, अतः
उसका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
पुद्गलोंके संख्यात, असंख्यात और अनन्त प्रदेश हैं ॥१०॥
§ ५४५. सूत्रमें जो 'च' शब्द दिया है उससे अनन्तकी अनुवृत्ति होती है। तात्पर्य यह है
कि किसी द्व्यणुक आदि पुद्गल द्रव्यके संख्यात प्रदेश होते हैं और किसीके असंख्यात तथा अनन्त
प्रदेश होते हैं। शंका-यहाँ अनन्तानन्तका उपसंख्यान करना चाहिए ? समाधान -नहीं; क्योंकि
यहाँ अनन्त सामान्यका ग्रहण किया है। अनन्त प्रमाण तीन प्रकारका कहा है- परीतानन्त,
युक्तानन्त और अनन्तानन्त । इसलिए इन सबका अनन्त सामान्यसे ग्रहण हो जाता है। शंका-
लोक असंख्यात प्रदेशवाला है इसलिए वह अनन्त प्रदेशवाले और अनन्तानन्त प्रदेशवाले स्कन्धका
आधार है, इस बातके माननेमें विरोध आता है अतः पुद्गलके अनन्त प्रदेश नहीं बनते ?
समाधान- यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि सूक्ष्म परिणमन होनेसे और अवगाहन शक्तिके निमित्तसे
अनन्त या अनन्तानन्त प्रदेशवाले पुद्गल स्कन्धोंका आकाश आधार हो जाता है । सूक्ष्मरूपसे
परिणत हुए परमाणु आकाशके एक-एक प्रदेशमें अनन्तानन्त ठहर जाते हैं। इनकी यह अवगाहन
शक्ति व्याघात रहित है, इसलिए आकाशके एक प्रदेशमें भी अनन्तानन्त परमाणुओंका अवस्थान
विरोधको प्राप्त नहीं होता ।
§ ५४६. पूर्व सूत्रमें 'पुद्गलानाम्' यह सामान्य वचन कहा है । इससे परमाणुके भी प्रदेशों
का प्रसंग प्राप्त होता है, अतः उसका निषेध करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
परमाणुके प्रदेश नहीं होते ॥११॥
१. च शब्देनानन्ता-मु०, ता०, ना० ।