सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 329, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें– ५।२२ ६ ५६९ ] पञ्चमोऽध्यायः २१७
समयादिभिर्निर्वर्त्यमानानां च पाकादीनां समयः पाक इत्येवमादित्वसंज्ञारूढिसद्भावेऽपि समयः
कालः ओदनपाकः काल इति अध्यारोप्यमाणः कालब्यपदेशस्तद्व्यपदेशनिमित्तस्य कालस्यास्तित्वं
गमयति । कुतः । गौणस्य मुख्यापेक्षत्वात् । द्रव्यस्य पर्यायो धर्मान्तरनिवृत्तिधर्मान्तरोत्पादनरूपः
अपरिस्पन्दात्मकः परिणामः । जीवस्य क्रोधादिः, पुद्गलस्य वर्णादिः । धर्माधर्माकाशानामगुरुलघु-
गुणवृद्धिहानिकृतः । क्रिया परिस्पन्दात्मिका³ । सा द्विविधा; प्रायोगिकवैस्रसिकभेदात् । तत्र प्रायो-
गिकी शकटादीनाम्, वैस्रसिकी मेघादीनाम् । परत्वापरत्वे क्षेत्रकृते कालकृते च स्तः । तत्र कालो-
पैकारप्रकरणात्कालकृते गृह्येते । त एते वर्तनादय उपकाराः कालस्यास्तित्वं गमयन्ति । ननु
'वर्तना'ग्रहणमेवास्तु, तद्भेदाः परिणामादयस्तेषां पृथग्ग्रहणमनर्थकम् । नानर्थकम्; कालद्वयसूच-
नार्थत्वात्प्रपञ्चस्य । कालो हि द्विविधः परमार्थकालो व्यवहारकालश्च । परमार्थकालो वर्तना-
लक्षणः । परिणामादिलक्षणो व्यवहारकालः । अन्येन परिच्छिन्नः अन्यस्य परिच्छेदहेतुः क्रिया- १०
विशेषः काल इति व्यवह्रियते । स त्रिधा व्यवतिष्ठते भूतो वर्तमानो भविष्यन्निति । तत्र परमार्थ-
काले कालव्यपदेशो मुख्यः । भूतादिव्यपदेशो गौणः । व्यवहारकाले भूतादिव्यपदेशो मुख्यः ।
कालव्यपदेशो गौणः; क्रियावद्द्रव्यापेक्षत्वात्कालकृतत्वाच्च । अत्राह, धर्माधर्माकाशपुद्गलजी-
वकालानामपकारा उक्ताः । लक्षणं चोक्तम् 'उपयोगो लक्षणम्' इत्येवमादि । पुद्गलानां तु
समाधान - समयादिक क्रियाविशेषोंकी और समयादिकके द्वारा होनेवाले पाक आदिककी समय, १५
पाक इत्यादिक रूपसे अपनी अपनी रूढ़िक संज्ञाके रहते हुए भी उसमें जो समय काल, ओदनपाक-
काल इत्यादि रूपसे काल संज्ञाका अध्यारोप होता है वह उस संज्ञाके निमित्तभूत मुख्यकालके
अस्तित्वका ज्ञान कराता है क्योंकि गौण व्यवहार मुख्यकी अपेक्षा रखता है। एक धर्मकी निवृत्ति
करके दूसरे धर्मके पैदा करने रूप और परिस्पन्दसे रहित द्रव्यकी जो पर्याय है उसे परिणाम कहते
हैं। यथा जीवके क्रोधादि और पुद्गलके वर्णादि । इसी प्रकार धर्म, अधर्म, आकाश और काल २०
द्रव्यमें परिणाम होता है जो अगुरुलघु गुणकी वृद्धि और हानिसे उत्पन्न होता है। द्रव्यमें जो
परिस्पन्दरूप परिणमन होता है उसे क्रिया कहते हैं। प्रायोगिक और वैस्रसिकके भेदसे वह दो
प्रकारकी है। उनमें-से गाड़ी आदिकी प्रायोगिकी क्रिया है और मेघादिककी वैस्रसिकी । परत्व
और अपरत्व दो प्रकारका है- क्षेत्रकृत और कालकृत । प्रकृतमें कालकृत उपकारका
प्रकरण है इसलिए कालकृत परत्व और अपरत्व लिये गये हैं। ये सब वर्तनादिक उपकार २५
कालके अस्तित्वका ज्ञान कराते हैं। शंका - सूत्रमें केवल वर्तना पदका ग्रहण करना पर्याप्त है।
परिणाम आदिक उसके भेद हैं अतः उनका अलगसे ग्रहण करना निष्फल है । समाधान - परिणाम
आदिकका अलगसे ग्रहण करना निष्फल नहीं है, क्योंकि दो प्रकारके कालके सूचन करनेके लिए
इतना विस्तारसे कथन किया है। काल दो प्रकारका है-- परमार्थ काल और व्यवहारकाल ।
इनमें-से परमार्थ काल वर्तना लक्षणवाला है और परिणाम आदि लक्षणवाला व्यवहार काल है। ३०
तात्पर्य यह है कि जो क्रिया विशेष अन्यसे परिच्छिन्न होकर अन्यके परिच्छेदका हेतु है उसमें
काल इस प्रकारका व्यवहार किया गया है। वह काल तीन प्रकारका है- भूत, वर्तमान और
भविष्यत् । उनमें-से परमार्थ कालमें काल यह संज्ञा मुख्य है और भूतादिक व्यपदेश गौण है।
तथा व्यवहार कालमें भूतादिक रूप संज्ञा मुख्य है और काल संज्ञा गौण है; क्योंकि इस प्रकारका
व्यवहार क्रियावाले द्रव्यकी अपेक्षासे होता है तथा कालका कार्य है। यहाँ पर शंकाकार कहता ३५
है कि धर्म, अधर्म, आकाश, पुद्गल, जीव और काल द्रव्यका उपकार कहा तथा 'उपयोगो
१. -द्विष्वसंज्ञा-मु० । २. पाककालः मु० । ३. -त्मिका । परत्वापरत्वे ता० । ४. कालोपकरणा-मु० ।
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