सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ५।१९ § ५६३ ] पञ्चमोऽध्यायः २११
कायादयः पुन्र्निष्क्रिया नित्यसंबन्धास्तेषां कथमवगाह इति चेत् । न; उपचारांतस्तत्सिद्धेः । यथा
गमनाभावेऽपि 'सर्वगतमाकाशम्' इत्युच्यते; सर्वत्र सद्भावात्, एवं धर्माधर्मवपि अवगाहक्रिया-
भावेऽपि सर्वत्र व्याप्तिदर्शनादवगाहिनावित्युपचर्येते । आह यद्यवकाशदानमस्य स्वभावो वज्रादि-
भिर्लोष्टादीनां भित्त्यादिभिर्गवादीनां च व्याघातो न प्राप्नोति । दृश्यते च व्याघातः । तस्मादस्याव-
काशदानं हीयते इति । नैष दोषः; वज्रलोष्टादीनां स्थूलानां परस्परव्याघात इति नास्यावकाश- ५
दानसामर्थ्यं हीयते; तत्रावगाहिनामेव व्याघातात् । वज्रादयः पुनः स्थूलत्वात्परस्परं प्रत्यवकाश-
दानं न कुर्वन्तीति नासावाकाशदोषः । ये खलु पुद्गलाः सूक्ष्मास्ते¹ परस्परं प्रत्यवकाशदानं
कुर्वन्ति । यद्येवं नेदमाकाशस्यासाधारणं लक्षणम्; इतरेषामपि तत्सद्भावादिति । तन्न; सर्वपदा-
र्थानां साधारणावगाहनहेतुत्वमस्यासाधारणं लक्षणमिति नास्ति दोषः । अलोकाकाशे तदभावाद-
भाव इति चेत्; न; स्वभावापरित्यागात् । १०
§ ५६२. उक्त आकाशस्योपकारः । अथ तदनन्तरोद्दिष्टानां पुद्गलानां क उपकार इत्य-
त्रोच्यते—
शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् ।।१९।।
§ ५६३. इदमयुक्तं वर्तते । किमत्रायुक्तम् । पुद्गलानां क उपकार इति परिप्रश्ने पुद्गलानां
निष्क्रिय और सदा सम्बन्धवाले हैं इसलिए उनका अवगाह कैसे बन सकता है ? समाधान—नहीं; १५
क्योंकि उपचारसे इसकी सिद्धि होती है । जैसे गमन नहीं करने पर भी आकाश सर्वगत कहा
जाता है, क्योंकि वह सर्वत्र पाया जाता है इसी प्रकार यद्यपि धर्म और अधर्म द्रव्यमें अवगाह-
रूप क्रिया नहीं पायी जाती तो भी लोकाकाशमें वे सर्वत्र व्याप्त हैं अतः वे अवगाही हैं ऐसा
उपचार कर लिया जाता है । शंका—यदि अवकाश देना आकाशका स्वभाव है तो वज्रादिकसे
लोढ़ा आदिकका और भीत आदिकसे गाय आदिकका व्याघात नहीं प्राप्त होता है, किन्तु व्याघात २०
तो देखा जाता है इससे मालूम होता है कि अवकाश देना आकाशका स्वभाव नहीं ठहरता ?
समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि वज्र और लोढ़ा आदिक स्थूल पदार्थ हैं इसलिए उनका
आपसमें व्याघात होता है, अतः आकाशकी अवकाश देने रूप सामर्थ्य नहीं नष्ट होती । यहाँ जो
व्याघात दिखाई देता है वह अवगाहन करनेवाले पदार्थोंका ही है । तात्पर्य यह है कि वज्रादिक
स्थूल पदार्थ हैं इसलिए वे परस्पर अवकाश नहीं देते, यह कुछ आकाशका दोष नहीं है । हाँ, जो २५
पुद्गल सूक्ष्म होते हैं वे परस्पर अवकाश देते हैं । शंका—यदि ऐसा है तो यह आकाशका असा-
धारण लक्षण नहीं रहता, क्योंकि दूसरे पदार्थोंमें भी इसका सद्भाव पाया जाता है ? समाधान—
नहीं, क्योंकि आकाश द्रव्य सब पदार्थोंको अवकाश देनेमें साधारण कारण है यही इसका असाधारण
लक्षण है, इसलिए कोई दोष नहीं है । शंका—अलोकाकाशमें अवकाशदान रूप स्वभाव नहीं पाया
जाता, इससे ज्ञात होता है कि यह आकाशका स्वभाव नहीं है ? समाधान—नहीं, क्योंकि कोई ३०
भी द्रव्य अपने स्वभावका त्याग नहीं करता ।
§ ५६२. आकाश द्रव्यका उपकार कहा । अब उसके अनन्तर कहे गये पुद्गलोंका क्या
उपकार है, यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शरीर, वचन, मन और प्राणापान यह पुद्गलोंका उपकार है ॥१९॥
§ ५६३. शंका—यह अयुक्त है ? प्रतिशंका—क्या अयुक्त है ? शंका—पुद्गलोंका क्या ३५
१. -स्तेऽपि परस्प- आ०, दि० १, दि० २ । २. -क्षणमिति परे-आ०, दि० १, दि० २ ।