सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 328, कुल 558 में से
संदर्भ में पढ़ें२१६ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।२२ § ५६८ –
§ ५६८. आह, यद्यवश्यं सतोपकारिणा भवितव्यम्; संश्च कालोऽभिमतस्तस्य क उपकार
इत्यत्रोच्यते—
वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य ॥२२॥
§ ५६९. वृत्तेर्णिजन्तात्कर्मणि भावे वा युटि स्त्रीलिङ्गे वर्तनेति भवति । वर्त्यते¹ वर्तनमात्रं
५ वा वर्तना इति । धर्मादीनां द्रव्याणां स्वपर्यायनिर्वृत्ति प्रति स्वात्मनैव वर्तमानानां बाह्योपग्रहाद्विना
तद्वृत्त्यभावात्तत्प्रवर्तनोपलक्षितः काल इति कृत्वा वर्तना कालस्योपकारः । को णिजर्थः । वर्तते
द्रव्यपर्यायस्तस्य वर्तयिता कालः । यद्येवं कालस्य क्रियावत्त्वं प्राप्नोति । यथा शिष्योऽधीते, उपा-
ध्यायोऽध्यापयतीति । नैष दोषः; निमित्तमात्रेऽपि हेतुकर्तृव्यपदेशो दृष्टः । यथा "कारीषो²ऽग्निर-
ध्यापयति³ ।" एवं कालस्य हेतुकर्तृता । स कथं काल इत्यवसीयते । समयादीनां क्रियाविशेषाणां
१० अपनी योग्यतानुसार ही होता है । संसारी जीव पुद्गल द्रव्यसे बँधा हुआ है यह भी अपनी
योग्यताके कारण ही और कालान्तरमें मुक्त होता है यह भी अपनी योग्यतानुसार ही । तथापि
प्रत्येक द्रव्यके इस योग्यतानुसार कार्यके होनेमें बाह्य पदार्थ निमित्त माना जाता है । जैसे बालक-
में पढ़नेकी योग्यता है इसलिए उसे अध्यापक व पुस्तक आदिका निमित्त मिलने पर वह पढ़कर
विद्वान् बनता है, इसलिए ये अध्यापक आदि उसके निमित्त हैं। पर तत्त्वतः विचार करने पर
१५ ज्ञात होता है कि यहाँ कुछ अध्यापक या पुस्तक आदिने बालककी आत्मामें बुद्धि नहीं उत्पन्न
कर दी । यदि इन बाह्य पदार्थोंमें बुद्धि उत्पन्न करनेकी योग्यता होती तो जितने बालक उस
अध्यापकके पास पढ़ते हैं उन सबमें वह बुद्धि उत्पन्न कर सकता था । पर देखा यह जाता है कि
कोई मूर्ख रहता है, कोई अल्पज्ञानी हो पाता है और कोई महाज्ञानी हो जाता है । एक ओर तो
अध्यापकके बिना बालक पढ़ नहीं पाता और दूसरी ओर यदि बालकमें बुद्धिके प्रादुर्भाव होनेकी
२० योग्यता नहीं है तो अध्यापकके लाख चेष्टा करने पर भी वह मूर्ख बना रहता है । इससे ज्ञात
होता है कि कार्यकी उत्पत्तिमें अध्यापक निमित्त तो है पर वह प्रेरक नहीं । ईश्वरको मान्यतामें
प्रेरकतापर बल दिया गया है और यहाँ उपकार प्रकरणमें निमित्तको तो स्वीकार किया गया है
पर उसे प्रेरक नहीं माना है । यहाँ उपकार प्रकरणके ग्रथित करनेका यही अभिप्राय है ।
§ ५६८. यदि ऐसा है कि जो है उसे अवश्य उपकारी होना चाहिए तो काल भी सद्रूप माना
२५ गया है इसलिए उसका क्या उपकार है, इसी बातके बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं ।
वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व ये कालके उपकार हैं ॥२२॥
§ ५६९. णिजन्त 'वर्त' धातुसे कर्म या भावमें 'ल्युट्' प्रत्ययके करनेपर स्त्रीलिंगमें वर्तना
शब्द बनता है । जिसकी व्युत्पत्ति 'वर्त्यते' या 'वर्तनमात्रम्' होती है । यद्यपि धर्मादिक द्रव्य अपनी
नवीन पर्यायके उत्पन्न करनेमें स्वयं प्रवृत्त होते हैं तो भी वह बाह्य सहकारी कारणके बिना नहीं
३० हो सकती इसलिए उसे प्रवर्तानेवाला काल है ऐसा मान कर वर्तना कालका उपकार कहा है ।
शंका-णिजर्थ क्या है ? समाधान -द्रव्यकी पर्याय बदलती है और उसे बदलानेवाला काल है ।
शंका-यदि ऐसा है तो काल क्रियावान् द्रव्य प्राप्त होता है ? जैसे शिष्य पढ़ता है और उपाध्याय
पढ़ाता है । यहाँ उपाध्याय क्रियावान् द्रव्य है ? समाधान- यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि निमित्त-
मात्रमें भी हेतुकर्ता रूप व्यपदेश देखा जाता है । जैसे कंडेकी अग्नि पढ़ाती है । यहाँ कंडेकी अग्नि
३५ निमित्तमात्र है उसी प्रकार काल भी हेतुकर्ता है । शंका- वह काल है यह कैसे जाना जाता है ?
१. -र्त्यते वर्तते वर्तन- मु० । २. कारीषाग्नि-आ० । ३. 'हेतुनिर्देशश्च निमित्तमात्रे भिक्षादिषु दर्शनात् ।
हेतुनिर्देशश्च निमित्तमात्रे द्रष्टव्यः । यावद् ब्रूयान्निमित्तं कारणमिति तावद्धेतुरिति । किं प्रयोजनम् ? भिक्षादिषु
दर्शनात् । भिक्षादिष्वपि णिजृदृश्यते भिक्षा वासयन्ति कारीषोऽग्निरध्यापयति इति ।' -पा० म० भा० ३, १,
२, २६ ।
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