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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 318, कुल 558 में से

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पृष्ठ 318

२०६ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१३ ६ ५५० -
रूपादयः शरीरे हस्तादय इति । लोक इत्युच्यते । को लोकः । धर्माधर्मादीनि द्रव्याणि यत्र
लोक्यन्ते स लोक इति । अधिकरणसाधनो घञ् । आकाशं द्विधा विभक्तं लोकाकाशमलोकाकाशं
चेति । लोक उक्तः । स यत्र तल्लोकाकाशम् । ततो बहिः सर्वतोऽनन्तमलोकाकाशम् । लोकालोक-
विभागश्च धर्माधर्मास्तिका य सद्भावासद्भावाद्द्ज्ञेयः । असति हि तस्मिन्धर्मास्तिकाये जीवपुद्-
गलांनां गतिनियमहेत्वभावाद्विभागो न स्यात् । असति चाधर्मास्तिकाये स्थितेराश्रयनिमित्ताभावात्
स्थितेरभावो लोकालोकविभागाभावो वा स्यात् । तस्मादुभयसद्भावाँसद्भावाल्लोकालोक-
विभागसिद्धिः ।
§ ५५०. तत्रावध्रियमाणानामवस्थानभेदसंभवाद्विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह -
धर्माधर्मयोः कृत्स्ने ॥१३॥
§ ५५१. कृत्स्नवचनमशेषव्याप्तिप्रदर्शनायँम् । अगारेऽवस्थितो घट इति यथा तथा धर्माधर्म-
योर्लोकाकाशेऽवगाहो न भवति । किं र्तार्ह । कृत्स्ने तिलेषु तैलवदिति । अन्योन्यप्रदेशप्रवेशव्याघाता-
भावः अवगाहनशक्तियोगाद्वेदितव्यः ।
§ ५५२. अतो विपरीतानां मूर्तिमतोमप्रदेशसंख्येयासंख्येयानन्तप्रदेशानां पुद्गलानामवगाह-
विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह -
भाव देखा जाता है। यथा - घटमें रूपादिकका और शरीरमें हाथ आदिका । अब लोकका स्वरूप
कहते हैं- शंका- लोक किसे कहते हैं ? समाधान - जहाँ धर्मादिक द्रव्य विलोके जाते हैं उसे लोक
कहते हैं । 'लोक' धातुसे अधिकरण अर्थमें 'घञ्' प्रत्यय करके लोक शब्द बना है। आकाश दो
प्रकारका है- लोकाकाश और अलोकाकाश । लोकका स्वरूप पहले कह आये हैं। वह जितने
आकाशमें होता है वह लोकाकाश है और उससे बाहर सबसे अनन्त अलोकाकाश है। यह लोका-
लोकका विभाग धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकायके सद्भाव और असद्भावकी अपेक्षासे जानना
चाहिए । अर्थात् धर्मास्तिकाय और अधर्मास्तिकाय जहां तक पाये जाते हैं वह लोकाकाश है और
इससे बाहर अलोकाकाश है । यदि धर्मास्तिकायका सद्भाव न माना जाय तो जीव और पुद्गलों-
की गतिके नियमका हेतु न रहनेसे लोकालोकका विभाग नहीं बनता । उसी प्रकार यदि अधर्मा-
स्तिकायका सद्भाव न माना जाय तो स्थितिका निमित्त न रहनेसे जीव और पुद्गलोंकी स्थितिका
अभाव होता है जिससे लोकालोकका विभाग नहीं बनता । इसलिए इन दोनोंके सद्भाव और
असद्भावकी अपेक्षा लोकालोकके विभागकी सिद्धि होती है।
§ ५५०. लोकाकाशमें जितने द्रव्य बतलाये हैं उनके अवस्थानमें भेद हो सकता है इसलिए
प्रत्येक द्रव्यके अवस्थान विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
धर्म और अधर्म द्रव्यका अवगाह समग्र लोकाकाशमें है ॥१३॥
§ ५५१. सब लोकाकाशके साथ व्याप्तिके दिखलानेके लिए सूत्रमें 'कृत्स्न' पद रखा है।
घरमें जिस प्रकार घट अवस्थित रहता है उस प्रकार लोकाकाशमें धर्म और अधर्म द्रव्यका अवगाह
नहीं है। किन्तु जिस प्रकार तिलमें तैल रहता है उस प्रकार सब लोकाकाशमें धर्म और अधर्म
द्रव्यका अवगाह है । यद्यपि ये सब द्रव्य एक जगह रहते हैं तो भी अवगाहन शक्तिके निमित्तसे
इनके प्रदेश परस्पर प्रविष्ट होकर व्याघातको नहीं प्राप्त होते ।
§ ५५२. अब जो उक्त द्रव्योंसे विपरीत हैं और जो अप्रदेशी हैं या संख्यात असंख्यात और
अनन्तप्रदेशी हैं ऐसे मूर्तिमान् पुद्गलोंके अवगाह विशेषके ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते है-
१. 'हलः' जैनेन्द्र, २।३।११८। 'हलश्च' पाणिनि, ३।३।१२१ । २. -कायसद्भावाद्धि-मु० । ३. -रभावः ।
तस्या अभावे लोका-मु०, ता०, ना० । ४. - भयसद्भावाल्लोका-मु० । ५. -मतामेकप्रदे-मु० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri