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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 321, कुल 558 में से

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पृष्ठ 321
  • ५।१७ § ५५९ ] पञ्चमोऽध्यायः २०९
    “अण्णोण्णं पविसंता दिंता ओगासमण्णमण्णस्स ।
    मेलंता वि य णिच्चं सगसब्भावं ण जहंति ।”
    § ५५८. यद्येवं धर्मादीनां स्वभावभेद उच्यतामित्यत आह—
    गतिस्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ॥१७॥
    § ५५९. देशान्तरप्राप्तिहेतुर्गतिः। तद्विपरीता स्थितिः। उपगृह्यत इत्युपग्रहः। गतिश्च ५
    स्थितिश्च गतिस्थिती। गतिस्थिती एव उपग्रहौ गतिस्थित्युपग्रहौ। धर्माधर्मयोरिति कर्तृनिर्देशः।
    उपक्रियत इत्युपकारः। कः पुनरसौ। गत्युपग्रहः स्थित्युपग्रहश्च। यद्येवं द्वित्वनिर्देशः प्राप्नोति।
    नैष दोषः; सामान्येन व्युत्पादितः१ शब्द उपात्तसंख्यः शब्दान्तरसंबन्धे सत्यपि न पूर्वोपात्तां संख्यां
    जहाति। यथा—“साधोः कार्यं तपःश्रुते” इति। एतदुक्तं भवति-गतिपरिणामिनां जीवपुद्गलानां
    गत्युपग्रहे कर्तव्ये धर्मास्तिकायः साधारणश्रयो जलवन्मत्स्यगमने। तथा स्थितिपरिणामिनां १०
    जीवपुद्गलानां स्थित्युपग्रहे कर्तव्ये अधर्मास्तिकायः साधारणश्रयः पृथिवीधातुरिवाश्वादिस्थित्या-
    विति। ननु च 'उपग्रह' वचनमनर्थकम् 'उपकारः' इत्येवं२ सिद्धत्वात्। 'गतिस्थिती धर्माधर्म-
    योरुपकारः' इति। नैष दोषः; याथासंख्यनिवृत्त्यर्थम् 'उपग्रह'वचनम्। धर्माधर्मयोर्गतिस्थित्योश्च
    यथासंख्यं भवति, एवं जीवपुद्गलानां यथासंख्यं प्राप्नोति धर्मस्योपकारो जीवानां गतिः अधर्म-
    'सब द्रव्य परस्पर प्रविष्ट हैं, एक दूसरेको अवकाश देते हैं, और सदा मिलकर रह १५
    रहे हैं तो भी अपने स्वभावको नहीं छोड़ते।'
    § ५५८. यदि ऐसा है तो धर्मादिक द्रव्योंका स्वभावभेद कहना चाहिए इसलिए आगेका
    सूत्र-कहते हैं—
    गति और स्थितिमें निमित्त होना यह क्रमसे धर्म और अधर्म द्रव्यका उपकार है ॥१७॥
    § ५५९. एक स्थानसे दूसरे स्थानके प्राप्त करानेमें जो कारण है उसे गति कहते हैं। स्थिति- २०
    का स्वरूप इससे उलटा है। उपग्रह शब्द उपकारका पर्यायवाची है जिसकी व्युत्पत्ति 'उपगृह्यते'
    है। गति और स्थिति इन दोनोंमें द्वन्द्व समास है। गति और स्थिति ही उपग्रह हैं, इसलिए
    'गतिस्थित्युपग्रहौ' यह सूत्रवचन कहा है। 'धर्माधर्मयोः' यह कर्ता अर्थमें षष्ठी निर्देश है। उपकार-
    की व्युत्पत्ति 'उपक्रियते' है। शंका—यह उपकार क्या है ? समाधान—गति उपग्रह और स्थिति
    उपग्रह यही उपकार है। शंका—यदि ऐसा है तो द्विवचनका निर्देश प्राप्त होता है ? समाधान— २५
    यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि सामान्यसे ग्रहण किया गया शब्द जिस संख्याको प्राप्त कर लेता है
    दूसरे शब्दके सम्बन्ध होनेपर भी वह उस संख्याको नहीं छोड़ता। जैसे 'साधोः कार्यं तपःश्रुते'
    इस वाक्य में 'कार्यम्' एकवचन और 'तपःश्रुते' द्विवचन है। यही बात प्रकृतमें जानना चाहिए।
    इस सूत्रका यह अभिप्राय है कि जिस प्रकार मछलीके गमनमें जल साधारण निमित्त है उसी
    प्रकार गमन करते हुए जीव और पुद्गलोंके गमनमें धर्मास्तिकाय साधारण निमित्त है। तथा जिस ३०
    प्रकार घोड़ा आदिके ठहरनेमें पृथिवी साधारण निमित्त है उसी प्रकार ठहरनेवाले जीव और
    पुद्गलोंके ठहरनेमें अधर्मास्तिकाय साधारण निमित्त है। शंका—सूत्रमें 'उपग्रह' वचन निरर्थक है
    क्योंकि 'उपकार' इसीसे काम चल जाता है। यथा—'गतिस्थिती धर्माधर्मयोरुपकारः' ?
    समाधान—यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि यथाक्रमके निराकरण करनेके लिए 'उपग्रह' पद रखा
    है। जिस प्रकार धर्म और अधर्मके साथ गति और स्थितिका क्रमसे सम्बन्ध होता है उसी प्रकार ३५
    जीव और पुद्गलोंका क्रमसे सम्बन्ध प्राप्त होता है। यथा-धर्म द्रव्यका उपकार जीवोंकी गति
    १. -दितः उपात्त-ता०, ना०, मु०। २. इत्येव सिद्ध-ता० ।
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