सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२२२ सर्वार्थसिद्धौ [ ५।२७ § ५७७ –
द्विप्रदेशस्याणोश्च त्रयाणां वा अणूनां संघातात्त्रिप्रदेशः । द्वयोर्द्विप्रदेशयोस्त्रिप्रदेशस्याणोश्च
चतुर्णां वा अणूनां संघाताचतुःप्रदेशः । एवं संख्येयासंख्येयानन्तानामनन्तानन्तानां च
संघातात्तावत्प्रदेशः। एषामेव भेदात्तावद्² द्विप्रदेशपर्यन्ताः स्कन्धा उत्पद्यन्ते । एवं भेदसंघाताभ्या-
मेकसमयिकाभ्यां द्विप्रदेशादयः स्कन्धा उत्पद्यन्ते । अन्यतो भेदेनान्यस्य संघातेनेति । एवं स्कन्धा-
नामुत्पत्तिहेतुरुक्तः।
§ ५७७. अणोरुत्पत्तिहेतुप्रदर्शनार्थमाह—
भेदादणुः ॥२७॥
§ ५७८. "सिद्धे ³ विधिरारभ्यमाणो नियमार्थो भवति ।” अणोरुत्पत्तिर्भेदादेव, न संघाता-
न्नापि भेदसंघाताभ्यामिति ।
§ ५७९. आह, संघातादेव स्कन्धानामात्मलाभे सिद्धे भेदसंघातग्रहणमनर्थकमिति तद्ग्रहण-
प्रयोजनप्रतिपादनार्थमिदमुच्यते—
भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः ॥२८॥
§ ५८०. अनन्तानन्तपरमाणुसमुदयनिष्पाद्योऽपि कश्चिच्चाक्षुषः कश्चिदचाक्षुषः । तत्र
योऽचाक्षुषः स कथं चाक्षुषो भवतीति चेदुच्यते—भेदसंघाताभ्यां चाक्षुषः । न भेदादिति । कात्रोप-
संघात इन दोनोंसे स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। खुलासा इस प्रकार है—दो परमाणुओंके संघातसे दो
प्रदेशवाला स्कन्ध उत्पन्न होता है। दो प्रदेशवाले स्कन्ध और अणुके संघातसे या तीन अणुओंके
संघातसे तीन प्रदेशवाला स्कन्ध उत्पन्न होता है। दो प्रदेशवाले दो स्कन्धोंके संघातसे, तीन
प्रदेशवाले स्कन्ध और अणुके संघातसे या चार अणुओंके संघातसे चार प्रदेशवाला स्कन्ध उत्पन्न
होता है। इस प्रकार संख्यात, असंख्यात, अनन्त और अनन्तानन्त अणुओंके संघातसे उतने उतने
प्रदेशोंवाले स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। तथा इन्हीं संख्यात आदि परमाणुवाले स्कन्धोंके भेदसे दो
प्रदेशवाले स्कन्ध तक स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। इसी प्रकार एक समयमें होनेवाले भेद और संघात
इन दोनोंसे दो प्रदेशवाले आदि स्कन्ध उत्पन्न होते हैं। तात्पर्य यह है कि जब अन्य स्कन्धसे
भेद होता है और अन्यका संघात, तब एक साथ भेद और संघात इन दोनोंसे भी स्कन्धकी उत्पत्ति
होती है। इस प्रकार स्कन्धोंकी उत्पत्तिका कारण कहा।
§ ५७७. अब अणुकी उत्पत्तिके हेतुको दिखलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भेदसे अणु उत्पन्न होता है ॥२७॥
§ ५७८. कोई विधि सिद्ध हो, फिर भी यदि उसका आरम्भ किया जाता है तो वह नियम
के लिए होती है। तात्पर्य यह है कि अणु भेदसे होता है यद्यपि यह सिद्ध है फिर भी 'भेदादणुः'
इस सूत्रके निर्माण करनेसे यह नियम फलित होता है कि अणुकी उत्पत्ति भेदसे ही होती है। न
संघातसे होती है और न भेद और संघात इन दोनोंसे ही होती है।
§ ५७९. जब संघातसे ही स्कन्धोंकी उत्पत्ति होती है तब सूत्रमें भेद और संघात इन दोनों
पदोंका ग्रहण करना निष्फल है ? अतः इन दोनों पदोंके ग्रहण करनेका क्या प्रयोजन है इसका
कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
भेद और संघातसे चाक्षुष स्कन्ध बनता है ॥२८॥
§ ५८०. अनन्तानन्त परमाणुओंके समुदायसे निष्पन्न होकर भी कोई स्कन्ध चाक्षुष होता
है और कोई अचाक्षुष । उसमें जो अचाक्षुष स्कन्ध है वह चाक्षुष कैसे होता है इसी बातके बतलाने
१. –ख्येयानन्तानां च संघा–ता०, ना० । २. भेदाद्द्विप्रदे–ता०, आ०, दि० १, दि० २ । ३. ‘सिद्धे सत्यारम्भो नियमार्थः’ न्यायसंग्रहः ।