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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 333, कुल 558 में से

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पृष्ठ 333
  • ५।२६ § ५७६ ] पञ्चमोऽध्यायः २२१
    "अत्तादि अत्तमज्झं अत्तंतं णेव इंदिये गेज्झं ।
    जं दव्वं अविभागी तं परमाणुं विआणाहि ।"
    स्थूलभावेन ग्रहणनिक्षेपणादिव्यापारस्कन्धनात्स्कन्धा इति संज्ञायन्ते । रूढौ क्रिया क्वचि-
    त्सती उपलक्षणत्वेनाश्रीयते इति ग्रहणादिव्यापारारोग्येष्वपि द्वयणुकादिषु स्कन्धाख्या प्रवर्तते ।
    अनन्तभेदा अपि पुद्गला अणुजात्या स्कन्धजात्या च द्वैविध्यमापद्यमानाः सर्वे गृह्यन्त इति ५
    तज्जात्याधारानन्तभेदसंसूचनार्थं बहुवचनं क्रियते । अणवः स्कन्धा इति भेदाभिधानं पूर्वोक्तसूत्रद्वय-
    भेदसंबन्धनार्थम् । स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तोऽणवः । स्कन्धाः पुनः शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेद-
    तमश्छायातपोद्योतवन्तश्च स्पर्शादिमन्तश्चेति ।
    § ५७५. आह, किमेषां पुद्गलानामणुस्कन्धलक्षणः परिणामोऽनादिरुत आदिमानित्युच्यते ।
    स खलूत्पत्तिमत्त्वादादिमान्प्रतिज्ञायते । यद्येवं तस्मादभिधीयतां कस्मान्निमित्तादुत्पद्यन्त इति । तत्र १०
    स्कन्धानां तावदुत्पत्तिहेतुप्रतिपादनार्थमुच्यते—
    भेदसंघातेभ्य उत्पद्यन्ते ॥२६॥
    § ५७६. संघातानां द्वितयनिमित्तवशाद्विदारणं भेदः । पृथग्भूतानामेकत्वापत्तिः संघातः ।
    ननु च द्वित्वाद् द्विवचनेन भवितव्यम् । बहुवचननिर्देशस्त्रितयसंग्रहार्थः । भेदात्संघाताद् भेदसंघा-
    ताभ्यां च उत्पद्यन्त इति । तद्यथा—द्वयोः परमाण्वोः संघाताद् द्विप्रदेशः स्कन्ध उत्पद्यते । १५
    'जिसका आदि, मध्य और अन्त एक है, और जिसे इन्द्रियां नहीं ग्रहण कर सकतीं ऐसा
    जो विभाग रहित द्रव्य है उसे परमाणु समझो ।'
    जिनमें स्थूल रूपसे पकड़ना, रखना आदि व्यापारका स्कन्धन अर्थात् संघटना होती है वे
    स्कन्ध कहे जाते हैं। रूढ़िमें क्रिया कहीं पर होती है, सर्वत्र नहीं। फिर भी उपलक्षणरूपसे वह ली
    जाती है, इसलिए ग्रहण आदि व्यापारके अयोग्य द्वयणुक आदिकमें भी स्कन्ध संज्ञा प्रवृत्त होती २०
    है। पुद्गलोंके अनन्त भेद हैं तो भी वे सब अणुजाति और स्कन्धजातिके भेदसे दो प्रकारके हैं।
    इस प्रकार पुद्गलोंकी इन दोनों जातियोंके आधारभूत अनन्त भेदोंके सूचन करनेके लिए सूत्रमें
    बहुवचनका निर्देश किया है। यद्यपि सूत्रमें अणु और स्कन्ध इन दोनों पदोंको समसित रखा जा
    सकता था तब भी ऐसा न करके 'अणवः स्कन्धाः' इस प्रकार भेद रूपसे जो कथन किया है वह
    इस सूत्रसे पहले कहे गये दो सूत्रोंके साथ अलग अलग सम्बन्ध बतलानेके लिए किया है। २५
    जिससे यह ज्ञात हो कि अणु स्पर्श, रस, गन्ध और वर्णवाले हैं परन्तु स्कन्ध शब्द, बन्ध, सौक्ष्म्य,
    स्थौल्य, संस्थान, भेद, छाया, आतप और उद्योतवाले हैं तथा स्पर्शादिवाले भी हैं।
    § ५७५. इन पुद्गलोंका अणु और स्कन्धरूप परिणाम होना अनादि है या सादि ? वह
    उत्पन्न होता इसलिए सादि है। यदि ऐसा है तो उस निमित्तका कथन करो जिससे अणु और
    स्कन्ध ये भेद उत्पन्न होते हैं ? इसलिए पहले स्कन्धोंकी उत्पत्तिके हेतुका कथन करनेके लिए ३०
    आगेका सूत्र कहते हैं—
    भेदसे, संघातसे तथा भेद और संघात दोनोंसे स्कन्ध उत्पन्न होते हैं ।।२६।।
    § ५७६. अन्तरंग और बहिरंग इन दोनों प्रकारके निमित्तोंसे संघातोंके विदारण करनेको
    भेद कहते हैं। तथा पृथग्भूत हुए पदार्थोंके एकरूप हो जानेको संघात कहते हैं। शंका—भेद और
    संघात दो हैं इसलिए सूत्रमें द्विवचन होना चाहिए ? समाधान—तीनका संग्रह करनेके लिए सूत्रमें ३५
    बहुवचनका निर्देश किया है। जिससे यह अर्थ सम्पन्न होता है कि भेदसे, संघातसे तथा भेद और
    १. तृतीय-मु० ।