सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished558 पृष्ठ
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- ५।२१ § ५६७ ] पञ्चमोऽध्यायः २१५
परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥२१॥
§ ५६७. 'परस्पर'शब्दः कर्मव्यतिहारे वर्तते । कर्मव्यतिहारश्च क्रियाव्यतिहारः । परस्पर-
स्योपग्रहः परस्परोपग्रहः । जीवानामुपकारः । कः पुनरसौ । स्वामी भृत्यः, आचार्यः शिष्यः,
इत्येवमादिभावेन वृत्तिः परस्परोपग्रहः । स्वामी तावद्वित्तत्यागादिना भृत्यानामुपकारे वर्तते ।
भृत्याश्च हितप्रतिपादनेनाहितप्रतिषेधेन च । आचार्य उभयलोकफलप्रदोपदेशदर्शनेन तदुपदेश- ५
विहितक्रियानुष्ठापनेन च शिष्याणामनुग्रहे वर्तते । शिष्या अपि तदानुकूल्यवृत्त्या आचार्याणाम्¹ ।
उपकाराधिकारे पुनः 'उपग्रह'वचनं किमर्थम् । पूर्वोक्तसुखादिचतुष्टयप्रदर्शनार्थं पुनः 'उपग्रह'वचनं
क्रियते² । सुखादीन्यपि जीवानां जीवकृत उपकार इति ।
परस्पर निमित्त होना यह जीवोंका उपकार है ॥२१॥
§ ५६७. परस्पर यह शब्द कर्म व्यतिहार अर्थमें रहता है । और कर्मव्यतिहारका अर्थ १०
क्रियाव्यतिहार है । परस्परका उपग्रह परस्परोपग्रह है । यह जीवोंका उपकार है । शंका—
वह क्या है ? समाधान—स्वामी और सेवक तथा आचार्य और शिष्य इत्यादि रूपसे वर्तन करना
परस्परोपग्रह है । स्वामी तो धन आदि देकर सेवकका उपकार करता है और सेवक हितका कथन
करके तथा अहितका निषेध करके स्वामीका उपकार करता है। आचार्य दोनों लोकमें सुखदायी
उपदेश-द्वारा तथा उस उपदेशके अनुसार क्रियामें लगाकर शिष्योंका उपकार करता है और शिष्य १५
भी आचार्यके अनुकूल प्रवृत्ति करके आचार्यका उपकार करते हैं। शंका—उपकारका अधिकार
है, इसलिए सूत्र में फिर से 'उपग्रह' शब्द किसलिए दिया है ? समाधान—पिछले सूत्रमें जो
सुखादिक चार कह आये हैं उनके दिखलानेके लिए फिरसे 'उपग्रह' शब्द दिया है । तात्पर्य यह
है कि सुखादिक भी जीवोंके जीवकृत उपकार हैं।
विशेषार्थ—यहाँ उपकार के प्रकरणमें कौन द्रव्य अन्यका क्या उपकार करता है इस २०
बातका निर्देश किया गया है, इसलिए विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या अन्य द्रव्य अपनेसे भिन्न
दूसरे द्रव्यका भला-बुरा कुछ कर सकता है ? यदि कर सकता है यह मान लिया जाय तो जैन-
दर्शनमें ईश्वरवादका निषेध क्यों किया गया है ? यह तो मानी हुई बात है कि एक द्रव्यके जो
गुण और पर्याय होते हैं वे उसे छोड़कर अन्य द्रव्यमें प्रविष्ट नहीं होते । इसलिए एक द्रव्य अपनेसे
भिन्न दूसरेका उपकार करता है यह विचारणीय हो जाता है। जिन दर्शनोंने ईश्वरवादको स्वीकार २५
किया है वे प्रत्येक कार्यके होनेमें प्रेरक रूपसे ईश्वरको निमित्त कारण मानते हैं। उनका कहना
है कि यह प्राणी अज्ञ है, अपने सुख-दुःखका स्वामी नहीं है । ईश्वरकी प्रेरणावश स्वर्ग जाता है
या नरक । इसमें स्वर्ग और नरक आदि गतियोंकी प्राप्ति जीवको होती है यह बात स्वीकार की
गयी है, तथापि उनकी प्राप्तिमें ईश्वरका पूरा हाथ रहता है । अगर ईश्वर चाहे तो जीवको इन
गतियोंमें जानेसे बचा भी सकता है। यदि इसी अभिप्रायसे एक द्रव्यको अन्य द्रव्यका उपकारक ३०
माना जाता है तब तो ईश्वरवादका निषेध करना न करनेके बराबर होता है और यदि इस
उपकार प्रकरणका कोई भिन्न अभिप्राय है तो उसका दार्शनिक विश्लेषण होना अत्यावश्यक है ।
आगे संक्षेपमें इसी बातपर प्रकाश डाला जाता है—
लोकमें जितने द्रव्य हैं वे सब अपने-अपने गुण और पर्यायोंको लिये हुए हैं । द्रव्यदृष्टिसे
वे अनन्त काल पहले जैसे थे आज भी वैसे ही हैं और आगे भी वैसे ही बने रहेंगे । किन्तु ३५
पर्यायदृष्टिसे वे सदा परिवर्तनशील हैं । उनका यह परिवर्तन द्रव्यकी मर्यादाके भीतर ही होता
है । प्रत्येक द्रव्यका यह स्वभाव है । इसलिए प्रत्येक द्रव्यमें जो भी परिणाम होता है वह अपनी-
१. -याणां कृतोप-आ० । २. क्रियते । आह यद्यवश्यं ता०, ना० ।