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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 558 में से

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पृष्ठ 322

२१० सर्वार्थसिद्धौ [ ५।१८ § ५६० –
स्योपकारः पुद्गलानां स्थितिरिति । तन्निवृत्त्यर्थमुपग्रहवचनं क्रियते । आह धर्माधर्मयोर्य उपकारः
स आकाशस्य युक्तः; सर्वगतत्वादिति चेत् । तदयुक्तम्; तस्यान्योपकारसद्भावात् । सर्वेषां धर्मादीनां
द्रव्याणामवगाहनं तत्प्रयोजनम् । एकस्यानेकप्रयोजनकल्पनायां लोकालोकविभागाभावः । भूमि-
जलादीन्येव तत्प्रयोजनसमर्थानि नार्थो धर्माधर्माभ्यामिति चेत् । न; साधारणाश्रय इति विशि-
ष्योक्तत्वात् । अनेककारणसाध्यत्वाच्चैकस्य कार्यस्य । तुल्यबलत्वात्तयोर्गतिस्थितिप्रतिबन्ध इति
चेत् । न; अप्रेरकत्वात् । अनुपलब्धेर्न तौ स्तः खरविषाणवदिति चेत् । न; सर्व१प्रवाद्यविप्रतिपत्तेः ।
सर्वे हि २प्रवादिनाः प्रत्यक्षाप्रत्यक्षानर्थानभिवाञ्छन्ति । अस्मान्प्रति हेतोरसिद्धेश्च । सर्वज्ञेन
निरतिशयप्रत्यक्षज्ञानचक्षुषा धर्मादयः सर्वे उपलभ्यन्ते । तदुपदेशाच्च श्रुतज्ञानिभिरपि ।
§ ५६०. अत्राह, यद्यतीन्द्रिययोर्धर्माधर्मयोरुपकारसंबन्धेनास्तित्वमवध्रियते, तदनन्तरमु-
द्दिष्टस्य नभसोऽतीन्द्रियस्याधिगमे क उपकार इत्युच्यते—
आकाशस्यावगाहः ॥१८॥
§ ५६१. ३'उपकारः' इत्यनुवर्तते । जीवपुद्गलादीनामवगाहिनामवकाशदानमवगाह-आकाश-
स्योपकारो वेदितव्यः । आह, जीवपुद्गलानां क्रियावतामवगाहिनामवकाशदानं युक्तम् । धर्मास्ति-
है और अधर्म द्रव्यका उपकार पुद्गलोंकी स्थिति है अतः इसका निराकरण करनेके लिए
सूत्रमें 'उपग्रह' पद रखा है। शंका—धर्म और अधर्म द्रव्यका जो उपकार है उसे आकाशका
मान लेना युक्त है, क्योंकि आकाश सर्वगत है ? समाधान—यह कहना युक्त नहीं है; क्योंकि
आकाशका अन्य उपकार है। सब धर्मादिक द्रव्योंको अवगाहन देना आकाशका प्रयोजन है । यदि
एक द्रव्यके अनेक प्रयोजन माने जाते हैं तो लोकालोकके विभागका अभाव होता है, अतः धर्म
और अधर्म द्रव्यका जो उपकार है वह आकाशका मानना युक्त नहीं । शंका—धर्म और अधर्म
द्रव्यके जो प्रयोजन हैं पृथिवी और जल आदिक ही उनके करनेमें समर्थ हैं, अतः धर्म और अधर्म
द्रव्यका मानना ठीक नहीं ? समाधान—नहीं, क्योंकि धर्म और अधर्म द्रव्य गति और स्थितिके
साधारण कारण हैं यह विशेष रूपसे कहा है । तथा एक कार्य अनेक कारणोंसे होता है, इसलिए
धर्म और अधर्म द्रव्यका मानना ठीक है। शंका—धर्म और अधर्म ये दोनों द्रव्य तुल्य बलवाले हैं,
अतः गतिसे स्थितिका और स्थितिसे गतिका प्रतिबन्ध होना चाहिए ? समाधान—नहीं, क्योंकि
ये अप्रेरक हैं । शंका—धर्म और अधर्म द्रव्य नहीं हैं, क्योंकि उनकी उपलब्धि नहीं होती, जैसे
गधेके सींग ? समाधान—नहीं; क्योंकि इसमें सब वादियोंको विवाद नहीं है । तात्पर्य यह है कि
जितने वादी हैं वे प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों प्रकारके पदार्थोंको स्वीकार करते हैं । इसलिए इनका
अभाव नहीं किया जा सकता । दूसरे हम जैनोंके प्रति 'अनुपलब्धि' हेतु असिद्ध है, क्योंकि जिनके
सातिशय प्रत्यक्ष ज्ञानरूपी नेत्र विद्यमान हैं ऐसे सर्वज्ञ देव सब धर्मादिक द्रव्योंको प्रत्यक्ष जानते हैं
और उनके उपदेशसे श्रुतज्ञानी भी जानते हैं ।
§ ५६०. यदि अतीन्द्रिय धर्म और अधर्म द्रव्यका उपकारके सम्बन्धसे अस्तित्व स्वीकार
किया जाता है तो इनके अनन्तर जो अतीन्द्रिय आकाश द्रव्य कहा है, ऐसा कौन-सा उपकार है
जिससे उसका ज्ञान होता है ? अब इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
अवकाश देना आकाशका उपकार है ॥१८॥
§ ५६१. इस सूत्रमें 'उपकार' इस पदकी अनुवृत्ति होती है । अवगाहन करनेवाले जीव
और पुद्गलोंको अवकाश देना आकाशका उपकार जानना चाहिए । शंका—अवगाहन स्वभाव
वाले जीव और पुद्गल क्रियावान् हैं इसलिए इनको अवकाश देना युक्त है परन्तु धर्मादिक द्रव्य
१. –प्रतिवाद्य ता०, ना० । २. प्रतिवादिनः ता०, ना० । ३. उपकार इति वर्तते आ०, ता०, ना० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri