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सर्वकोश
सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)

Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary

आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished558 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 558 में से

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पृष्ठ 325
  • ५।१९ § ५६३ ] पञ्चमोऽध्यायः २१३

भिभवादिदर्शनान्मूर्त्तिमत्त्वसिद्धेः । मनो द्विविधं द्रव्यमनो भावमनश्चेति । भावमनस्तावल्लब्ध्युप-
योगलक्षणं पुद्गलावलम्बनत्वात् पौद्गलिकम् । द्रव्यमनश्च, ज्ञानावरणवीर्यान्तरायक्षयोपशमाङ्गो-
पाङ्गनामलाभप्रत्यया गुणदोषविचारस्मरणादिप्रणिधानाभिमुख्यस्यात्मनोऽनुग्राहकाः पुद्गला
मनस्त्वेन परिणता इति पौद्गलिकम् । कश्चिदाह मनो द्रव्यान्तरं रूपादिपरिणामरहित-
मणुमात्रं तस्य पौद्गलिकत्वमयुक्तमिति । तदयुक्तम् । कथम् । उच्यते—तदिन्द्रियेणात्मना च
संबद्धं वा स्यादसंबद्धं वा । यद्यसंबद्धम्, तन्नात्मन उपकारकं भवितुमर्हति इन्द्रियस्य च साचिव्यं
न करोति । अथ संबद्धम्, एकस्मिन् प्रदेशे संबद्धं सत्तदणु इतरेषु प्रदेशेषु उपकारं न कुर्यात् ।
अदृष्टवशादस्य अलातचक्रवत्परिभ्रमणमिति चेत् । न; तत्सामर्थ्याभावात् । अमूर्त्तस्यात्मनो
निष्क्रियस्यादृष्टो गुणः, स निष्क्रियः संन्नन्यत्र क्रियारम्भे न समर्थः । दृष्टो हि वायुद्रव्यविशेषः
क्रियावान्स्पर्शवान्प्र१भवन्वनस्पतौ परिस्पन्दहेतुस्तद्विपरीतलक्षणश्चायमिति क्रियाहेतुत्वाभावः ।
वीर्यान्तरायज्ञानावरणक्षयोपशमाङ्गोपाङ्गनामोदयापेक्षे२णात्मना उदस्यमानः कोष्ठ्यो वायु-
रुच्छ्वासलक्षणः प्राण इत्युच्यते । तेनैवात्मना बाह्यो वायुरभ्यन्तरीक्रियमाणो निःश्वासलक्षणोऽपान
इत्याख्यायते । एवं तावप्यात्मानुग्राहिणौ; जीवितहेतुत्वात् । तेषां मनःप्राणापानानां मूर्त्तिमत्त्वमव-
सेयम् । कुतः ३ । मूर्त्तिमद्भिः प्रतिघातादिदर्शनात् । प्रतिभयहेतुभिरशनिपातादिभिर्मनसः प्रतिघातो
दृश्यते । सुरादिभिश्चाभिभवः । ४ हस्ततलपटादिभिरास्यसंवरणात्प्राणापानयोः प्रतिघात उपलभ्यते ।
जाता है यथा अन्य कारणोंसे उनका अभिभव आदि देखा जाता है इससे शब्द मूर्त्त सिद्ध होते हैं ।
मन दो प्रकारका है—द्रव्यमन और भावमन । लब्धि और उपयोग-लक्षण भावमन पुद्गलोंके
आलम्बनसे होता है इसलिए पौद्गलिक है । तथा ज्ञानावरण और वीर्यान्तरायके क्षयोपशमसे
तथा अंगोपांग नामकर्मके निमित्तसे जो पुद्गल गुण दोषका विचार और स्मरण आदि उप-
योगके सम्मुख हुए आत्माके उपकारक हैं वे ही मन रूपसे परिणत होते हैं अतः द्रव्यमन भी
पौद्गलिक है । शंका—मन एक स्वतन्त्र द्रव्य है । वह रूपादि रूप परिणमनसे रहित है और
अणुमात्र है इसलिए उसे पौद्गलिक मानना अयुक्त है ? समाधान—शंकाकारका इस प्रकार कहना
अयुक्त है । खुलासा इस प्रकार है—वह मन आत्मा और इन्द्रियसे सम्बद्ध है या असम्बद्ध । यदि
असम्बद्ध है तो वह आत्माका उपकारक नहीं हो सकता और इन्द्रियोंकी सहायता भी नहीं कर
सकता । यदि सम्बद्ध है तो जिस प्रदेशमें वह अणु मन सम्बद्ध है उस प्रदेशको छोड़ कर इतर
प्रदेशोंका उपकार नहीं कर सकता । शंका—अदृष्ट नामका एक गुण है उसके वशसे यह मन
अलातचक्रके समान सब प्रदेशोंमें घूमता रहता है ? समाधान—नहीं; क्योंकि अदृष्ट नामके गुणमें
इस प्रकारकी सामर्थ्य नहीं पायी जाती । यतः अमूर्त्त और निष्क्रिय आत्माका अदृष्ट गुण है। अतः
यह गुण भी निष्क्रिय है इसलिए अन्यत्र क्रियाका आरम्भ करनेमें असमर्थ है । देखा जाता है कि
वायु नामक द्रव्य विशेष स्वयं क्रियावाला और स्पर्शवाला होकर ही वनस्पतिमें परिस्पन्दका
कारण होता है परन्तु यह अदृष्ट उससे विपरीत लक्षणवाला है इसलिए यह क्रियाका हेतु नहीं हो
सकता । वीर्यान्तराय और ज्ञानावरणके क्षयोपशम तथा अंगोपांग नामकर्मके उदयकी अपेक्षा
रखनेवाला आत्मा कोष्ठगत जिस वायुको बाहर निकालता है उच्छ्वासलक्षण उस वायुको प्राण
कहते हैं । तथा वही आत्मा बाहरी जिस वायुको भीतर करता है निःश्वासलक्षण उस वायुको
अपान कहते हैं । इस प्रकार ये प्राण और अपान भी आत्माका उपकार करते हैं, क्योंकि इनसे
आत्मा जीवित रहता है । ये मन, प्राण और अपान मूर्त्त हैं, क्योंकि दूसरे मूर्त्तपदार्थोंके द्वारा
इनका प्रतिघात आदि देखा जाता है । जैसे-प्रतिभय पैदा करनेवाले बिजली पात आदिके द्वारा
१. प्रासः वन-आ०, दि० १, दि० २, ता०, ना० । २. -पेक्षेणा-आ०, दि० १, दि० २ । ३. कुतः ।
प्रतिघा- -ता० । ४. हस्ततलपुटादि- ता०, ना० मु० ।