सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
१७६ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।५ § ४५१ -
त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्या व्यन्तरज्योतिष्काः ॥५॥
§ ४५१. व्यन्तरेषु ज्योतिष्केषु च त्रायस्त्रिंशांल्लोकपालांश्च वर्जयित्वा इतरेऽष्टौ विकल्पा
द्रष्टव्याः ।
§ ४५२. अथ तेषु निकायेषु किमेकैक इन्द्र उतान्यः प्रतिनियमः कश्चिदस्तीत्यत आह—
पूर्वयोर्द्वीन्द्राः ॥६॥
§ ४५३. पूर्वयोर्निकाययोर्भवनवासिव्यन्तरनिकाययोः । कथं द्वितीयस्य पूर्वत्वम् । सामी-
प्यात्पूर्वत्वमुपचर्योक्तम् । ‘द्वीन्द्राः’ इति अन्तर्नीतवीप्सार्थः । द्वौ द्वौ इन्द्रौ येषां ते द्वीन्द्रा इति ।
यथा सप्तपर्णोऽष्टापद इति । तद्यथा—भवनवासिषु तावदसुरकुमाराणां द्वाविन्द्रौ चमरौ वैरोचनश्च ।
नागकुमाराणां धरणो भूतानन्दश्च । विद्युत्कुमाराणां हरिसिंहो हरिकान्तश्च । सुपर्णकुमाराणां
वेणुदेवो वेणुधारी च । अग्निकुमाराणामग्निशिखोऽग्निमाणवश्च । वातकुमाराणां वैलम्बः
प्रभञ्जनश्च । स्तनितकुमाराणां सुघोषो महाघोषश्च । उदधिकुमाराणां जलकान्तो जलप्रभश्च ।
द्वीपकुमाराणां पूर्णो वसिष्ठश्च । दिक्कुमाराणाममितगतिरमितवाहनश्चेति । व्यन्तरेष्वपि
किन्नराणां द्वाविन्द्रौ किन्नरः किम्पुरुषश्च । किम्पुरुषाणां सत्पुरुषो महापुरुषश्च २। महोरगाणा-
मतिकायो महाकायश्च । गन्धर्वाणां गीतरतिर्गीतयशश्च । यक्षाणां पूर्णभद्रो मणिभद्रश्च ।
राक्षसानां भीमो महाभीमश्च । भूतानां प्रतिरूपोऽप्रतिरूपश्च । पिशाचानां कालो महाकालश्च ।
किन्तु व्यन्तर और ज्योतिष्क देव त्रायस्त्रिंश और लोकपाल इन दो भेदों से रहित हैं ॥५॥
§ ४५१. व्यन्तर और ज्योतिषियोंमें त्रायस्त्रिंश और लोकपाल इन दो भेदोंके सिवा शेष
आठ भेद जानना चाहिए ।
§ ४५२. उन निकायोंमें क्या एक-एक इन्द्र है या और दूसरा कोई नियम है, इस बातके
बतलानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं ।
प्रथम दो निकायोंमें दो दो इन्द्र हैं ॥६॥
§ ४५३. पूर्व दो निकायोंसे भवनवासी और व्यन्तर ये दो निकाय लेना चाहिए । शंका—
दूसरे निकायको पूर्व कैसे कहा जा सकता है ? समाधान—प्रथमके समीपवर्ती होनेसे दूसरे निकाय
को उपचारसे पूर्व कहा है । ‘द्वीन्द्राः’ इस पदमें वीप्सा रूप अर्थ गर्भित है अतः इसका विग्रह इस
प्रकार हुआ कि ‘द्वौ द्वौ इन्द्रौ येषां ते द्वीन्द्राः’ जैसे सप्तपर्ण और अष्टापद । तात्पर्य यह है जिस प्रकार
सप्तपर्ण और अष्टापद इन पदोंमें वीप्सारूप अर्थ गर्भित है उसी प्रकार प्रकृतमें जानना चाहिए ।
खुलासा इस प्रकार है—भवनवासियोंमें असुरकुमारोंके चमर और वैरोचन ये दो इन्द्र हैं । नाग
कुमारोंके धरण और भूतानन्द ये दो इन्द्र हैं । विद्युत्कुमारोंके हरिसिंह और हरिकान्त ये दो इन्द्र हैं ।
सुपर्णकुमारोंके वेणुदेव और वेणुधारी ये दो इन्द्र हैं । अग्निकुमारोंके अग्निशिख और अग्निमाणव ये
दो इन्द्र हैं । वातकुमारोंके वैलम्ब और प्रभंजन ये दो इन्द्र हैं । स्तनितकुमारोंके सुघोष और महा-
घोष ये दो इन्द्र हैं । उदधिकुमारोंके जलकान्त और जलप्रभ ये दो इन्द्र हैं । द्वीपकुमारोंके पूर्ण और
विशिष्ट ये दो इन्द्र हैं । तथा दिक्कुमारोंके अमितगति और अमितवाहन ये दो इन्द्र हैं । व्यन्तरोंमें
भी किन्नरोंके किन्नर और किम्पुरुष ये दो इन्द्र हैं । किम्पुरुषोंके सत्पुरुष और महापुरुष ये दो
इन्द्र हैं । महोरगोंके अतिकाय और महाकाय ये दो इन्द्र हैं । गन्धर्वों के गीतरति और गीतयश
ये दो इन्द्र हैं । यक्षोंके पूर्णभद्र और मणिभद्र ये दो इन्द्र हैं । राक्षसोंके भीम और महाभीम ये
दो इन्द्र हैं । भूतोंके प्रतिरूप और अप्रतिरूप ये दो इन्द्र हैं । तथा पिशाचोंके काल और महाकाल
ये दो इन्द्र हैं ।
१. -वर्ज्या व्य- ता०, ना०, । २. - रुषश्चेति महो-मु० ।
– ४१८ § ४५७ ] चतुर्थोऽध्यायः १७७
§ ४५४. अथैषां देवानां सुखं कीदृशमित्युक्ते सुखावबोधनार्थमाह—
कायप्रवीचारा आ ऐशानात् ॥७॥
§ ४५५. प्रवीचारो मैथुनोपसेवनम् । कायेन प्रवीचारो येषां ते कायप्रवीचाराः । आङ्
अभिविध्यर्थः । असंहितया निर्देशः असंदेहार्थः । एते भवनवास्यादय ऐशानान्ताः संक्लिष्टकर्म-
त्वान्मनुष्यवत्स्त्रीविषयसुखमनुभवन्तीत्यर्थः ।
§ ४५६. अवधिग्रहणादितरेषां सुखविभागेऽनिश्चिते तत्प्रतिपादनार्थमाह—
शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः ॥८॥
§ ४५७. उक्तावशिष्टग्रहणार्थं 'शेष' ग्रहणम् । के पुनरुक्तावशिष्टाः । कल्पवासिनः । स्पर्शश्च
रूपं च शब्दश्च मनश्च स्पर्शरूपशब्दमनांसि, तेषु प्रवीचारो येषां ते स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः ।
कथमभिसंबन्धः । आर्षाविरोधेन । कुतः पुनः 'प्रवीचार'ग्रहणम् । इष्टसंप्रत्ययार्थमिति । कः
पुनरिष्टोऽभिसंबन्धः । आर्षाविरोधी—सानत्कुमारमाहेन्द्रयोर्देवा देवाङ्गनाङ्गस्पर्शमात्रादेव परां
प्रीतिमुपलभन्ते, तथा देव्योऽपि । ब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठेषु देवा दिव्याङ्गनानां शृङ्गाराकार-
विलासचतुरमनोज्ञवेषरूपावलोकनमात्रादेव परमसौख्यमाप्नुवन्ति । शुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेषु देवा
देववनितानां मधुरसंगीतमुद्धसितललितकथितभूषणरवश्रवणमात्रादेव परां प्रीतिमास्कन्दन्ति ।
आनतप्राणतारणाच्युतकल्पेषु देवा स्वाङ्गनामनःसंकल्पमात्रादेव परं सुखमाप्नुवन्ति ।
§ ४५४. इन देवोंका सुख किस प्रकारका होता है ऐसा पूछने पर सुखका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ऐशान तकके देव कायप्रवीचार अर्थात् शरीरसे विषय-सुख भोगनेवाले होते हैं ॥७॥
§ ४५५. मैथुनके उपसेवनको प्रवीचार कहते हैं । जिनका कायसे प्रवीचार है वे कायप्रवी-
चारवाले कहे जाते हैं । कहां तक कायसे प्रवीचारकी व्याप्ति है इस बातके बतलानेके लिए सूत्रमें
‘आङ्’ का निर्देश किया है । सन्देह न हो इसलिए ‘आ ऐशानात्’ इस प्रकार सन्धिके बिना निर्देश
किया है । तात्पर्य यह है कि ऐशान स्वर्ग पर्यन्त ये भवनवासी आदि देव संक्लिष्ट कर्मवाले होनेके
कारण मनुष्योंके समान स्त्रीविषयक सुखका अनुभव करते हैं ।
§ ४५६. ऊपरके सूत्रमें कायसे प्रवीचारकी मर्यादा कर दी है इसलिए इतर देवोंके सुखका
विभाग नहीं ज्ञात होता है, अतः इसके प्रतिपादन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
शेष देव स्पर्श, रूप, शब्द और मनसे विषय-सुख भोगनेवाले होते हैं ॥८॥
§ ४५७. पहले जिन देवोंका प्रवीचार कहा है उनसे अतिरिक्त देवोंके ग्रहण करनेके लिए
'शेष' पदका ग्रहण किया है । शंका—उक्त देवोंसे अवशिष्ट और कौन देव हैं ? समाधान—
कल्पवासी । यहाँ स्पर्श, रूप, शब्द और मन इनका परस्पर द्वन्द्व समास करके अनन्तर प्रवीचार
शब्दके साथ बहुव्रीहि समास किया है । शंका—इनमें-से किन देवोंके कौन-सा प्रवीचार है इसका
सम्बन्ध कैसे करना चाहिए ? समाधान—इसका सम्बन्ध जिस प्रकार आर्षमें विरोध न आवे उस
प्रकार कर लेना चाहिए । शंका—पुनः ‘प्रवीचार' शब्दका ग्रहण किसलिए किया है ? समाधान—
इष्ट अर्थका ज्ञान करानेके लिए । शंका—जिसमें आर्षसे विरोध न आवे ऐसा वह इष्ट अर्थ क्या है ?
समाधान—सानत्कुमार और माहेन्द्र स्वर्गके देव देवांगनाओंके स्पर्श मात्रसे परम प्रीतिको प्राप्त
होते हैं और इसी प्रकार वहाँकी देवियां भी । ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव और कापिष्ठ स्वर्गके देव
देवांगनाओंके शृंगार, आकृति, विलास, चतुर और मनोज्ञ वेष तथा मनोज्ञ रूपके देखने मात्रसे ही
परम सुखको प्राप्त होते हैं । शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्रार स्वर्गके देव देवांगनाओंके मधुर
१. ‘आङ् मर्यादाभिविध्योः ।’ पा० २, १, १३ । २. -ङ्गाकास्पर्श-मु० ।
२३
१७८ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।९ § ४५८ -
§ ४५८. अथोत्तरेषां किंप्रकारं सुखमित्युक्ते तन्निश्चयार्थमाह—
परेऽप्रवीचाराः ॥६॥
§ ४५९. 'पर'ग्रहणमितराशेषसंग्रहार्थम् । 'अप्रवीचार'ग्रहणं परमसुखप्रतिपत्त्यर्थम् ।
प्रवीचारो हि वेदनाप्रतिकारः । तदभावे तेषां परमसुखमनावरतं भवति ।
§ ४६०. उक्ता ये आदिनिकायदेवा दशविकल्पा इति तेषां सामान्यविशेषसंज्ञाविज्ञापनार्थ-
मिदमुच्यते—
भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्निवातस्तनितोदधिद्वीप दिक्कुमाराः ॥१०॥
§ ४६१. भवनेषु वसन्तीत्येवंशीला भवनवासिनः । आदिनिकायस्येयं सामान्यसंज्ञा ।
असुरादयो विशेषसंज्ञा विशिष्टनामकर्मोदयापादितवृत्तयः सर्वेषां देवानामनवस्थितवयःस्वभावत्वेऽपि
वेषभूषायुधयानवाहनक्रीडनादिकुमारवद्वेषामाभासत इति भवनवासिषु कुमारव्यपदेशो रूढः । स
प्रत्येकं परिसमाप्यते असुरकुमारा इत्येवमादि । क्व तेषां भवनानीति चेत् । उच्यते—रत्नप्रभायाः
पङ्कबहुलभागेऽसुरकुमाराणां भवनानि । खरपृथिवीभागे उपर्यधश्च एकैकयोजनसहस्रं वर्जयित्वा
शेषनवानां कुमाराणामावासाः ।
§ ४६२. द्वितीय निकायस्य सामान्यविशेषसंज्ञावधारणार्थमाह—
संगीत, कोमल हास्य, ललित कथा और भूषणोंके कोमल शब्दोंके सुननेमात्रसे ही परम प्रीतिको
प्राप्त होते हैं। तथा आनत, प्राणत, आरण और अच्युत कल्पके देव अपनी अंगनाका मनमें संकल्प
करनेमात्रसे ही परम सुखको प्राप्त होते हैं ।
§ ४५८. अब आगेके देवोंका किस प्रकारका सुख है ऐसा प्रश्न करनेपर उसका निश्चय
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
बाकीके सब देव विषय-सुख से रहित होते हैं ॥९॥
§ ४५९. शेष सब देवोंका संग्रह करनेके लिए सूत्रमें 'पर' शब्दका ग्रहण किया है। परम
सुखका ज्ञान करानेके लिए अप्रवीचार पदका ग्रहण किया है। प्रवीचार वेद
– ४।१२ § ४६५ ] चतुर्थोऽध्यायः १७९
व्यन्तराः किंनरकिंपुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूतपिशाचाः ॥११॥
§ ४६३. विविधदेशान्तराणि येषां निवासास्ते 'व्यन्तराः' इत्यन्वर्था सामान्यसंज्ञेयमष्टा-
नामपि विकल्पानाम् । तेषां व्यन्तराणामष्टौ विकल्पाः किंनरादयो वेदितव्या नामकर्मोदयविशेषा-
पादिताः । क्व पुनस्तेषामावासा इति चेत् । उच्यते—अस्माज्जम्बूद्वीपादसंख्येयान् द्वीपसमुद्रानतीत्य
उपरिष्टे¹ खरपृथिवीभागे सप्तानां व्यन्तराणांवासाः । राक्षसानां पङ्कबहुलभागे ।
§ ४६४. तृतीयस्य निकायस्य सामान्यविशेषसंज्ञासंकीर्तनार्थमाह—
ज्योतिष्काः सूर्याचन्द्रमसौ ग्रहनक्षत्रप्रकीर्णकतारकाश्च ॥१२॥
§ ४६५. ज्योतिस्स्वभावत्वादेषां पञ्चानामपि 'ज्योतिष्काः' इति सामान्यसंज्ञा अन्वर्था ।
सूर्यादयस्तद्विशेषसंज्ञा नामकर्मोदयप्रत्ययाः । 'सूर्याचन्द्रमसौ' इति पृथग्ग्रहणं प्राधान्यख्यापनार्थम् ।
किंकृतं पुनः प्राधान्यम् । प्रभावादिकृतम् । क्व पुनस्तेषामावासाः । इत्यत्रोच्यते, अस्मात्समाद्
भूमिभागादूर्ध्वं सप्तयोजनशतानि नवत्युत्तराणि² उत्पत्य सर्वज्योतिषामधोभागविन्यस्तास्तारका-
श्चरन्ति । ततो दशयोजनान्युत्पत्य सूर्यश्चरन्ति । ततोऽशीतियोजनान्युत्पत्य चन्द्रमसो भ्रमन्ति ।
ततै³श्चत्वारि योजनान्युत्पत्य नक्षत्राणि । ततश्च⁴त्वारि योजनान्युत्पत्य बुधाः । ततस्त्रीणि योजना-
न्युत्पत्य शुक्राः । ततै⁵स्त्रीणि योजनान्युत्पत्य बृहस्पतयः । ततस्त्रीणि⁶ योजनान्युत्पत्याङ्गारकाः ।
व्यन्तर देव आठ प्रकारके हैं—किन्नर, किम्पुरुष, महोरग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, भूत और
पिशाच ॥११॥
§ ४६३. जिनका नानाप्रकारके देशोंमें निवास है वे व्यन्तर देव कहलाते हैं। यह सामान्य
संज्ञा सार्थक है जो अपने आठों ही भेदोंमें लागू है। इन व्यन्तरोंके किन्नरादिक आठों भेद विशेष
नामकर्मके उदयसे प्राप्त होते हैं ऐसा जानना चाहिए। शंका—इन व्यन्तरोंके आवास कहां हैं ?
समाधान—इस जम्बूद्वीपसे असंख्यात द्वीप और समुद्र लांघकर ऊपरके खर पृथिवी भागमें सात
प्रकारके व्यन्तरोंके आवास हैं। तथा पंकबहुल भागमें राक्षसोंके आवास हैं।
§ ४६४. अब तीसरे निकायकी सामान्य और विशेष संज्ञाका कथन करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
ज्योतिषी देव पांच प्रकारके हैं—सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह, नक्षत्र और प्रकीर्णक तारे ॥१२॥
§ ४६५. ये सब पांचों प्रकारके देव ज्योतिर्मय हैं इसलिए इनकी ज्योतिषी यह सामान्य
संज्ञा सार्थक है। तथा सूर्य आदि विशेष संज्ञाएं विशेष नामकर्मके उदयसे प्राप्त होती हैं। सूर्य और
चन्द्रमाकी प्रधानताको दिखलानेके लिए 'सूर्याचन्द्रमसौ' इस प्रकार इन दोनोंका अलगसे ग्रहण
किया है। शंका—इनमें प्रधानता किस निमित्तसे प्राप्त होती है ? समाधान—इनमें प्रभाव आदिक-
की अपेक्षा प्रधानता प्राप्त होती है। शंका—इनका आवास कहांपर है ? समाधान—इस समान
भूमिभागसे सातसौ नब्बे योजन ऊपर जाकर तारकाएं विचरण करती हैं जो सब ज्योतिषियोंके
अधोभागमें स्थित हैं। इससे दस योजन ऊपर जाकर सूर्य विचरण करते हैं। इससे अस्सी योजन
ऊपर जाकर चन्द्रमा परिभ्रमण करते हैं। इससे चार योजन ऊपर जाकर नक्षत्र हैं। इससे चार
योजन ऊपर जाकर बुध हैं। इससे तीन योजन ऊपर जाकर शुक्र हैं। इससे तीन योजन ऊपर
जाकर बृहस्पति हैं। इससे तीन योजन ऊपर जाकर मंगल हैं। इससे तीन योजन ऊपर
१. -तीत्य परिष्टे आ०, ता०, ना०, दि० १, दि० २ । २. -त्तराणि ७९० उत्प-मु० । ३. ततस्त्रीणि
योज-ता०, ना०, । तत्त्वा० । ४. ततस्त्रीणि योज-ता०, ना०, तत्त्वा० । ५. ततश्चत्वारि योज-ता०, ना०,
तत्त्वा० । ६. ततश्चत्वारि योज-ता०, ना०, तत्त्वा० ।
१८० सर्वार्थसिद्धौ [ ४।१३ § ४६६ -
ततस्त्रीणि योजनान्युत्पत्य शनैश्चराश्चरन्ति । स एष ज्योतिर्गणगोचरो नभोऽवकाशो दशाधिक-
योजनशतबहलस्तिर्यगसंख्यातद्वीपसमुद्रप्रमाणो घनोदधिपर्यन्तः । उक्तं च—
“णउदुत्तरसत्तसया दससीदो१ चदुगं तियचउक्कं ।
तारारविससिरिक्खा बुहभग्गवगुरुअंगिरारसणी२ ॥”
§ ४६६. ज्योतिष्काणां गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
मेरुप्रदक्षिणा नित्यगतयो नृलोके ॥१३॥
§ ४६७. मेरोः प्रदक्षिणा मेरुप्रदक्षिणाः । 'मेरुप्रदक्षिणाः' इति वचनं गतिविशेषप्रतिपत्त्यर्थ-
विपरीता गतिर्मा विज्ञायीति । 'नित्यगतयः' इति विशेषणमनुपरतक्रियाप्रतिपादनार्थम् । 'नृलोक'-
ग्रहणं विषयार्थम् । अर्धतृतीयेषु द्वीपेषु द्वयोश्च समुद्रयोर्ज्योतिष्का नित्यगतयो नान्यत्रेति । ज्यो-
तिष्कविमानानां गतिहेत्वभावात्तद्वृत्त्यभाव इति चेत् । न; असिद्धत्वात्, गतिरताभियोग्यदेवप्रेरित-
गतिपरिणामात्मकर्मविपाकस्य वैचित्र्यात् । तेषां हि गतिमुखेनैव कर्म विपच्यत इति । एकादशभियों-
जनशतैरेकविंशैर्मेरुमप्राप्य ज्योतिष्काः प्रदक्षिणाश्चरन्ति ।
§ ४६८. गतिमज्ज्योतिस्संबन्धेन व्यवहारकालप्रतिपत्त्यर्थमाह—
तत्कृतः कालविभागः ॥१४॥
जाकर शनीचर हैं। यह ज्योतिषियोंसे व्याप्त नभःप्रदेश एक सौ दस योजन मोटा और घनोदधि-
पर्यन्त असंख्यात द्वीप समुद्रप्रमाण लम्बा है। कहा भी है—
'इस पृथिवी तलसे सात सौ नब्बे योजन ऊपर जाकर ताराएं हैं। पुनः दस योजन ऊपर
जाकर सूर्य हैं। पुनः अस्सी योजन ऊपर जाकर चन्द्रमा हैं। पुनः चार योजन ऊपर जाकर नक्षत्र
और चार योजन ऊपर जाकर बुध हैं। पुनः चार बार तीन योजन ऊपर जाकर अर्थात् तीन-तीन
योजन ऊपर जाकर क्रमसे शुक्र, गुरु, मंगल और शनि हैं ॥'
§ ४६६. अब ज्योतिषी देवोंकी गतिविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ज्योतिषी देव मनुष्यलोकमें मेरुकी प्रदक्षिणा करनेवाले और निरन्तर गतिशील हैं ॥१३॥
§ ४६७. 'मेरुप्रदक्षिणा' इस पदमें षष्ठी तत्पुरुष समास है। 'मेरुप्रदक्षिणा' यह वचन
गतिविशेषका ज्ञान करानेके लिए और कोई विपरीत गति न समझ बैठे इसके लिए दिया है। वे
निरन्तर गतिरूप क्रिया युक्त हैं इस बातका ज्ञान करानेके लिए 'नित्यगतयः' पद दिया है। इस
प्रकारके ज्योतिषी देवोंका क्षेत्र बतलानेके लिए 'नृलोक' पदका ग्रहण किया है। तात्पर्य यह है कि
ढाई द्वीप और दो समुद्रोंमें ज्योतिषी देव निरन्तर गमन करते रहते हैं अन्यत्र नहीं। शंका—
ज्योतिषी देवोंके विमानोंकी गतिका कारण नहीं पाया जाता, अतः उनका गमन नहीं बन सकता ?
समाधान—नहीं, क्योंकि यह हेतु असिद्ध है। बात यह है कि गमन करनेमें रत जो आभियोग्य
जातिके देव हैं उनसे प्रेरित होकर ज्योतिषी देवोंके विमानोंका गमन होता रहता है। यदि कहा
जाय कि आभियोग्य जातिके देव निरन्तर गतिमें ही क्यों रत रहते हैं तो उसका उत्तर यह है कि
यह कर्मके परिपाककी विचित्रता है। उनका कर्म गतिरूप से ही फलता है। यही कारण है
कि वे निरन्तर गमन करनेमें ही रत रहते हैं। यद्यपि ज्योतिषी देव मेरु पर्वतकी प्रदक्षिणा करते
हैं तो भी वे मेरु पर्वतसे ग्यारह सौ इक्कीस योजन दूर रह कर ही विचरण करते हैं।
§ ४६८. अब गमन करनेवाले ज्योतिषियोंके सम्बन्धसे व्यवहार-कालका ज्ञान करानेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
उन गमन करनेवाले ज्योतिषियोंके द्वारा किया हुआ कालविभाग है ॥१४॥
१. –सीदिं चदुतियं दुगचउक्कं । तारा-ता०, ना०, तत्त्वा० । २. 'णउदुत्तरसत्तसए दस सीदी चदुदुगे तिय-
चउक्के । तारिणससिरिक्खबुहा सुक्कगुरुंगारमंदगदी।'-ति०, सा०, गा० ३३२ ।
– ४।१५ § ४७१ ] चतुर्थोऽध्यायः १८१
§ ४६९. 'तद्'ग्रहणं गतिमज्ज्योतिःप्रतिनिदेशार्थम् । न केवलया गत्या नापि केवलैर्ज्यो-
तिर्भिः कालः परिच्छिद्यते; अनुपलब्धेरपरिवर्तनाच्च । कालो द्विविधो व्यावहारिको मुख्यश्च ।
व्यावहारिकः कालविभागस्तत्कृतः समयावलिकादिः क्रियाविशेषपरिच्छिन्नोऽन्यस्यापरिच्छिन्नस्य
परिच्छेदहेतुः । मुख्योऽन्यो वक्ष्यमाणलक्षणः ।
§ ४७०. इतरत्र ज्योतिषामवस्थानप्रतिपादनार्थमाह—
बहिरवस्थिताः ॥१५॥
§ ४७१. 'बहिः' इत्युच्यते । कुतो बहिः । नृलोकात् । कथमवगम्यते । अर्थवशाद्विभक्ति-
§ ४६९. गमन करनेवाले ज्योतिषी देवोंका निर्देश करनेके लिए 'तत्' पदका ग्रहण किया
है । केवल गतिसे कालका निर्णय नहीं हो सकता क्योंकि वह पायी नहीं जाती और गतिके बिना
केवल ज्योतिसे भी कालका निर्णय नहीं हो सकता क्योंकि परिवर्तनके बिना वह सदा एक-सी
रहेगी । यही कारण है कि यहाँ 'तत्' पदके द्वारा गतिवाले ज्योतिषियोंका निर्देश किया है। काल
दो प्रकारका है—व्यावहारिककाल और मुख्यकाल । इनमें-से समय और आवलि आदि रूप व्याव-
हारिककालका विभाग गतिवाले ज्योतिषी देवोंके द्वारा किया हुआ है। यह क्रिया विशेषसे जाना
जाता है और अन्य नहीं जानी हुई वस्तुओंके जाननेका हेतु है । मुख्यकाल इससे भिन्न है जिसका
लक्षण आगे कहनेवाले हैं ।
विशेषार्थ—मनुष्य मानुषोत्तर पर्वतके भीतर पाये जाते हैं। मानुषोत्तर पर्वतके एक ओरसे
लेकर दूसरी ओर तक कुल विस्तार पैंतालीस लाख योजन है। मनुष्य इसी क्षेत्रमें पाये जाते हैं।
इसलिए यह मनुष्यलोक कहलाता है। इस लोकमें ज्योतिष्क सदा भ्रमण किया करते हैं। इनका
भ्रमण मेरुके चारों ओर होता है। मेरुके चारों ओर ग्यारहसौ इक्कीस योजन तक ज्योतिष्क
मण्डल नहीं है। इसके आगे आकाशमें सर्वत्र बिखरा हुआ है। जम्बूद्वीपमें दो सूर्य और दो चन्द्र
हैं। एक सूर्य जम्बूद्वीपकी पूरी प्रदक्षिणा दो दिन-रातमें करता है। इसका चार क्षेत्र जम्बूद्वीपमें
१८० योजन और लवण समुद्रमें ३३० ४८/६१ योजन माना गया है। सूर्यके घूमनेकी कुल गलियां १८४
हैं। इनमें यह क्षेत्र विभाजित हो जाता है। एक गलीसे दूसरी गलीमें २ योजनका अन्तर माना
गया है। इसमें सूर्यबिम्बके प्रमाणको मिला देनेपर वह २ ४८/६१ योजन होता है। इतना उदयान्तर है।
मण्डलान्तर दो योजनका ही है। चन्द्रको पूरी प्रदक्षिणा करनेमें दो दिन-रातसे कुछ अधिक समय
लगता है। चन्द्रोदयमें न्यूनाधिकता इसीसे आती है। लवण समुद्रमें चार सूर्य, चार चन्द्र, धातकी-
खण्डमें बारह सूर्य, बारह चन्द्र, कालोदधिमें ब्यालीस सूर्य, ब्यालीस चन्द्र और पुष्करार्धमें बहत्तर
सूर्य, बहत्तर चन्द्र हैं। इस प्रकार ढाई द्वीपमें एक सौ बत्तीस सूर्य और एक सौ बत्तीस चन्द्र हैं।
इन दोनोंमें चन्द्र, इन्द्र और सूर्य प्रतीन्द्र हैं। एक-एक चन्द्रका परिवार एक सूर्य, अट्ठाईस नक्षत्र,
अठासी ग्रह और छ्यासठ हजार नौ सौ कोड़ाकोड़ी तारे हैं। इन ज्योतिष्र्कोंका गमन स्वभाव है
तो भी आभियोग्य देव सूर्य आदि के विमानोंको निरन्तर ढोया करते हैं। ये देव सिंह, गज,
बैल और घोड़ेका आकार धारण किये रहते हैं। सिंहाकार देवोंका मुख पूर्व दिशाकी ओर रहता
है। तथा गजाकार देवोंका मुख दक्षिण दिशाकी ओर, वृषभाकार देवोंका मुख पश्चिमकी ओर,
और अश्वाकार देवोंका मुख उत्तर दिशाकी ओर रहता है।
§ ४७०. अब ढाई द्वीपके बाहर ज्योतिषियोंके अवस्थानका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
मनुष्य-लोकके बाहर ज्योतिषी देव स्थिर रहते हैं ॥१५॥
§ ४७१. सूत्रमें 'बहिः' पद दिया है। शंका—किससे बाहर ? समाधान—मनुष्य-लोकसे
Here is the line-by-line transcription of the text from the provided image:
१८२ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।१६ § ४७२ –
परिणामो भवति । ननु च नृलोके 'नित्यगति'वचनादन्यत्रावस्थानं ज्योतिष्काणां सिद्धम् । अतो
बहिरवस्थिता इति वचनमनर्थकमिति । तन्न; किं कारणम् । नृलोकादन्यत्र^१ हि ज्योतिषामस्तित्व-
मवस्थानं चासिद्धम् । अतस्तदुभयसिद्धयर्थं बहिरवस्थिता इत्युच्यते । विपरीतगतिनिवृत्त्यर्थं
कादाचित्कगतिनिवृत्त्यर्थं च सूत्रमारब्धम् ।
५ § ४७२. तुरीयस्य निकायस्य सामान्यसंज्ञासंकीर्तनार्थमाह—
वैमानिकाः ॥१६॥
§ ४७३. 'वैमानिक'ग्रहणमधिकारार्थम् । इत उत्तरं ये वक्ष्यन्ते तेषां वैमानिकसंप्रत्ययो
यथा स्यादिति अधिकारः क्रियते । विशेषेणात्मस्थान् सुकृतिनो मानयन्तीति विमानानि । विमानेषु
भवा वैमानिकाः । तानि विमानानि^२ त्रिविधानि–इन्द्रकश्रेणीपुष्पप्रकीर्णकभेदेन । तत्र इन्द्रकविमा-
१० नानि इन्द्रवन्मध्येऽवस्थितानि^३ । तेषां चतसृषु दिक्षु आकाशप्रदेशश्रेणिवदवस्थानात् श्रेणीविमानानि ।
विदिक्षु प्रकीर्णपुष्पवदवस्थानात्पुष्पप्रकीर्णकानि ।
§ ४७४. तेषां वैमानिकानां भेदावबोधनार्थमाह—
कल्पोपपन्नाः कल्पातीताश्च ॥१७॥
§ ४७५. कल्पेषूपपन्नाः कल्पोपपन्नाः—कल्पानतीताः कल्पातीताश्चेति द्विविधा वैमानिकाः ।
१५ बाहर । शंका-यह कैसे जाना जाता है ? समाधान - पिछले सूत्रमें 'नृलोके' पद आया है । अर्थके
अनुसार उसकी विभक्ति बदल जाती है, जिससे यह जाना जाता है कि यहां 'बहिः' पदसे मनुष्य-
लोकके बाहर यह अर्थ इष्ट है । शंका - मनुष्य-लोकमें ज्योतिषी निरन्तर गमन करते हैं यह पिछले
सूत्रमें कहा ही है अतः अन्यत्र ज्योतिषियोंका अवस्थान सुतरां सिद्ध है । इसलिए 'बहिरवस्थिताः'
यह सूत्रवचन निरर्थक है ? समाधान - यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि मनुष्यलोकके बाहर
२० ज्योतिषियोंका अस्तित्व और अवस्थान ये दोनों असिद्ध हैं । अतः इन दोनोंकी सिद्धिके लिए
'बहिरवस्थिताः' यह सूत्रवचन कहा है । दूसरे विपरीत गतिके निराकरण करनेके लिए और
कादाचित्क गतिके निराकरण करनेके लिए यह सूत्र रचा है। अतः यह सूत्रवचन अनर्थक
नहीं है ।
§ ४७२. अब चौथे निकायकी सामान्य संज्ञाके कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
२५ चौथे निकायके देव वैमानिक हैं ॥१६॥
§ ४७३. वैमानिकोंका अधिकार है यह बतलानेके लिए 'वैमानिक' पदका ग्रहण किया है ।
आगे जिनका कथन करनेवाले हैं वे वैमानिक हैं । इनका ज्ञान जैसे हो इसके लिए यह अधिकार
वचन है । जो विशेषतः अपनेमें रहनेवाले जीवोंको पुण्यात्मा मानते हैं वे विमान हैं और जो उन
विमानोंमें होते हैं वे वैमानिक हैं । इन्द्रक, श्रेणिबद्ध और पुष्पप्रकीर्णकके भेदसे विमान अनेक
३० प्रकारके हैं । उनमें से इन्द्रक विमान इन्द्रके समान मध्यमें स्थित हैं । उनके चारों ओर आकाशके
प्रदेशोंकी पंक्तिके समान जो स्थित हैं वे श्रेणिविमान हैं । तथा बिखरे हुए फूलोंके समान विदिशाओं-
में जो विमान अवस्थित हैं वे पुष्पप्रकीर्णक विमान हैं ।
§ ४७४ उन वैमानिकोंके भेदोंका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
वे दो प्रकारके हैं-कल्पोपपन्न और कल्पातीत ॥१७॥
३५ § ४७५. जो कल्पोंमें उत्पन्न होते हैं वे कल्पोपपन्न कहलाते हैं। और जो कल्पोंके परे हैं वे
कल्पातीत कहलाते हैं । इस प्रकार वैमानिक दो प्रकारके हैं ।
१. ॰न्यत्र बहिर्ज्यो-मु० । २. -नानि विविधा-मु० । ३. मध्ये व्यव- मु० ।
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- ४।१९ § ४७९ ] चतुर्थोऽध्यायः १८३
§ ४७६. तेषामवस्थानविशेषनिर्ज्ञानार्थमाह-
उपर्युपरि ॥१८॥
§ ४७७. किमर्थमिदमुच्यते । तिर्यगवस्थितिप्रतिषेधार्थमुच्यते । न. ज्योतिष्कवत्तिर्यगव-
स्थिताः । न व्यन्तरवदसमावस्थितयः । 'उपर्युपरि' इत्युच्यन्ते । के ते । कल्पाः । ५
§ ४७८. यद्येवं, कियत्सु कल्पविमानेषु ते देवा भवन्तीत्यत आह-
सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्रब्रह्मब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठशुक्रमहाशुक्रशतारसह-
स्रारेष्वानतप्राणतयोरारणाच्युतयोर्नवसु ग्रैवेयकेषु विजयवैजयन्तजयन्ताप-
राजितेषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥१९॥
§ ४७९. कथमेषां सौधर्मादिशब्दानां कल्पाभिधानम् । चातुरर्थिकेनाणा स्वभावतो वा कल्प-
स्याभिधानं भवति । अथ कथमिन्द्राभिधानम् । स्वभावतः साहचर्याद्वा । तत्कथमिति चेत् । १०
उच्यते-सुधर्मा नाम सभा, साऽस्मिन्नस्तीति सौधर्मः कल्पः । "तदस्मिन्नस्तीति¹" अण् । तत्कल्प-
साहचर्यादिन्द्रोऽपि सौधर्मः । ईशानो नाम इन्द्रः स्वभावतः । ईशानस्य निवासः कल्प ऐशानः ।
"तस्य निवासः²" इत्यण् । तत्साहचर्यादिन्द्रोऽप्यैशानः । सनत्कुमारो नाम इन्द्रः स्वभावतः ।
"तस्य निवासः" इत्यण् । सानत्कुमारः कल्पः । तत्साहचर्यादिन्द्रोऽपि सानत्कुमारः । महेन्द्रो
§ ४७६. अब उनके अवस्थान विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं- १५
वे ऊपर-ऊपर रहते हैं ॥१८॥
§ ४७७. शंका - यह सूत्र किसलिए कहा है ? समाधान-ये कल्पोपपन्न और कल्पातीत
वैमानिक तिरछे रूपसे रहते हैं इसका निषेध करनेके लिए कहा है । ये ज्योतिषियोंके समान तिरछे
रूपसे नहीं रहते हैं। उसी प्रकार व्यन्तरोंके समान विषमरूपसे नहीं रहते हैं। किन्तु ऊपर-ऊपर
हैं। शंका - वे ऊपर-ऊपर क्या हैं ? समाधान-कल्प । २०
§ ४७८. यदि ऐसा है तो कितने कल्प विमानोंमें वे देव निवास करते हैं, इस बातके बत-
लानेके लिए अब आगेका सूत्र कहते हैं-
सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार, माहेन्द्र, ब्रह्म, ब्रह्मोत्तर, लान्तव, कापिष्ठ, शुक्र, महाशुक्र,
शतार और सहस्रार तथा आनत-प्राणत, आरण-अच्युत, नौ ग्रैवेयक और विजय, वैजयन्त, जयन्त
अपराजित तथा सर्वार्थसिद्धिमें वे निवास करते हैं ॥१९॥ २५
§ ४७९. शंका-इन सौधर्मादिक शब्दोंको कल्प संज्ञा किस निमित्तसे मिली है ? समा-
धान - व्याकरणमें चार अर्थमें 'अण्' प्रत्यय होता है उससे सौधर्म आदि शब्दोंकी कल्पसंज्ञा है या
स्वभावसे ही वे कल्प कहलाते हैं। शंका-सौधर्म आदि शब्द इन्द्रके वाची कैसे हैं ? समाधान -
स्वभावसे या साहचर्यसे । शंका - कैसे ? समाधान-सुधर्मा नामकी सभा है वह जहाँ है उस
कल्पका नाम सौधर्म है। यहाँ 'तदस्मिन्नस्ति' इससे 'अण्' प्रत्यय हुआ है। और इस कल्पके ३०
सम्बन्धसे वहाँका इन्द्र भी सौधर्म कहलाता है। इन्द्रका ईशान यह नाम स्वभावसे है। वह इन्द्र
जिस कल्पमें रहता है उसका नाम ऐशान कल्प है। यहाँ 'तस्य निवासः' इस सूत्रसे 'अण्' प्रत्यय
हुआ है। तथा इस कल्पके सम्बन्धसे इन्द्र भी ऐशान कहलाता है। इन्द्रका सनत्कुमार नाम
स्वभावसे है। यहाँ 'तस्य निवासः' इस सूत्रसे 'अण्' प्रत्यय हुआ है इससे कल्पका नाम सानत्कुमार
१. 'तदस्मिन्नस्तीति देशे तन्नाम्नि'-पा० ४, २, ६७ । 'तदस्मिन्नन्नं प्राये खौ'-जैनेन्द्र ४, १, २५ । २. 'तस्य ३५
निवासः'-पा० ४, २, ६९, । तस्य निवासादूरभवौ'-जैनेन्द्र० ३, २, ८६ ।
१८४ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।१९ § ४७९ -
नामेन्द्रः स्वभावतः । तस्य निवासः कल्पो माहेन्द्रः । तत्साहचर्यादिन्द्रोऽपि माहेन्द्रः । एवमुत्तरत्रापि
योज्यम् । आगमापेक्षया व्यवस्था भवतीति 'उपर्युपरि' इत्यनेन द्वयोर्द्वयोरभिसंबन्धो वेदितव्यः ।
प्रथमो सौधर्मेशानकल्पौ, तयोरुपरि सानत्कुमारमाहेन्द्रौ, तयोरुपरि ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरौ, तयोरुपरि
लान्तवकापिष्ठौ, तयोरुपरि शुक्रमहाशुक्रौ, तयोरुपरि शतारसहस्रारौ, तयोरुपरि आनतप्राणतौ,
तयोरुपरि आरणाच्युतौ । अद्य उपरि च प्रत्येकमिन्द्रसंबन्धो वेदितव्यः । मध्ये तु प्रतिद्वयम् ।
सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्राणां चतुर्णां चत्वार इन्द्राः । ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरयोरेको ब्रह्मा नाम ।
लान्तवकापिष्ठयोरेको लान्तवाख्यः । शुक्रमहाशुकयोरेकः शुक्रसंज्ञः । शतारसहस्रारयोरेकः
शतारनामा । आनतप्राणतारणाच्युतानां चतुर्णां चत्वारः । एवं कल्पवासिनां द्वादश इन्द्रा
भवन्ति । जम्बूद्वीपे महामन्दरो योजनसहस्रावगाहो³ नवनवतियोजनसहस्रोच्छ्रायः । तस्याधस्ताद-
धोलोकः । बाहुल्येनें तत्प्रमाणैस्तिर्यक्प्रसृतस्तिर्यग्लोकः । तस्योपरिष्टादूर्ध्वलोकः । मेरुचूलिका
चत्वारिंशद्योजनोच्छ्राया । तस्या उपरि केशान्तरमात्रे व्यवस्थितमृजुविमानमिन्द्रकं सौधर्मस्य ।
सर्वमन्यल्लोकानुयोगाद्वेदितव्यम् । 'नवसु ग्रैवेयकेषु' इति नवशब्दस्य पृथग्वचनं किमर्थम् ।
अन्यान्यपि नवविमानानि अनूदिशसंज्ञकानि सन्तीति ज्ञापनार्थम् । तेनानुदिशानां ग्रहणं वेदितव्यम् ।
पड़ा और इसके सम्बन्धसे इन्द्र भी सानत्कुमार कहलाता है । इन्द्रका माहेन्द्र नाम स्वभावसे है ।
वह इन्द्र जिस कल्पमें रहता है उसका नाम माहेन्द्र है । और इसके सम्बन्धसे इन्द्र भी माहेन्द्र
कहलाता है। इसी प्रकार आगे भी जानना । 'व्यवस्था आगमके अनुसार होती है इसलिए 'उपर्यु-
परि' इस पदके साथ दो दो कल्पोंका सम्बन्ध कर लेना चाहिए । सर्वप्रथम सौधर्म और ऐशान
कल्प हैं। इनके ऊपर सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्प है । इनके ऊपर ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर कल्प हैं।
इनके ऊपर लान्तव और कापिष्ठ कल्प हैं। इनके ऊपर शुक्र और महाशुक्र कल्प हैं। इनके ऊपर
शतार और सहस्रार कल्प हैं । इनके ऊपर आनत और प्राणत कल्प हैं। इनके ऊपर आरण और
अच्युत कल्प हैं। नीचे और ऊपर प्रत्येक कल्पमें एक एक इन्द्र है तथा मध्यमें दो दो कल्पोंमें एक
एक इन्द्र है। तात्पर्य यह है कि सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार और माहेन्द्र इन चार कल्पोंके चार
इन्द्र हैं । ब्रह्मलोक और ब्रह्मोत्तर इन दो कल्पोंका एक ब्रह्म नामका इन्द्र है। लान्तव और कापिष्ठ
इन दो कल्पोंमें एक लान्तव नामका इन्द्र है। शुक्र और महाशुक्रमें एक शुक्र नामका इन्द्र है।
शतार और सहस्रार इन दो कल्पोंमें एक शतार नामका इन्द्र है। तथा आनत, प्राणत, आरण
और अच्युत इन चार कल्पोंके चार इन्द्र हैं। इस प्रकार कल्पवासियोंके बारह इन्द्र होते हैं।
जम्बूद्वीप में एक महामन्दर नामका पर्वत है जो मूलमें एक हजार योजन गहरा है। और
निन्यानबे हजार योजन ऊँचा है। उसके नीचे अधोलोक है। मेरु पर्वतकी जितनी ऊँचाई है उतना
मोटा और तिरछा फैला हुआ तिर्यग्लोक है। उसके ऊपर ऊर्ध्वलोक है, जिसकी मेरु चूलिका
चालीस योजन विस्तृत है। उसके ऊपर एक बालके अन्तरसे ऋजुविमान है जो सौधर्म कल्पका
इन्द्रक विमान है। शेष सब लोकानुयोगसे जानना चाहिए। शंका - 'नवसु ग्रैवेयकेषु' यहाँ 'नव'
शब्दका कथन अलगसे क्यों किया है ? समाधान - अनुदिश नामके नौ विमान और हैं इस बातके
बतलानेके लिए 'नव' शब्दका अलगसे कथन किया है। इससे नौ अनुदिशोंका ग्रहण कर
लेना चाहिए ।
विशेषार्थ-यद्यपि पहले वमानिक निकायके बारह भेद कर आये हैं और यहाँ सोलह भेद
गिनाये हैं इसलिए यह शंका होती है कि इनमें से कोई एक कथन समीचीन होना चाहिए ? समा-
१. द्वयमेकम् मु० । २. ब्रह्मेन्द्रो नाम मु० । ३. -गाहो भवति नव मु०, ता०, ना० । ४. बाहुल्येन मु०, ता०,
ना०, दि० २ । ५. तत्प्रमाण (मेरुप्रमाण) स्तिर्य-मु० । ६. -वचनं अन्या- ता०, ना० । ७. - मानानि
सन्तीति आ०, ता०, ना० ।
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- ४।२१ § ४८३ ] चतुर्थोऽध्यायः १८५
§ ४८०. एषामधिकृतानां¹ वैमानिकानां परस्परतो विशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
स्थितिप्रभावसुखद्युतिलेश्याविशुद्धीन्द्रियावधिविषयतोऽधिकाः ॥२०॥
§ ४८१. स्वोपात्तस्यायुष उदयात्तस्मिन्भवे शरीरेण सहावस्थानं² स्थितिः । शापानुग्रह-
शक्तिः प्रभावः । सुखमिन्द्रियार्थानुभवः । शरीरवसनाभरणादिदीप्तिः द्युतिः । लेश्या उक्ता । लेश्याया
विशुद्धिलैश्याविशुद्धिः । इन्द्रियाणामवधेश्च विषय इन्द्रियावधिविषयः । ³तेभ्यस्तैर्वाऽधिका इति⁴ ५
तसिः । उपर्युपरि प्रतिकल्पं प्रतिप्रस्तारं च वैमानिकाः स्थित्यादिभिरधिका इत्यर्थः ।
§ ४८२. यथा स्थित्यादिभिरुपर्युपर्यधिका एवं गत्यादिभिरपीत्यतिप्रसङ्गे तन्निवृत्त्यर्थमाह—
गतिशरीरपरिग्रहाभिमानतो हीनाः ॥२१॥
§ ४८३. देशाद्देशान्तरप्राप्तिहेतुर्गतिः । शरीरं वैक्रियिकमुक्तम् । लोभकषायोदयाद्विषयेषु
सङ्गः परिग्रहः । मानकषायादुत्पन्नोऽहंकारोऽभिमानः । एतैर्गत्यादिभिरुपर्युपरि हीनाः । देशान्तर- १०
विषयक्रीडारतिप्रकर्षाभावादुपर्युपरि गतिहीनाः । शरीरं सौधर्मेशानयोर्देवानां सप्तरत्निप्रमाणम् ।
धान यह है कि कल्पोपपन्नोंके बारह इन्द्र होते हैं, इसलिए उनके भेद भी बारह ही हैं पर वे रहते
हैं सोलह कल्पोंमें । यहाँ कल्पोंमें रहनेवाले देवोंके भेद नहीं गिनाये हैं । यहाँ तो उनके निवास-
स्थानोंकी परिगणना की गयी है, इसलिए दोनों कथनोंमें कोई विरोध नहीं है। शेष कथन १५
सुगम है।
§ ४८०. अब इन अधिकार प्राप्त वैमानिकोंके परस्पर विशेष ज्ञान करानेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं—
स्थिति, प्रभाव, सुख, द्युति, लेश्याविशुद्धि, इन्द्रियविषय और अवधिविषयकी अपेक्षा
ऊपर-ऊपरके देव अधिक हैं ॥२०॥
§ ४८१. अपने द्वारा प्राप्त हुई आयुके उदयसे उस भवमें शरीरके साथ रहना स्थिति कह- २०
लाती है। शाप और अनुग्रहरूप शक्तिको प्रभाव कहते हैं। इन्द्रियोंके विषयोंके अनुभवने करनेको
सुख कहते हैं। शरीर, वस्त्र और आभूषण आदिकी कान्तिको द्युति कहते हैं। लेश्याका कथन कर
आये। लेश्याकी विशुद्धि लेश्याविशुद्धि कहलाती है। इन्द्रिय और अवधिज्ञानका विषय इन्द्रिय-
विषय और अवधिविषय कहलाता है। इनसे या इनकी अपेक्षा वे सब देव उत्तरोत्तर अधिक-अधिक
हैं। तात्पर्य यह है कि ऊपर-ऊपर प्रत्येक कल्पमें और प्रत्येक प्रस्तारमें वैमानिक देव स्थिति आदि- २५
की अपेक्षा अधिक-अधिक हैं।
§ ४८२. जिस प्रकार ये वैमानिक देव स्थिति आदिकी अपेक्षा ऊपर-ऊपर अधिक हैं
उसी प्रकार गति आदिकी अपेक्षा भी प्राप्त हुए, अतः इसका निराकरण करनेके लिए आगे का
सूत्र कहते हैं—
गति, शरीर, परिग्रह और अभिमानकी अपेक्षा ऊपर-ऊपरके देव हीन हैं ॥२१॥ ३०
§ ४८३. एक देशसे दूसरे देशके प्राप्त करनेका जो साधन है उसे गति कहते हैं। यहाँ
शरीरसे वैक्रियिक शरीर लिया है यह पहले कह आये हैं। लोभ कषायके उदयसे विषयोंके संगको
परिग्रह कहते हैं। मानकषायके उदयसे उत्पन्न हुए अहंकारको अभिमान कहते हैं। इन गति
आदिकी अपेक्षा वैमानिक देव ऊपर-ऊपर हीन हैं। भिन्न देशमें स्थित विषयोंमें क्रीड़ा विषयक
रतिका प्रकर्ष नहीं पाया जाता इसलिए ऊपर-ऊपर गमन कम है। सौधर्म और ऐशान स्वर्गके ३५
१. -तानां परस्प- आ० । २. सह स्थानं आ०, दि० १, दि० २ । ३. 'अपादाने चाहीयरुहोः'- पा० ५,
४, ४५ । -अपादानेऽहीयरुहोः' -जैनेन्द्र ४, २, ६२ । 'आद्यादिभ्य उपसंख्यानम्'-पा० ५, ४, ४४ वार्ति० ।
'आद्यादिभ्यस्तसिः' -जैनन्द्र० ४, २, ६० । ४. इति तस्मिन्नुप- मु० ।
२४
१८६ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।२२ § ४८४ -
सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः षडरत्निप्रमाणम् । ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठेषु पञ्चारत्निप्रमाणम् ।
शुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेषु चतुररत्निप्रमाणम् । आनतप्राणतयोरर्द्धचतुर्थारत्निप्रमाणम् । आरणा-
च्युतयोस्त्र्यरत्निप्रमाणम् । अधोग्रैवेयकेषु अर्द्धतृतीयारत्निप्रमाणम् । मध्यग्रैवेयकेष्वरत्निद्वयप्रमा-
णम् । उपरिग्रैवेयकेषु अनुदिशविमानकेषु च अध्यर्द्धारत्नि१प्रमाणम् । अनुत्तरेष्वरत्निप्रमाणम् ।
५ परिग्रहश्च विमानपरिच्छदादिरूपयु'परि हीनः । अभिमानश्चोपर्यु'परि तनुकषायत्वाद्धीनः ।
§ ४८४. पुरस्तात्त्रिषु निकायेषु देवानां लेश्याविधिरुक्तः । इदानीं वैमानिकेषु लेश्याविधि-
प्रतिपत्त्यर्थमाह—
पीतपद्मशुक्ललेश्या द्वित्रिशेषेषु ॥२२॥
§ ४८५. पीता च पद्मा च शुक्ला च२ ताः पीतपद्मशुक्लाः ।
– ४।२३ § ४८७ ] चतुर्थोऽध्यायः १८७
तेषामिव लेश्या येषां ते पीतपद्मशुक्ललेश्याः । तत्र कस्य का लेश्या इति । अत्रोच्यते—सौधर्मै-
शानयोः पीतलेश्याः । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः पीतपद्मलेश्याः । ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरलान्तवकापिष्ठेषु
पद्मलेश्याः । शुक्रमहाशुक्रशतारसहस्रारेषु पद्मशुक्ललेश्याः । आनतादिषु शुक्ललेश्याः । तत्राप्यनु-
दिशानुत्तरेषु परमशुक्ललेश्याः । सूत्रेऽनभिहितं कथं मिश्रग्रहणम् । साहचर्याल्लोकवत् । तद्यथा—
छत्रिणो गच्छन्ति इति अच्छत्रिषु छत्रव्यवहारः । एवमिहापि मिश्रयोरन्यतरग्रहणं भवति । अयमर्थः ९
सूत्रतः कथं गम्यते इति चेत् । उच्यते—एवमभिसंबन्धः क्रियते, द्वयोः कल्पयुगलयोः पीतलेश्या;
सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः पद्मलेश्याया अविवक्षातः ब्रह्मलोकादिषु त्रिषु कल्पयुगलेषु पद्मलेश्या;
शुक्रमहाशुकयोः शुक्ललेश्याया अविवक्षातः । शेषेषु शतारादिषु शुक्ललेश्या; पद्मलेश्याया अवि-
वक्षातः । इति नास्ति दोषः ।
§ ४८६. आह कल्पोपपन्ना इत्युक्तं तत्रेदं न ज्ञायते के कल्पा इत्यत्रोच्यते— १०
प्राग्ग्रैवेयकेभ्यः कल्पाः ॥२३॥
§ ४८७. इदं न ज्ञायते इत आरभ्य कल्पा भवन्तीति सौधर्मादिग्रहणमनुवर्तते । तेनायमर्थो
लभ्यते—सौधर्मादयः प्राग्ग्रैवेयकेभ्यः कल्पा इति । पारिशेष्यादितरे कल्पातीता इति ।
करण करनेपर मध्यमा और विलम्बितावृत्तिमें उसका उपसंख्यान होता है इसके अनुसार यहाँ
'मध्यमा' शब्दमें औत्तरपदिक ह्रस्व हुआ है। उसी प्रकार प्रकृतमें भी औत्तरपदिक ह्रस्व जानना १५
चाहिए। अथवा यहाँ पीता, पद्मा और शुक्ला शब्द न लेकर पीत, पद्म और शुक्ल वर्णवाले
पदार्थ लेने चाहिए । जिनके इन वर्णोंके समान लेश्याएँ पायी जाती हैं वे पीत, पद्म और शुक्ल
लेश्यावाले जीव हैं। इस प्रकार यहाँ पीत, पद्म और शुक्ल ये तीन शब्द ह्रस्व ही समझना
चाहिए। अब किसके कौन लेश्या है यह बतलाते हैं—सौधर्म और ऐशान कल्पमें पीत लेश्या है।
सानत्कुमार और माहेन्द्रकल्पमें पीत और पद्म दोनों लेश्याएँ हैं। ब्रह्मलोक, ब्रह्मोत्तर, लान्तव २०
और कापिष्ठ कल्पोंमें पद्मलेश्या है। शुक्र, महाशुक्र, शतार और सहस्रार कल्पमें पद्म और
शुक्ल ये दो लेश्याएँ हैं। तथा आनतादिकमें शुक्ल लेश्या है। उसमें भी अनुदिश और अनुत्तर
विमानोंमें परम शुक्ल लेश्या है। शंका—सूत्रमें तो मिश्र लेश्याएँ नहीं कही हैं फिर उनका कैसे
ग्रहण होता है ? समाधान—सम्बन्धसे मिश्र लेश्याओंका ग्रहण होता है, लोकके समान । जैसे,
'छत्री जाते हैं' ऐसा कथन करने पर अच्छत्रियोंमें भी छत्री व्यवहार होता है उसी प्रकार यहाँ भी २५
दोनों मिश्र लेश्याओंमें से किसी एकका ग्रहण होता है। शंका—यह अर्थ सूत्रसे कैसे जाना जाता
है ? समाधान—यहाँ ऐसा सम्बन्ध करना चाहिए कि दो कल्प युगलोंमें पीत लेश्या है। यहाँ
सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पमें पद्मलेश्याकी विवक्षा नहीं की। ब्रह्मलोक आदि तीन कल्प-
युगलोंमें पद्म लेश्या है। शुक्र और महाशुक्रमें शुक्ल लेश्याकी विवक्षा नहीं की। शेष शतार
आदिमें शुक्ललेश्या है। पद्म लेश्याकी विवक्षा नहीं की। इसलिए कोई दोष नहीं है। ३०
§ ४८६. कल्पोपपन्न देव हैं यह कह आये पर यह नहीं ज्ञात हुआ कि कल्प कौन हैं, इस-
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
ग्रैवेयकोंसे पहले तक कल्प हैं ॥२३॥
§ ४८७. यह नहीं मालूम होता कि यहाँसे लेकर कल्प है इसलिए सौधर्म आदि पदकी
अनुवृत्ति होती है। इससे यह अर्थ प्राप्त होता है कि सौधर्मसे लेकर और नौ ग्रैवेयकसे पूर्वंतक कल्प ३५
हैं। परिशेष न्यायसे यह भी ज्ञात हो जाता है कि शेष सब कल्पातीत हैं।
१८८ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।२४ § ४८८ -
§ ४८८. लौकान्तिका देवा वैमानिकाः सन्तः क्व गृह्यन्ते । कल्पोपपन्नेषु । कथमिति
चेदुच्यते-
ब्रह्मलोकालया लौकान्तिकाः ॥२४॥
§ ४८९. एत्य तस्मिन् लीयन्त इति आलय आवासः । ब्रह्मलोक आलयो येषां ते ब्रह्मलो-
कालया लौकान्तिका देवा वेदितव्याः । यद्येवं सर्वेषां ब्रह्मलोकालयानां देवानां लौकान्तिकत्वं
प्रसक्तम् । अन्वर्थसंज्ञाग्रहणाददोषः ब्रह्मलोको लोकः, तस्यान्तो लोकान्तः, तस्मिन्भवा लौकान्तिका
इति न सर्वेषां ग्रहणम् । तेषां हि विमानानि ब्रह्मलोकस्यान्तेषु स्थितानि । अथवा जन्मजरामरणा-
कीर्णो लोकः संसारः, तस्यान्तो लोकान्तः । लोकान्ते भवा लौकान्तिकाः । ते सर्वे परीतसंसाराः,
ततश्च्युता एकं गर्भवासं प्राप्य परिनिर्वास्यन्तीति ।
§ ४९०. तेषां सामान्येनोपदिष्टानां भेदप्रदर्शनार्थमाह-
सारस्वतादित्यवह्न्यरुणगर्दतोयतुषिताव्याबाधारिष्टाश्च ॥२५॥
§ ४९१. क्व इमे सारस्वतादयः । अष्टास्वपि पूर्वोत्तरादिषु दिक्षु यथाक्रममेते सारस्वतादयो
देवगणा वेदितव्याः । तद्यथा-पूर्वोत्तरकोणे सारस्वतविमानम्, पूर्वस्यां दिशि आदित्यविमानम्,
पूर्वदक्षिणस्यां दिशि वह्निविमानम्, दक्षिणस्यां दिशि अरुणविमानम्, दक्षिणापरकोणे गर्दतोय-
विमानम्, अपरस्यां दिशि तुषितविमानम्, उत्तरापरस्यां दिशि अव्याबाधविमानम्, उत्तरस्यां दिशि
अरिष्टविमानम् । 'च'शब्दसमुच्चितास्तेषामन्तरेषु द्वौ देवगणौ । तद्यथा-सारस्वतादित्यान्तरे
§ ४८८. लौकान्तिक देव वैमानिक हैं उनका किनमें समावेश होता है ? वैमानिकोंमें ।
कैसे ? अब इसी बातके बतलानेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
लौकान्तिक देवोंका ब्रह्मलोक निवासस्थान है ॥२४॥
§ ४८९. आकर जिसमें लयको प्राप्त होते हैं वह आलय या आवास कहलाता है । ब्रह्मलोक
जिनका घर है वे ब्रह्मलोकमें रहनेवाले लौकान्तिक देव जानना चाहिए । शंका-यदि ऐसा है तो
ब्रह्मलोकमें रहनेवाले सब देव लौकान्तिक हुए ? समाधान - सार्थक संज्ञाके ग्रहण करनेसे यह दोष
नहीं रहता । लौकान्तिक शब्दमें जो लोक शब्द है उससे ब्रह्मलोक लिया है और उसका अन्त
अर्थात् प्रान्तभाग लोकान्त कहलाया । वहाँ जो होते हैं वे लौकान्तिक कहलाते हैं इसलिए
ब्रह्मलोकमें रहनेवाले सब देवोंका ग्रहण नहीं होता है। इन लौकान्तिक देवोंके विमान ब्रह्मलोकके
प्रान्तभागमें स्थित हैं। अथवा जन्म, जरा और मरणसे व्याप्त संसार लोक कहलाता है और उसका
अन्त लोकान्त कहलाता है। इस प्रकार संसारके अन्तमें जो होते हैं वे लौकान्तिक हैं, क्योंकि
ये सब संसारको प्राप्त हो गये हैं। वहाँसे च्युत होकर और एक बार गर्भमें रहकर निर्वाणको
प्राप्त होंगे ।
§ ४९०. सामान्यसे कहे गये उन लौकान्तिक देवोंके भेदोंका कथन करनेके लिए आगेका
सूत्र कहते हैं-
सारस्वत, आदित्य, वह्नि, अरुण, गर्दतोय, तुषित, अव्याबाध और अरिष्ट ये लौकान्तिक
देव हैं ॥२५॥
§ ४९१. शंका-ये सारस्वत आदिक कहां रहते हैं ? समाधान-पूर्व-उत्तर आदि आठों ही
दिशाओंमें क्रमसे ये सारस्वत आदि देवगण रहते हैं ऐसा जानना चाहिए । यथा - पूर्वोत्तर कोणमें
सारस्वतोंके विमान हैं। पूर्व दिशामें आदित्योंके विमान हैं। पूर्व-दक्षिण दिशामें वह्निदेवोंके विमान
हैं। दक्षिण दिशामें अरुण विमान हैं। दक्षिण-पश्चिम कोनेमें गर्दतोयविमान हैं। पश्चिम दिशामें
तुषितविमान हैं। उत्तर-पश्चिम दिशामें अव्याबाधविमान हैं। और उत्तर दिशामें अरिष्टविमान हैं।
अग्न्याभसूर्याभाः । आदित्यस्य च वह्नेश्चान्तरे चन्द्राभसत्याभाः । वह््न्यरुणान्तराले श्रेयस्करक्षेमं-
कराः । अरुणगर्दतोयान्तराले वृषभैष्टकामचाराः । गर्दतोयतुषितमध्ये निर्माणरजोदिगन्तरक्षिताः ।
तुषिताव्याबाधमध्ये आत्मरक्षितसर्वरक्षिताः । अव्याबाधारिष्टान्तराले मरुद्वसवः । अरिष्टसार-
स्वतान्तराले अश्वविश्ववाः । सर्वे एते स्वतन्त्राः, हीनाधिकत्वाभावात्, विषयरतिविरहाद्देवर्षयः,
इतरेषां देवानामर्र्चनीयाः, चतुर्दशपूर्वधराः तीर्थकरनिष्क्रमणप्रतिबोधनपरा वेदितव्याः। ५
§ ४९२. आह, उक्ता लौकान्तिकास्ततश्च्युता एकं गर्भवासमवाप्य निर्वा्स्यन्तीत्युक्ताः ।
किमेवमन्येष्वपि निर्वाणप्राप्तिकालविभागो विद्यते । इत्यत आह—
विजयादिषु द्विचरमाः ॥२६॥
§ ४९३. 'आदि'शब्दः प्रकारार्थे वर्तते, तेन विजयवैजयन्तजयन्तापराजितानुदिशविमाना-
नामिष्टानां ग्रहणं सिद्धं भवति । कः पुनरत्र प्रकारः । अहमिन्द्रत्वे सति सम्यग्दृष्ट्युपपादः । १०
सर्वार्थसिद्धिप्रसङ्ग इति चेत् । न; तेषां, परमोत्कृष्टत्वात्, अन्वर्थसंज्ञात एकचरमत्वसिद्धेः । चरमत्वं
देहस्य मनुष्यभवापेक्षया । द्वौ चरमौ देहौ येषां ते द्विचरमाः । विजयादिभ्यश्च्युता अप्रतिपतित-
सम्यक्त्वा मनुष्येषूत्पद्य संयममाराध्य पुनर्विजयादिषूत्पद्य ततश्च्युताः पुनर्मनुष्यभवमवाप्य सिद्ध्य-
न्तीति द्विचरमदेहत्वम् ।
सूत्रमें 'च' शब्द है उससे इनके मध्यमें दो दो देवगण और हैं इसका समुच्चय होता है । यथा— १५
सारस्वत और आदित्यके मध्यमें अग्न्याभ और सूर्याभ हैं। आदित्य और वह्निके मध्यमें चन्द्राभ
और सत्याभ हैं। वह्नि और अरुणके मध्यमें श्रेयस्कर और क्षेमंकर हैं। अरुण और गर्दतोयके
मध्यमें वृषभैष्ट और कामचार हैं। गर्दतोय और तुषितके मध्यमें निर्माणरजस् और दिगन्तरक्षित
हैं। तुषित और अव्याबाधके मध्यमें आत्मरक्षित और सर्वरक्षित हैं। अव्याबाध और अरिष्टके
मध्यमें मरुत् और वसु हैं। अरिष्ट और सारस्वतके मध्यमें अश्व और विश्व हैं। ये सब देव स्वतन्त्र २०
हैं, क्योंकि इनमें हीनाधिकता नहीं पायी जाती । विषय-रतिसे रहित होनेके कारण देवऋषि हैं।
दूसरे देव इनकी अर्चा करते हैं। चौदह पूर्वोंके ज्ञाता हैं और वैराग्य कल्याणकके समय तीर्थंकरको
संबोधन करनेमें तत्पर हैं।
§ ४९२. लौकान्तिक देवोंका कथन किया और वहाँसे च्युत होकर तथा एक गर्भको धारण
करके निर्वाणको प्राप्त होंगे यह भी कहा। क्या इसी प्रकार अन्य देवोंमें भी निर्वाणको प्राप्त होनेके २५
कालमें भेद है ? अब इसी बातका ज्ञान कराने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
विजयादिकमें दो चरमवाले देव होते हैं ॥२६॥
§ ४९३. यहाँ आदि शब्द प्रकारवाची है। इससे विजय, वैजयन्त, जयन्त, अपराजित और
नौ अनुदिशोंका ग्रहण सिद्ध हो जाता है। शंका—यहाँ कौन-सा प्रकार लिया है ? समाधान—
अहमिन्द्र होते हुए सम्यग्दृष्टियोंका उत्पन्न होना, यह प्रकार यहाँ लिया गया है। शंका—इससे ३०
सर्वार्थसिद्धिका भी ग्रहण प्राप्त होता है ? समाधान—नहीं, क्योंकि वे परम उत्कृष्ट हैं। उनका
सर्वार्थसिद्धि यह सार्थक नाम है इसलिए वे एक भवावतारी होते हैं। देहका चरमपना मनुष्य भवकी
अपेक्षा लिया है। जिसके दो चरम भव होते हैं वे द्विचरम कहलाते हैं। जो विजयादिकसे च्युत
होकर और सम्यक्त्वको न छोड़कर मनुष्योंमें उत्पन्न होते हैं और संयमकी आराधना कर पुनः
मनुष्य भवको प्राप्त करके सिद्ध होते हैं। इस प्रकार यहाँ मनुष्य भवकी अपेक्षा द्विचरमपना है। ३५
विशेषार्थ—कोई-कोई विजयादिकके देव मनुष्य होते हैं। अनन्तर सौधर्म और ईशान कल्पमें
देव होते हैं। अनन्तर मनुष्य होते हैं। फिर विजयादिकमें देव होते हैं और अन्तमें वहाँसे च्युत
होकर मनुष्य होते हैं। तब कहीं मोक्ष जाते हैं। इस प्रकार इस विधिसे विचार करनेपर मनुष्यके
१९० सर्वार्थसिद्धौ [ ४।२७ § ४९४ -
§ ४९४. आह, जीवस्यौदयिकेषु भावेषु तिर्यग्योनिगतिरौदयिकीत्युक्तं, पुनश्च स्थितौ
'तिर्यग्योनिजानां च' इति । तत्र न ज्ञायते के तिर्यग्योनयः । इत्यत्रोच्यते-
औपपादिकमनुष्येभ्यः शेषास्तिर्यग्योनयः ॥२७॥
§ ४९५. औपपादिका उक्ता देवनारकाः । मनुष्याश्च निर्दिष्टाः 'प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः'
५ इति । एभ्योऽन्ये संसारिणो जीवाः शेषास्ते' तिर्यग्योनयो वेदितव्याः । तेषां तिरश्चां देवादीनामिव
क्षेत्रविभागः पुनर्निर्देष्टव्यः । सर्वलोकव्यापित्वात्तेषां क्षेत्रविभागो नोक्तः ।
§ ४९६. आह, स्थितिरुक्ता नारकाणां मनुष्याणां तिरश्चां च । देवानां नोक्ता । तस्यां
वक्तव्यायामादावुद्दिष्टानां भवनवासिनां स्थितिप्रतिपादनार्थमाह-
स्थितिरसुरनागसुपर्णद्वीपशेषाणां सागरोपमत्रिपल्योपमार्द्धहीनमिता ॥२८॥
१० § ४९७. असुरादीनां सागरोपमादिभिर्यथाक्रममत्राभिसंबन्धो वेदितव्यः । इयं स्थितिरुत्कृष्टा।
जघन्याप्युत्तरत्र वक्ष्यते । तद्यथा असुराणां सागरोपमा स्थितिः । नागानां त्रिपल्योपमानि२ स्थितिः ।
सुपर्णानामर्द्धतृतीयानि । द्वीपानां द्वे । शेषाणां षण्णामध्यर्द्धपल्योपमम् ।
तीन भव हो जाते हैं । इसलिए मनुष्य भवकी अपेक्षा द्विचचरमपना नहीं ठहरता ? इसका समाधान
यह है कि विजयादिकसे तो दो बार ही मनुष्य जन्म लेना पड़ता है, इसलिए पूर्वोक्त कथन बन
१५ जाता है। ऐसा जीव यद्यपि मध्यमें एक बार अन्य कल्पमें हो आया है, पर सूत्रकारने यहाँ उसकी
विवक्षा नहीं की है । उनकी दृष्टि यही बतलानेकी रही है कि विजयादिकसे अधिकसे अधिक
कितनी बार मनुष्य होकर जीव मोक्ष जाता है।
§ ४९४. जीवके औदयिक भावोंको बतलाते हुए तिर्यंचगति औदयिकी कही है। पुनः
स्थितिका कथन करते समय 'तिर्यग्योनिजानां च' यह सूत्र कहा है। पर यह न जान सके कि
२० तिर्यंच कौन हैं इसलिए आगेका सूत्र कहते हैं-
उपपाद जन्मवाले और मनुष्योंके सिवा शेष सब जीव तिर्यंचयोनिवाले हैं ॥२७॥
§ ४९५. औपपादिक देव और नारकी हैं यह पहले कह आये । 'प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः'
इसका व्याख्यान करते समय मनुष्योंका भी कथन कर आये । इनसे अन्य जितने संसारी जीव हैं
उनका यहाँ शेष पदके द्वारा ग्रहण किया है। वे सब तिर्यंच जानना चाहिए। शंका - जिस प्रकार
२५ देवादिकका पृथक्-पृथक् क्षेत्र बतलाया है उसी प्रकार इनका क्षेत्र बतलाना चाहिए ? समाधान -
तिर्यंच सब लोकमें रहते हैं अतः उनका अलगसे क्षेत्र नहीं कहा ।
§ ४९६. नारकी, मनुष्य और तिर्यंचोंकी स्थिति पहले कही जा चुकी है। परन्तु अभी तक
देवोंकी स्थिति नहीं कही है। अतः उसका कथन करते हुए सर्वप्रथम प्रारम्भमें कहे गये भवन-
वासियोंकी स्थितिका कथन करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
३० असुरकुमार, नागकुमार, सुपर्णकुमार, द्वीपकुमार और शेष भवनवासियोंकी उत्कृष्ट स्थिति
क्रमसे एक सागर, तीन पल्य, ढाई पल्य, दो पल्य और डेढ़ पल्य प्रमाण है ॥२८॥
§ ४९७. यहाँ सागरोपम आदि शब्दोंके साथ असुरकुमार आदि शब्दोंका क्रमसे सम्बन्ध
जान लेना चाहिए । यह उत्कृष्ट स्थिति है । जघन्य स्थिति भी आगे कहेंगे। वह उत्कृष्ट स्थिति
इस प्रकार है-असुरोंकी स्थिति एक सागर है । सागरोंकी उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य है। सुपर्णोंकी
३५ उत्कृष्ट स्थिति ढाई पल्य है। द्वीपोंकी उत्कृष्ट स्थिति दो पल्य है। और शेष छह कुमारोंकी उत्कृष्ट
स्थिति डेढ़ पल्य है।
१. शेषास्तिर्य-मु०, दि० २ । २. -पमा स्थितिः मु० ।
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- ४।३१ § ५०३ ] चतुर्थोऽध्यायः १९१
§ ४९८. आद्यदेवनिकायस्थित्यभिधानादनन्तरं व्यन्तरज्योतिष्कस्थितिवचने क्रमप्राप्ते सति
तदुल्लङ्घ्य वैमानिकानां स्थितिरुच्यते । कुतः। तयोरुत्तरत्र लघुनोपायेन स्थितिवचनात् । तेषु
चादावुद्दिष्टयोः कल्पयोः स्थितिविधानार्थमाह—
सौधर्मेशानयोः सागरोपमे अधिके ॥२९॥
§ ४९९. 'सागरोपमे' इति द्विवचननिर्देशाद् द्वित्वगतिः । 'अधिके' इत्ययमधिकारः । आ ५
कुतः । आ सहस्रारात् । इदं तु कुतो ज्ञायते । उत्तरत्र 'तु' शब्दग्रहणात् । तेन सौधर्मेशानयोर्देवानां
द्वे सागरोपमे सातिरेके प्रत्येतव्ये ।
§ ५००. उत्तरयोः स्थितिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः सप्त ॥३०॥
§ ५०१. अनयोः कल्पयोर्देवानां सप्तसागरोपमाणि साधिकानि उत्कृष्टा स्थितिः । १०
§ ५०२. ब्रह्मलोकादिष्वच्युतावसानेषु स्थितिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
त्रिसप्तनवैकादशत्रयोदशपञ्चदशभिरधिकानि तु ॥३१॥
§ ५०३. 'सप्त'ग्रहणं प्रकृतम् । तस्येह त्र्यादिभिर्निर्दिष्टैरभिसंबन्धो वेदितव्यः । सप्त
त्रिभिरधिकानि, सप्त सप्तभिरधिकानीत्यादिः । द्वयोर्द्वयोरभिसंबन्धो वेदितव्यः । 'तु'शब्दो विशेष-
§ ४९८. देवोंके प्रथम निकायकी स्थिति कहनेके पश्चात् व्यन्तर और ज्योतिषियोंकी स्थिति १५
क्रमप्राप्त है किन्तु उसे छोड़कर वैमानिकोंकी स्थिति कहते हैं; क्योंकि व्यन्तर और ज्योतिषियोंकी
स्थिति आगे थोड़ेमें कही जा सकेगी । वैमानिकोंमें आदिमें कहे गये दो कल्पोंकी स्थितिका कथन
करनेके लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
सौधर्म और ऐशान कल्पमें दो सागरसे कुछ अधिक उत्कृष्ट स्थिति है ॥२९॥
§ ४९९. सूत्रमें 'सागरोपमे' यह द्विवचन प्रयोग दिया है उससे दो सागरोंका ज्ञान होता है । २०
'अधिके' यह अधिकार वचन है । शंका—इसका कहां तक अधिकार है ? समाधान—सहस्रार कल्प
तक । शंका—यह कैसे जाना जाता है ? समाधान—अगले सूत्रमें जो 'तु' पद दिया है उससे
जाना जाता है ।
§ ५००. इससे यह निश्चित होता है कि सौधर्म और ऐशान कल्पमें दो सागरसे कुछ
अधिक स्थिति है। अब आगेके दो कल्पोंमें स्थिति विशेषका ज्ञान करानेके लिए आगे का सूत्र २५
कहते हैं—
सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्पमें सात सागरसे कुछ अधिक उत्कृष्ट स्थिति है ॥३०॥
§ ५०१. इन दो कल्पोंमें देवोंकी साधिक सात सागर उत्कृष्ट स्थिति है ।
§ ५०२. अब ब्रह्मलोकसे लेकर अच्युत पर्यन्त कल्पोंमें स्थिति विशेषका ज्ञान करानेके लिए
आगेका सूत्र कहते हैं— ३०
ब्रह्म-ब्रह्मोत्तर युगलसे लेकर प्रत्येक युगलमें आरण-अच्युत तक क्रमसे साधिक तीनसे
अधिक सात सागरोपम, साधिक सातसे अधिक सात सागरोपम, साधिक नौसे अधिक सात
सागरोपम, साधिक ग्यारहसे अधिक सात सागरोपम, तेरहसे अधिक सात सागरोपम और पन्द्रह-
से अधिक सात सागरोपम उत्कृष्ट स्थिति है ॥३१॥
§ ५०३. यहाँ पिछले सूत्रसे 'सप्त' पदका ग्रहण होता है । उसका यहाँ तीन आदि निर्दिष्ट ३५
शब्दोंके साथ सम्बन्ध जानना चाहिए । यथा—तीन अधिक सात, सात अधिक सात आदि । तथा
इनका क्रमसे दो दो कल्पोंके साथ सम्बन्ध जानना चाहिए । सूत्रमें 'तु' शब्द विशेषताके दिखलाने-
१९२ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।३२ § ५०४ -
णार्थः । किं विशिनष्टि । 'अधिक' शब्दोऽनुवर्तमानश्चतुर्भिरेभिसंबध्यते¹ नोत्तराभ्यामित्ययमर्थो
विशिष्यते । तेनायमर्थो भवति—ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरयोर्दशसागरोपमाणि साधिकानि । लान्तवका-
पिष्ठयोश्चतुर्दशसागरोपमाणि साधिकानि । शुक्क्रमहाशुक्रयोः षोडशसागरोपमाणि साधिकानि ।
शतारसहस्रारयोरष्टादशसागरोपमाणि साधिकानि । आनतप्राणतयोर्विंशतिसागरोपमाणि ।
आरणाच्युतयोर्द्वाविंशतिसागरोपमाणि ।
§ ५०४. तत ऊर्ध्वं स्थितिविशेषप्रतिपत्त्यर्थमाह—
आरणाच्युतादूर्ध्वमेकैकैकेन नवसु ग्रैवेयकेषु विजयादिषु सर्वार्थसिद्धौ च ॥३२॥
§ ५०५. 'अधिक' ग्रहणमनुवर्तते । तेनेहाभिसंबन्धो वेदितव्यः । एकैकेनाधिकानीति ।
'नव' ग्रहणं किमर्थम् । प्रत्येकमेकैकमधिकमिति ज्ञापनार्थम् । इतरथा हि ग्रैवेयकेष्वेकमेवाधिकं
स्यात् । विजयादिष्विति 'आदि' शब्दस्य प्रकारार्थत्वादनुदिशानमपि ग्रहणम् । सर्वार्थसिद्धेस्तु
पृथग्ग्रहणं जघन्याभावप्रतिपादनार्थम् । तेनायमर्थः, अधोग्रैवेयकेषु प्रथमे त्रयोविंशतिः, द्वितीये
चतुर्विंशतिः, तृतीये पञ्चविंशतिः । मध्यमग्रैवेयकेषु प्रथमे षड्विंशतिः द्वितीये सप्तविंशतिः
तृतीयेऽष्टाविंशतिः । उपरिग्रैवेयकेषु प्रथमे एकोनत्रिंशद् द्वितीये त्रिंशत् तृतीये एकत्रिंशत् ।
अनुदिशविमानेषु द्वात्रिंशत् । विजयादिषु त्रयस्त्रिंशत्सागरोपमाण्युत्कृष्टा स्थितिः । सर्वार्थसिद्धौ²
त्रयस्त्रिंशदेवेति ।
के लिए आया है । शंका—इससे क्या विशेषता मालूम पड़ती है ? समाधान—इससे यहाँ यह
विशेषता मालूम पड़ती है कि अधिक शब्दकी अनुवृत्ति होकर उसका सम्बन्ध त्रि आदि चार शब्दों-
से ही होता है, अन्तके दो स्थितिविकल्पोंसे नहीं । इससे यहाँ यह अर्थ प्राप्त हो जाता है, ब्रह्मलोक
और ब्रह्मोत्तरमें साधिक दस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । लान्तव और कापिष्ठमें साधिक चौदह-
सागर उत्कृष्ट स्थिति है । शुक्र और महाशुक्रमें साधिक सोलह सागर उत्कृष्ट स्थिति है । शतार
और सहस्रारमें साधिक अठारह सागर उत्कृष्ट स्थिति है । आनत और प्राणतमें बीस सागर
उत्कृष्ट स्थिति है । तथा आरण और अच्युतमें बाईस सागर उत्कृष्ट स्थिति है ।
§ ५०४. अब इसके आगेके विमानोंमें स्थितिविशेषका ज्ञान करानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
आरण-अच्युतके ऊपर नौ ग्रैवेयकमें-से प्रत्येकमें नौ अनुदिशमें, चार विजयादिकमें एक-एक
सागर अधिक उत्कृष्ट स्थिति है । तथा सर्वार्थसिद्धिमें पूरी तैंतीस सागर स्थिति है । ॥३२॥
§ ५०५. पूर्व सूत्रसे अधिक पदकी अनुवृत्ति होती है, इसलिए यहाँ इस प्रकार सम्बन्ध
करना चाहिए कि एक-एक सागर अधिक है । शंका—सूत्रमें 'नव' पदका ग्रहण किसलिए किया ?
समाधान—प्रत्येक ग्रैवेयकमें एक-एक सागर अधिक उत्कृष्ट स्थिति है इस बातका ज्ञान करानेके
लिए 'नव' पदका अलगसे ग्रहण किया है । यदि ऐसा न करते तो सब ग्रैवेयकोंमें एक सागर
अधिक स्थिति ही प्राप्त होती । 'विजयादिषु' में आदि शब्द प्रकारवाची है जिससे अनुदिशोंका ग्रहण
हो जाता है । सर्वार्थसिद्धिमें जघन्य आयु नहीं है यह बतलानेके लिए 'सर्वार्थसिद्धि' पदका अलगसे
ग्रहण किया है । इससे यह अर्थ प्राप्त हुआ कि अधोग्रैवेयकमें-से प्रथममें तेईस सागर, दूसरेमें
चौबीस सागर और तीसरेमें पच्चीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । मध्यम ग्रैवेयकमें-से प्रथममें छब्बीस
सागर, दूसरेमें सत्ताईस सागर और तीसरेमें अट्ठाईस सागर उत्कृष्ट स्थिति है । उपरिम ग्रैवेयकमें-से
पहलेमें उनतीस सागर, दूसरेमें तीस सागर और तीसरेमें इकतीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है ।
अनुदिश विमानोंमें बत्तीस सागर उत्कृष्ट स्थिति है और सर्वार्थसिद्धिमें तैंतीस सागर ही स्थिति है ।
यहाँ उत्कृष्ट और जघन्यका भेद नहीं है ।
१. -तुर्भिरिह सम्ब-भा० १, दि० २ । २. जघन्यस्थितिः मु० ।
- ४।३५ § ५१० ] चतुर्थोऽध्यायः १९३
§ ५०६. निर्दिष्टोत्कृष्टस्थितिकेषु देवेषु जघन्यस्थितिप्रतिपादनार्थमाह—
अपरा पल्योपममधिकम् ॥३३॥
§ ५०७. पल्योपमं व्याख्यातम् । अपरा जघन्या१ स्थितिः । पल्योपमं साधिकम् । केषाम् ।
सौधर्मेशानीयानाम् । कथं गम्यते । 'परतः परतः' इत्युत्तरत्र वक्ष्यमाणत्वात् ।
§ ५०८. तत ऊर्ध्वं जघन्यस्थितिप्रतिपादनार्थमाह—
परतः परतः पूर्वापूर्वानन्तरा ॥३४॥
§ ५०९. परस्मिन्देशे परतः । वीप्सायां द्वित्वम् । 'पूर्व'शब्दस्यापि । 'अधिक'ग्रहणमनुवर्तते ।
तेनैवमभिसंबन्धः क्रियते—सौधर्मेशानयोद्वे सागरोपमे साधिके उक्ते, ते साधिके सानत्कुमारमाहेन्द्र-
योर्जघन्या स्थितिः । सानत्कुमारमाहेन्द्रयोः परा स्थितिः सप्तसागरोपमाणि साधिकानि, २तानि
साधिकानि ब्रह्मब्रह्मोत्तरयोर्जघन्या स्थितिरित्यादि ।
§ ५१०. नारकाणामुत्कृष्टा स्थितिरुक्ता । जघन्यां सूत्रेऽनुपात्तामप्रकृतामपि लघुनोपायेन
प्रतिपादयितुमिच्छन्नाह—
नारकाणां च द्वितीयादिषु ॥३५॥
§ ५०६. जिनमें उत्कृष्ट स्थिति कह आये हैं उनमें जघन्य स्थिति का कथन करने के लिए
आगेका सूत्र कहते हैं—
सौधर्म और ऐशान कल्पमें जघन्य स्थिति साधिक एक पल्य है ॥३३॥
§ ५०७. पल्योपमका व्याख्यान कर आये । यहाँ 'अपरा' पदसे जघन्य स्थिति ली गयी है ।
जो साधिक एक पल्य है । शंका—यह जघन्य स्थिति किनकी है । समाधान—सौधर्म और ऐशान
कल्पके देवोंकी । शंका—कैसे जाना जाता है ? समाधान—जो पूर्व-पूर्व देवों की उत्कृष्ट स्थिति है
वह अगले-अगले देवों की जघन्य स्थिति है यह आगे कहनेवाले हैं इससे जाना जाता कि यह
सौधर्म और ऐशान कल्पके देवों की जघन्य स्थिति है ।
§ ५०८. अब सौधर्म और ऐशान कल्पसे आगेके देवोंकी जघन्य स्थितिका प्रतिपादन करनेके
लिए आगेका सूत्र कहते हैं—
आगे-आगे पूर्व-पूर्वकी उत्कृष्ट स्थिति अनन्तर-अनन्तरकी जघन्य स्थिति है ॥३४॥
§ ५०९. यहाँ 'परतः' पदका अर्थ 'पर स्थानमें' लिया गया है । तथा द्वित्व वीप्सा रूप
अर्थमें आया है । इसी प्रकार 'पूर्व' शब्द को भी वीप्सा अर्थमें द्वित्व किया है । अधिक पदकी यहाँ
अनुवृत्ति होती है । इसलिए इस प्रकार सम्बन्ध करना चाहिए कि सौधर्म और ऐशान कल्पमें जो
साधिक दो सागर उत्कृष्ट स्थिति कही है उसमें एक समय मिला देने पर सानत्कुमार और माहेन्द्र-
कल्पमें जघन्य स्थिति होती है । सानत्कुमार और माहेन्द्रमें जो साधिक सात सागर उत्कृष्ट स्थिति
कही है उसमें एक समय मिला देने पर ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर में जघन्य स्थिति होती है इत्यादि ।
§ ५१०. नारकियोंकी उत्कृष्ट स्थिति कह आये हैं पर सूत्र-द्वारा अभी जघन्य स्थिति नहीं
कही है । यद्यपि उसका प्रकरण नहीं है तो भी यहाँ उसका थोड़ेमें कथन हो सकता है इस इच्छासे
आचार्यने आगेका सूत्र कहा है—
दूसरी आदि भूमियोंमें नारकोंकी पूर्व-पूर्वकी उत्कृष्ट स्थिति ही अनन्तर-अनन्तरकी जघन्य
स्थिति है ॥३५॥
१. जघन्यस्थितिः मु० । २. तानि ब्रह्म-मु०, ता० ।
२५
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१९४ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।३६ § ५११ -
§ ५११. 'च'शब्दः किमर्थः । प्रकृतसमुच्चयार्थः । किं च प्रकृतम् । 'परतः परतः पूर्वापूर्वा-
ऽनन्तरा' अपरा स्थितिरिति । तेनायमर्थो लक्ष्यते-रत्नप्रभायां नारकाणां परा स्थितिरेकं सागरोप-
मम् । सा शर्कराप्रभायां जघन्या । शर्कराप्रभायामुत्कृष्टा स्थितिरस्त्रीणि सागरोपमाणि । सा
वालुकाप्रभायां जघन्येत्यादि ।
§ ५१२. एवं द्वितीयादिषु जघन्या स्थितिरुक्ता । प्रथमायां का जघन्येति तत्प्रदर्शनार्थमाह-
दशवर्षसहस्राणि प्रथमायाम् ॥३६॥
§ ५१३. अपरा स्थितिरित्यनुवर्तते¹ । रत्नप्रभायां दशवर्षसहस्राणि अपरा स्थितिवेदितव्या ।
§ ५१४. अथ भवनवासिनां का जघन्या स्थितिरित्यत आह-
भवनेषु च ॥३७॥
§ ५१५. 'च' शब्द किमर्थः । प्रकृतसमुच्चयार्थः । तेन भवनवासिनामपरा स्थितिर्दशवर्ष-
सहस्राणीत्यभिसंबध्यते ।
§ ५१६. व्यन्तराणां तर्हि का जघन्या स्थितिरित्यत आह-
व्यन्तराणां च ॥३८॥
§ ५१७. 'च'शब्दः प्रकृतसमुच्चयार्थः । तेन व्यन्तराणामपरा स्थितिर्दशवर्षसहस्राणीत्यव-
गम्यते ।
§ ५११. शंका-सूत्र में 'च' शब्द किसलिए दिया है ? समाधान-प्रकृत विषयका समुच्चय
करनेके लिए 'च' शब्द दिया है। शंका-क्या प्रकृत है ? समाधान-'परतः परतः पूर्वा पूर्वाऽनन्तरा
अपरा स्थितिः' यह प्रकृत है 'च' शब्द से इसका समुच्चय हो जाता है। इससे यह अर्थ प्राप्त होता
है कि रत्नप्रभामें नारकियोंकी उत्कृष्ट स्थिति जो एक सागर है वह शर्कराप्रभामें जघन्य स्थिति
है । शर्कराप्रभामें उत्कृष्ट स्थिति जो तीन सागर है वह वालुका प्रभामें जघन्य स्थिति है इत्यादि ।
§ ५१२. इस प्रकार द्वितीयादि नरकोंमें जघन्य स्थिति कही । प्रथम नरकमें जघन्य स्थिति
कितनी है अब यह बतलाने के लिए आगेका सूत्र कहते हैं-
प्रथम भूमिमें दस हजार वर्ष जघन्य स्थिति है ॥३६॥
§ ५१३. इस सूत्रमें 'अपरा स्थितिः' इस पदकी अनुवृत्ति होती है। तात्पर्य यह है कि
रत्नप्रभा पृथिवीमें दस हजार वर्ष जघन्य स्थिति है।
§ ५१४. अब भवनवासियों की जघन्य स्थिति कितनी है यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं-
भवनवासियों में भी दस हजार वर्ष जघन्य स्थिति है ॥३७॥
§ ५१५. शंका-सूत्रमें 'च' शब्द किसलिए दिया है ? समाधान-प्रकृत विषयका समुच्चय
करनेके लिए। इससे ऐसा अर्थ घटित होता है कि भवनवासियोंकी जघन्य स्थिति दस हजार
वर्ष है।
§ ५१६. तो व्यन्तरोंकी जघन्य स्थिति कितनी है अब यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं-
व्यन्तरों की दस हजार वर्ष जघन्य स्थिति है ॥३८॥
§ ५१७. सूत्रमें 'च' शब्द प्रकृत विषयका समुच्चय करनेके लिए दिया है। इससे ऐसा
अर्थ घटित होता है कि व्यन्तरोंकी जघन्य स्थिति दस हजार वर्ष है।
१. -र्तते । अथ भवन-आ०, दि० १, दि० २ ।
– ४।४२ § ५२५ ] चतुर्थोऽध्यायः १९५
§ ५१८. अथैषां परा स्थितिः का इत्यत्रोच्यते—
परा पल्योपममधिकम् ॥३६॥
§ ५१९. परा उत्कृष्टा। स्थितिव्यन्तराणां पल्योपममधिकम् ।
§ ५२०. इदानीं ज्योतिष्काणां परा स्थितिर्वक्तव्येत्यत आह—
ज्योतिष्काणां च ॥४०॥
§ ५२१. 'च'शब्दः प्रकृतसमुच्चयार्थः । तेनैवमभिसंबन्धः । ज्योतिष्काणां परा स्थितिः
पल्योपममधिकमिति ।
§ ५२२. अथापरा कियतीत्यत आह—
तदष्टभागोऽपरा ॥४१॥
§ ५२३. तस्य पल्योपमस्याष्टभागो ज्योतिष्काणामपरा स्थितिरित्यर्थः ।
§ ५२४. अथ लौकान्तिकानां विशेषोक्तानां स्थितिविशेषो नोक्तः । स कियानित्यत्रोच्यते—
लौकान्तिकानामष्टौ सागरोपमाणि सर्वेषाम् ॥४२॥
§ ५२५. अविशिष्टाः सर्वे ते शुक्ललेश्याः पञ्चहस्तोत्सेधशरीराः१।
इति तत्त्वार्थवृत्तौ सर्वार्थसिद्धिसंज्ञायां चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
§ ५१८. अब व्यन्तरों की उत्कृष्ट स्थिति कितनी है यह बतलाने के लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
और उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है ॥३९॥
§ ५१९. पर शब्दका अर्थ उत्कृष्ट है । तात्पर्य यह है कि व्यन्तरों की उत्कृष्ट स्थिति साधिक
एक पल्य है।
§ ५२०. अब ज्योतिषियों की स्थिति कहनी चाहिए, अतः आगे का सूत्र कहते हैं—
ज्योतिषियोंकी उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है ॥४०॥
§ ५२१. सूत्रमें 'च' शब्द प्रकृतका समुच्चय करनेके लिए दिया है । इससे यह अर्थ घटित
होता है कि ज्योतिषियोंकी उत्कृष्ट स्थिति साधिक एक पल्य है ।
§ ५२२. ज्योतिषियोंकी जघन्य स्थिति कितनी है अब यह बतलानेके लिए आगेका सूत्र
कहते हैं—
ज्योतिषियोंकी जघन्य स्थिति उत्कृष्ट स्थितिका आठवां भाग है ॥४१॥
§ ५२३. इस सूत्रका यह भाव है कि उसका अर्थात् पल्यका आठवां भाग ज्योतिषियोंको
जघन्य स्थिति है ।
§ ५२४. विशेषरूपमें कहे गये लौकान्तिक देवोंकी स्थिति नहीं कही है । वह कितनी है अब
यह बतलाते हैं—
सब लौकान्तिकोंकी स्थिति आठ सागर है ॥४२॥
§ ५२५. इन सब लौकान्तिकोंकी शुक्ल लेश्या होती है । और शरीरकी ऊँचाई पाँच हाथ
होती है।
इस प्रकार सर्वार्थसिद्धि नामवाली तत्त्वार्थवृत्तिमें चौथा अध्याय समाप्त हुआ ॥४॥
१. शरीराः। चतुर्णिकायदेवानां स्थानं भेदः सुखादिकम् । परापरा स्थितिर्लेश्या तुर्याध्याये निरूपितम् । ३५
इति तत्त्वा०सु०, दि० १, मि० २, आ० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri