सर्वार्थसिद्धि: तत्त्वार्थसूत्र (आचार्य पूज्यपाद - पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री सविस्तार हिन्दी टीका)
Sarvarthasiddhi of Acharya Pujyapada on Tattvartha Sutra with Commentary
आचार्य उमास्वामी / पूज्यपाद (टीकाकार: पं. फूलचन्द्र सिद्धान्तशास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८४ सर्वार्थसिद्धौ [ ४।१९ § ४७९ -
नामेन्द्रः स्वभावतः । तस्य निवासः कल्पो माहेन्द्रः । तत्साहचर्यादिन्द्रोऽपि माहेन्द्रः । एवमुत्तरत्रापि
योज्यम् । आगमापेक्षया व्यवस्था भवतीति 'उपर्युपरि' इत्यनेन द्वयोर्द्वयोरभिसंबन्धो वेदितव्यः ।
प्रथमो सौधर्मेशानकल्पौ, तयोरुपरि सानत्कुमारमाहेन्द्रौ, तयोरुपरि ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरौ, तयोरुपरि
लान्तवकापिष्ठौ, तयोरुपरि शुक्रमहाशुक्रौ, तयोरुपरि शतारसहस्रारौ, तयोरुपरि आनतप्राणतौ,
तयोरुपरि आरणाच्युतौ । अद्य उपरि च प्रत्येकमिन्द्रसंबन्धो वेदितव्यः । मध्ये तु प्रतिद्वयम् ।
सौधर्मेशानसानत्कुमारमाहेन्द्राणां चतुर्णां चत्वार इन्द्राः । ब्रह्मलोकब्रह्मोत्तरयोरेको ब्रह्मा नाम ।
लान्तवकापिष्ठयोरेको लान्तवाख्यः । शुक्रमहाशुकयोरेकः शुक्रसंज्ञः । शतारसहस्रारयोरेकः
शतारनामा । आनतप्राणतारणाच्युतानां चतुर्णां चत्वारः । एवं कल्पवासिनां द्वादश इन्द्रा
भवन्ति । जम्बूद्वीपे महामन्दरो योजनसहस्रावगाहो³ नवनवतियोजनसहस्रोच्छ्रायः । तस्याधस्ताद-
धोलोकः । बाहुल्येनें तत्प्रमाणैस्तिर्यक्प्रसृतस्तिर्यग्लोकः । तस्योपरिष्टादूर्ध्वलोकः । मेरुचूलिका
चत्वारिंशद्योजनोच्छ्राया । तस्या उपरि केशान्तरमात्रे व्यवस्थितमृजुविमानमिन्द्रकं सौधर्मस्य ।
सर्वमन्यल्लोकानुयोगाद्वेदितव्यम् । 'नवसु ग्रैवेयकेषु' इति नवशब्दस्य पृथग्वचनं किमर्थम् ।
अन्यान्यपि नवविमानानि अनूदिशसंज्ञकानि सन्तीति ज्ञापनार्थम् । तेनानुदिशानां ग्रहणं वेदितव्यम् ।
पड़ा और इसके सम्बन्धसे इन्द्र भी सानत्कुमार कहलाता है । इन्द्रका माहेन्द्र नाम स्वभावसे है ।
वह इन्द्र जिस कल्पमें रहता है उसका नाम माहेन्द्र है । और इसके सम्बन्धसे इन्द्र भी माहेन्द्र
कहलाता है। इसी प्रकार आगे भी जानना । 'व्यवस्था आगमके अनुसार होती है इसलिए 'उपर्यु-
परि' इस पदके साथ दो दो कल्पोंका सम्बन्ध कर लेना चाहिए । सर्वप्रथम सौधर्म और ऐशान
कल्प हैं। इनके ऊपर सानत्कुमार और माहेन्द्र कल्प है । इनके ऊपर ब्रह्म और ब्रह्मोत्तर कल्प हैं।
इनके ऊपर लान्तव और कापिष्ठ कल्प हैं। इनके ऊपर शुक्र और महाशुक्र कल्प हैं। इनके ऊपर
शतार और सहस्रार कल्प हैं । इनके ऊपर आनत और प्राणत कल्प हैं। इनके ऊपर आरण और
अच्युत कल्प हैं। नीचे और ऊपर प्रत्येक कल्पमें एक एक इन्द्र है तथा मध्यमें दो दो कल्पोंमें एक
एक इन्द्र है। तात्पर्य यह है कि सौधर्म, ऐशान, सानत्कुमार और माहेन्द्र इन चार कल्पोंके चार
इन्द्र हैं । ब्रह्मलोक और ब्रह्मोत्तर इन दो कल्पोंका एक ब्रह्म नामका इन्द्र है। लान्तव और कापिष्ठ
इन दो कल्पोंमें एक लान्तव नामका इन्द्र है। शुक्र और महाशुक्रमें एक शुक्र नामका इन्द्र है।
शतार और सहस्रार इन दो कल्पोंमें एक शतार नामका इन्द्र है। तथा आनत, प्राणत, आरण
और अच्युत इन चार कल्पोंके चार इन्द्र हैं। इस प्रकार कल्पवासियोंके बारह इन्द्र होते हैं।
जम्बूद्वीप में एक महामन्दर नामका पर्वत है जो मूलमें एक हजार योजन गहरा है। और
निन्यानबे हजार योजन ऊँचा है। उसके नीचे अधोलोक है। मेरु पर्वतकी जितनी ऊँचाई है उतना
मोटा और तिरछा फैला हुआ तिर्यग्लोक है। उसके ऊपर ऊर्ध्वलोक है, जिसकी मेरु चूलिका
चालीस योजन विस्तृत है। उसके ऊपर एक बालके अन्तरसे ऋजुविमान है जो सौधर्म कल्पका
इन्द्रक विमान है। शेष सब लोकानुयोगसे जानना चाहिए। शंका - 'नवसु ग्रैवेयकेषु' यहाँ 'नव'
शब्दका कथन अलगसे क्यों किया है ? समाधान - अनुदिश नामके नौ विमान और हैं इस बातके
बतलानेके लिए 'नव' शब्दका अलगसे कथन किया है। इससे नौ अनुदिशोंका ग्रहण कर
लेना चाहिए ।
विशेषार्थ-यद्यपि पहले वमानिक निकायके बारह भेद कर आये हैं और यहाँ सोलह भेद
गिनाये हैं इसलिए यह शंका होती है कि इनमें से कोई एक कथन समीचीन होना चाहिए ? समा-
१. द्वयमेकम् मु० । २. ब्रह्मेन्द्रो नाम मु० । ३. -गाहो भवति नव मु०, ता०, ना० । ४. बाहुल्येन मु०, ता०,
ना०, दि० २ । ५. तत्प्रमाण (मेरुप्रमाण) स्तिर्य-मु० । ६. -वचनं अन्या- ता०, ना० । ७. - मानानि
सन्तीति आ०, ता०, ना० ।
CC-0 Pt. Chakradhar Joshi and Sons, Dev Prayag. Digitized by eGangotri